कहानी: अध्यापक श्रीपद जी

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

दरवाज़े पर हुई दस्तक सुनकर श्रीपद जी ने हाथ का अख़बार पास की छोटी मेज़ पर रखा, अपने बूढ़े शरीर को मूढ़े से उठाया और धीरे-धीरे चलते हुए दरवाज़े तक पहुँचे। इतनी सुबह दरवाज़े पर एक पुलिसमैन को देख कर चौंक गये। एक अवकाशप्राप्त बूढ़े अध्यापक ने क्या अपराध किया जो तड़के ही पुलिस आ पहुँची उसके दरवाज़े पर? पुलिसमैन ने एक ज़ोर का सैल्यूट मारा और बोला, "साहब आ रहे हैं आपसे मिलने"।
"कौन साहब?" पूछने से पहले ही साहब हाथ जोड़े खट-खट सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर आ पहुँचे। मध्यम कद के भारी शरीर पर बड़ी-बड़ी मूँछें, रंग काफ़ी गोरा, सफेद पैंट कमीज़। कुल मिला कर एक आकर्षक व्यक्तित्व। प्रणाम करते हुए साहब श्रीपद जी  के पैरों की ओर झुके। बीच में ही उनके हाथ पकड़ लिए श्रीपद जी ने।
"माफ़ कीजिएगा, पहचाना नहीं आपको", कहते हुए उन्हें अंदर ले गये। अपने खाली किए मूढ़े पर उन्हें बिठा कर अपने लिए दूसरे मूढ़े पर लदी पुस्तकों को बेदखल किया और प्रश्नसूचक निगाहों से साहब की ओर देखा। साहब भी आदर छलकाती निगाहों से श्रीपद जी को ताक रहे थे। श्रीपद जी यह तो समझ रहे थे कि साहब कभी उनके शिष्य रहे होंगे। लेकिन चकित भी थे। जीवन में पहली बार उनका कोई शिष्य इतने आदर से उन्हें मिलने आया था। कुछ क्षण ऐसे ही दोनों एक दूसरे को देखते रहे। "मैं अशोक हूँ, गुरु जी", चुप्पी साहब ने ही तोड़ी। "अशोक? कौन अशोक?" श्रीपद जी विस्मित थे।
"आपका शिष्य अशोक, गुरु जी। आपकी कृपा से ही आज मैं कुछ बन पाया हूँ।" साहब की आँखों की नमी श्रीपद जी महसूस कर रहे थे। याद फिर भी कुछ नहीं आ रहा था। बुढ़ापे में आदमी यों भी सब भूलने लगता है।
"न जाने कितने बच्चों को पढ़ा चुका हूँ मैं। उनमें कितने ही अशोक होंगे। तुम कौन से अशोक हो, बेटा?” श्रीपद जी ने जानना चाहा।
साहब मुस्कुराए, "ओहो, आपको तो कुछ भी याद नहीं है गुरुजी। मैं लक्ष्मी का बेटा अशोक। लक्ष्मी, जो आपके घर के काम करती थी। याद आया, गुरुजी?"
"ओह। लक्ष्मी का बेटा अशोक।" श्रीपद जी की आँखों में चमक आ गई। "कैसी है लक्ष्मी?"
