लोक-जीवन की प्रखर अभिव्यक्ति: भोजपुरी

डॉ. योगेश राव

योगेश राव


     ‘भाषा’ अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों तथा इच्छाओं को दूसरे पर प्रकट कर सकता है और उसके विचारों को जान सकता है। मानव के मुख से निस्सृत प्रत्येक ध्वनि भाषा नहीं कही जाती है। केवल सार्थक शब्द-निर्माण में समर्थ ध्वनियाँ ही ‘भाषा’ की परिधि में आती हैं। भाषा विचार की पोषक होती है। भाषा के बिना विचार अस्तित्वहीन होता है। भाषा और विचार का अत्यंत निकट सम्बन्ध है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना व्यर्थ है। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ भाषा के महत्त्व पर लिखते हैं- “जब भाषा का शरीर दुरुस्त, उसकी सूक्ष्मातिसूक्ष्म नाड़ियाँ तैयार हो जाती हैं, नसों में रक्त का प्रवाह और हृदय में जीवन स्पंदन पैदा हो जाता है, तब वह जीवन-यौवन के पुष्प-पत्रसकुल बसन्त में नवीन कल्पनाएँ करता हुआ, नयी-नयी सृष्टि करता है।” 1   इसी सन्दर्भ में एमर्सन ने भाषा के महत्त्व पर लिखा है- “Language is a city to the building of which every human being brought a stone.”2  अर्थात् ‘भाषा एक नगर है जिसके निर्माण में प्रत्येक मानव एक पत्थर लाया है।’

      भाषा का क्षेत्रीय रूप ‘बोली’ कहलाता है। अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है। बोली का विकास विभाषा में और विभाषा का विकास भाषा में होता है। विभाषा का क्षेत्र बोली की अपेक्षा अधिक विस्तृत होती है। यह एक प्रांत या उपप्रांत में प्रचलित होती है। इसमें साहित्यिक रचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। जैसे हिन्दी की विभाषाएँ हैं- ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी और मैथिली। विभाषा स्तर पर प्रचलित होने पर ही राजनीतिक, साहित्यिक या सांस्कृतिक गौरव के कारण भाषा का स्थान प्राप्त कर लेती है।

      ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हिन्दी प्रदेश की उपभाषा ‘बिहारी’ की इस बोली का नाम ‘भोजपुर’ (जिला शाहाबाद का एक परगना) नाम के एक छोटे से कस्बे के आधार पर पड़ा है, यद्दपि यह दूर-दूर तक बोली जाती है। मध्यकाल में इस स्थान को भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा। इसी नाम के कारण यहाँ बोले जाने वाली भाषा का नाम भोजपुरी पड़ गया। ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या लगभग 2 करोड़ तथा क्षेत्र के बाहर 4 लाख अत: कुल दो करोड़ 4 लाख के लगभग थी।  यह भाषा भोजपुर (आरा), बक्सर, रोहतास (सासाराम), भभुआ, सारन (छपरा), सिवान, गोपालगंज, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण के अलावा आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। इस क्षेत्रों को भोजपुरी क्षेत्र भी कहा जाता है। वहीं उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, वाराणसी, चंदौली, गोरखपुर, महराजगंज तथा देवरिया के अलावा अन्य कई जिलों में यह बोली जाती है। भोजपुरी उत्तर में नेपाल के दक्षिणी सीमा रेखा के आसपास से लेकर दक्षिण में छोटा नागपुर तक और पश्चिम में मिर्जापुर, बनारस तथा पूर्वी फैजाबाद से लेकर पूर्व में राँची और पटना के पास तक बस्ती (कुछ भाग), गोरखपुर, देवरिया, सारन, मिर्जापुर (दक्षिणी-पूर्वी), बनारस, जौनपुर (पूर्वी), गाजीपुर, बलिया, शाहाबाद, पालामूऊ तथा राँची (थोड़ा पूर्वी भाग छोड़कर) तक इसका व्यापक विस्तार है। भोजपुरी की प्रधान उपबोलियाँ चार हैं- उत्तरी भोजपुरी, दक्षिणी भोजपुरी, पश्चिमी भोजपुरी तथा नगपुरिया। इनमें ‘नगपुरिया’ औरों की अपेक्षाकृत अधिक भिन्न है। दक्षिणी भोजपुरी (भोजपुर क़स्बा जिसके केंद्र में है) भोजपुरी का परिनिष्ठित रूप है। सूदूर उत्तर में भोजपुरी का थारू नाम की जाति में प्रचलित रूप मिलता है, जिसे थारू भोजपुरी कहते हैं। इसके अलावा अन्य स्थानीय रूप भगेसी, बंगरही, सरवरिया, सारनबोली, गोरखपुरी, खारवारी, क्षपरहिया तथा सोनपुरी आदि हैं।

