भक्ति: एक विवेचन

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

‘भक्ति’ शब्द की उत्पति ‘भज सेवयाम्’ धातु में ‘क्तिन’ प्रत्यय लगने से हुआ है। भक्ति शब्द से ‘सेवा’ का ही बोध होता है। यह सेवा मुख्यतः भगवत्सेवा के ही अर्थो में प्रयुक्त होता है। वस्तुतः भक्ति भगवान् यानी परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग का ही नाम है। वेदों में कहा गया है कि भगवान् के दिव्यतम गुणों के श्रवण से द्रवीभूत चित्त-वृत्तियों का उनकी ओर धाराप्रवाह रूप से सतत प्रवाहित होने की संज्ञा ‘भक्ति’ है। यथा-
‘अग्निं विश्वा अभिपृक्षः सचन्ते,
समुद्रं न श्रक्तः सप्त मह्विः।‘
          [ऋग्वेद, 1. 71. 7]

अर्थात् जैसे गंगा आदि बड़ी नदियाँ समुद्र की ओर ही दौड़ती हुई उसमें विलीन हो जाती है, वैसे ही भक्तों के मन की सारी वृत्तियाँ अनंत दिव्यगुणकर्मान् परमात्मा की ओर जाती हुई उसमें विलीन हो जाती है। इसी का नाम भक्ति है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी कहा गया है कि भगवद्गगुणों के श्रवण से मनोगति का अविच्छिन रूप से प्रभु की ओर सतत प्रवाहित होना ही भक्ति कहलाता है। यथा-
‘मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये ।
मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गंगाम्भसोऽम्बुधौ।।‘
                     [भागवत,3 .29.12]

भगवद्गीता के अनुसार आत्मरति एवं तुष्टि का नाम ही भक्ति है। [गीता-3/17] रुपगोस्वामी के अनुसार समस्त अभिलाषाओं से रहित और कर्म-ज्ञानादि से अनावृत्त भाव से श्रीकृष्ण का सदा अनुशीलन करना ही श्रेष्ठ भक्ति है। यथा-
‘अनन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्ताद्यानावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तामा।‘
          [भक्तिरसामृतसिन्धु प्रथमा सामान्य लहरी]

मधुसूदन सरस्वती के अनुसार भगवद्धर्मो से द्रवित चित्त की अविच्छिन वृत्ति ही भक्ति कहलाती है। नारदभक्तिसूत्र के अनुसार सभी कर्मो को भगवान् के अर्पण करना तथा भगवान् का तनिक-सा भी विस्मरण होने पर परम व्याकुल हो जाना ही भक्ति है।
‘नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।
                          [नारदभक्तिसूत्र, प्रथम भाग 3.19]

महर्षि शाण्डिल्य ने भी भक्ति को ईश्वर के प्रति परम अनुरक्ति कहा है। उपर्युक्त विवेचनों से स्पष्ट हो जाता है कि जब जीव की चित्त-वृतियाँ संसार और सांसारिक वस्तुओं से मुड़कर भगवान् की ओर निरंतर प्रवाहित होने लगती है, तब उसे भक्ति की संख्या से अभिहित किया जाता है।