"माँ अब नहीं है गुरु जी। पिछले साल थोड़े ही दिन के वायरल बुखार ने माँ को लील लिया। आख़िरी साँस तक आपका ही नाम था माँ की ज़ुबान पर। माँ ने मुझसे वादा लिया था कि मैं शीघ्र आपसे मिलूंगा और बताऊंगा कि आपका छोटा सा अशोक आपके आशीर्वाद से कहाँ जा पहुँचा है।"
अतीत की परतें खुलने लगीं। याद आने लगा।
पचास वर्ष पहले युवा श्रीपद को इस छोटे से कस्बे के प्राइमरी स्कूल में अध्यापन का कार्य मिलने के लगभग तुरंत बाद उनका विवाह तय हुआ और शीघ्र ही संपन्न भी हो गया। एक अनजान जगह पर नववधु को घर का सारा काम बिना किसी मदद के स्वयं करना पड़े, उनके माता पिता को रुचिकर नहीं लगा। अतः उन्होंने पड़ोस की एक ग़रीब महिला लक्ष्मी से, जिसका पति उसे अकेला छोड़ कर स्वर्ग सिधार गया था, बात की। लक्ष्मी का इस संसार में अपने एक छोटे से बेटे अशोक के सिवा कोई नहीं था। उसने सहर्ष नवदंपति के साथ जाना स्वीकार किया।
लक्ष्मी ने श्रीपद जी का घर संभाला और श्रीपद जी ने लक्ष्मीपुत्र को। बालक अशोक श्रीपद जी के घर पर अक्षरज्ञान प्राप्त करने लगा। जब श्रीपद जी स्कूल में होते अशोक उनकी पत्नी के संरक्षण में होता। शीघ्र ही श्रीपद जी ने जान लिया कि अशोक एक मेधावी छात्र है और यदि उसे अच्छी शिक्षा मिले तो वह जीवन में बहुत आगे निकल सकता है। उन्होंने अशोक को अपने स्कूल में दाखिला दिलवा दिया। अशोक ने उन्हें निराश नहीं किया। श्रीपद जी की सहायता से अशोक ने पहले मिडल पास की, फिर हाई स्कूल और इंटरमीडियेट। इसके बाद छात्रवृत्ति पाकर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर चला गया। लक्ष्मी को तो बेटे के साथ जाना ही था।
"ओह। लक्ष्मी नहीं रही। बेचारी लक्ष्मी। क्या कर रहे हो आजकल, बेटा?" श्रीपद जी ने बात का रुख़ मोड़ा।
"जी, पुलिस में डी. एस. पी. हूँ।"
"बहुत खूब। बहुत अच्छा बेटा। ईश्वर तुम्हें और भी तरक्की दे।"
"गुरुआनी जी कहाँ हैं गुरु जी, दिखाई नहीं दे रहीं?", इधर उधर देखते हुए अशोक ने पूछा।
"श्रीकांत के पास।" श्री पद जी ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
"और पद्मा?" अशोक ने जानना चाहा।
"बेटियाँ तो विवाह के बाद ससुराल की ही हो जाती हैं।"
"ओह! पद्मा का विवाह हो गया? हाँ, हो तो गया ही होगा. और श्रीकांत कहाँ रहता है, गुरुजी?"
"अमेरिका में।" श्रीपद जी ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.
"अमेरिका में! तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं गुरुजी? आपको भी उसके पास चले जाना चाहिए।"
"नहीं बेटा। मैं यहीं ठीक हूँ।"
"क्या बात है गुरुजी? आप यहाँ अकेले? गुरुआनी जी के साथ आपको भी जाना चाहिए था न।"
"नहीं बेटा, मेरा स्थान यहीं है। मैं अमेरिका में क्या करूँगा?"
कुछ देर के लिए दोनों चुप हो गये, मानो कुछ सोच रहे हों। चुप्पी फिर अशोक ने ही तोड़ी।
"कहीं श्रीकांत . . .?"
