कहानी: सुहागदान

विनय कुमार पाठक
अस्पताल प्रबंधन की शिकायत आए दिन सुनने में आती रहती है। डॉक्टरों की लापरवाही के किस्से भी कम नहीं हैं। दायें के स्थान पर बायें पैर, हाथ या कान की सर्जरी, ऑपरेशन के दौरान पेट में कैंची, रुई, या अन्य कोई चीज छोड़ देना गरीब व्यक्ति के जिंदा बच्चे को मृत बताकर अस्पताल से वापस कर देना, बिल बढ़ाने के लिए मृत व्यक्ति को भी अस्पताल में रखे रहना आदि आदि।। पर कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं जिसमें अस्पताल के डॉक्टरों ने, अस्पताल प्रबंधन ने कई जिंदगियों को बचाया है। ऐसी ही एक घटना है जिसमें डॉक्टरों ने मिलकर दो सुहागनों को एक दूसरे का सुहाग बचाने का माध्यम बना लिया।
हेब्बल के एशिया अस्पताल में संतोष भर्ती था। उसके किडनी की हालत बहुत खराब थी और उसे किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता थी। उसकी पत्नी सुवर्णा उसे किडनी देने के लिए तैयार थी। क्यों न तैयार होती भला। आखिर वह उसका सुहाग था, उसकी जिंदगी था, उसका प्यार था। पर मेडिकल कारणों से वह अपने पति को अपना एक किडनी नहीं दे सकती थी। बेचारा संतोष बिस्तर पर लेटा-लेटा किसी के अंगदान से अपनी जिंदगी बचने की आस लगाए था। या फिर कहें पल-पल मौत की प्रतीक्षा कर रहा था। बड़ा ही कठिन समय था दोनों पति-पत्नी के लिए। कोई भी रिश्तेदार, मित्र किडनी डोनेट करने के लिए तैयार न था। अंगदान इतना प्रचलित न था कि ब्रेन डेड या दुर्घटना में मरने वालों के परिजन अंगदान के लिए तैयार हों।
दूसरी ओर राजाजीनगर स्थित सुगुणा अस्पताल में अशोक की भी ठीक वैसी ही स्थिति थी। उसकी पत्नी मौसमी भी उसे किडनी देना चाहती थी पर दे नहीं सकती थी। और कोई चारा था नहीं दोनों मरीजों के पास। शायद दोनों को अंगदान के अभाव में मरना ही लिखा था। मौत धीरे-धीरे खिसक रही थी दोनों की ओर। दोनों की बीमारी उस चरण में पहुँच चुकी थी जहाँ दवा किसी काम का था तो बस मौत को कुछ दिनों के लिए टालने का।
डॉक्टरों के एक कंफरेंस में दोनों अस्पताल के डॉक्टरों की चेन्नई में मुलाकात हुई थी। डॉ. राजेश और डॉ श्रेयस एक दूसरे से अच्छी तरह परिचित थे। कंफरेंस के दौरान लंच ब्रेक में दोनों एक ही टेबल पर खाना खा रहे थे। इस बीच डॉक्टर राजेश ने बात ही बात में अपने मरीज की चर्चा छेड़ दी, ”यार! मेरे अस्पताल में एक मरीज को किडनी की आवश्यकता है। उसकी पत्नी उसे किडनी देने के लिए तैयार है पर रक्त समूह के कारण उसकी किडनी नहीं ली जा सकती। लोग समझते हैं कि हमारे पास हर रोग का इलाज है, पर कभी-कभी हम कितने लाचार हो जाते हैं।”
“अरे! संयोग से बिल्कुल यही स्थिति हमारे अस्पताल में भी है। मेरे मरीज की पत्नी तो रो-रो कर अपना किडनी अपने पति को ट्रांसप्लांट करने के लिए कह रही थी। उसकी रुलाई सुन मेरा दिल बैठ जाता है पर कैसे अलग-अलग ब्लड ग्रुप के व्यक्ति की किडनी लगा दूँ? मरीज का ब्लड ग्रुप ए है जबकि उसकी पत्नी का बी है।”
“क्या? मेरे अस्पताल में स्थिति विपरीत है। मरीज ब्लड ग्रुप बी का है जबकि उसकी पत्नी का ब्लड ग्रुप ए है।”
