सम्पादकीय: दो शब्द ...


अनुराग शर्मा
हमें ऐसे लोग चाहिये जो आशा की अनुपस्थिति में भी भय और झिझक के बिना युद्ध जारी रख सकें। हमें ऐसे लोग चाहिये जो आदर-सम्मान की आशा रखे बिना उस मृत्यु के वरण को तैयार हों, जिसके लिये न कोई आँसू बहे और न ही कोई स्मारक बने।
~ भगवतीचरण वोहरा

जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हों, उन्हें कष्‍ट सहन करने की आदत डालकर सुसंगठित रूप से ऐसा कार्य करना चाहिए, जिसका परिणाम स्थायी हो। केथेराइन ने इसी प्रकार कार्य किया था। उदर-पूर्ति के निमित्त केथेराइन के अनुयायी ग्रामों में जाकर कपड़े सीते या जूते बनाते और रात्रि के समय किसानों को उपदेश देते थे। जिस समय मैंने केथेराइन की जीवनी (The Grandmother of the Russian Revolution) का अंग्रेजी भाषा में अध्ययन किया, मुझ पर भी उसका प्रभाव हुआ। मैंने तुरन्त उसकी जीवनी 'केथेराइन-8' नाम से हिन्दी में प्रकाशित कराई। मैं भी उसी प्रकार काम करना चाहता था, पर बीच में ही क्रान्तिकारी दल में फंस गया। मेरा तो अब यह दृढ़ निश्‍चय हो गया है कि अभी पचास वर्ष तक क्रान्तिकारी दल को भारतवर्ष में सफलता नहीं मिल सकती क्योंकि यहाँ की स्थिति उसके उपयुक्‍त नहीं।
~ रामप्रसाद बिस्मिल

भारत के स्वाधीनता संग्राम में प्राण न्योछावर करने वाले भगवतीचरण वोहरा तथा रामप्रसाद बिस्मिल जैसे महानायकों ने हमारे भविष्य के लिये आत्मोत्सर्ग तो किया ही, वे अपने जीवनकाल में भी भारतीय जनता के उत्थान और राष्ट्रीय परिवेश की उन्नति के लिय निरंतर प्रयासरत रहे। उनके सम्पर्क की बात तो बड़ी है, उनके विचार पढ़ने मात्र से ही कितने मनुष्यों का विवेक जागृत हुआ। तो भी यह देखना कष्टप्रद है कि निस्वार्थ सेवा की प्रथा अभी भी भारत में अल्पप्रचलित है। भारत में, विशेषकर हिंदी के क्षेत्र में शायद त्वरित लाभ का मोह अभी भी इतना है कि आत्मोन्नति के सामान्य, सरल, और निःशुल्क साधनों की उपेक्षा हो रही है।

हिंदी के क्षेत्र में लगभग एक दशक से अधिक सक्रिय रहते हुए, विशेषकर पिछले ढाई वर्षों से सेतु के सम्पादन से जुड़े रहने के बाद आज यह कहना मेरे लिये दु:खद है कि इतने लम्बे समय में भी हमें अब तक ऐसा एक भी स्वयंसेवक नहीं मिला जो सेतु के प्रकाशन में निस्वार्थ भाव से स्तरीय सहयोग कर सके और एक-दो वर्षों में कभी आवश्यकता पड़ने पर किसी अंक के अपलोड जैसा सरल कार्य करने में कुछ घण्टों का योगदान कर सके। बेशक उसमें सक्षम होने के लिये थोड़ा-बहुत सीखना भी पड़ेगा, लेकिन सीखा हुआ कुछ भी कभी बेकार नहीं जाता है। पूर्व में कुछ प्रयास और प्रयोग किये गये थे, लेकिन कुल मिलाकर अब तक का सारा श्रम व्यर्थ ही सिद्ध हुआ है। अंग्रेज़ी संस्करण में पिछले कुछ अंकों से विश्वस्तरीय अतिथि सम्पादकों का सहयोग मिल रहा है। दुर्भाग्य से हिंदी संस्करण में यह प्रयोग भी अभी शैशवावस्था में ही रहा है।

