उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नवोन्मेष एवं गुणवत्ता की पुनर्स्थापना

मंजु अरोरा

- मंजु अरोरा


सारांश (Abstract):
                                   मनुष्य ने जब स्वयं का महत्त्व जाना, अपने विवेक की उपयोगिता और उसके मूल्य को  समझा, कि वह प्राणियों में अपने विवेक के रहते श्रेष्ठ और पृथक है, तो उसने सभ्यता और संस्कृति की राह  पकड़ कर एक व्यवस्था की सृजना की, और स्वयं को परम सत्ता की सर्वश्रेष्ठ कृति बनाने के लिए शिक्षा तथा ज्ञान का मार्ग चुना। चूँकि शिक्षा मनुष्य को शिक्षित ही नहीं बनाती, वह उसमें मनुष्य होने का भाव भी भरती है। केवल मानव देह को ही मानव होना नहीं कहा जा सकता, मानव को वास्तविक मानव शिक्षा की  गुणवत्ता ही बनाती है। अत: शिक्षा की उपयोगिता और उसका अर्थ, जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं! संचालित करते हैं! इस तथ्य को समझने का प्रयास कालों से किया जा रहा है। ज्ञातव्य हो कि यह विषय जीवन की तरह निरंतन है, अत: यह विवेचन भी सतत किया जाता रहेगा। व्यक्ति जीवन की कौन सी दिशा का चुनाव कर के अपने व्यक्तित्व का ताना बाना बुनता है? अपने व्यवहार के लिए किन  मूल्यों का चयन करता है? वह उसके द्वारा प्राप्त शिक्षा की गुणवत्ता ही है, जिसमें उसके जीवन की क्रिया-प्रतिक्रिया-व्यवहार-दिशा आदि प्रतिबिम्बित होते हैं। उसका रुझान, उसके आचरण और स्वभाव का पता उसकी शिक्षा से ही तो निर्धारित होता है! इसलिए किसी भी तरह मानवीय जीवन में शिक्षा और मूल्यों की उपस्थिति और उनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। अब यदि शिक्षा की अनिवार्यता को समझ पाते हैं, तो शिक्षा का स्वरूप कैसा हो? यह देखना भी आवश्यक है? यदि इसके चुनाव में गफलत कर दी तो भीड़ का हिस्सा बन, अजनबी और अनुपयोगी जीवन जीने के सिवा कोई और विकल्प नहीं रह जायेगा। इसलिए शिक्षा के सामयिक  स्वरूप को समझना, उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता को अपने शास्त्रों के अनुरूप ग्रहण करके ही जीवन का सार प्राप्त करने के योग्य होना वास्तविक मानव होना है।  

बीज शब्द : (Key Words): शिक्षा, संस्कृति, स्वभाव, प्रभावित, मूल्य, क्रिया-प्रतिक्रिया, सर्वश्रेष्ठ,
                                                    चुनाव, मानवीय, मनोविज्ञान, चेतना, आनंद, अध्यात्म, बौद्धिकता

