यात्रा संस्मरण: बेंगळुरु में 20 दिन

- गोविन्द सेन


मैं मूलतः यात्राभीरु हूँ - 'घर के बाहर घर जैसा आराम का कहाँ' जैसी मानसिकता वाला। पर एक ही जगह पर रहते हुए आदमी ऊब जाता है। आखिर एक जैसे मकान, एक जैसे रास्ते, एक जैसे पेड़-पौधे और चेहरे आदमी कब तक देखे। हर आदमी को नए रास्ते, नए मकान, नए पेड़-पौधे कुछ तो नया चाहिए। मुझे अनजानी जगहों पर जाना असुविधाओं को बुलावा देना लगता है। मैं अनजाने डर से घिर जाता हूँ। असहज हो जाता हूँ। पर अनजाने और नए का आकर्षण भी होता है-एक अदम्य आकर्षण। इससे बचा नहीं जा सकता। मैं भी इस आकर्षण की गिरफ्त में था। फिर जहाँ मुझे जाना था वह भी मेरा अस्थायी ही सही, घर ही था। हाँ, उस शहर में पहली बार जा रहा था और पहली बार का आकर्षण रहता ही है।

बड़ा बेटा विनय बेंगळुरु में साफ्टवेयर इंजीनियर है। नवम्बर 2018 में दीपावली के बाद उसने गूगल ज्वाइन किया था। जब वहाँ एक सोसायटी में फ्लैट रेंट पर ले लिया और सामान सेटल कर लिया तो उसने हमारे लिए तीन एयर टिकट बुक करवा दिए-दो हम पति, पत्नी और हमारे छोटे बेटे निखिल के लिए।

इंदौर से उड़ान भरकर एक फरवरी 2019 की रात को हम बेंगळुरु के कैम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे। बेल्ट से बैग उठाकर अच्छी तरह नाम चैक किये। यह चैक करना बहुत ज़रूरी लगा। पिछली बार इंदिरा गाँधी इन्टरनेशनल एअरपोर्ट दिल्ली में ट्राली बैग उठाने में गच्चा खा चुके थे। गफलत महँगी पड़ी थी। खैर, वह एक अलग कहानी है। चैक करने के बाद हम सामान लेकर बाहर निकले। निखिल ने मोबाइल के जरिए कैब बुलवाई। कैब कई मोड़ों, पुलों और अंडरपासों से गुजर रही थी। हम उत्सुकता से रोशनी में चमचमाते पेड़ों, फूलों और ऊँची इमारतों को देखते जा रहे थे। आखिर सोसायटी के गेट से होते हुए फ़्लैट तक पहुँचे।

अगले ही दिन विनय हमें भारतीय जलपान गृह नाश्ते के लिए ले गया। इससे पहले सोसायटी के पास ही उसने हमें डीआरडीओ क्षेत्र के गेट नंबर तीन से प्रवेश करवाकर भ्रमण करवा दिया था। सुझाव भी दिया था कि सुबह घूमने के लिए मैं इस क्षेत्र में आ सकता हूँ। वहाँ कतारबद्ध बड़े-बड़े मोटे तने वाले ऊँचे छायादार सैकड़ों पेड़ हैं। पेड़ों की शाखाएँ ऊपर मिलकर सायबान-सा बना रही थीं। पेड़ों पर तने की छाल पर उनकी क्रम संख्याएँ भी अंकित हैं। हर पेड़ को एक नंबर दिया गया था। हर पेड़ का एक नंबर था।

बेटा जॉब पर जहाँ-जहाँ रहा, वहाँ-वहाँ हमें बुलाता रहा। हैदराबाद, गुरुग्राम (गुड़गाँव) और अब बेंगळुरु। हैदराबाद में बड़े-बड़े गोल पत्थरों ने अचरज से भर दिया था। प्राकृतिक वातावरण के बीच अत्याधुनिक और सर्वसुविधा सम्पन्न माइक्रोसॉफ्ट के ऑफिस की बिल्डिंगें देख मन खिल उठा था। वह स्थान बहुत सुन्दर था। वहाँ एक छोटे-से तालाब के पास हरियाली में मोर को विचरण करते हुए देख तो सुखद आश्चर्य हुआ था। लग रहा था कि प्रकृति को कम से कम नुकसान पहुँचाकर उसे अधिकाधिक सुरम्य बनाया गया है। उसे देखते हुए मन बार-बार पूछ रहा था कि क्या जन्नत यही है। हर जगह के लोगों का मिजाज और मिट्टी का रंग अलग-अलग होता है। गुरुग्राम और दिल्ली के आसपास की मिट्टी पीले रंग की है जबकि बेंगळुरु की मिट्टी का रंग लाल है।