सामान्यतः भक्ति को दो वर्गों में विभक्त किया गया है- सगुण भक्ति तथा निर्गुण भक्ति। सगुण-साकार ब्रह्म की उपासना सगुण भक्ति कहलाती है। इसमें मूर्ति पूजा का विधान होता है। निर्गुण भक्ति के अंतर्गत निर्गुण-निराकार ब्रह्म की उपासना की जाती है। निर्गुण का अर्थ गुणरहित नहीं होकर गुणातीत होता है। गुणातीत का तात्पर्य सत्व, तम और राज – इन तीनों गुणों से परे होना है। इस स्थिति में ब्रह्म का कोई स्वरूप नहीं होता है। मूलतः ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप निर्गुण ही है, जिसे ऐश्वर्य की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। लेकिन जीवों के कल्याण व सत्य-धर्म की रक्षा हेतु वही ब्रह्म करूणावश सगुण-साकार रूप में अवतरित होते हैं, तब उसे माधुर्य की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यही माधुर्य रूप की उपासना सगुण भक्ति कहलाती है। वाल्मीकि, सूर, तुलसी आदि की भक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वही कबीर निर्गुण भक्ति के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप के उपासक थे। वे ब्रह्म का वर्णन करते हुए कहते है-
‘जाके मह माथा नहीं नहीं रूपक रूप,
पुहुप बास थै पतला ऐसा तत अनूप ।‘
[कबीर ग्रंथाबली, सं०- श्यामसुन्दरदास, पीव पिछांणन कौ अंग]

या
‘रेखा-रूप जेहि है नहीं, अधर धरो नहिं देह।
गगन-मंडल के मध्ये, रहता पुरुष विदेह।।‘
        [कबीर, हजारी प्र० द्विवेदी, पद- 148]

कबीर राम के अस्तित्व को तो स्वीकारते हैं, लेकिन उनके राम निर्गुण राम हैं, न कि दशरथनंदन राम। वे कहते हैं- ‘दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।‘ कहने का तात्पर्य है कि इसप्रकार के ब्रह्म की उपासना ही निर्गुण भक्ति कहलाती है। तुलसीदास के मानस में सगुण भक्ति का वर्णन मिलता है। उनके राम अवतारी हैं-
‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुद रूप बिचारी ।।
 लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।
भूषण बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी ।।
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।
माया गुन गयानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ।।
करुणा सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ।।
                      [मानस, बालकाण्ड, दोहा-191 का छंद ]

लेकिन मानस में निर्गुण ब्रह्म का भी वर्णन मिलता है। यथा-
‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ।।
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ।।
असि सब भाँती अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ।।‘
                        [बालकाण्ड, दोहा-117 की अर्धाली]

वस्तुतः यह निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ही वर्णन है और ऐसे ब्रह्म की उपासना करना ही निर्गुण भक्ति कहलाता है। हिंदी साहित्य में निर्गुण भक्ति को दो रूपों- ज्ञानमार्गी भक्ति तथा प्रेममार्गी भक्ति में विभक्त किया गया है। ज्ञानमार्गी भक्ति के पथिक कबीरदास, नानकदेव, रैदास, दादू दयाल आदि हैं तथा प्रेममार्गी भक्ति के राही मुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझन, मलिक मुहम्मद जायसी आदि हैं।

