लघुकथाएँ: सुनील गज्जाणी

पहचान

"भले ही तुम मेरी पत्‍नी होकर मेरा साथ ना दो, मगर मैं ये मानने को कतई तैयार नहीं हूं कि गजनी फिल्‍म के आमिर खान जैसा किरदार भी कोई इन्‍सान हक़ीकत में होता है क्‍या, कि जिसे याददाश्त सिर्फ पन्‍द्रह मिनट के लिये रहती है.....मैं इस मैगजीन में छपे आर्टिकल की कटु आलोचना करता हूं।"..... "डॉक्‍टर रिजर्व नेचर की मेरी पत्‍नी जाने कैसे तुमसे इतनी घुल-मिल गई जो इस आर्टिकल को लेकर तुम्‍हारा सपोर्ट कर रही है! डॉक्‍टर, मुझे हस्‍पताल से छुट्टी कब दे रहे हो, मेरी मेडिकल रिपोर्ट का क्‍या हुआ। हॉँ..मेरी बीमारी तुम्‍हारे पकड़ में आयी है या नहीं या यूंही मुझ पर एक्‍सपेरीमेंट करे जा रहे हो, डॉक्‍टर लोग शायद मरीज को इन्‍सान नहीं जानवर समझकर अपने नित-नए प्रयोग करने की कोशिश करते हैं, हॉँ... तो डॉक्‍टर..."

"क्‍या हुआ चुप क्यूँ हो गए, क्या कह रहे थे? ... तो डॉक्टर?" बौखलाई सी पत्‍नी उसके पास जाती हुई बोली।
"माफ कीजिए, मैने आपको जरा....पहचाना नहीं "
पत्‍नी डबडबाई आँखें लिए अपनी शादी का फोटो फिर से पति को दिखाने लगी।


ऑफिस ऑर्डर 

"बहुत मेहनत करनी पड़ी सर, कही भी ऐसा घर नहीं दिखा जो बूस्टर लगा पानी खींच रहा हो। हो सकता है जलदाय विभाग के नए नियमों से लोग डर गए हों कि अगर बूस्टर लगा मिला तो जुर्माना भरना पडेगा..."
"सही बात है।"
अधीनस्थ कर्मचारी अपने अधिकारी को सूचना देता हुआ रिपोर्ट दे रहा था।
'मगर सर, मुझे लगता है कि जुर्माने से बचने के लिए लोग नए-नए तरीके खोज लेते हैं।"
"हमारे यहाँ नियम तोड़ने के तरीके नियम से पहले बन जाते है, समझा?" अधिकारी समझाता सा बोला
"जी सर, सौ फीसदी सच!" अधीनस्थ कर्मचारी ने सहमति जताई।
"किसी को पानी का हक़ नहीं मारना चाहिए कि बूस्टर लगाकर खुद का घर तो लबालब कर ले और अपने पडोसी का कोई सोचे ही नहीं।"
"साब, आज तो सभी पहले अपनी ही सोचते है।"
"सही है दयाराम! जो ना सोचे ऐसा वो अपनी ही खींचे-ओढ़े! फिर वो क्यूँ आकर हमारे सामने अपने मटके फोड़ते है?"
'बात सही है साब ..."
"अब छोड़ इस बात को, चल पंखा तेज़ कर, गर्मी तो मानो जान लेकर छोड़ेगी।"
"साब, लगता तो पानी का भी है, पूरे शहर में किल्लत मारा-मारी। अच्छा हुआ जो आप ने फरमान जारी करवा दिया कि अगर किसी के यहाँ पानी सप्लाई के समय बूस्टर लगा मिल गया फ़्लाइंग के समय तो हाथों-हाथ जुर्माना देना पडेगा। साब, लगता है आप की योजना काम कर गयी।"अधीनस्थ कर्मचारी दाद देता सा बोला।
"अरे भई, सीधी सी बात है दया राम। पानी देंगे तो उतना ही ना जितना हमें पीछे से मिलेगा। रोज-रोज बूस्टर की शिकायतों से तंग आकर ऊपर से परमिशन लेकर ये फरमान ही जारी करवाना पड़ा। चलो मगज़मारी तो मिटी कुछ समय के लिए" ठंडी साँस भरता बोला।
"अरे साब! याद आया, याद आया, शहर के दूसरे छोर पर मुझे एक निर्माणाधीन मकान में बूस्टर लगा मिला। जब ऐसा करने के लिए वहाँ मना किया वहाँ खड़े लोग इतराते हुए मुझसे धक्का-मुक्की करने लगे, गाली-गलौज करके धमकाने लगे।"
"कहीं लगी तो नहीं न तुम्हे?" अधिकारी चिंतित भाव में प्रश्न किया।
"नहीं साब, मगर मैंने वहाँ का ठिकाना नोट कर लाया, नोटिस ज़ारी कीजिये इस नाम का। सारी हेकड़ी हवा हो जायेगी सालों की।" अधीनस्थ कर्मचारी दाँत पीसता अपने जेब से पर्ची निकालता हुआ बोला।
पर्ची देखते ही चेहरे की हवा उड़ गयी और तुरंत पर्ची फाड़ते हुए कहा. 'अभी नई नई ही नौकरी लगी है तुम्हारी, इसलिए अंजान हो कुछ नियमों से। मुझे भी पता था इस मकान का, अगर अपनी सर्विस बुक पे कोई लांछन नहीं लगवाना चाहते होतो फिर कभी इस पर्ची का ज़िक्र मत करना।"
"कारण?" सकपकाये से अधीनस्थ अपनी जिज्ञासा रखते हुए पूछा।
'कुछ कारण समझे जाते है, बताये नहीं जाते। बस इतना समझ लो की हमें भी अपने ऊपर वालों की कुछ बातें दबानी पड़ती हैं।"
"ओह, समझ गया। क्या जान सकता हूँ निर्माणाधीन मकान किसका है?"
"हमारे ही डिविज़नल हैड का।'

अध्यक्ष, बुनियाद साहित्य एवं कला संस्थान, सुथारों की बड़ी गुवाड, बीकानेर - 334005, राजस्थान
http://www.aakhaakalash.blogspot.com
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