काव्य: सुमित दहिया

(चलभाष: +91 989 635 1814)

 (1)

एक दबाव निकला, एक प्रभाव निकला
जो बदला ना गया वो स्वभाव निकला

आखिर किसकी मौजूदगी बांध बनी थी
ये मौजूदगी हटते ही तेज़ बहाव निकला

आँधियों वाला पेड़ संग नजारे लिए था
बहारों वाला पेड़ कहाँ लिए छाँव निकला

अभी नक्शा खींचने वालो को घर तलाशने दो
बाद देखना किस किसके, कहाँ-कहाँ घाव निकला

अबकी बार भी उछाला पत्थर वापिस नही आया
ना धरती गोद बनी, ना आसमान में खिंचाव निकला

फिर खाली छत पर चाँद से गुफ़्तगू हुई
फिर तारों से मेरा भेदभाव निकला

जिनकी बर्फ होती सांसों को गर्माहट अदा की
उनका गर्माहट से खूब मन-मुटाव निकला

शक्कर जमी पर बिखेरकर जब चींटियों को बुलाया
उनकी रफ्तार में भी एक ठहराव निकला

हर बार नए चेहरे का अंत ऐसा हुआ
हर अंत पर एक जैसा हाव-भाव निकला



(2)

जब देखो, जहाँ देखो निगहबानी रखते हैं
वो जिस्म से रूह तक निशानी रखते हैं

सब कहते हैं सबके पास सब कुछ हैं
हम भी कोई चुनिंदा कहानी रखते हैं

अल्फ़ाज़ों से समझदारी बया करने वाले
अपने मोन में अक्सर नादानी रखते हैं

जिन्हें पूरा जमाना खानाखराब पुकारता हो
अपने साथ कोई बला खानदानी रखते हैं

इस मर्ज के मौसम कितनी उम्र ले गए
कभी दवा नई तो कभी पुरानी रखते हैं

हर कतार के बाद थोड़ा फासला था
ये भीड़भाड़ वाले भी वीरानी रखते है

चारों तरफ घास और बीच मे भी घास
एक रंग वाले क्या-क्या हैरानी रखते हैं

सिलसिलों के दौर में एक और सिलसिला
एक और बार आँखों में पानी रखते हैं

निगहबानी= पहरेदारी, खानाखराब = आवारा, अभागा


(3)

कभी अपने आने का वास्ता तो दिया होता
सभी मंजिले टटोलकर कोई रास्ता तो दिया होता

हमें अपने होने की खबर तक नही रहती
नही तो तुम्हारे कहने पर क्या-क्या किया होता

तुम्हारे, मेरे रिश्ते से हम दोनों गायब हैं
फिर कैसे कोई तीसरा हमारे दरमियाँ होता

एक बार की इबादत हर बार बहुत थी
वो मंज़र जब जहन में आता माहौल ख़ुशनुमा होता

एक सुनसान रास्ता अक्सर मेरे साथ-साथ चला
ये सोचकर कि कभी मेरे संग काफ़िला होता

शहर भर को खंगालकर जब शहर  नही मिला
फिर कैसे वो शख्स मिलता जो अक्सर यहाँ-वहाँ होता

अब तक ग़ज़ल में तुम्हे कही शामिल नही किया
अगर शामिल करता तो ये ग़ज़ल नही मरसिया होता

मरसिया = मरणशोक में गायी गई कविता,,



(4)

वो राह से निकलकर राह ही में हैं
आँधियों से बचा तो हवा ही में हैं

मैंने अपना वजूद आईने में खूब तलाश किया
मगर वजूद बिखरा हुआ किसी-किसी मे हैं

आप अक्सर जाकर मंदिरों, मस्जिदों में खोजते हो
देखो खुदा को शामिल बच्चों की हँसी में हैं

एक तरफ शहर में चकाचौंद ओर भीड़ हैं
एक तरफ सन्नाटा भी शहर ही में हैं


बेशक गाँव के वीरान रास्ते खरपतवार उगाते थे
मेरा बचपन उन्हीं रास्तों, उसी जमी में हैं

जिस दिक्कत के लिए पूरी इमारत की नब्ज टटोली
वो दिक़्कत आखिर मिली बुनियाद ही में हैं

एक शख्स हैं जो मर्ज, दवा दोनों का हिस्सा हैं
वो शख्स अक्सर शामिल मेरी चारागरी में हैं

कोई बताओ मुझे आखिर मंजिल की परिभाषा क्या है
अब तक चाँद, सूरज भी सफर ही में हैं

चारागरी = चिकित्सा

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