बेंगळुरु में हर जगह दुकानों-कार्यालयों के साइन बोर्डों पर कन्नड़ और अंग्रेज़ी में लिखा हुआ है। केवल डीआरडीओ कैम्पस में स्थित केंद्रीय विद्यालय के बोर्ड पर ही कन्नड़ और अंग्रेज़ी के साथ हिन्दी में लिखा हुआ मिला था। कन्नड़ की लिखावट बहुत आकर्षक और सुन्दर लगी। लिखावट ऐसी कि जैसे चित्रों की शृंखला हो। कन्नड़ में कई गोलाइयाँ और हुकनुमा आकृतियाँ होती हैं। कोई वर्ण मुड़ी हुई भुजा-सा, कोई वर्ण अंग्रेज़ी के आठ अंक-सा किन्तु आड़ा पड़ा हुआ। कोई वर्ण जैसे हाथी सूँड उठाए हुए। कोई वर्ण गरदन उठाए कमर की ओर मुख मोड़े चौकन्ने हिरण-सा।

हम कार से लालबाग गार्डन के लिए निकले थे। कार में गल्ली ब्वाय का ट्रेन सोंग बज रहा था। मैं सुनकर खुद में स्फूर्ति महसूस कर रहा था । लोगों को शिकायत रहती है कि नए गानों में पुराने गानों जैसी बात नहीं है। मुझे लगता है कि वे नए गानों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण उन्हें ठीक से सुनते ही नहीं, अन्यथा उनमें नई आधुनिक शैली में जीवन-दर्शन और जीवंत-प्रेरक भावों की कमी नहीं है । ट्रेन सोंग की कई पक्तियाँ मुझे प्रभावित कर रही थीं-‘जीवन-जीवन दरिया-दरिया, एक को पार करो दूसरा दरिया मिले।’ हमारी कार लगातार आगे बढ़ रही और नए-नए दृश्य सामने आ-आकर पीछे जा रहे थे । जैसे एक दरिया पार किया तो दूसरा दरिया सामने आ गया हो।

तीन फरवरी की सुबह ही हम बेटे द्वारा चयनित एक उपहार गृह में लोहे की फेंस के पास ही कार पार्क कर नाश्ता कर रहे थे-इडली-सांभर-डोसा-दही बड़ा आदि। विनय ने अपने लिए फ़िल्टर काफ़ी का आर्डर दे दिया था । तभी बदन पर एक सस्ती-मैली साड़ी लपेटे अधेड़ महिला कहीं से आयी और हमसे भोजन दिलवाने की लगातार याचना करने लगी। वह धारा प्रवाह अंग्रेज़ी में बोल रही थी-'गीव मी सम फुड...पार्सल...आय एम हंगरी...आय हेव फोर्टी ईयर मेंटली रिटायर सन...आय' म लाइक योर मदर...प्लीज़ गीव मी फुड।’ वह काफी देर तक मिन्नत करती रही। 'फ़ूड-फ़ूड' की रट लगाती जा रही थी। बहुत अजीब लग रहा था पर हम उससे उलझे बिना अपना नाश्ता करते रहे। जब उसे लग गया कि हम उसे भोजन या नाश्ते का पार्सल दिलवाने वाले नहीं हैं। तब उसने याचक का चोला छोड़कर रणचंडी का रौद्र रूप धर लिया और एक निश्चित दूरी पर जाकर हम पर धुंआधार बरसने लगीं । ललकारने लगी। वह बार-बार हमारे लिए...' यू कुड़ल्ली...यू कुड़ल्ली...'या ऐसा ही कुछ बके जा रही थी।' कुड़ल्ली'का कोई अर्थ पकड़ में नहीं आ रहा था पर इतना ज़रूर समझ में आ रहा था कि वह हमें अपनी भाषा में शाप दे रही थी। यह स्थिति हमें विचलित और शर्मिंदा कर रही थी। मुझे ‘रोटी’ और ‘रोटी, कपड़ा और मकान' जैसी फ़िल्मों की याद आने लगी। जीवन की पहली और मूल आवश्यकता है-रोटी। जब तक सभी की भूख नहीं मिटती, हम सुख से खा नहीं सकते। मुझे जगमग उजाले के भीतर का अँधेरा नजर आने लगा था। अख़बारों के वे शीर्षक और टीवी की वे ख़बरें याद आने लगीं जिनमें रखरखाव की लापरवाही के चलते बरसात में खुले में पड़ा कितना ही अनाज सड़ जाने का जिक्र होता है और ये ख़बरें हर साल बनी रहती हैं । इसके बाद जब हम कब्बन पार्क में गए थे तब वहाँ भी एक आबनूसी रंग की वृद्ध महिला भीख माँगने के लिए हाथ आगे करके खड़ी थी। उसकी आँख से आँख मिलाना मुश्किल हो रहा था। उसकी आँखों में निरंतर एक असहनीय लाचारी टपक रही थी। उसके मुँह से एक शब्द भी निकल नहीं पा रहा था पर आँखें इतनी बोल रही थी कि उन बोलों को सह पाना मुश्किल था।