"नहीं-नहीं बेटा।" श्रीपद जी ने अशोक की बात पूरी नहीं होने दी। “श्रीकांत तो पीछे पड़ा हुआ था, मैं ही नहीं गया।“
श्रीपद जी खिड़की के बाहर देख रहे थे। उनकी दृष्टि स्थिर थी। अतीत के पन्ने फिर खुलने लगे थे।
पढ़ाई में बहुत अच्छा न होने पर भी श्रीकांत अपने दादा जी की बदौलत डॉक्टर बन गया था। बहुत पैसे वाले तो न थे दादा जी पर कहीं से धन का प्रबंध करके उन्होंने श्रीकांत को अमेरिका भेज दिया था। किस्मत के धनी श्रीकांत को वहाँ एक छोटे शहर के छोटे से अस्पताल में नौकरी भी मिल गई। दादा-दादी, माता-पिता प्रसन्न थे। उनके मध्यमवर्गीय खानदान से कोई तो विदेश जाने में सफल हुआ।
दादी के स्वर्गवास के समय न आ सका था पर दादा की मृत्यु पर श्रीकांत रोता बिलखता आया। तेरहवीं के उपरांत उसने पिता से अमेरिका चल कर रहने के लिए कहा।
"मेरे लिए वहाँ क्या है? करूँगा क्या मैं वहाँ?" श्रीपद जी ने पूछा.
"मैं हूँ न वहाँ पर। आप को कुछ करना नहीं होगा । माँ और आप मेरे साथ रहेंगे, बस।" श्रीकांत ने प्यार जताते हुए उत्तर दिया।
"पर बेटा, मैं वहाँ किसी को जानता नहीं। अँग्रेज़ी मेरी, माशाअल्लाह, जैसी है तू जानता ही है। और वहाँ के लोग हिन्दी नहीं जानते। मैं तो बात करने को तरस जाऊँगा। नहीं बेटा, मैं नहीं जाऊँगा।"
"मेरे पड़ोस में कुछ हिन्दी भाषी भारतीय रहते हैं। उनसे आपकी जान पहचान हो जाएगी, भाषा की आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।"
"और मेरे विद्यार्थी? उनका क्या होगा?"
"आप रिटायर हो चुके हैं पिताजी। बहुत काम कर लिया आपने। अब और पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। कोई और टीचर पढ़ा देगा आपके विद्यार्थियों को।"
"कैसी बात कर रहे हो श्रीकांत? एक अध्यापक जीवन भर अध्यापक ही रहता है। मैं अपने विद्यार्थियों को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगा।" श्रीपद जी ने दृढ़ता से कहा।
श्रीकांत अब माँ से मुखातिब हुआ। "माँ, आप समझाईये न पिता जी को। व्यर्थ यहाँ अपनी हड्डियाँ गला रहे हैं। अमेरिका में कितना सुख है, पता है?"
"ठीक तो कह रहे हैं तेरे पिताजी। सारा जीवन इस कस्बे में बिताया है हमने। यहाँ के सभी लोग हमारा परिवार हैं। अपने लोगों को छोड़ कर हम कैसे जा सकते हैं? अपना देश अपना ही होता है बेटा।" कहते-कहते माँ भावुक हो उठीं।
"माँ, इतने दिनों से मैं विदेश में अकेला रह रहा हूँ। क्या आपको कभी ख्याल नहीं आया कि मैं वहाँ क्या और कैसे ख़ाता होऊँगा? माँ, घर की, आपके हाथ के खाने की कितनी याद आती है मुझे वहाँ।" श्रीकांत ने अब ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
"तो यह बात है!” माँ को हँसी आ गई। बोली “बेटा तू शादी कर ले। खाना बनाने वाली मिल जाएगी।" एक कुशल महारथी की तरह माँ ने ब्रह्मास्त्र को निरस्त कर दिया।
अमेरिका में रहने वाले डॉक्टर को लड़कियों की कहाँ कमी थी। आनन-फानन में शादी हो गई। पत्नी रमा ने श्रीकांत की घर के खाने की समस्या हल कर दी। रमा के माता-पिता भी खुश थे कि उनकी बेटी को एक अच्छे पति के साथ-साथ अमेरिका जाने का अवसर भी मिल गया।
दो वर्ष निकल गये। अब वह अमेरिका का नागरिक बन चुका था। इस बार भी भारत आकर उसने श्रीपद जी और माँ से साथ चलने की गुज़ारिश की। श्रीपद जी का अभी भी वही तर्क था। माँ का भी। लेकिन इस बार जो ब्रह्मास्त्र श्रीकांत ने चलाया उसकी काट माँ के पास नहीं थी।
"माँ, आप दादी बनने वाली हैं।" माँ तो निहाल हो गयीं। ब़लाएँ लीं, भगवान के सामने हाथ जोड़े और प्रसाद के लिए ग्यारह रुपये निकाल कर रख दिए।
"बहू ठीक तो है न बेटा?"