“मतलब, एक दूसरे की पत्नियाँ उन्हें किडनी दान कर सकती हैं।”
“बिल्कुल! फिर क्यों न हम उन्हें राजी करें इसके लिए। आखिर दोनों महिलाएं किडनी दान करने के लिए तैयार हैं। दोनों पुरुषों को किडनी की सख्त आवश्यकता है। दोनों एक दूसरे के पति की जान बचा सकती हैं।”
“बिल्कुल यह तो बहुत ही अच्छा होगा। मैं कल ही बात चलाता हूँ। तुम भी बात चलाओ।”
डॉ राजेश ने जब संतोष की पत्नी सुवर्णा से इस बारे में बात की तो सुवर्णा असमंजस में पड़ गई। अपने पति संतोष के लिए किडनी देने के लिए तो उसने कभी का मन बना लिया था पर एक गैर पुरुष के लिए किडनी दान देना.....। उसे ऐसा करने में झिझक महसूस हुई। संतोष से जब बात की गई तो उसने भी कोई उत्साह नहीं दिखाया।
कुछ यही हाल अशोक और उसकी पत्नी मौसमी का था। दोनों ने मुखर रूप से विरोध तो नहीं किया इस प्रस्ताव का पर कोई उत्साह भी नहीं दिखाया इसके लिए। डॉ राजेश और डॉ श्रेयस जानते थे कि जबतक अंगदान करने वाला नहीं मिलता दोनों रोगियों की जिंगदी को ज्यादा दिन तक बचाना संभव नहीं था। दोनों ने मिलकर सुवर्णा और मौसमी को समझाने के लिए इस स्थान और समय तय किया। सुगुना अस्पताल में मौसमी को बुलाया गया और अशोक तथा मौसमी के साथ इस बारे में बात की गई।
डॉ राजेश ने अशोक और दोनों महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा- “किडनी ट्रांसप्लांट ही एक मात्र उपाय है जो वर्तमान परिस्थिति में उचित है। आप दोनों महिलाएं किडनी दान करने के लिए तैयार है पर अपने पति को किडनी नहीं दे सकती हैं। परंतु यह एक सुंदर संयोग है कि आप दोनों एक दूसरे के पतियों को किडनी दान कर सकती हैं और इसकी जानकारी भी हमें संयोग से ही मिली है। इस संयोग का लाभ उठाइए और एक दूसरे का जीवन बचाइए।”
“पर हम चाहते हैं कि हमारे परिवार से ही किसी का किडनी मैच कर जाए तो बेहतर है,”  मौसमी ने कहा। संतोष बस चुपचाप सभी को बारी बारी से ताक रहा था।
“देखिए जबतक परिवार के किसी सदस्य से किडनी मिले तबतक देर न हो जाए। किडनी ट्रांसप्लांट जितनी जल्दी हो जाए उतना बेहतर होगा।” डॉ श्रेयस ने कहा।
“पर हम दोनों अलग अलग अस्पताल में हैं। कोई एक किडनी दान कर दे और फिर दूसरा बाद में राजी न हो तो क्या किया जाएगा? संतोष ने कमजोर आवाज में अपनी शंका व्यक्त की।
“आपको इसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। दोनों मरीज को एक ही अस्पताल में शिफ़्ट करके उसी दिन दोनों ऑपरेशन को पूरा कर दिया जाएगा। किसी तरह के विवाद की गुंजाइस नहीं रहेगी। बस दोनों पत्नियों को अपनी लिखित सहमति देनी होगी। डॉ. राजेश ने कहा।
“एक बार हम सभी अशोक के सामने भी इस बारे में बात कर लें।” डॉ. श्रेयस ने कहा और दूसरे दिन अशोक के साथ भी इस पर मंत्रणा हुई। सभी अंत में इसके लिए राजी हो गए। अशोक को सुगना अस्पताल से एशिया अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया और फिर एक ही दिन दोनों रोगियों के किडनी को ट्रांसप्लांट कर दिया गया। इस प्रकार दोनों पत्नियों ने एक-दूसरे को अंगदान कर सुहागदान का तोहफा दिया।

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