सोसायटी के पास मॉल और ठेले पर खुले में बिकने वाली सब्जियाँ काफी महँगी होती हैं। केआर पुरम मार्केट के बारे में प्रियंका ने अवगत कराया। उसने बताया कि केआर पुरम मार्केट में मंगलवार को हाट पड़ता है, वहाँ सब्जी और फल वगैरह सस्ते मिलते हैं। हमने वहाँ जाकर सब्जियाँ और फल लाने का निश्चय किया। प्रियंका फ्लैट में बर्तन, झाड़ू-पौंछा करने आती है। आठवीं तक पढ़ी है। पूछने पर कि आगे क्यों नहीं पढ़ी, बताया कि फैमिली में एक प्राब्लेम आ जाने से आगे नहीं पढ़ पायी। उस प्रॉब्लम के बारे में पूछना मुझे अशोभनीय लगा, इसलिए नहीं पूछा। कन्नड़भाषी प्रियंका ठीक-ठाक हिन्दी बोल लेती है। वहाँ स्कूल में कन्नड़, अंग्रेज़ी और हिन्दी तीनों भाषाएँ पढ़ाई जाती है।

यहाँ की जगहों और सड़कों के नाम जल्दी जुबान पर नहीं चढ़ रहे थे। उन्हें याद करने के लिए तरकीब लगानी पड़ी। बैंगनाहल्ली, बायपन्नाहल्ली, वरथुर रोड, कागादास रोड। इनके हिज्जे यही सही हो, मैं कह नहीं सकता। यह हमारी समस्या अधिक थी। वहाँ के रहवासी कन्नड़ भाषियों के लिए तो इनका उच्चारण सहज होगा। बहू अंकिता ने बताया कि यहाँ गाँव को 'हल्ली' कहते हैं। मैं समझ गया कि इसीलिए कई स्थानों के साथ 'हल्ली' लगा हुआ है। अनजाने में एक सूत्र पकड़ में आ गया। नगर जब महानगर बनते हैं तो आसपास के गाँवों को निगल जाते हैं पर उनके नाम अक्सर वैसे ही जीवित रहते हैं। जबान पर चढ़ा था-आरके स्टूडियो। इसे उल्टा करके याद रखना पड़ा। आरके का उल्टा केआर और उसके साथ में पुरम लगा दो-हो गया आरके पुरम। बैंगनाहल्ली को बैंगन से याद रखना पड़ा। केआर पुरम जाने के लिए बैंगनाहल्ली बस स्टाप से बस पकड़ना थी।

दस फरवरी को साहित्यकार मित्र आचार्य बलवंत से कब्बन पार्क में मिलना तय हुआ था। हालाँकि इस बीच हम लालबाग पार्क और कब्बन पार्क देख चुके थे। चूँकि यह पार्क हम दोनों के निवास के बीच में पड़ता था इसलिए वहीँ हमने मुलाकात तय की थी। इस तरह मुझे कब्बन पार्क दुबारा जाना पड़ रहा था। मैं मेट्रो से कब्बन पार्क स्टेशन-स्टेशन पर पहुँचा। स्टेशन से जैसे ही बाहर हुआ बलवंत जी टैक्सी वाले से बात करते हुए मिल गए। तस्वीरों से बाहर मैं पहली बार उनसे मिल रहा था। उनसे जब मोबाइल पर बात होती थी तो लगता था कि कोई बुजुर्ग होंगे। पर प्रत्यक्ष देखने पर सच सामने था। आबनूसी रंग के बलवंत जी मुझसे सात-आठ साल छोटे थे पर कद उनका छह फुट था, मुझसे कोई छह-सात इंच अधिक। ये वे ही शख्स थे जिन्होंने मेरी कहानी 'सुखदेव की सुबह' पर समीक्षा लिखी थी। उस पर बात कर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया तो दी ही थी। 'परिकथा' में छपी यह कहानी उन्हें बहुत पसंद थी। इससे पहले मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था।

