विदा नामवर सिंह


अनुराग शर्मा
पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल पर हुए हमले ने आतंक के विरुद्ध भारत की प्रतिबद्धता को और बलवती किया है। लेकिन देश की सीमाओं के भीतर आतंकियों द्वारा इतना बड़ा दुस्साहस कर पाना इस तथ्य की याद दिलाता है कि आतंक के दानव के विरुद्ध सेना ही नहीं स्थानीय प्रशासन को भी काम करना होगा। यह युद्ध सीमाओं के भीतर भी सैन्य प्रतिबद्धता से ही लड़ा जाना चाहिये। घटनाओं के क्रम में बालाकोट की आतंकी छावनी के खात्मे के बाद विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के बंदी बनाये जाने का समाचार मिला। प्रसन्नता की बात है कि जिनीवा समझौते का सम्मान करते हुए पाकिस्तान ने उनकी वापसी का वचन दिया है। 

यह सच है कि युद्ध जनबल की अपार हानि कर सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि शक्तिशाली सेना ही युद्ध को रोक सकती है। किसी विद्वान ने ठीक ही कहा था कि यदि आप शांति चाहते हैं तो युद्ध के लिये तैयार रहें। हमारे देश का तो आदर्शवाक्य ही 'सत्यमेव जयते' है, सत्य की ओर रहें, और विजयी हों। 

इस माह के दुखद समाचारों में अर्चना वर्मा, महाश्वेता चतुर्वेदी, तथा नामवर सिंह का देहावसान भी है। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाञ्जलि।

जैसा पिछली बार बताया था, इस अंक के अतिथि सम्पादक का दायित्व भारत के महामहिम राष्ट्रपति के सम्पादक रह चुके डॉ. कन्हैया त्रिपाठी ने निभाया है। कुछ अनपेक्षित कारणों से इस दौरान उन्हें अत्यधिक व्यस्त रहना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने अपना दायित्व भली-भांति निभाया, इसके लिये मैं उनका आभारी हूँ। लगभग 45 रचनाओं के साथ यह अंक आपके सामने है। इस अंक के पूरा होते-होते सेतु के अद्वितीय क्लिक्स की संख्या 601,000 से अधिक तथा आलेखों की संख्या 3,000 से अधिक हो चुकी है। सेतु पर आपका प्रेम इसी प्रकार बना रहे, इसी आकांक्षा के साथ आपकी राय और सुझावों का सदा स्वागत है, अवश्य साझा कीजिये।

शुभाकांक्षी,
अनुराग शर्मा

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