      भोजपुरी अपनी शब्दावली के लिए मुख्यत: संस्कृत और हिन्दी पर निर्भर है। वही कुछ शब्द इसने उर्दू से भी लिएँ हैं। आचार्य हवालदार त्रिपाठी ने अपने शोध-ग्रन्थ ‘व्युत्पत्तिमूलक भोजपुरी की धातु और क्रियाएँ’ में निष्कर्ष दिया है कि “भोजपुरी की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा से उद्भूत है और भोजपुरी और संस्कृत के मध्य समानता है।” 3  इसकी उत्पत्ति पश्चिमी मागधी या मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से मानी जाती है। भोजपुरी प्रमुखत: नागरी लिपि में लिखी जाती है। कुछ पुराने लोग कैथी का प्रयोग करते हैं। बहीखाते के लिए महाजनी लिपि का प्रयोग होता है। 1812 ई. में अंग्रेजी विद्वान् और इतिहासकार डॉ. बकुनन भोजपुर क्षेत्र में आए थे और उन्होंने मालवा के भोजवंशी उज्जैन राजपूतों के चेरों जाती को पराजित करने के सम्बन्ध में उल्लेख भी किया है। भाषा के अर्थ में ‘भोजपुरी’ शब्द का प्रथम लिखित प्रयोग रेमंड की पुस्तक ‘शेर मुता-खरीन’ के अनुवाद (दूसरे संस्करण) की भूमिका में सन 1789 ई. को मिलता है। राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी को ‘मल्ली’ तथा काशिका दो नाम दिए हैं। वर्तमान में भोजपुरी को बोलने वालों की संख्या लगभग 3.5 करोड़ है जो बोलनेवालों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जाने वाली बोली है। भोजपुरी का विस्तार केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के सभी महाद्वीपों तक है, इसका प्रमुख कारण ब्रिटिशराज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेजों द्वारा ले जाए गए मजदूर हैं। अब उनके वंशज वहीं बस गए हैं। इनमे सूरीनाम, फिजी, मारीशस, गुयाना, त्रिनिनाद तथा टोबैगो आदि देश प्रमुख हैं। इसके अतरिक्त पड़ोसी देश नेपाल में भी भोजपुरी भाषी लोगों की आबादी लाखों में है जो वहाँ की भाषा की तकरीबन नौ फीसद है। यह कहना अप्रासंगिक न होगा की भोजपुरी भाषा का जितना विस्तार हुआ है उतना अन्य किसी लोकभाषा का नहीं हुआ है। इस दृष्टि से देखा जाए तो भोजपुरी अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की बोली है।

      भोजपुरी भाषा का इतिहास सातवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के समय के संस्कृत कवि बाणभट्ट के विवरणों में ईसानचंद्र और बेनीभारत का उल्लेख है जो जो भोजपुरी कवि थे। नवी शताब्दी में पूरन भगत ने भोजपुरी साहित्य को आगे बढ़ाने का काम किया। नाथसंप्रदाय के गुरु गोरखनाथ ने सैकड़ों वर्ष पहले गोरखबानी लिखा था। संत साहित्य में युग प्रवर्तक, महाकवि और असाधारण जनवादी विचारक कबीर का विशिष्ट स्थान है, जिन्होंने लोकभाषा भोजपुरी को भी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर विशिष्ट गरिमा प्रदान की। कबीर की कविता में महान संदेशो की अभिव्यक्ति हुई है। सभ्यता और संस्कृति चाहे कितनी ही विकसित हो जाय पर कबीर के ये सन्देश कभी न फीके पड़ेंगे न समय की गति में पुराने होंगे। इन संदेशो में आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, पथ प्रदर्शन तथा संवेदना की भावना सन्निहित है, भोजपुरी में उनके पद की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जा सकती हैं-
“कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।I
चंदन काठ कै बनल खटोलना, तापर दुलहिन सूतल हो।I
उठो रे सखी मोरी माँग सँवारों, दुलहा मोसे रूसल हो।I
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे, नैनन आँसू टूटल हो।I
चार जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धू-धू उठल हो।I
कहत कबीर सुनो भाई साधो, जग से नाता टूटल हो।I” 4

