‘साहित्‍य विकल्‍प’ का कल्‍पवास - दूधनाथ सिं‍ह: आत्‍महंता आस्‍था के निराला

डॉ. डी एन प्रसाद

- डी. एन. प्रसाद 

प्राध्‍यापक:  महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा- 442 001 (महाराष्‍ट्र) 

प्रथमत: साहित्‍य भंडार, इलाहाबाद की अर्ध्‍दवार्षिंक पत्रिका ‘साहित्‍य विकल्‍प’ का जून 2018 अंक साहित्‍य की दूधधारा से धवल सर्जक व आलोचक दूधनाथ सिंह पर केन्द्रित अंक इलाहाबाद के भाई डॉ. बृजेन्‍द्र गौतम जी द्वारा प्राप्‍त हुआ। सुन्‍दर और सफल संयोजन पत्रिका को सचमुच साहित्‍य का विकल्‍प दे रही है। वैकल्पिक साहित्‍य का अर्थ मात्र एक नया विकल्‍प साहित्‍य के क्षेत्र में देना ही नहीं है बल्कि दशकों पहले साहित्‍य में जो गिरावट आयी उसमें गुणात्‍मक सुधार करते हुए साहित्‍य को मूल्‍यों और मुद्दों की पटरी पर पुन: स्‍थापित करना ही वैकल्पिक साहित्‍य का उद्देश्‍य है और मैं समझता हूँ ‘साहित्‍य विकल्‍प’ पत्रिका का भी ... इस साहित्‍य विकल्‍प में व्‍यक्ति की प्रमुखता के स्‍थान पर व्‍यक्तित्‍व की प्रमुखता और साहित्‍य को केवल व्‍यवसाय न मानकर मानवीय मर्म की संवेदना को सहारा देना ही सत्-हित साहित्‍य का पर्याय होना चाहिए। दिवंगत आत्‍मा दूधनाथ सिंह जी भी साहित्‍य का विकल्‍प ही थे क्‍योंकि ‘लॉन्‍ग नाइंटी’ के बाद साहित्‍य अपने विकल्‍प की तलाश में इधर-उधर भटकता रहा। पटना, बनारस, इलाहाबाद के बाद दिल्‍ली, भोपाल टटोलता रहा। ले-दे-के संगम में डूबकी लगाने के बाद धवल कुंतल और स्मित मुस्‍कान के साथ धवल दंत से बँधी-बँधी ध्‍वनि काव्‍य-मर्म, कथामर्म और आलोचना- मर्म की समय के समकाल पर जन को पुकारती नज़र आई, जिसे साहित्‍य का विकल्‍प कहना अप्रासंगिक न होगा। और अब तो साहित्‍य का विकल्‍प वह दूधनाथ सिंह भी नहीं रहे, ऐसी स्थिति में उनकी कृतियाँ साहित्‍य विकल्‍प का काम करती रहेंगी -

