काव्य: विजय कुमार पुरी

प्यारी अपनी धरती है

प्यारी अपनी धरती है और प्यारा अपना देश है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

कुछ लोग यहाँ पर ऐसे हैं,
जो धरती को गन्दा करते हैं,
उनकी करनी धरनी से भई,
वन्य जीव  सब    मरते हैं,
उनकी रक्षा करना ही, सब धर्मों का सन्देश है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

गिद्ध और कौए हमसे कहते,
हम  धरा  की  शान  हैं,
प्रदूषण को कम हैं करते,
न इससे तुम अनजान हैं,
मत ऐसा व्यवहार करो कि लगे हमें परदेस है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

देख यहाँ पर कूड़ा कचरा,
अपना जी भर आया है,
बहुत कोशिशें कर ली लेकिन,
सब कुछ न हो पाया है,
कुछ तो अच्छा करना सीखो, नवयुग में प्रवेश है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

सब झूम झूम कर गाएंगे,
हम पर्यावरण बचाएंगे,
धरती के श्रृंगार के लिए,
पेड़ और पौधे लगाएँगे,
जन जन में अब जाग उठा ये नया नया उन्मेष है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।

वृक्ष धरा के भूषण हैं और,
उनसे जीवन मिलता है,
निर्मल सुंदर स्वच्छ धरा में,
सबका ही मन खिलता है,
रंग रंगीले फूलों से अब बदला धरा ने भेष है।
हरे भरे पेड़ों से सजता सुंदर ये परिवेश है।।


समय का चक्रव्यूह

सुना था तेरे शहर में शांति है,
पर यहाँ तो गूंगे बहरे रहते हैं।

आँखों के कोनों में दर्द दिखता है,
रिसते हुए ज़ख्म हंस कर कहते हैं।

बातें करने को अभी सारी उम्र है,
कहीं बुरा न मान जाएं, डरते हैं।

भीड़ यहाँ भी कहने को काफी है,
सब अपनी बातों में ही उलझते हैं।

भावुक होने की ज़रूरत नहीं यहाँ,
आँखों से मगरमच्छी आँसू बहते हैं।

बोझ उठाते हुए टूटते रहे कन्धे सदा,
साथ चलने वाले भी बहाना करते हैं।

नाज़ुक हाथों में थमाया बारूदी ढेर,
चिंगारी छोड़ते हुए भी वे हँसते हैं।

वादा किया था दुःख साझा करने का,
लेकिन चक्रव्यूह दुखों का वही रचते हैं।


अंतर्व्यथा

क्यों लगे बहने सघन जल बिंदुओं से,
आज मुक्तामणियों सम मेरे नयन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,

सावन महीने की झमाझम,
बरसती फुहारों में,
दादुर मयूर पपीहे सी,
तड़पती पुकारों में,
चहकना महकना और
बताना कुछ इशारों में,
प्रेम पींगे झूलते थे जब,
बागों की बहारों में,
रूठ के टूट कर इस जहाँ के चलन से,
निकलती क्यों नहीं वह कोप के भवन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,

निहारता था रूप उसका,
लेके इन हथेलियों में,
राजरानी सी थी वह,
अपनी सभी सहेलियों में,
सर्वदा ही जीतती थी,
वह अठखेलियों में,
बूझ कर अनबुझ रह गई,
वह इन पहेलियों में,
प्रेम पुष्प पुण्य के बह गए प्रवाह में,
थाम कर रखा था, जिनको बड़े जतन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,

शिशिर के शीत सी रही,
कांपती मनोव्यथा,
हिमकणों के संग संग,
जम गई मेरी कथा,
मेरे मन के कोने में,
तू बस रही थी सर्वथा,
अगर न होता ऐसा तो,
मैं भूल जाता अन्यथा,
दर्द मेरा सर्द होता जाता है तुहिन से,
सूखी कली को वास्ता न कोई पल्लवन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,

साध कर शर मारता था,
चुपके छुपके से मदन,
ऋतुराज में खिलता कहाँ,
खो गया है वह चमन,
भुजदंड में जब झूलता था,
तोरा गोरा तनवदन,
दहक उठती ज्वाल सी अब,
जब लगती यौवन की अगन,
कजरारे कारे नयन क्यों भर गये अंसुअन से,
मुक्त कर जाते जहाँ को, अपनी झूठी लगन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,

बैठ कर नदी किनारे,
मैं डूबता मझधार में,
स्वार्थों का ज़ोर है,
इस निठुर संसार में,
छल कपट की नीतियां,
और बेरुखी है प्यार में,
होता नहीं है फैसला क्यों
आपके दरबार में,
रूह फरियाद अब निकलती नहीं मन से,
भस्म क्यों न हो गया मैं, विरह की अगन से,
घात से आघात कर रहे क्यों छलन से,
आतुर निकलने को लगे हैं प्राण मेरे तन से,


पल पल करता है मन मेरा

शरद चांदनी की रातों में, ढूंढूँ अजब ठिकाने को,
याद में उसकी खोया रहता, कौन सुने अफ़साने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

झर झर झरने सी झरती क्यों,
आँखों से अश्रु की धारा
कम्पित अधरों की खामोशी,
बूझ सका न क्यों हरकारा,
भाव भंगिमा के बलबूते, आतुर थी समझाने को,
चुप्पी को ही अच्छा समझा, देख किसी अनजाने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

मधुमास में मधुकरी सी,
मधुवन में गुंजार करे,
फूलों कलियों की रंगत से,
नित नित नव श्रृंगार करे,
जब छलके यौवन मदमाता, फिर होश कहाँ दीवाने को,
गुन गुन करते आए भँवरे, प्रीत की रीत सिखाने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

विपुल केश राशि रजनी सी,
मुख पर जब भी आती है,
रूप सलोने की कान्ति,
चपला सी चमकती जाती है,
फरफर उड़ता आँचल उसका, मन मेरा ललचाने को,
लाख कोशिशें करता रहता, मैं भी उसको पाने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

उठती पलकें नज़र नशीली,
झुकती पलकों से शरमाये,
हिरणी सी जब चाल चले तो,
कमर लचीली बल बल खाए,
रूप निहारूँ बैठे बैठे, और सांसे हैं थम जाने को,
जादूगरी सी करती रहती, लगातार भरमाने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

ललना की छलनी छाया को,
लिपटा लूँ अपनी बाहों में,
बस मदहोशी का आलम हो,
क्यों प्यासा भटकूँ राहों में,
प्रणय चेतना अगन लगाती, जो कहती जल जाने को,
मयखाने में मैं क्यों जाऊँ, अपनी प्यास बुझाने को,
पलपल करता है मन मेरा, उनसे मिलने  जाने को,
कुछ बातें सुनने को उनकी, कुछ अपनी बतलाने को।।

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सम्पादक: सृजनसरिता त्रैमासिक साहित्यिक
चलभाष: +91 973 662 1307, +91 981 618 1836
ग्राम पदरा पोस्ट हंगलोह, तहसील पालमपुर ज़िला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश 176059

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