जूठन (दूसरा खंड) में व्याप्त अस्मिता और विद्रोह

आनन्द दास

आनन्द दास

अतिथि प्रवक्ता (बी.एड. विभाग), एजेसी बोस कॉलेज, कोलकाता
चलभाष: +91 980 455 1685
ईमेल: anandpcdas@gmail.com

           दलित साहित्य के प्राणतत्व वेदना, नकार, और विद्रोह हैं, जिससे साहित्य को अस्मिता, सौंदर्य एवं सामर्थ्य प्राप्त होता है। दलितों की अस्मिता जातीय स्वाभिमान और अस्तित्व से जुड़ा है। दलित अस्मिता की एक प्रमुख पहचान यह है कि दलितों में अपनी स्थिति के प्रति, अपनी जातीय स्थिति के प्रति एक विशेष पहचान की भावना उत्पन्न हुई है। अपनी अस्मिता की रक्षा विद्रोह करना जरूरी है पर वह विद्रोही स्वरूप किसी को मारना-पीटना, अत्याचार करना या समाज में दरार पैदा करना नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय व समता के लिए प्रतिबद्ध रहना है। एक दलित अपनी अस्मिता की रक्षा तभी कर पाएगा जब उसमें चेतना और विद्रोह की भावना होगी। दलितों की अस्मिता और विद्रोह की अभिव्यक्ति जूठन (दूसरा खंड) में हुई है जिसका मैंने अध्ययन व विश्लेषण करने का सार्थक प्रयास किया है। जूठन भाग-2 की शुरुआत लेखक की तबादले की घटना से होती है। सबसे पहले आमप्रकाश वाल्मीकि देहरादून में ही रहते थे पर तबादले के कारण उन्हें महाराष्ट्र के चंद्रपुर ऑर्डनेंस फैक्टरी में जाना पड़ा था। पर अब तबादले के बाद वापस वे उसी देहरादून की फैक्टरी में आ गए। वापस पुराने फैक्टरी में आने के कारण लेखक बहुत खुश थे। फैक्टरी में पुराने कर्मचारी भी मिलते हैं जिनसे लेखक बातचीत कर आनंद का एहसास करते हैं। वे लगभग सतरह साल बाद देहरादून फैक्टरी में वापस आए हैं। उन्हें एहसास होता है कि एक दलित होने के नाते किसी फैक्टरी में वापस आना वो भी एक सम्मानित पद पर कम बड़ी बात नहीं थी। पर ओमप्रकाश वाल्मीकि का टाइटल 'वाल्मीकि' होने के कारण फैक्ट्री के सवर्णों को रास नहीं आ रहा था। वे लिखते हैं, "लोगों में मेरे उपनाम को लेकर एक अजीब तरह की सुगबुगाहट है, जिसे कानाफूसी कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्यों कि मेरी जाति के किसी व्यक्ति को इस पद पर देखने के वे अभ्यस्त ही नहीं थे। ऊपर से 'वाल्मीकि' उपनाम उनके गले ही नहीं उतर रहा था। एक अजीब-सी स्थिति थी। मैं एक सम्मानित पद पर इस फैक्टरी में आया हूँ, वह भी एक विशिष्ट योग्यता के साथ। यह बात लोगों के गले ही नहीं उतर रही थी। वे इसे आरक्षण द्वारा मिलने वाली सुविधाओं के साथ जोड़कर देख रहे थे।"1 सवर्ण कर्मचारियों को केवल इतना लगता है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित होने के कारण आरक्षण के बल पर यहाँ इस पद तक पहुँचे हैं, बाकि उनकी पढ़ाई-लिखाई, जानकारी, प्रशिक्षण, अनुभव सबके सब बेकार हैं। देहरादून आने के बाद वहाँ की परिस्थिति पहले जैसे (सतरह साल) बिल्कुल नहीं थी, समयानुसार बहुत कुछ बदल चुका था पर एक चीज नहीं बदली वह थी 'लोगों की मानसिकता' और 'जातिवादी सोच'