सगुण भक्ति को भी हिंदी साहित्य में राम भक्ति तथा कृष्ण भक्ति के रूप में विभाजित किया गया है। राम भक्ति धारा के प्रमुख कवि  तुलसीदास, केशवदास, नाभादास, अग्रदास आदि हैं तथा कृष्ण भक्ति धारा के प्रमुख कवि सूरदास, नंददास, ध्रुवदास, मीराबाई, रसखान आदि हैं। सगुण भक्ति को गौणी भक्ति तथा निर्गुण भक्ति को परा भक्ति भी कहा जाता है। पुनः सगुण अथवा गौणी भक्ति को तामस, राजस और सात्त्विक तीन भेद किये गये हैं। क्रोधवश, दंभवश या अति क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति हेतु जो लोग प्रभु की पूजा-अर्चना करते हैं, वह तामसी भक्ति कहलाता है। विषयभोग, धन, यश, ऐश्वर्य आदि की कामना से जो पूजा-अर्चना की जाती है, वह राजसी भक्ति के नाम से जाना जाता है। पाप-नाश की इच्छा से जो लोग पूजा-अर्चना करते हैं, वह सात्त्विकी भक्ति कहलाती है। उपर्युक्त तीनों प्रकार की भक्ति गौणी भक्ति है, क्योंकि ये तीनों ही प्रकार भेद-ज्ञान के द्वारा प्रभावित तथा स्वभावेन प्रवृतियों से अनुप्राणित है। स्मरणीय है कि नवधा भक्ति भी  गौणी भक्ति के अंतर्गत ही आते हैं। ये हैं- श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। प्रभु के यश, गुण, नाम, महिमा, लीला-गान आदि का श्रद्धापूर्वक सुनना श्रवण भक्ति कहलाता है। जब भक्त स्वयं श्रद्धापूर्वक भगवान् का महिमा-गान आदि करता है तो कीर्तन भक्ति कहलाता है। भगवान् के नाम, रूप, लीला आदि का प्रेममुग्ध चित्त से मनन करना स्मरण भक्ति कहलाता है। भगवान् के मंगल-मूर्ति के चरणों अथवा चरण-पादुकाओं का श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करना पादसेवन भक्ति कहलाता है। जब भगवान् की पूजा विविध सामग्रियों यथा-पुष्प, सुगंध, नैवेद्य आदि से किया जाता है तो उसे अर्चन भक्ति कहा जाता है। भगवान् की मंगल-मूर्ति को श्रद्धापूर्वक नमन करना वंदन भक्ति कहलाता है। भगवान् में अगाध स्नेह रखते हुए उनको स्वामी तथा स्वयं को सेवक मानना दास्य भक्ति कहलाता है। जब भक्त भगवान् को सखा मानकर उनकी उपासना करता है तो वह साख्य भक्ति कहलाता है। मनसा-वाचा-कर्मणा अपने-आप को भगवान् के चरणों में समर्पित कर देना ही आत्मनिवेदन भक्ति है। उक्त नवधा भक्ति भागवत महापुराण में प्रह्लाद प्रोक्त है। तुलसी की भक्ति दास्य भक्ति की श्रेणी में आता है। वही विनयपत्रिका में इनकी आत्मनिवेदन भक्ति का दर्शन किया जा सकता है। सूरदास की भक्ति सख्यभाव की भक्ति है। शेष प्रकार की भक्ति का दर्शन सर्वत्र किया जा सकता है। इसी प्रकार गरुड़पुराण में आठ तथा अध्यात्म रामायण में नौ प्रकार के भक्ति बतलाएं गये हैं। वे सभी भक्ति गौणी अथवा साधन भक्ति के श्रेणी में आते हैं।

निर्गुण भक्ति या परा भक्ति को अहैतुकी भक्ति, रागात्मिका भक्ति, रागानुगा भक्ति, साध्य भक्ति, प्रेमाभक्ति आदि नामों से जाना जाता है। सात्त्विकी भक्ति की साधन करते-करते साधक अथवा भक्त परा भक्ति या प्रेमाभक्ति की प्राप्ति कर लेता है। परा भक्ति अद्वैत ज्ञान की जननी है। इसमें साधक भगवान् का चिंतन करते-करते स्वयं को भगवान् से भिन्न नहीं जानकार भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। वह समस्त सांसारिक विषय-वासनाओं व कामनाओं से ऊपर उठकर चिंता और चाह से परे हो जाता है। उसे परमात्मा के तत्त्वतः स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तथा तदन्तर वह परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। रुपगोस्वामी ने परा भक्ति को ‘उत्तमा’ भक्ति कहा है। वास्तव में पराभक्ति आत्मा की एक विरल दशा का नाम है, जिसमें भगवान्, भक्ति और भक्त का भेद मिट जाता है। इसमें भक्त की दशा प्रमत्त की –सी हो जाती है। वह देखता हुआ भी नहीं देखता है, कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता है और बोलता हुआ भी कुछ नहीं बोलता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उसका चित्त प्रभु के पाद-पंकजों में अविचल रूप से लगा रहता है। परा भक्ति निष्काम कोटि की भक्ति है। इसमें कुछ भी कामना अथवा इच्छा शेष नहीं रह जाती। यहाँ तक कि भक्त मोक्ष की कामना का भी परित्याग कर देता है तथा भगवत्सेवा के अतिरिक्त उसमें कोई भी ऐशना नहीं रह जाती है। जबकि गौणी भक्ति सकाम भक्ति है। इसमें साधक अपने अभिष्ट की प्राप्ति की कामना अपने इष्ट से करता है। इसे ही वैधी भक्ति कहा जाता है।