भूमिका: (Introduction):
                                            मनुष्य का जब जन्म होता है तो वह अन्य प्राणियों से भी अधिक निरीह अवस्था में होता है। जन्म के तुरंत बाद, अन्य प्राणी स्वयं उठ के खड़े हो जाते हैं, किन्तु एक मनुष्य ही ऐसा है, जिसे सब कुछ सीखना पड़ता है। यहाँ इस बात को स्वीकार करते हुए, यह समझना होगा कि अन्य प्राणियों को कुछ सीखना नहीं है। उनके जीवन की नैसर्गिकता ही उनका स्थाई स्वभाव है। पर मनुष्य यदि जन्म समय असहाय है, तो उसका गूढ़ अर्थ है, उसके पास कुछ सीखने की गुणवता है - और भूलें नही तो यह गुण जीवन भर के लिए उसे परमपिता ने दिया है। कितना बड़ा वरदान है यह! सारी  जिन्दगी सीख सकने का! लेकिन इसे  सब जानते हुए भी, कौन हैं, जो इस वरदान को समझ कर इसका सदुपयोग कर पाते हैं?
                                      सीखना यानी शिक्षा, अर्थात शिक्षित होना। जीवन भर चल सकने वाला, मिल सकने वाला आशीर्वाद! तो शिक्षा ही मनुष्य को खड़ा होना सिखाती है। चाहे माँ के मुख से निकले शब्द हों, चाहे गुरु के शब्दों से मिली सीख, अथवा पुस्तकों का अंतहीन-अनहद ज्ञान। मनुष्य को मनुष्य बनाने में बाकी सभी बातों से अलहदा शिक्षा ही सबसे अधिक योगदान देती है। उसके मानवीय गुणों का दर्पण दिखाती, उसे पूर्ण व्यक्तित्व और व्यक्ति में परिवर्तित करती है शिक्षा। इसके महत्त्व को किसी भी प्रकार कमजोर अथवा महत्वहीन नहीं समझा जा सकता, वरन इसकी गुणवत्ता की बेहतरी से व्यक्तित्व को सँवारा निखारा  जा सकता है। जिससे व्यक्तित्व का अलंकरण हो सके।