        ओमप्रकाश वाल्मीकि अफसर बनकर दोबारा देहरादून ट्रांसफर होकर आ जाते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि के सिर पर ग्रुप डी सरकारी कर्मचारी नहीं रहते हैं। बल्कि उन पर अफसर होने का सरकारी तैग लगा रहा रहता। ससुराल वाले लोग सासु माँ से कहते, "मेरी बेटी और दामाद देहरादून आ गए हैं। दामाद बम्ब फैक्टरी में अफसर हैं।"2 जाहिर है ओमप्रकाश 'वाल्मीकि' जाति होने के बावजूद भी एक अफसर हैं, इस पर सभी को गर्वबोध होता है। पर उनका कहने का तरीका जरा हास्यास्पद-सा प्रतीत होता है पर वे कम पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोग हैं उनका वही तरीका है। लेखक इतने बड़े अफसर होने के बावजूद भी उन्हें एक किराए का घर नसीब नहीं होता है। लेखक अपनी दुख की व्यथा हास्यास्पद तरीके से कह देता है, "ऐसा अफसर जिसके पास सिर छिपाने के लिए घर तक नहीं है, जो किराए के मकान के लिए दर-दर भटक रहा है, जिसे कोई भी अपना मकान किराए पर देने को तैयार नहीं है।"3 उन्हें अफसर होने का बाहर से तो गर्व है पर भीतर ही भीतर उन्हें अपनी अस्मिता पर प्रश्न उठाता है। गहराई से उनकी बातों को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि एक अन्य जाति के व्यक्ति को साधारण से साधारण व्यक्ति क्यों न हो पर किराए का मकान मिल जाता है पर एक दलित का अफसर होने के बाद भी आसानी से किराए का मकान भी नहीं मिलता है। उन्हें अपने आप ही अस्मिता की बात भीतर से टटोलती है।

           रोटी, कपड़ा और मकान एक इन्सान होने के नाते उसका अधिकार है। ओमप्रकाश जी रोटी और कपड़ा की व्यवस्था अपनी मेहनत, लगन और संघर्ष से ससम्मान प्राप्त करते हैं, पर घर-गृहस्थी चलाने के लिए एक मकान की जरूरत होती हे। लेखक को किराए का मकान लेने के लिए महीने भर भटकना पड़ता है पर मकान नहीं मिलता है। वैसे सरकारी मकान या फैक्टरी की आवासीय कॉलोनी भी मिलती है पर तत्कालीन में कॉलोनी की बढ़ी मात्रा में कमी थी और नई कॉलोनियां तैयार होने में काफी समय लगता इसी वजह से अलग किराए का मकान ओमप्रकाश वाल्मीकि खोज रहे थे। घर में सामान की भरमार थी और उचित मकान नहीं मिलने के कारण सभी सामानों को परिवार के लोगों के यहाँ ठिकाना लगा देते हैं। एक दलित होने के कारण मकान के लिए महीने भर भटकना पड़ता है और न जाने कितना संघर्ष करना पड़ता। इस परिस्थिति में मानसिक तौर पर उनकी हालत क्या होगी सरलता से जाना जा सकता है। उनके मित्र मकान के लिए अक्सर चक्कर लगाते और उन्हें भी खाली हाथ ही लौटना पड़ता। वह जाति के कारण मकान नहीं मिला यह बात खुल कर नहीं बताते पर धीरे-धीरे ओमप्रकाश वाल्मीकि  को समझ में आने लगता है। जब भी, जहाँ भी गए वहाँ सबसे पहल जाति पूछी जाती है। वे मकान मालिक और तत्कालीन प्रसंग की बातों को बताते हैं, "ना जी, किसी चूहड़े-चमार को हम मकान नहीं देंगे। इस उत्तर पर उलटे पाँव लौटना पड़ता था। मन में ढेर-सी कुंठाएँ लेकर वापस आ जाते थे। तंग आकर मेरे कई मित्रों ने यह भी सुझाव दिया था, यार! तेरे माथे पर लिखा है कि तू एस.सी. है, मत बता, तुझे देखकर कोई कहेगा कि तू कौन है?''4 यह सब बात सुनकर लेखक अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं। वे अपने स्वाभिमान और अस्मिता की रक्षा के लिए झूठ बोलकर मकान लेना उचित नहीं समझते हैं। उन्हें मकान नहीं मिलने पर वह अपने आप नहीं कोसते हैं बल्कि आधुनिक कहे जाने वाले पढ़े-लिखे लोगों को कोसते हैं और खासकर देहरादून जैसे पढ़े-लिखे लोगों के शहर को धिक्कारते हैं।