भक्ति की प्राप्ति हेतु शास्त्रों में प्रपत्ति अथवा शरणागति का विधान किया गया है। निष्ठापूर्वक ईश्वर को ही साधन और साध्य, उपाय और उपेय जानकार स्तुति करते रहने को प्रपत्ति या शरणागति कहा जाता है। दूसरे शब्दों में मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं। वे ही सब प्रकार से मेरी रक्षा कर रहे हैं, यह समझकर उनके चरणों में सर्वस्व समर्पण कर देना ही शरणागति कहलाता है। अनन्य शरणागति में निर्भयता, निश्चिन्तता और आत्मीयता का पुट होता है। प्रपत्ति अथवा शरणागति के छः भेद किये गये हैं जो निम्नवत् है-
1) अनुकूल का संकल्प:- भगवान् के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम आदि के निरंतर ध्यान से चित्तवृत्तियों का उनके अनुकूल होना तथा तदुनुरूप ही संकल्प होने का नाम ही अनुकूल का संकल्प कहलाता है।
2) प्रतिकूल का त्याग:- शरणागति के बाधक देश, काल, कर्म, संग, संबंध आदि के दोषों का त्याग करने का नाम प्रतिकूल का त्याग अथवा प्रतिकूल का वर्जन कहलाता है। 
3) भगवान् की रक्षा का विश्वास:- भगवान् बड़े-बड़े दीन-दुखियों, पापियों, अधर्मियों आदि की रक्षा की है; अतः वे मेरी रक्षा भी अवश्य करेंगे, इसप्रकार भगवान् के रक्षण-रूप में विश्वास का नाम ही रक्षा का विश्वास कहलाता है।  4) भगवान् के रक्षण-रूप में वरण:- भगवान् को रक्षण-रूप में वरण कर लेने का नाम गोप्तृत्ववरणम् यानी भगवान् के रक्षण-रूप में वरण कहलाता है। द्रौपदी, गजेन्द्र आदि आर्तभक्त इसके उदाहरण हैं।
5) आत्मनिक्षेप:- भगवान् के चरणों में मन, वाणी, कर्म से अपने को तथा अपनी समस्त संपदाओं को समर्पित कर देना आत्मनिक्षेप कहलाती है।
6) कार्पण्य:- भगवान् को सब कुछ समर्पित कर भी यह भाव रखना कि हमनें कुछ भी समर्पित नहीं किया, कार्पण्य या दैन्यभाव कहलाता है।

