कहानी: महिलाओं के लिए आरक्षित

नफे सिंह कादयान

- नफे सिंह कादयान 


"अपने हकों की लड़ाई में पहला कदम उठाने के लिए आज महिला दिवस से अच्छा कोई और दिन नही हो सकता। वह आज से ही शुरूआत करेगी।" कस्बे के बस स्टैंड पर पहुँच कर निशा ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी दोनों सहेलियाँ रजनी, सुनीता बॉडी गार्डो की तरह उसके पीछे चल रही थी। उसकी हिम्मत ओर अधिक बड़ गई। दृढ़ निश्चय के साथ वह बस की तरफ लपकी। बस में भीड़ इतनी थी कि पैर रखने की भी जगह नही थी। सीटे तो पूरी भरी हुई थी ही, उसमें लोग सीटों के मध्य एक दूसरे से चिपके भी खड़े थे।"
निशा ने बस में सवार होने से पहले निचले पायदान पर पड़े केले के छिलके को उठाकर सड़क के किनारे फैंक दिया। एक बार ऐसा ही छिलका उसके लिए भारी परेशानी का सबब बन गया था। वह पिछले महीने ऐसे ही हर रोज की तरह बस में सवार होने लगी तो किसी यात्री द्वारा केला खाकर लापरवाही से पायदान पर फैंके गए छिलके पर पैर फिसलने से उसके घुटने पर चोट लग गई थी। चोट की वजह से वह एक सप्ताह तक कॉलेज नही जा पाई थी। अब वह चीजों को ध्यान पूर्वक देखकर ही कदम उठाती थी।
 निशा को उन यात्रियों पर बहुत गुस्सा आता था जो बस को कूडे़दान की तरह इस्तेमाल करते हैं। वे सीटों के नीचे सन्तरे, मूंगफली, केले के छिलके फैंक देते हैं। "सार्वजनिक स्थानों का दुरूपयोग करने के लिए ऐसे लोगों पर भारी जूर्माना लगाया जाना चाहिये मगर प्रशासन द्वारा लागू नियमों की परवाह कौन करता है? बीड़ी-सिगरेट पीने पर सार्वजनिक स्थान पर बैन है पर यहाँ बस ड्राईवर इत्मिनान से बीड़ी के कश लगा रहा था।" निशा को अचानक किसी ने पीछे से धक्का दिया तो वह अपनी मन की विचार श्रृंखला से बाहर निकल आई। उसने बीड़ी पीते ड्राईवर से ध्यान हटा धक्का मारने वाले की तरफ घूरकर देखा।
"अन्धा है क्या? दिखाई नही देता।" वह उस युवक पर बरस पड़ी जो उसके ही कॉलेज का सीनियर छात्र था।
निशा को धक्का देने वाला युवक अचानक उसका रोद्र रूप देख उससे दूर जाकर खड़ा हो गया। वह आश्चर्य से मुहँ फाड़े निशा की तरफ देख रहा था। "पहले तो कभी ऐसा नही हुआ।" उनकी चार-पाँच लड़कों की टोली थी। वह अक्सर बस में भीड़ का फायदा उठा लड़कियों से छेड़खानी करते थे मगर किसी लड़की ने आज तक ऐसी हिम्मत नही दिखाई कि उनसे आँख भी मिला सके। निशा का रोद्र रूप देख उसने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। उसे पता था, चाहे वो जैसे भी तीसमारखां बने अगर इस लड़की से उलझे तो सहयात्री उसकी धुनाई कर देंगे। वह जानता था कुछ लोग अपने हाथ की खुजली मिटाने के लिए ऐसे ही मौके की तलाश में रहते हैं।