विश्लेषण : (Explanation):
                           कहते हैं-व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व केवल उसके विचारों से नहीं वरन व्यवहार से भी संचालित होता है। अब विचारणीय यह है, कि व्यवहार को दिशा-निर्देश कहाँ से प्राप्त होते हैं? वह कौन से मूल्य हैं, जिनसे मनुष्य अपने कार्य-व्यवहार को व्यवस्थित करता है? कौन है? क्या है? जो उसे बताता है, कि कैसे आचरण मूल्यपरक हैं, और कौन से आचरण मूल्य विरोधी? इन सब आचरणों की व्याख्या से पहले यह आवश्यक होगा, कि शिक्षा की अपरिहार्यता के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता को भी चिंतन क्षेत्र में सम्मिलित  किया जाए।
                         सामयिक संदर्भों की चर्चा करने से पूर्व एक शास्त्र-गत पौराणिक उदाहरण लेते हैं। रामायण की तरह महाभारत भी भारतीय संस्कृति का पौराणिक ग्रन्थ ही नहीं जीवन मूल्यों की अनवरत गाथा है। डॉ. नरेंद्र कोहली ने इस महागाथा पर आधारित नौ खण्डों में एक महा-उपन्यास लिखा – ‘महासमर’। इसी उपन्यास के द्वितीय खंड-अधिकार से उद्धृत एक उदाहरण है। कुरु राजकुमारों को अपनी शिक्षा के लिए गुरु कृपाचार्य के पास भेजा जाता है। कुछ काल उपरांत पितामह भीष्म उनकी शिक्षा के विषय में पूछने के लिए गुरु के आश्रम में जाते हैं। और उनसे पूछते हैं कि उन्हें कौन सी विद्याएँ सिखायीं जा रही हैं। आचार्य से चर्चा करते हुए वह उन्हें अपने अनुभव के अनुरूप परामर्श देते हुए कहते हैं, “आचार्य! क्षत्रिय के लिए शस्त्र-ज्ञान भी आवश्यक है और शस्त्र-परिचालन का अभ्यास भी; किन्तु उससे भी अधिक आवश्यक है, न्याय और अन्याय का ज्ञान, धर्म और अधर्म का निर्णय। क्षत्रिय का शस्त्र केवल अन्याय के प्रतिरोध में ही उठना चाहिए। क्षत्रिय यदि न्यायालय के निर्णय के बिना शस्त्र-परिचालन का अभ्यस्त हो जायेगा, तो वह दस्यु हो जायेगा। ... मैं चाहता हूँ कि चाहे वे युद्ध-विद्या सीखें, चाहे क्रीड़ा में भाग लें, चाहे शास्त्र-ज्ञान प्राप्त करें, चाहे प्रतिस्पर्धाओं में व्यस्त रहें; किन्तु इन सबके माध्यम से वे परस्पर एक-दूसरे के निकट आयें, स्नेह करना सीखें, दूसरे की सुख सुविधा के लिए त्याग और बलिदान करना सीखें। उनमें स्वार्थ-शून्यता तथा सहिष्णुता का भी विकास होना चाहिए। अच्छे योद्धा बनने से पहले वे अच्छे मानव बनें।...अपना मानसिक और शारीरिक विकास करें, किन्तु दूसरों के गुणों का भी आदर करना सीखें। उनमें पूज्य के प्रति पूजा का भाव जागृत हो। उन्हें अपना रक्त देकर प्रजा का पालन करने वाले, अपना सुख-भोग त्याग, निर्बलों की रक्षा करने वाले क्षत्रिय बनाना। ऐसा न हो कि इनके कारण कुरुकुल किसी भी रूप में कलंकित हो।”
                      उपरोक्त उदाहरण इस बात का द्योतक है कि शिक्षा अनिवार्य है। लेकिन उसकी अनिवार्यता के साथ कुछ और बातें भी ध्यान योग्य हैं! शिक्षा क्यों और कैसी? कैसा मानव? कैसे व्यवहार? कैसा समाज? और परिपूर्णता में कैसा अचार-विचार? क्या बन कर उत्पन्न हुए? और क्या हो जाने की योग्यता मिली है? और क्या हो सके हम? इन सब का ब्यौरा ही तो आकलन अर्थात Audit कहलाता है न? तो कब किया हम ने अपना आकलन? और प्रत्येक मानव जानता है, इस आकलन की आवश्यकता उत्तम जीवन के लिए, वास्तविक मानव बनने के लिए, निर्विरोध रूप से आवश्यक है। तभी तो यह आकलन जैसा शब्द शिक्षा में प्रवेश पा सका। शिक्षा देने वाला इस बात के प्रति आग्रही रहता ही है कि उसका शिक्षित किया पात्र-छात्र समाज का कल्याण करे और गुरु को सम्मान दे। लेकिन इसके उलट यदि छात्र-पात्र समाज विरोधी कार्य करता है तो गुरु पहले कलंकित होता है। तभी भीष्म शिक्षा के द्वारा कुरु कुल के  कल्याण की  और राजकुमारों के ज्ञान द्वारा सद्भाव की कामना और स्थापना की कल्पना करते हैं।
                          महासमर के मुख्य पात्र युधिष्ठिर तो राज्य की व्यवस्थाओं में भी शिक्षा के नीतिगत और नैतिक रूप को और जन कल्याण को अधिक प्रश्रय देते हैं। वह सदैव उत्तम वृतियों के पक्षधर बन कर विचार करते हैं। उनके अनुसार, “राज्य, मानव-कल्याण के लिए नीतियां बनाये तो मनुष्य को मनुष्य मान कर ही बनाये, उसे पशु मान कर नहीं। यदि हम दूषित वस्तुओं पर प्रतिबंध लगायेंगे और मनुष्य की सद्वृत्तियों को प्रेरित करेंगे, तो कोई कारण नहीं है कि मानव-मन का उचित विकास न हो।”2
                            अब विचार करें तो पाएंगे कि युधिष्ठिर भी उसी उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना की बात करते हैं। मुख्यत: राज्य एवं मानवीय  व्यवहार के आकलन की ही बात कर रहें हैं। और यह होगा तभी, जब ज्ञान के उच्च संवेदनात्मक रूप को शिक्षा के अंदर समाहित किया जायेगा।