भारतीय आचार्यो ने शरणागति या आत्मनिवेदन के सात और विभाग किये हैं, जिसे विनय की सप्त भूमिकाएँ के नाम से जाना जाता है। ये हैं-
1) दीनता:- अपने को अति तुच्छ समझना और भगवान् को तारणहार समझकर प्रार्थना करना दीनता कहलाता है।
2) मानमर्षता:- अहं का त्याग और विनय के प्रदर्शन का नाम मानमर्षता है। भक्ति-मार्ग का सबसे बड़ा प्रत्यूह अभिमान है। अतः अभिमान और अहंकार को त्यागकर भगवान् के चरणों में जाना ही मानमर्षता है।
3) भय-दर्शन:- मन को पापों और दुष्कर्मो के भयंकर परिणाम दिखाकर भगवान् की ओर उन्मुख करने का नाम भय-दर्शन है।
4) भर्त्सना:- जब मन सन्मार्ग व सद्कर्मो पर नहीं चलता है तो उसे डांट-फटकार लगाकर भगवान् की ओर मोड़ना ही भर्त्सना कहलाता है।
5) आश्वासन:- भगवान् के गुणों, उनकी उदारता, शरणागतवत्सलता और रक्षण-शक्ति पर मन को भरोसा बंधाकर यह आश्वस्त करना कि उसका भी कल्याण अवश्य होगा, आश्वासन कहलाता है।
6) मनोराज्य:- अन्तर्मन का वह भाव कि मैं परमात्मा से जुड़ा हुआ हूँ, परमात्मा मेरी रक्षा कर रहें हैं, मेरे सभी पाप व ताप-त्रय नष्ट हो गये हैं और मैं आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हूँ – ऐसी मनोदशा का नाम मनोराज्य है। वस्तुतः मनोराज्य ‘आनुकूलस्यः संकल्पः’ का समानार्थक भाव है।
7) विचारणा:- जब मन स्वयं अंतर्मुखी होकर अपनी गतिविधियों पर विचार करते हुए दर्शन के लोक में पहुँचकर आत्मा-परमात्मा संबंधी अनेक गुत्थियों पर विचार करने लगता है तथा उसे यह समझाने का यत्न करता है, विचारणा कहलाता है।

प्रपत्ति अथवा शरणागति के साथ ही भगवत्भक्ति प्राप्ति के और सात साधन बताये गए हैं। इन साधनों के अनुष्ठान से आत्म-उन्नयन होता है तथा भगवत्भक्ति की प्राप्ति होती है। ये सात साधन निम्नवत् हैं-
1) विवेक:- जाति, आश्रय और निमित्त के आधार पर विभाजित अशुद्ध अन्न के सेवन से बचकर शरीर को शुद्ध रखने का नाम विवेक है।
2) विमोक:- हृदय से कामनाओं का त्याग ‘विमोक’ कहलाता है। कामनाओं के परित्याग के बाद ही मन भगवान् की ओर उन्मुख होता है।   
3) अभ्यास:- भगवान् के गुणों का बारम्बार चिन्तन-मनन करने को अभ्यास कहा जाता है। अभ्यास से चित्त की गति व वृत्ति विशुद्ध होकर भगवान् में संलग्न हो जाता है।
4) क्रिया:- अपनी सामर्थ्य के अनुसार वेद-पुराणादि में वर्णित अनुष्ठान का संपादन करना ‘क्रिया’ कहलाता है।
5) कल्याण:- सत्यनिष्ठा के साथ निहित स्वार्थ से रहित होकर दूसरों को मदद करना, दान करना, दुःखदि का निवारण करना कल्याण कहलाता है। यह भगवत्भक्ति प्राप्ति का अमोघ साधन है।
6) अनवसाद:- मन को अवसाद से मुक्त रखना ही अनवसाद कहलाता है। जब देशकाल-परिस्थिति के अनुकूल किसी वस्तु की प्राप्ति न हो या क्षय हो तथा भविष्य में भय की आशंका से मन भयभीत रहता हो तो अवसाद की उत्पति होती है। भगवान् के सान्निध्य की प्राप्ति के लिए अवसाद से मुक्ति अवश्यम्भावी है।
7) अनुद्घर्ष:- देशकाल की अनुकूलता होने पर, क्षणिक सफलता होने पर, प्रिय वस्तु की प्राप्ति होने पर मन में जो शिथिलता यानी संतोष आती है, उसे उद्घर्ष कहा जाता है तथा इसके विपरीत की स्थिति अनुद्घर्ष है। अध्यात्म-मार्ग में संतोष या तृप्ति को बाधक माना गया है,क्योंकि यह चरम लक्ष्य की ओर बढ़ने नहीं देता। अतः मन में अनुद्घर्ष लाना आवश्यक है। भगवत्स्मरण में सदा अतृप्त रहना अथवा असंतुष्ट रहना ही अनुद्घर्ष कहलाता है।