द्वितीय यह कि मेरा राशि नाम भी दूधनाथ है, अत: दूधनाथ सिंह के साहित्‍य से मेरा सम्‍पर्क नाम धर्म के कारण हुआ और मैं गाहे-बगाहे दूधनाथ सिं‍ह को पढ़ा भी, अंतिम समय में वर्धा के हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय में उनके प्रेम में पड़ा भी ‘तुम्‍हारे लिए...’ इस उम्र का यह ‘प्रेम’  विकल्‍प स्‍वरूप ही था, कारण चाहे जो रहा हो...
 विकल्‍प हर समय की भरपाई करता है-
साँझ हो रही थी  जब मैं चला तुम्‍हारी ओर
अंधे की तरह, तुम्‍हें
टटोलता हुआ
लोगों की नज़र थी मुझ पर
कोई दौड़ा – ‘बाबा उधर नहीं
इधर’
जिधर तुम नहीं थी
मृत्‍यु का तट था !
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तृतीय यह कि किसी सर्जक की सर्जना पर कोई पत्रिका या पुस्‍तक सम्‍पादित होती हो तो अक्‍सर यह देखा जाता है कि संस्‍मरण के बहाने लोग उसके व्‍यक्ति को उकेरने लगते हैं यानी उसका व्‍यक्तित्‍व कितना विवादित था, वह कितना प्रेम में पड़ा था आदि-आदि। मनुष्‍य का स्‍वभाव है विवादित चीजों को, प्रेम- कहानी को बड़े चाव से पढ़ता है और इस परिप्रेक्ष्‍य में वह उस रचनाकार के कृतित्‍व की मूल्‍यवत्‍ता को भूल जाता है। तात्‍पर्य यह कि आदमी अपने गुणों के कारण बड़ा होता है, विवादों और प्रेम-प्रसंगों के कारण नहीं। अत: जब भी किसी पर केन्द्रित विशेषांक हो तो यह तय करना होगा कि उस व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व पर या कृतित्‍व पर ! साहित्‍य विकल्‍प में संस्‍मरणों के बहाने यही हुआ है जिसे पटाक्षेप कर देना चाहिए। आज दूधनाथ सिंह जाने जाते हैं अपनी रचनाधर्मिता से न कि अपनी व्‍यक्तिगत कमजोरियों से या अपने पारिवारिक व्‍यवधानों से, वह तो उनका अपना निज है। हमें तो देखना चाहिए उनकी निजता से नि:सृत उन तमाम रचनाओं को जो समय के समकाल पर यमगाथा बन गईं ,  तभी तो दूधनाथ सिंह जिन्‍दा हैं आज भी........ हालॉकि कुछ अच्‍छे संस्‍मरण भी हैं जो अच्‍छे फलक का दीदार कराते हैं और मन साहित्‍य-सा पावस होकर उर्जावान हो जाता है। विशेषांक में लगभग दो दर्जन संस्‍मरण हैं जिसमें डेढ़ दर्जन मानवीय संवेदना से सरोकार रखते हैं परंतु आधा दर्जन उसके विपरीत खिलंदड़ अंदाज में हैं जो किसी के निज को छिज रहा है, यह लेखन का धर्म नहीं है यानी साहित्‍य और साहित्‍यकार का संस्‍मरण नहीं है इसके अलावे और सब कुछ हो सकता है। अस्‍तु, किसी की निजता पर प्रहार करने का क्‍या हक है? स्‍वयं रचनाकार अपनी निजता खोले तो बात गौर करने लायक है कि उसका उत्‍स किस दिशा-बोध का द्योतक है। यथा गांधी ने अपनी आत्‍मकथा में और हरिवंश राय बच्‍चन ने अपनी आत्‍मकथा में अपने-अपने नीड़ का निर्माण अपनी निजता को स्‍वयं खोलकर किया है जो जीवन-सत्‍य को एक ‘थीसिस’ देती है।
इसी परिप्रेक्ष्‍य में यह इंगित कर देना कि सम्‍पादकश्री का अपने सम्‍पादकीय पृष्‍ठ-6 के पैरा-5 पर दूधनाथ सिं‍ह के व्‍यक्ति के बारे में जो उन्‍होंने लिखा है, वह एक केन्द्रित विशेषांक के हेतु या कहें कि एक सम्‍पादक के सम्‍पादकीय के हेतु संगत नहीं है। सत्‍य है, परंतु संगत नहीं है। अस्‍तु, बहुत बार बहुत कुछ अनकहा रह जाता है या अनकहा रहने देना चाहिए, क्‍योंकि सत्‍य का सत्‍य रूप विभत्‍स होता है। देवी मिनर्वा से सत्‍य का सत्‍य रूप देखकर भी एथेंस का सत्‍यार्थी चौंधिया गया था, विचलित हो गया था। पाठक भी विचलित हो जाता है और आस्‍था जाती रहती है।

विशेषांक में लगभग 42 मूल्‍यांकन पूर्ण देश के प्रसिद्ध-सुप्रसिद्ध रचनाकारों की लेखनी से दूधनाथ सिंह आप्‍लावित हुए हैं। उनकी सृजनधर्मिता पर, उनके सृजन मन पर, उनकी संवेदना पर और उनकी रचनाशीलता के शील पर आदि काफी अच्‍छा लेखन हो गया है। लेखकों ने मन से लिखा है, उनके उपन्‍यास पर, कहानी पर, नाटक पर, संस्‍मरण पर, आलोचना पर सर्जना के साथ सृजन किया है। दूधनाथ सिंह के बिम्‍ब-प्रतिबिम्‍ब, काव्‍य-प्रयोजन, कथा-मर्म और आलोचना के अक्‍स को पकड़ा गया है। साहित्‍य विकल्‍प के इस आयोजन में दूधनाथ सिंह के लगभग सभी कृतियों पर पूरी सिद्दत और ईमानदारी से अवलोकन करने की भरपूर कोशिश की गयी है। इस तरह यह पूरा संकलन संग्रह करने वालों के लिए संगहणीय है, पाठकों और प्राध्‍यापकों के लिए पठनीय है, शोधार्थियों के लिए शोधनीय है और आम-फहम के लिए दूधनाथ सिंह की दरियादिली की जानकारी पूर्ण दस्‍तावेज भी है। प्रकाशक महोदय से निवेदन तो यह है कि इस विशेषांक को कुछ एडिट करके इसे पुस्‍तक स्‍वरूप दे दिया जाय तो यह अकादमिक दुनिया के लिए आवश्‍यक किताब बन जायेगी।