                              सामान्य रूप में जब हम किसी से बात करते हैं और उसकी शिक्षा की बात करते हैं तो यही पूछा जाता है, ‘कितना पढ़ा लिखा है?’ डिग्री की ही बात होती है न? इन्हीं उपाधियों से ही व्यक्ति के उच्च शिक्षित होने अथवा न होने का मापदंड होता है? प्रश्न है, अब उच्चता का आकलन कैसे हो? सिर्फ डिग्री की उच्चता देख कर अथवा व्यक्ति आचरण की उच्चता देखकर! यह विचारणीय है?
                              हम सभी जब व्यवहार करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि जो व्यवहार हम अन्य लोगों से स्वयं के लिए अपेक्षित करते हैं वह हमें भी तो प्रदर्शित करना होगा! उसके योग्य हमें भी तो होना होगा! तथ्य यह है कि इस व्यवहार का ज्ञान हमें कैसे प्राप्त होगा? वास्तविक शिक्षा का आधार तो यही होना चाहिए और उच्च शिक्षा के पड़ाव पर इस की पुनर्स्थापना पुन: जागृत करनी होगी, तभी समाज का पुनरुत्थान-पुनर्जागरण और नव स्वरूप सृजित होगा।
                              डॉ. रामजी लाल सहायक रचित कबीर दर्शन पुस्तक के लिए शुभ कामना देते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री चन्द्र भानु गुप्त ने शिक्षा की उच्चता पर अपने उद्गार इस प्रकार प्रकट किये, “पूर्ण विश्व की सभी हलचलों का एकत्व, मानव के पावन और परिशुद्ध रूप का स्थापत्य, समाज के सर्वोत्कृष्ट कल्याणमय स्वरूप का निर्माण तथा समाज के कल्याण के लिए निष्काम भाव से कर्म करने का महत्त्व-संपादन। क्या ज्ञान, क्या योग, क्या भक्ति और क्या कर्मयोग, इन सभी साधना मार्गों का उद्देश्य है – मानव को सच्चा मानव बनाना, स्वकर्तव्य में निष्काम भाव से लगे रहना तथा उसे अपने सत्य स्वरूप को पहचानने में समर्थ बनाना। निष्काम भाव से सर्वहित के कार्यों में लगे रहने से ही मानव को अपने सत्य, नित्य, मुक्त स्वरूप के दर्शन हो सकते हैं।”3   अत: शिक्षा को देकर ही शिक्षक के कार्य की इतिश्री नहीं हो जाती। उसका वास्तविक परिणाम तब देखने को मिलेगा, जब उच्च मानव द्वारा, उच्च मानवीय और बौद्धिक शक्तियां जन-कल्याण के कार्य करती दिखाई देंगी। शिक्षा केवल अपने मार्ग को प्रशस्त नहीं करती, वरन यह वह ज्योति है जो समग्रता से जन-समुदाय को मार्ग दिखाती चलती है।
                               वस्तुत: भारतीय संस्कृति में सत-रज-तम गुणों को समझना ही वास्तविक मानव बनना है। और शास्त्र इस शिक्षा को ही देने की बात करते हैं। इसीलिए किसी भी तरह यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता, कि शिक्षा की उच्चता उसकी गुणवत्ता में ही निहित है, अत: समय-समय पर उसका नवीनीकरण और आकलन होना आवश्यक है।
                                  “एक कथा है कि एक नवजात सिंह-शिशु के माँ-बाप मर गये और उसका पालन-पोषण कुछ गधों ने किया। परिणाम स्वरूप बड़ा होने पर शेर, बाघ, हाथी आदि हिंसक जानवरों को देखकर गधों के साथ वह भी डर के मारे भागने लगता। एक शेर ने जब यह देखा तो उसे यह अपनी जाति का अपमान लगा। वह सिंह-शिशु को गर्दन से पकड़ कर पानी के समीप ले गया और कहा- ‘देख अपनी सूरत और मिला मेरी सूरत से।’ बस! सिंह-शिशु को आत्म-स्वरूप का बोध हो गया और वह शेर बन गया। यही हीनभावना वाले मनुष्य की कहानी है। उसे भी अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना होगा, अपने–आप से परिचय करना होगा और यह संभव है आत्म-साक्षात्कार के द्वारा।”4  
                                     यह आत्म-साक्षात्कार होगा कैसे? कहना न होगा–उच्च शिक्षा के अवलोकन द्वारा। और क्या है स्वयं को ऑडिट करनामानव को उसकी श्रेष्ठता बताना शुरू किया हमारे शास्त्रों ने, जो सौभाग्य से अनंत और निरंतन है, तथा सतत ज्ञान के द्योतक है। शास्त्रों की ही पंक्ति को उद्धृत करते हैं, “समनुर भव्, जन्या दैवय जन्म।” (ऋग्वेद:10.53.6)5       
                                  “मानव जीवन को श्रेष्ठ समझते हुए ही वैदिक ऋषियों का आग्रह है–‘तुम मानव बनो। स्वयं तो मानव बनो ही, दूसरों को भी मानव बनाओ, ऐसा मानव जिसमें दिव्य गुणों का आवास हो’।’6
                                       शिक्षा की उपयोगिता, अनिवार्यता और अपरिहार्यता हमारे शास्त्रों द्वारा भी प्रामाणिकता से स्थापित की गयी है। तो सोचना तो पड़ेगा ही, कि भूली-बिसरी नैतिक-आध्यात्मिक मूल्यों की बारीकी को नवीनता से वापिस जागृत करके उत्थान की ओर कैसे ले जाया जा सके और स्वयं का मूल्याङ्कन किया जाए।