पिछले कुछ मास से कार्य-सम्बंधी व्यस्तता, तथा यात्राओं के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बंधी दीर्घकालीन अवरोधों के सम्मिलित प्रयास इस अंक के प्रकाशन में कुछ देर करने में सफल हो गये हैं। बाधाओं का आदर करते हुए भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस अंक के हिंदी संस्करण में हुई देरी एक अपवाद है और भविष्य में सेतु के सभी अंक पिछले अंकों की तरह समय पर आते रहेंगे।

प्रकाशन के इच्छुक मित्रों से वही पुराना अनुरोध एक बार फिर - कृपया लेखकों से निवेदन अवश्य पढ़ें। सेतु के लिये गुणवत्ता के साथ-साथ विश्वसनीयता और प्रामाणिकता भी महत्त्वपूर्ण हैं। हम अपने रचनाकारों से प्रेषित उत्कृष्ट रचनाओं की प्रामाणिकता की अपेक्षा रखते हैं। केवल मौलिक, और पूर्णतः अप्रकाशित रचनाएँ ही भेजें। आलेखों में सभी संदर्भ और श्रेय स्पष्ट लिखें। सेतु के अंतर्जालीय स्वरूप के कारण अंतर्जालीय समूहों या पत्र-पत्रिकाओं, फ़ेसबुक, ब्लॉग आदि पर पहले से प्रकाशित रचनाओं के सेतु में पुनर्प्रकाशन का प्रयास व्यर्थ का दोहराव है, जिससे हम बचना चाहते हैं। किसी राजनैतिक विचारधारा के प्रचार, हिंसक गतिविधि, या किसी भी प्रकार की घृणा या द्वेष की अभिव्यक्ति के लिये सेतु में कोई स्थान नहीं है, चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति, या लिंग के विरुद्ध हो, चाहे किसी पंथ, धर्म, भाषा, राज्य, या राष्ट्रीयता के प्रति हो। नये-पुराने, सभी लेखकों के लिये 'लेखकों से निवेदन' की निम्न कड़ी सभी पक्षों का समय बचाने और प्रकाशन की गुणवत्ता बनाये रखने में लाभप्रद है: http://www.setumag.com/p/hindi-setu-submission-guidelines-setu.html

हिंदी लेखन में दिखने वाली सामान्य लापरवाहियों और त्रुटियों से बचने के लिये सेतु में प्रकाशित पुराने आलेख 'कृपया सही लिखें' पर दृष्टिपात करें। इससे आपके हिंदी लेखन को तो लाभ होगा ही, आप सेतु की लेखन-शैली / स्टाइल शीट से भी परिचित हो सकेंगे, जिसके प्रयोग से आपकी रचना की स्वीकृति की सम्भावना बढ़ सकेगी।

कैनैडा के साहित्यिक मित्रों के सहयोग से सेतु परिवार ने 25 मई, 2019 को हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य में रुचि रखने वाले उत्तर अमेरिकी समुदाय के लिये एक एक-दिवसीय गोष्ठी और मिलन का आयोजन टोरण्टो में करने का निश्चय किया है जिसमें सेतु के अनेक शुभाकांक्षियों के साथ-साथ मुम्बई से हमारे अंग्रेज़ी संस्करण के सम्पादक डॉ. सुनील शर्मा भी सम्मिलित हो रहे हैं। और हाँ, आपका स्वागत करने मैं भी वहाँ पहुँच रहा हूँ।

रमणिका गुप्त का देहावसान इस मास के दुखद समाचारों में प्रमुख है। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाञ्जलि।

हिंदी और अंग्रेज़ी, दोनों संस्करणों में सम्मिलित लगभग 200 रचनाओं के साथ सेतु का यह अंक आपके सामने है। इस अंक के पूरा होते-होते सेतु के लेखकों की संख्या 700 हो गयी है। सेतु के, विशेषकर इस अंक के बारे में अपनी राय हमारे साथ अवश्य साझा कीजिये।

शुभाकांक्षी,
अनुराग शर्मा

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