          देहरादून के ऑर्डनेंस फैक्टरी के डिजाइन आफिस में ओमप्रकाश वाल्मीकि की नियुक्ति डिजाइन आफिसर के तौर पर होने के बाद ऑफिस में मौजूद दलित और गैर दलित कर्मचारियों को नहीं लगता कि वह अपना काम कर पाएँगे। कुल मिलाकार ऐसी अचंभित कर देने वाली स्थिति पैदा हो गई थी। ऐसे में वहाँ के लोग ओमप्रकाश जी से मिलने के लिए उत्साहित थे कि कौन है वो दलित और कहाँ से आया है? उसी ऑडेनेंस फैक्टरी में कई ऐसे काबिल दलित थे पर वे अपना परिचय कभी ऑफिस में नहीं बताते, वैसे ही किस्म के दो दलित कर्मचारी पास ही स्थित विजिलेंस अनुभाग के वरिष्ठ अधिकारी के पी.ए. थे। जिनका नाम रमेश कुमार जी और रामस्वरूप जी था। वे ओमप्रकाश जी का टाइटल जानने के बाद चोरी-छिपे गोपनीय तरीके से मिले थे, आफिस में नहीं बल्कि प्रशासनिक भवन के गलियारे में, उसमें भी भय के कारण इधर-उधर ताकते कहीं कोई देख न ले। इस तरीके को देखकर ओमप्रकाश जी मधुर भाव में कहते हैं - "यदि मेरे साथ बात करने से आपकी प्रतिष्ठा पर आँच आती है तो कृपया आगे से हम नहीं मिलेंगे। आप लोगों को समाज से डर लगता है तो लगे, मुझे नहीं लगता।''5 यह बात कहने के बाद ओमप्रकाश जी को समझाने लगते हैं और कहते हैं नए-नए हो आप इसलिए आपको पता नहीं है कि यहाँ कर्मचारी की जाति जान जाने के बाद उनके साथ बुरा व्यवहार करने लगते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि जब इन सब बातों को सुनते हैं तब उनसे रहा नहीं जाता है और विद्रोही स्वर में कहते हैं - "देखिए जाति को लेकर समाज में जो स्थिति है, मैं उससे इन्कार नहीं कर रहा हूँ। लेकिन जितना डरोगे, लोग उतना ही तुम्हें डराएँगे। एक बार मन से डर निकाल दो, फिर देखो, तुमसे डरने लगेंगे। डर-डरकर हजारों साल से जी रहे हो, क्या मिला? पढ़-लिखकर अच्छे पद पर काम कर रहे हो, फिर भी डरे हुए हो, अपने भीतर के हीनताबोध से बाहर आकर देखो। भाई! यह भी कोई जिंदगी है। हर वक्त सिर्फ इस चिंता में घुलते रहो कि सामने वाला आपकी जाति के कारण आपके साथ गलत व्यवहार कर रहा है। जरा एक बार विरोध करके तो देखो, शायद स्थिति में कोई अंतर आ जाए। जिस बात से टकराना चाहिए, उससे डरकर भाग रहे हो, क्यों? इससे मुक्त होने का क्या यही रास्ता बचा है कि समस्या से पलायन करके भाग लो। इससे क्या समस्या खत्म हो गई! नहीं, खुलकर कहो, जो भी कहना है, अपनी काबिलीयत साबित करो, स्थितियाँ बदलेंगी, यही तो जीवन-संघर्ष है।''6  जब कटाक्ष और विद्रोह भरे स्वर में वाल्मीकि जी बोल रहे थे तब वे दोनों बिना कुछ कहे चुपचाप सुन रहे थे। उनकी चुप्पी केवल इसलिए नहीं थी कि लेखक उन्हें अपनी जातीय पहचान के लिए संघर्ष करने तथा सामाजिक यथार्थ से रू-ब-रू करा रहे थे। उनकी चुप्पी का सबसे बड़ा कारण था कि वे अपनी जाति छुपाते हुए उन्हें शर्मिंदा होना पड़ रहा था। पर उनके बारे में लेखक को बाद में पता चलता है कि वे दोनों, कर्मचारी सरकारी खाते में या आफिस में 'वाल्मीकि' यानी एक दलित हैं। पर सरकारी आफिस की दुनिया से बाहर निकलते ही वे सरकारी बाबू वाल्मीकि या दलित नहीं रहते। वे अपनी जाति छिपाते हुए 'ईसाई' बन कर रहते हैं। वे अपनी जाति बदलकर समाज के सामने गलत फहमियों में जीते हैं। लेखक इन जैसे पढ़े-लिखे बाबुओं या सरकारी अफसरों को कोसते हैं। यही वे लोग हैं जो समाज में परिवर्तन ला सकते हैं नहीं तो भला क्या एक अनपढ़ या अज्ञानी दलित समाज का व्यक्ति लाएगा? इस प्रकार लेखक उन दोनों दलित कर्मचारी से मिलने पर खुशी से ज्यादा दुख अनुभव करते हैं और निराश हो जाते हैं।