  उपसंहार: Conclusion:
                                       मानव जीवन को सर्वांगीण पूर्णता से देखें तो इसे विविध पहलुओं से देखना और परखना पड़ेगा। जीवन का जहाँ एक स्थूल पक्ष है, वहीं एक सूक्ष्म पक्ष भी है। एक पक्ष भौतिक है, तो दूसरा आत्मिक है। दोनों पक्षों को एक साथ ले चलने में  ही जीवन की परिपूर्णता है। तभी एक संतुलित व्यक्तित्व  का निर्माण होगा और उच्च शिक्षित मानव की परिकल्पना ही नहीं उसकी रचना सार्थक होगी। जो व्यक्ति केवल भौतिक जीवन का ही पहलू पकड़े रहते है, वे अँधेरे में टटोलते चलते हैं, और जो केवल आत्मिक पहलू को पकड़े रहते हैं, वे उससे भी गहरे अंधकार में डूबते जाते हैं। इसलिए हमें जीवन के अंत: और बाह्य पक्ष अर्थात आत्मिक और भौतिक पक्ष, दोनों का एक समान पालन चाहिये। जिससे आत्मिक आनंद एवं सांसारिक सुखों का उपभोग एक साथ कर सकें। यही जीवन में प्राप्त शिक्षा का वास्तविक स्वरूप होना चाहिए। कभी स्वयं को खोजना हो तो यही प्राप्त करने का प्रयास करें। इसका ही शुभारम्भ शिक्षा के माध्यम से हो तो सांस्कृतिक-भौतिक-मानसिक-नैतिक-मानवीय-नवजागरण और पुनर्जागरण संभव और सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

सन्दर्भ सूची : References:                                                   
1.       डॉ.नरेंद्र कोहली, महासमर, खंड-2, अधिकार, पृष्ठ: 42, 43
2.       डॉ.नरेंद्र कोहली, महासमर, खंड-3 कर्म, पृष्ठ: 22
3.       डॉ.रामजी लाल सहायक, कबीर दर्शन, पृष्ठ: 11
4.       डॉ.दर्शन सिंह निर्वैर, वग्ज्योति, पी. डी. शास्त्री रचित लेख, पृष्ठ: 217
5.       ऋग्वेद: 10.53.6
6.       डॉ.दर्शन सिंह निर्वैर,वग्ज्योति, प्रो. वेदप्रकाश विद्या वाचस्पति रचित लेख, पृष्ठ: 189


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।