      कबीर अपने समय के अभिशप्त मानव समाज को संबोधित करते हुए कहते हैं-
“तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में।I
कोई ढूँढे पूरब कोई पच्छिम, कोई ढूँढ़े पानी पथरे में।I
सुर नर अरु पीर औलिया, सब भूलल बाड़ें नखरे में।I
दास कबीर ये हीरा को परखै, बाँधि लिहलैं जतन से अँचरे में।I” 5
इसी प्रकार बाबा कीनाराम और भीखाराम की रचनाओं में भी भोजपुरी की झलक मिलती है।

      आधुनिक काल में भोजपुरी कवियों में तेग अली तेग, हीरा डोम, बुलाकी दास, गोरख पाण्डेय, दूधनाथ उपाध्याय, रघुवीर नारायण, महेंद्र मिश्र का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इनमें हीरा डोम की कविता ‘अछूत की शिकायत’ सितम्बर 1914 को ‘सरस्वती’ में छपी थी जो भोजपुरी की एक कालजयी रचना है। उस कविता की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
“हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के साहेब से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुःख भगवानओं न देखता ते,
हमने के कबले कलेसवा उठाइबि।” 6

      जनवादी कवि गोरख पाण्डेय ने अपने कविता संग्रह ‘भोजपुरी के नवगीत’ में संगृहीत ‘अब नाहीं’ कविता में लिखते हैं-
“दिनवा खदनिया से सोना निकललीं रतिया लगवलीं अँगूठा
सगरो जिनगिया करजे में डूबलि कइल हिसबवा झूँठा
जिनगिया अब हम नाहीं डुबइबो, अछरिया हमरा के भावेले।
गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।” 7

      हालांकि भोजपुरी भाषा में निबद्ध साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं लेकिन अनेक कवियों और लेखकों ने इसे समृद्ध भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भोजपुरी भाषा के समर्थ कलाकार भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को नई ऊँचाई दी है। वे कवि, गीतकार, नाटककार, नर्तक, लोक संगीतकार होने के साथ-साथ एक मँझे हुए अभिनेता भी थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ- बिदेसिया, बिरहा-बहार, कलयुग बहार, गंगा-स्नान, विधवा-विलाप, पुत्रवध, ननद-भौजाई, भाई-विरोधी, बेटी-वियोग, शंका समाधान, श्रीनाम रत्न, हरि-कीर्तन तथा नक़ल भांड अ नेटुआ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रेम-वियोग की पीर भिखारी ठाकुर के गीतों में सहज ही प्रकट हो जाता है, यथा-
“करिके गवनवा, भवनवा में छोडि कर, अपने परईलन पुरुबवा बलमुआ।
अंखिया से दिन भर, गिरे लोर ढर ढर, बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।
गुलमा के नतिया, आवेला जब रतिया, तिल भर कल नाही परेला बलमुआ।
का कईनी चुकवा, कि छोड़ल मुलुकवा, कहल ना दिलवा का हलिया बलमुआ।” 8

      इसी प्रकार वियोग की चरम पराकाष्ठा इस गीत में देखी जा सकती है-
“गवना कराइ सैंया घर बइठवले से,
अपने लोभइले परदेस रे बिदेसिया।I
चढ़ली जवनियाँ बैरन भइली हमरी रे,
के मोरा हरिहें कलेश रे विदेसिया।I
दिनवाँ बितेला सइयाँ बटिया जोहत तोरा,
रतिया बितेला जागि-जागि रे बिदेसवा।I
घरी राति गइले पहर राति गइले से,
धधके करेजवा में आगि रे विदेसिया।I” 9

      भोजपुरी भाषा में विशिष्ट योगदान के लिए भिखारी ठाकुर को ‘बिहार रत्न’ की उपाधि से विभूषित किया गया। जगदीश चन्द्र माथुर ने उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ और राहुल सांकृत्यायन ने ‘अनगढ़ हीरा’ और ‘भोजपुरी का भारतेन्दु’ कहा है।