          मकान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ओमप्रकाश वाल्मीकि लंबे दिनों तक परेशान थे उसी क्रम में उनके प्रिय मित्र विजय बहादुर और अनिल भारद्वाज मकान दिलवाने के प्रयास में उनका साथ निभा रहे थे। विजय बहादुर मकान दिलाने के लिए मकान मालिक से करीबी मित्र कहकर सिफारिश कर चुका था और वह मालिक मकान देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं परंतु उनकी जाति का पता चलते ही सामाजिक बदनामी की दुहाई देकर साफ मना कर देते हैं। विजय उनकी बातों को सुनकर आग बबुला हो जाते हैं। विजय स्वयं गैरदलित है पर वह कभी भी जातिवादी मानसिकता नहीं रखते और न ही लेखक के साथ जातिवादी व्यवहार करते हैं। विजय स्वयं बताते हैं कि खाने-पीने से लेकर रहन-सहन और रिश्तेदारी जैसा संपर्क है; ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के साथ कभी भी जाति अड़ंगा नहीं लगाई है। विजय जब स्वयं को धिक्कारते हैं कि किस प्रकार के लोग से मेरा परिचय हो गया तभी मकान मालिक कुछ कहने का प्रयास करता है तब उनका आक्रोश और विद्रोह किसी दलित से कम नहीं दिखाई देता है। तब विजय विद्रोह करते हुए कहते हैं - "एक ही शब्द मुँह से निकाला तो मैं भूल जाऊँगा कि आपसे मेरा परिचय रहा है। पंजाब के लंबरदार का बेटा हूँ...तेरे जैसे घटिया आदमी से मेरे बापू अपने डंगरों को चारा भी नहीं डालने देते, तू है कौन?...जो जात पूछता है....''7 इससे स्पष्ट होता है कि जातिवादी व्यवहार असमानता का द्योतक है। मानवीय मूल्यों को मानने वाले व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो, इस प्रकार के अप्रिय और अमानवीय व्यवहार को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। इस विद्रोह से एक चीज स्पष्ट हो जाती है कि विद्रोह कोई जानबूझ कर, सोच-समझ कर, दिमाग लगाकर, रणनीति तय कर नहीं होता बल्कि यह परिस्थिति अनुरूप व्यवहारगत आचरण के कारण स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