"हम दब्बू किस्म की डरपोक लडकियाँ नही हैं, आज मुझे ये साबित करना ही होगा।" निशा बस में सीटों के मध्य खड़े यात्रियों के पास से गुजरते हुए कठिनाई महसूस कर रही थी मगर उसकी मंजिल आगे की तरफ वे महिला आरक्षित सीटें थी जिन पर बेशर्मी से पुरुष कब्जा करके बैठ जाते थे और बूढ़ी, लाचार, बच्चे गोदी में लिए महिलाएँ खड़े होकर सफर करती थी। उसकी दोनों सहेलियाँ रजनी, सुनीता भी उसके साथ आगे बढ़ रही थी। वे तीनों शहर के एस.डी. कॉलेज में एम.बी.ए. कर रही थी जो उनके छोटे कस्बे से पच्चीस किलो मीटर दूर था।
अभी मार्च महीना शुरू ही हुआ था। गर्मी इतनी नही थी मगर रजनी के चेहरे पर पसीने की बूंदे झलक रही थी। सुनीता भी कुछ सहमी हुई थी। वे दोनों निशा के अगले कदम को लेकर चिन्तित थी। "कैसे होगा ये सब? इन गाँव-कस्बों की महिलाएँ लाचारी से खड़ी रहती हैं पर अपने हकों  के लिए एक शब्द भी वे नही बोल सकती। क्या निशा आज एक नई क्रांति को जन्म देगी?" वे दोनों सोच रही थी, पीछे खड़े बेहूदा लड़के को सबक सिखा कर उसने साबित कर दिया था कि वह आज से महिलाओं के आत्म सम्मान की रक्षा जरूर करेगी। साहस से आत्मबल मिलता है और उससे ही एक नई क्रांति का जन्म होता है।,
निशा में यह बदलाव ऐसे ही नही आया था बल्कि उसकी बुआ की लड़की और उसकी सहेलियों ने बातों ही बातों में उसके गाँव-कस्बों में रहने वाली सभी लड़कियों को डरपोक दब्बू किस्म की बतला कर बहुत मजाक उड़ाया था। हुआ ये कि जब वह छुट्टियों में अपनी बुआ के घर चंडीगढ़ गई तो उसकी लड़की रेणू अपनी सहेलियों के साथ उसे सैक्टर चार, छह में स्थित रॉक गार्डन और सुखना झील दिखाने ले गई। जब वे बस में सवार हुए तो वहाँ महिला आरक्षित सीट पर एक व्यक्ति बैठा था- "ऐ सीट खाली कर अभी, तुझे शर्म नहीं आती हम खड़ी हैं और तू हमारी आरक्षित सीट पर बैठा है।" रेणू इतने रोब से बोली थी कि निशा हैरान रह गई। वह व्यक्ति चुपचाप उठकर सीटों के बीच बनी जगह पर खड़ा हो गया।
"क्या तुम ऐसे डाँट कर लोगों को उठा देती हो? तुम्हे पुरुषों से डर नही लगता?" निशा ने हेरान होते हुए रेणू से अनेक प्रश्न कर डाले।
"अपने हकों के लिये डरना कैसा? हम तुम्हारी तरह गाँव की अबला नारियाँ नही हैं जो पुरुषों से भय खाती हो।" रेणू व उसकी सहेलियाँ ये कहते हुए जोरदार ठहाका लगा कर हँस पड़ी।
"अच्छा अगर तुम्हारे कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के तुमसे छेड़खानी करे तो तुम क्या करती हो?"
