पुस्तक समीक्षा: अग्निपुराण के आलोक में लेखक की एक नाट्य-मीमांसा

समीक्षक: डॉ. गोपाल लाल मीणा


पुस्तक: अग्निपुराण का नाट्य दर्शन
लेखक: डॉ. सञ्जय कुमार
प्रकाशक: सत्यम पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष-2018
पृष्ठ: 142
मूल्य: ₹400

संस्कृत वाड्.मय विशाल ज्ञान राशि को धारण करने वाला साहित्य है। इसकी प्रवाहमयता एक अमृतनद की भांति है तथा नाट्य दर्शन कल-कल निनाद करने वाली सुधारस से ओत-प्रोत गंगा है। जिसकी पावन धारा में अवगाहन करने पर ज्ञान रूप में शब्द एवं भाव की अद्भुत मणि राशि प्राप्त होती है। सहस्रों वर्षों के कालखण्ड में इस पवित्र मन्दाकिनी की संजीवनी धरा प्रखण्डों में विभाजित होकर विलुप्त न हो जाए इस लिए सत्यवती पुत्र कृष्ण द्वैयपायन यानि वेदव्यास ने पुराणों के माध्यम से जिसमें प्रमुखतः अग्निपुराण को प्रयागराज की भांति प्रयोग में लाकर ज्ञानरूपी कुम्भ का आकार प्रदान किया। जिसमें सदियों से ही प्रवाहमान जन-जीवन की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम यह नाट्यकला ही रही है।

सञ्जय कुमार
डॉ. सञ्जय कुमार, सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) की आलोच्य पुस्तक "अग्निपुराण का नाट्य दर्शन" केवल नाट्य धर्मों का परिचय ही नहीं प्रस्तुत करती अपितु सम्पूर्ण नाट्य महात्म्य का प्रकाशन भी करती है। नाट्य दर्शन कई सिद्धांतों को लेकर चलता है। इसके प्रयोग एवं सिद्धान्त भी साथ-साथ चलते हैं। इसी क्रम में अग्निपुराण में जितने भी नाट्यगत सिद्धान्त बताए गये है। वह सभी इस पुस्तक में क्रमबद्ध रूप से सात अध्यायों में आचार्यों के तुलनात्मक अध्ययन के साथ सक्ष्मतया विवेचित है। शास्त्र मूलतः लोक के सूक्ष्म से स्थूल और स्थूल से सूक्ष्म के चक्रिया प्रक्रिया का परिणाम है। जो लोक में होता है वही शास्त्र बनता है। यह पुस्तक अग्निपुराण का परिचय, नाट्य स्वरूप एवं भेद पूर्वरंग, वास्तु विधान, पात्र योजना, अभिनय एवं रस सिद्धान्त को व्यापक रूप से प्रकाशित करने का कार्य व्यावहारिक दृष्टि से करती है। लेखक के द्वारा रस को ब्रह्मानन्द के रूप में चित्रित किया गया है तथा बताया गया है कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति का नाम चैतन्य, चमत्कार, अथवा रस है। लेखक के द्वारा बड़े मनोयोग पूर्वक रस की अनिवार्यता को सिद्ध करते हुए कहा गया है - लक्ष्मीरिव विनात्यागान्न वाणी भाति नीरसा। (अग्निपुराण 339/9)

अर्थात् जिस प्रकार बिना दान की लक्ष्मी शोभित नहीं होती है उसी प्रकार कविता भी रसों के बिना शोभित नहीं होती है। इसी प्रकार लेखक ने नाट्य भेद-उपभेद, पूर्वरंग, प्रस्तावना, वास्तुविधान रूप में अर्थ प्रकृति, कार्यावस्था, पंचसन्धियों आदि का वर्णन किया है। पात्रों के रूप में नायक, नायिका, अन्यपात्र का विधिवत परिचय दिया गया है। अभिनय इत्यादि की दृष्टि से भी यह पुस्तक भी अन्यतम् है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 'अग्निपुराण का नाट्यदर्शन' गागर में सागर भरने के समान है। इस पुस्तक में सैद्धान्तिक पक्षों पर ही ज्यादा बल दिया गया। सैद्धान्तिक पक्ष के साथ-साथ विभिन्न नाटको में अग्निपुराणोक्त नाट्य सिद्धान्त के प्रयोग विज्ञान को यदि दर्शाया गया होता तो इस पुस्तक का और अधिक गाम्भीर्य प्रकट हुआ होता ऐसा मेरा मानना है।

डॉ. सञ्जय कुमार की आलोच्य विद्यानुराग एवं दृष्टि इस पुस्तक में सहज एवं स्पष्ट भाषा के रूप में दिखलाई पड़ती है। लेखक ने अनेक शास्त्रीय गूढ विषय को भी बहुत ही सरलता के साथ व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। जिसके कारण मैं लेखक की प्रतिभा प्रकर्ष की कामना करते हुए इस पुस्तक की आलोचक समाज की ओर से प्रशंसा करता हूँ।

लेखक जेएनयू में संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान से सम्बद्ध हैं।
पता: डॉ. गोपाल लाल मीणा, ऐसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


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