          आवासीय मकान न मिलने पर पहले ओमप्रकाश वाल्मीकि ने वाजपेयी का जवाब दिया था। महेंद्र वशिष्ठ को पूरे घटनाक्रम की जानकारी होने के बाद उनसे रहा नहीं जाता और वे वार्ष्णेय जी से खूब झगड़ा करते हैं। अब वार्ष्णेय जी ओमप्रकाश वाल्मीकि को सबक सिखाने के लिए तुगलकी फरमान जारी करते हैं यानी उन्हें गोपनीय तरीके से ऑफिशियल पत्र भेजते हैं, काम का दबाव बढ़ाकर। असल में ओमप्रकाश वाल्मीकि को दुकानदारों पर बकाया किराया वसूलने का काम सौंपा गया था, उसी कार्य को जल्द से जल्द करने और उसकी रपट सौंपने का तुगलकी फरमान जारी किया था। दरअसल जी.सी.एफ मार्केट में दुकानों का किराया वसूलना टेढ़ी अंगुली से घी निकालने के बराबर था। वहाँ पिछले कई सालों से सरकारी प्रशासन से लेकर पुलिस तक किराया वसूल नहीं कर पाई थी। उसी काम के लिए वाल्मीकि जी को लगाया जाता है, साथ ही समय और सिक्योरिटी दोनों न के बराबर दी जाती है तो भला यह काम कैसे करे बहुत बड़ी समस्या मंडरा रही थी। ओमप्रकाश वाल्मीकि सबसे पहले स्टाफ और वर्कर्स को अपने विश्वास में लेने की कोशिश करते हैं और विद्रोही रूख अपनाते हुए कहते हैं, "क्या मुझे भी डरकर चुप बैठ जाना चाहिए? यदि आप सबकी राय 'हाँ' है तो मुझे यह नौकरी ही छोड़ देनी चाहिए, ऐसी मेरी राय है। यह मेरे लिए एक चैलेंज है, आपमें से जो भी यह सोचता है कि उसे यह काम नहीं करना है, वह खुलकर बता सकता है, जो इस कठिन और खतरे के काम में मेरे साथ खड़ा होना चाहता है, वह बताए। किसी पर कोई दबाव नहीं है।''8 मार्केट के दुकानदारों से सरकारी किराया वसूलते वक्त लड़ाई-झगड़ा और गुंडागर्दी होती थी। इन चीजों का खौफ स्टाफ और वर्कर्स के चेहरे पर साफ झलकती थी, पर वाल्मीकि जी मामले की गंभीरता को देखते हुए विद्रोही भाव अपनाते हुए किराया वसूलने की ठानते हैं। उनका विद्रोही काम उन गुंडगर्दी करने वाले लोगों और दुकानदारों पर किसी आक्रोश के साथ अभिव्यक्त नहीं होता है। वे अपने ऑफिस में चाय-समोसे पर बुलाकर प्रेमपूर्वक बातचीत करने के बाद मामले को सुलझा देते हैं तथा किराया वसूलते हैं। स्पष्ट है विद्रोही भाव केवल आक्रोश, आवेग और नफरत में केवल प्रकट नहीं होती है, बल्कि विद्रोही भाव मन में रख कर प्रेम व आदर के माध्यम से भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। अत: इस प्रकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने जूठन (दूसरा खंड) के माध्यम से समाज में व्याप्त अस्मिता और विद्रोह को दर्शाया है। 
             
                संदर्भ-सूची
1. वाल्मीकि ओमप्रकाश, जूठन - दूसरा खंड, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, प्रथम संस्करण - 2015, पृष्ठ संख्या -14
2. वही, पृष्ठ संख्या - 24
3. वही, पृष्ठ संख्या - 24
4. वही, पृष्ठ संख्या - 29
5. वही, पृष्ठ संख्या - 17
6. वही, पृष्ठ संख्या - 17-18
7. वही, पृष्ठ संख्या - 32
8. वही, पृष्ठ संख्या - 103

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