      भोजपुरी भाषा के उत्थान में भोलानाथ गहमरी, रामजी राय, राम दरश मिश्र, पाण्डेय कपिल, योगेन्द्र नाथ शर्मा, विवेकी राय, रघुवीर नारायण एवं मनोज कुमार सिंह का योगदान सराहनीय है। भोजपुरी साहित्य का इतिहास लिखने वालों में ग्रियर्सन, उदय नारायण तिवारी, कृष्णदेव तिवारी, हवालदार तिवारी और तैयब हुसैन प्रमुख है। आज भी ढेरों भोजपुरी कवि, लेखक और साहित्यकार भोजपुरी भाषा को समृद्ध करने का स्तुत्य प्रयास कर रहे हैं। भोजपुरी भाषा में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ और ग्रन्थ अनुदित हो रहे हैं। भोजपुरी लोक साहित्य के अलावा भोजपुरी गीतों और फिल्मों ने न केवल भारत के कोने-कोने में वरन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया है। सिनेमा जगत में भोजपुरी ही हिन्दी की वह बोली है जिसमें सबसे अधिक फ़िल्में बनती हैं। संत कबीर दास का जन्म दिवस (1297 ई.) भोजपुरी दिवस के रूप में स्वीकार किया गया है और भोजपुरी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। कला, साहित्य, और  फिल्मों के अतरिक्त भोजपुरी को अधिक समृद्ध और सशक्त बनाने हेतु ‘विश्व भोजपुरी सम्मेलन’ आंदोलनात्मक, रचनात्मक और बौद्धिक दृष्टि से एक सार्थक प्रयास है। भोजपुरी साहित्य को सहेजने और प्रचार-प्रसार हेतु मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिणी अफ्रीका, इंग्लैंड एवं अमेरिका जैसे देशों में भोजपुरी संस्थान खोले गए हैं। यह भोजपुरी भाषा के उपदेयता और प्रासंगिकता को विशिष्ट रूप से रेखांकित करता है।

      भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओँ से सम्बन्धित है और संविधान के 92 वें संशोधन, 2003 के तहत आठवीं अनुसूची में कुल 22 भाषाओं को राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। वे भाषाएँ हैं- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिन्धी, तमिल, तेलुगु और उर्दू। जहाँ तक भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के औचित्य का सवाल है उस पर यह शत-प्रतिशत खरा उतरती है। भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना भोजपुरी जनमानस की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के अनुकूल होगा।  भोजपुरी प्राकृतिक रूप से सुन्दर, सरस और मधुर भाषा है। इसकी मिठास लोगो को सहज ही अपने आकर्षण में बांध लेती है। पाश्चात्य आलोचक और साहित्य-सिद्धान्तवेत्ता रैल्फ फॉक्स लोक भाषाओं के महत्व के सन्दर्भ में लिखते हैं- “अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा जखीरा हर जाति की लोक भाषा में मौजूद है। इस भाषा को आज तक किसी ने मरते नहीं सुना है, यों संशोधन उसमे बराबर होता रहता है।” 10

      निष्कर्षत: लोक भाषा भोजपुरी जीवन्त, कलात्मक लोकाभिव्यक्ति है, जिसमें हृदय और मस्तिष्क को बांध लेने की अक्षुण्ण असीम क्षमता  है। फिर भी इसके संवर्द्धन, विकास और  परम्परा को संरक्षित रखने  के लिए जन, साहित्यकारों, लेखकों, संस्थाओं को अपनी महत्ता को समझना होगा तथा  साथ ही सत्तारूढ़ सरकारों को अपनी महती भूमिका को पहचानना होगा तभी लोकभाषा भोजपुरी का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।

सन्दर्भ:
1. दान बहादुर पाठक, भाषा विज्ञान, पृष्ठ- 65, प्रकाशन केन्द्र, लखनऊ
2. दान बहादुर पाठक, भाषा विज्ञान, पृष्ठ- 66, प्रकाशन केन्द्र, लखनऊ
3. जनसत्ता, 8 जनवरी, 2017
4. कबीर दास, कौन ठगवा नगरिया लूटल हो, अंतरजाल से
5. कबीर दास, तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में, अंतरजाल से
6. हीरा डोम, अछूत की शिकायत’ सरस्वती, सम्पादक- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ-512-513, सितम्बर 1914
7. गोरख पाण्डेय, भोजपुरी के नवगीत, जलेस, हिरावल, नई दिल्ली, 1978
8. भिखारी ठाकुर, करिके गवनवा भवनवा में छोडि कर, अंतरजाल से
9. भिखारी ठाकुर, गवना कराइ सैंया घर बइठवले से, अंतरजाल से
10. रैल्फ फॉक्स, उपन्यास और लोक-जीवन, पृष्ठ- 123, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा.) लिमिटेड, 1980

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