सर्पदंश : मिथक और तथ्य - भाग 3

अनुराग शर्मा
प्रस्तुत है सर्पदंश की जानकारी के आलेखों की शृंखला का तीसरा और अंतिम भाग

इस शृंखला की पिछली कड़ियों में डॉ. गोविंद माधव ने सर्प और उसके दंश से बचाव से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की थीं। पिछली कड़ी के अंत में उन्होंने कुछ प्रश्न भी पूछे थे। अति व्यस्तता के कारण वे इस कड़ी को स्वयं प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं इसलिये आज मैं, अनुराग शर्मा उन प्रश्नों से सम्बंधित सामान्य जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया ध्यान रखें कि यह जानकारी किसी औषधि, या चिकित्सा का विकल्प नहीं है। सर्पदंश जानलेवा हो सकता है, और इस संदर्भ में सावधानी के साथ-साथ त्वरित चिकित्सा आवश्यक है।

प्रश्न: एंटीटॉक्सिन क्या है और यह कैसे काम करता है? विष काटने के लिए इसकी कितनी मात्रा दी जाती है? इसके क्या दुष्प्रभाव हैं?

उत्तर: टॉक्सिन विष का पर्याय है और एंटीटॉक्सिन प्रतिविष है।  एंटीवेनम (Antivenom) वे प्रतिविष औषधियाँ हैं, जिनका प्रयोग सर्पदंश की चिकित्सा में होता है। भिन्न प्रकार के विषों के लिये प्रतिविष भी भिन्न होते हैं।

प्रतिविष प्राणियों के शरीर में उत्पन्न होते हैं या व्यावसायिक उत्पादन में  नियंत्रित प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। इसके लिये जीवित शरीर में सक्रिय प्रतिरक्षा उत्पन्न करने के सिद्धांत का प्रयोग करके रक्त में प्रतिरोधक प्रतिपिंड (antibody) बनाये जाते हैं। प्रतिविष उत्पादन की प्रक्रिया प्रयोगशाला में किसी स्वस्थ जीव को नियंत्रित मात्रा में विष देकर आरम्भ होती है। विष को निष्प्रभावी करने के लिये स्वस्थ जीव के शरीर में प्रतिरोधात्मक प्रक्रिया के फलस्वरूप प्रतिविष प्रतिपिंडों (एंटीबॉडीज़) का उत्पादन होता है जिन्हें उस प्राणी के शरीर से रक्त के साथ निकाल लिया जाता है और परिष्कृत करके टीके के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रतिविष प्रतिपिंडों को अनुकूल परिस्थितियों में निश्चित समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और चिकित्सा के उद्देश्य से सुई आदि के द्वारा पीड़ित के शरीर में पहुँचाया जा सकता है। प्रतिविष का प्रकार, शक्ति, मात्रा, और आवृत्ति आदि चिकित्सकों द्वारा विषयानुसार निर्धारित की जाती है।

जहाँ एक ओर प्रतिविष पीड़ित की अपनी प्रतिरोधक क्षमता के लिये उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) का कार्य करता है वहीं पीड़ित का प्रतिरोधक तंत्र प्रतिविष को भी बाहरी तत्व समझकर प्रतिरोध उत्पन्न कर सकता है। विशेषकर मानवेतर/पशु स्रोतों से बने प्रतिविष के प्रति शरीर सम्वेदनशील होने के कारण, ज्वर, पित्त, पीड़ा आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। इस स्थिति को सीरम सिकनैस (serum sickness) कहते हैं जिसका निदान सम्भव है।

प्रश्न: क्या झाडफूंक से भी सर्पदंश ठीक हो जाता है?
उत्तर: झाड़फूँक से कुछ भी ठीक होने का प्रमाण नहीं मिलता। झाड़फूँक का कोई वैज्ञानिक या शास्त्रीय आधार नहीं है। किसी पद्धति के प्रामाणिक होने का एक लक्षण उसकी पुनरावृत्तियों में उसके व्यवहार  और परिणाम में सातत्य होना भी है। झाड़फूँक में ऐसा नहीं होता। सर्पदंश के पीड़ित के लिये कालचक्र बहुत शीघ्रता से चल रहा होता है। एक-एक पल भारी होने के कारण सही समय पर सही चिकित्सा पाना अति मूल्यवान है। इस समय को झाड़फूँक आदि में गँवाना घातक मूर्खता है।

प्रश्न: क्या सर्पदंश से मृत व्यक्ति दुबारा जीवित हो सकता है?
उत्तर: सद्यमृत (clinically dead) व्यक्तियों को चिकित्सकों द्वारा पुनरुज्जीवित करने के उदाहरण हैं क्योंकि कार्डियक अरेस्ट आदि जैसी परिस्थितियों में यह सम्भव है। मृत व्यक्तियों के बाद में जीवित हो जाने के अन्य उदाहरण मुख्यतः मानवीय भूलों के उदाहरण हैं जिनमें मृतक वास्तव में मरा ही नहीं था। वर्तमान काल में, सामान्य परिस्थितियों में, मृतकों के दुबारा जीवित हो जाने की सम्भावना शून्य है।

प्रश्न: क्या विषहीन सर्प के दंश में भी उपचार की आवश्यकता है?
उत्तर: विषहीन सर्पदंश में भी उपचार महत्वपूर्ण है। सर्पदंश से होने वाली हानि सर्प के प्रकार और उसके दाँतों के आकार पर निर्भर करती है। दंश से बने घाव में त्वचा, पेशी तथा तंतुओं की हानि तो सम्भव है ही, अन्य वन्यप्राणियों की तरह सर्प भी अनेक रोगों के वाहक हो सकते हैं। इसके अलावा वे अनेक रोगकारक एककोशी (protozoa) प्राणियों के वाहक होते हैं। प्रामाणिक चिकित्सक ही सर्पदंश पीड़ित के लिये सटीक उपचार निर्धारित कर सकते हैं। विशेषज्ञता का यह कार्य उनपर ही छोड़ना चाहिये।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।