भक्ति के क्षेत्र में भाव का विशेष महत्व है। भक्त को भक्ति की प्राप्ति के लिए भावसाधना करनी पड़ती है, क्योंकि भक्तिभाव संबंध अथवा नाता पर आश्रित है। भगवद्गीता, रामचरितमानस आदि ग्रंथों में भी भक्त और भगवान् के बीच नाते का उल्लेख मिलता है। यह संबंध अथवा नाते शुद्धरूप से आध्यात्मिक है। भक्त जिस संबंध या नाता को जोड़कर भगवान् की उपासना करता है, वह उसका स्वभाव अर्थात् अपना भाव बन जाता है। भक्तिशास्त्रियों ने भक्ति के क्षेत्र में पाँच भावों की स्थापना की है जो निम्नवत् है-
1) शांत भाव:- इस भाव में उपास्य में निष्ठा होती है, तृष्णा-त्याग होता है, पर ममता नहीं होती। सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन (सनकादि) ये चार मुनिगण इस भाव अथवा रस के भक्त हैं।
2) दास्य भाव:- इस भाव में उपास्य में निष्ठा के साथ सेवा भाव होता है। इसमें सेवक-स्वामी भाव होता है। हनुमान, भरत आदि इस भक्ति भाव के उदाहरण हैं।
3) सख्य भाव:- इस भाव में निष्ठा, सेवा और असंकोच की स्थिति होती है। सख्य भाव में तुल्यतामयी रति होती है। इसे मैत्रीमय भक्ति भी कहा जाता है। गीता में अर्जुन, भागवत में उद्धव, सुदामा व ग्वालबाल आदि तथा रामचरितमानस में निषाद, सुग्रीव और विभीषण को भगवान् के सख्य भाव की प्राप्ति हुई है।
4) वात्सल्य भाव:- इस भाव में भक्त अपना सर्वस्व देकर अपने प्राणों के आधार बाल भगवान् की रक्षा एवं सेवा करता है। दशरथ, कौशल्या, नन्द, यशोदा आदि इस भाव के दृष्टांत हैं।
5) माधुर्य भाव:- इस भाव की भक्ति में पति-पत्नी के संबंध की धारणा अन्तर्निहित रहती है। इसे कांताभक्ति या दाम्पत्यभक्ति भी कहा जाता है। इसमें ब्रह्म-जीव के बीच भार्या-भर्ता या भोग्य-भोक्ता का संबंध होता है। ब्रह्म को पुरुष तथा जीव को स्त्री माना गया है। इस भाव की भक्ति का उदाहरण गोपियाँ हैं। मीरा ने भी कृष्ण की उपासना माधुर्य भाव से की है।

सारांशतः कहा जा सकता है कि भगवद्विषयक अनुरक्ति का नाम ही भक्ति है। वैधीभक्ति अथवा गौणीभक्ति को साधारण भक्ति तथा रागानुगा भक्ति अथवा परा भक्ति को श्रेष्ठ भक्ति माना गया है। शास्त्रोक्त भक्ति के साधनों का अवलंबन लेकर भगवद्कृपा अथवा भगवद्भक्ति की प्राप्ति की जा सकती है। भगवान् की भक्ति सभी रूपों में मंगलकारी है। यह दुःख, शोक, क्लेशदिको नष्ट कर जीवन में शुभता का संचार करती है तथा ईश्वर की ओर आकृष्ट कर मोक्ष को सुलभ बनाती है। यद्दपि इसकी प्राप्ति दुर्लभ है, तथापि असंभव नहीं। जीवन में शुचिता का संधान कर अमृत-रस रूपी भक्ति का रसपान कर जीवन में घनीभूत आनंद की प्राप्ति की जा सकती है। अस्तु कहा जा सकता है कि भक्ति सर्वतोभावेन, सर्वरूपेन सर्वमंगलकारी व अमंगलहारी है।           

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