निशा को अपने साथ हुई छेड़खानी की घटना याद आई तो उसने इस आशय से प्रश्न किया ताकि कोई ऐसी तरकीब हाथ लग जाए जिससे वह अपने कॉलेज के मजनुओं का कुछ इलाज कर सके।
"लो और सुनो इस गाँव की गोरी की। हम लड़कों को देखकर सीटी बजाते हैं और यह उनसे परेशान है। अरे वो क्या हमें छेड़ेगे हम ही उन्हे छेड़ देते हैं।" रेणू यह कह ठहाका लगा कर हँस पड़ी।
"और अगर कोई बदतमीजी पर उतर आए तो हम सब मिलकर उसकी सैंडल परेड भी कर देती हैं।" रेणू की एक सहेली इठलाती हुई बोली तो वे फिर जोर-जोर से हँसने लगी।
निशा झेंप कर चुप हो गई तो रेणू ने उसे समझाया था कि तुम चार-पाँच लड़कियों का एक ग्रुप बना लो। डरो नही मर्दों की आँखों मे आँखें डाल कर दृढ़ता से अपनी बात कहो। अगर कोई बद्तमीजी करे तो उसका फोरन प्रतिकार करो। छेड़खानी होने पर तुम गाँव की लड़कियाँ शर्म के कारण कुछ नहीं बोलती। तुम बिल्कुल र्निजीव गुडि़यों की तरह बन जाती हो जिससे अराजक तत्वों की हिम्मत बढ़ती है।"
बस में इतनी भीड़ थी कि कुछ छात्र अगले दरवाजे पर नीचे पायदान तक झूल रहे थे। निशा व उसकी सहेलियाँ पिछले दरवाजे से दाखिल हो कर ड्राईवर के ठीक पीछे महिला आरक्षित सीटों के पास पहुँच गई। जैसा की वहाँ पर अक्सर होता था बस में एक महिला बच्चा गोद में लिए खड़ी थी और वहाँ कुछ पुरुष महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर मजे से बैठे हुए आँखें बंद कर झपकियाँ ले रहे थे।
"अंकल जी ये सीट खाली करो। ये केवल महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।"-निशा ने शालिनता मगर दृढ़ता से तीन सीटों वाली सीट पर बैठे यात्रियों से कहा तो उनमे से एक व्यक्ति उस पर रोब जमाते हुए बोला-"सबसे अगली सीट पर भी तो महिलाओं के लिए आरक्षित लिखा है, और उस पर पुरुष बैठे हैं, पहले उन्हें उठाओ तब हम उठेंगे।"
   उस व्यक्ति की आँखें लाल थी और बाहर को उबली हुई प्रतीत हो रही थी। शायद वह किसी घातक नशे का आदी था। निशा को वह फिल्मों के खलनायक की तरह लग रहा था जिससे वह थोड़ा सा डर गई। "तो क्या वह अपने हको की लड़ाई के पहले कदम पर ही हथियार डाल देगी।" उसकी अर्न्तआत्मा ने उसे धिक्कारा।
"अंकल आप तीनों खड़े हो जाओ। इसे देखों बेचारी बच्चा लिए खड़ी है। आप को शर्म आनी चाहिये। जब अगले स्टाफ पर कोई और महिला सवार होगी तो अगली सीट भी खाली करा ली जायेगी।" निशा को अपनी अंर्तआत्मा की आवाज सुन तैश आ गया। वह बच्चा लिए स्त्री की तरफ इशारा करती हुई उन तीनों को डाँटते हुए बोली,
  "हाँ-हाँ अभी सीटें छोड़़ कर खड़े हो जाओ।" उसकी सहेलियों ने निशा का हौसला देखकर उसके सुर में सुर मिलाया।
 "जब लडकियाँ कह रही हैं तो महिलाओं की सीट से उठ जाओ। यह सरकार द्वारा महिलाओं के लिये ही आरक्षित हैं। यह तो तुम सब का दायित्व बनता है कि तुम महिलाओं का सम्मान करो, उल्टा तुम इनसे जिरह कर रहे हो।" इस बीच बस का परिचालक टिकट बनाते हुए पास आ उनका पक्ष लेते हुए बोला। तभी बस एक स्टॉप पर रुकी तो एक अधेड़ उम्र की महिला बस में सवार हो निशा के पास आ गई। कोई चारा न चलता देख वे तीनों व्यक्ति खिसयाते हुए सीट छोड़ मध्य में रेलिंग पकड़ कर खडे़ हो गए।
"इन सीटों पर बैठ जाओ अम्मा और आप भी बैठिये। ये सीटें सरकार द्वारा महिलाओं के लिए ही आरक्षित की गई हैं।" निशा विजयी भाव से बच्चा गोदी में लिये खड़ी स्त्री और उस अधेड़ औरत से बोली जो अभी बस में सवार हुई थी।
"तुम भी बैठो बेटी।" अधेड़ औरत उसके सर पर अपनत्व से हाथ फिराते हुए बोली तो निशा को लगा कि महिला दिवस के रोज स्त्रियों की आजादी और उनके हकों के लिए लड़ने में उसे आर्शीवाद मिल गया। 

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