"अभी तक तो ठीक है पर .... ।"
"पर क्या, बेटा?" माँ आशंकित हुईं।
"माँ, मैं अधिकतर अस्पताल में होता हूँ। रमा घर पर अकेली। उसकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है वहाँ।"
माँ निरुत्तर हो गईं। सोच में पड़ गईं। अकेले में पति से बात की। कहा कि अब तो दोनों को जाना ही चाहिए बेटे के पास। श्रीपद जी ज़िद के पक्के थे, नहीं मानना था तो नहीं माने। बोले "वहाँ ज़रूरत है बहू का ध्यान रखने वाली की। मेरा तो वहाँ कोई काम ही नहीं है। ऐसा करो, तुम चली जाओ।"
"और आप? यहाँ अकेले रहेंगे? इस उम्र में? आपका ध्यान कौन रखेगा?"
"अपना ध्यान मैं खुद रख सकता हूँ।”
"और खाने का क्या? कौन बनाएगा?"
"कोई न कोई मिल जाएगा। नहीं तो मैं खुद बना लूँगा।"
"अच्छा! चाय तक तो बनाते नहीं हो।"
"तुम्हारे होते ज़रूरत ही नहीं पड़ी। शादी से पहले मशहूर थी मेरी चाय। दोस्त कहते थे कि मुझे मास्टरी छोड़ कर चाय की दुकान खोल लेनी चाहिए।“
"अच्छा-अच्छा। पर खाने का क्या होगा?"
"अरे भागवान, हो जाएगा, सब हो जाएगा। तुम पोते के लिए बेटे का साथ जाओ। बस।"
अंत में श्रीकांत केवल माँ को ही साथ ले जा पाया। बहू ने पोता नहीं, पोती को जन्म दिया। श्रीपद जी ने पूरे कस्बे को मिठाई खिलाई। लेकिन अमेरिका नहीं गये। बेटे के बार-बार बुलाने पर भी। न ही श्रीकांत या उसकी माँ भारत आ सके।
कॉन्स्टेबल ने दरवाज़े के पास आ कर, हल्के से खांस कर, कहा, "सर, चलने का समय हो गया है।"
अशोक श्रीपद जी की बातों में मग्न था। सिर उठा कर बोला, “चलो, आता हूँ।"
"गुरु जी। अमेरिका तो आप गये नहीं। आपके आदर्श आड़े आ गये। लेकिन मेरे साथ आपको चलना ही पड़ेगा। मैं तो आपके पड़ोस में हूँ। मीता को पितातुल्य ससुर से और बच्चों को अपने दादाजी से मिल कर कितनी खुशी होगी इसका आप अंदाज़ भी नहीं लगा सकते। आपसे कभी मिले नहीं, लेकिन सभी आपको बहुत अच्छे से जानते हैं। गुरुजी, मैं न नहीं सुनूँगा। आपके पास पाँच दिन का समय है। यहाँ से अपने सभी काम ख़त्म कर लीजिएगा। मैं आपको लेने आऊंगा।"
श्रीपद जी कुछ बोले नहीं, चुपचाप अशोक को ताकते रहे रहे। अशोक ने उनके चरणस्पर्श किए और विदा ली।
पाँच दिन बाद अशोक सपरिवार आया उन्हें लेने के लिए, लेकिन ज़िद के पक्के श्रीपद जी पहले ही भगवान के घर कूच कर चुके थे।

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