गौरतलब है कि दूधनाथ सिंह के सभी कृतियों पर कलम चलाई गई है किंतु निराला: आत्‍महंता आस्‍था पर बीएचयू के मेरे भाई डॉ. प्रभाकर सिंह ने कलम चला कर इसे इस संकलन में छुटने से बचा दिया है। आत्‍महंता आस्‍था या आत्‍महंता निराला, सच में आत्‍महंता आस्‍था के व्‍यक्तित्‍व थे  निराला !  आस्‍था ऐसी जो आत्‍महंता है और आत्‍महंता किसके साथ ! आस्‍था के साथ ! निराला का सम्‍पूर्ण सृजन इन वृत्तियों का संगुम्‍फन है और दूधनाथ सिंह उसी आत्‍महंता आस्‍था के निराला थे। दूधनाथ सिंह को समझने के लिए ‘आत्‍महंता आस्‍था’ को समझना जरूरी है। इन दोनों शब्‍दों को एक साथ समझना होगा तभी हम निराला को भी समझ सकते हैं और दूधनाथ सिंह को भी! जीवन-साहित्‍य के सात प्रकरणों वाली यह विमर्श पुस्‍तक ‘निराला: आत्‍महंता आस्‍था’ जीवन के सात रंगों वाली है और समालोचना के सात अक्‍सवाली भी है, जिससे पूर्णता का प्रपत्ति भाव बोध होता है।

साहित्‍य भंडार ने अपनी पत्रिका साहित्‍य विकल्‍प के लिए एक अच्‍छा और जरूरी कल्‍प का संयोजन किया है। संस्‍मरण और मूल्‍यांकन के साथ पत्र-साहित्‍य और डायरी-साहित्‍य का भी समावेश हुआ है। कितना मानवी लगती है काशीनाथ सिंह और दूधनाथ सिंह के मध्‍य सम्‍प्रेषण के लिखित माध्‍यम पत्र की पारदर्शिता ! आज तो लोग पत्र लिखना भूल गये हैं, इसीसे संवेदना शिथिल होती जा रही है, बल्कि समाप्‍त होती जा रही है। बहरहाल, दूधनाथ सिंह पर केंन्द्रित ‘साहित्‍य विकल्‍प‘ का यह एक यादगार अंक है जो शाश्‍वतता की कोटि में आयेगा। एक बात पर ध्‍यान दिलाना चाहूँगा कि शायद शीघ्रता में या कहें जल्‍दबा़जी में ‘प्रुफ’ पर से ध्‍यान विचलित हो गया है जबकि ‘प्रुफ’ देखना तो प्रिया को बार-बार निहारना होता है ताकि कहीं कुछ छुट न जाय, कुछ असंगत रह न जाय। अत: जब प्रिया का भाव बोध प्रुफ के साथ सम्मिलित होता है तब शब्‍दों का सौन्‍दर्य और वाक्‍य-संरचना का संगीत बज उठता है और रचना प्राणवान हो जाती है। बावजूद इसके ‘साहित्‍य विकल्‍प’ पत्रिका की साज-सज्‍जा, कवर, छपाई, बाईडिंग की उत्‍कृष्‍टता सुगठित है और अपने नाक-नक्‍से में एक बड़ी पत्रिका का स्‍वरूप लिए साहित्‍य- सौन्‍दर्य का बोध देती है। यह पत्रिका साहित्‍य के विकल्‍प की भरपाई करेगी, साहित्‍य भंडार इस हेतु आत्‍महंता आस्‍था की स्‍वाभाविक सरणी में सुदृढ़ टिका है।

444 पृष्‍ठों के प्रस्‍तुत संकलन में दूधनाथ सिंह का पूरा जीवन-वृत्‍त अंत में प्रकाशित रहता तो उससे पाठक को उस रचनाकार के जीवन, जमीन और जहाँन का पता लग जाता, जिससे व्‍यक्ति की एक अपनी इष्‍ट भावना का उदय होता है। बहरहाल, दूधनाथ सिंह की साहित्‍य की दूधधारा शाश्‍वत सलिला का रुप लेगी।                       
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‘साहित्‍य विकल्‍प‘ (अर्धवार्षिक साहित्यिक), जून 2018, अंक-6, वर्ष-4, पृ. 444, मूल्‍य रु. 150 /-
सम्‍पादकः डॉ. विजय अग्रवाल, साहित्‍य भंडार, 50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद-211003 (उ.प्र.)
ई-मेलः sahityabhandar50@gmail.com
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