तेरह फरवरी को बारह बजे के आसपास जब लिफ्ट से नीचे उतरा तो बाहर धूप खिली हुई थी। सुबह आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा में ठंडक थी। इसीलिए यह खिली हुई धूप बहुत भली लग रही थी। मैं पैदल चलते हुए सोसायटी के गेट से बायीं ओर कागादास रोड की ओर मुड़ गया। मुझे इधर अधिक धूप मिलने की संभावना लग रही थी। घूमने के लिए मैं किसी भी रोड पर निकल पड़ता।

फुटपाथ पर कुछ आगे बड़ा तो सामने से एक मुस्लिम युवती काला बुरका पहने आ रही थी। उसने बच्चे का हाथ पकड़ रखा था। वे दोनों माँ-बेटे ही होंगे। बच्चे ने सफेद रंग की नेकर पर सफेद रंग का हाफ आस्तीन का शर्ट पहन रखा था। बच्चा बहुत सलोना लग रहा था। उसे उसकी मम्मी लगभग खींचकर लिए जा रही थी पर बच्चे का ध्यान तो कहीं ओर था। वह इधर उधर देखे जा रहा था। उसके चलने और देखने में कोई सामंजस्य नहीं था। माँ उसे आगे चला रही थी पर बाज़ार देखने का मोह उससे छूट नहीं पा रहा था। उसे देख मुझे अपना बचपन याद आ गया। मैं ऐसे ही देखने के चक्कर में मेले में गुम हो चुका था। मुझसे माँ का हाथ छूट गया था। फिर मेरे नाम का एनाउंस हुआ था। खिली हुई धूप में दो रंग थे एक काला और दूसरा सफेद। मैं उन्हें देख निहाल हो गया। काला अतीत का रंग था और सफेद भविष्य का। अतीत पर भविष्य की जिम्मेदारी थी। उसे भविष्य को बचाते हुए मंजिल तक ले जाना था।

चौदह फरवरी वेलेंटाइन डे की सुबह सर सीवी रमन बस स्टाप पर एक अजनबी युवक अनिरुद्ध वरखेड़े से परिचय हुआ। वह बस स्टैंड पर बैठकर कॉलेज जाने के लिए अपनी बस का इन्तजार कर रहा था। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि उसने ग्रेजुएशन में एक विषय मनोविज्ञान भी ले रखा था। वैसे मनोविज्ञान विषय कम ही विद्यार्थी लेते हैं। वह बढ़िया हिन्दी बोल रहा था जबकि वह वहीँ का निवासी था और उसका परिवार हिन्दी भाषी नहीं था। अच्छी हिन्दी का कारण पूछने पर बताया कि वह केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ा है और वहाँ उसके स्कूल के कई दोस्त हिन्दी भाषी थे। उन्हीं के साथ रहकर वह बढ़िया हिन्दी बोलना सीख गया था। वैसे स्कूल में एक भाषा हिन्दी थी ही।

उस दिन घूमकर जब फ्लैट पर वापस आया तो टीवी पर आतंकवादी हमले की खबरें चल रही थी। पुलवामा में जम्मू काश्मीर में हाईवे पर बड़ा आतंकी हमला हुआ था। इसे उरी से बड़ा हमला माना जा रहा था। तब उन्नीस जवान शहीद हुए थे और अब इस हमले में सीआरपीएफ के उनतालीस से अधिक जवान शहीद हुए । बस में इकतालीस जवान सवार थे। स्कारपीओ में करीब तीन सौ किलोग्राम विस्फोटक बताया जा रहा था। स्कीरपीओ जवानों की बस से टकरायी थी। वेलेंटाइन डे के माथे पर इस आतंकी हमले का कलंक चिपक चुका था।

पंद्रह फरवरी की सुबह मैंने गौर किया कि मैं सोसायटी के गेट से घूमने के लिए जब दाहिनी ओर मुड़ता हूँ तब चार कदम की दूरी पर ही बैठा हुआ एक बीमार कुत्ता डीआरडीओ की कॉलोनी की बाउंड्री से सटे फुटपाथ पर मिल जाता है। एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि सुबह मैंने उसे वहाँ बैठा हुआ न पाया हो। कुत्ते का रंग भूरा था जिस पर काली चित्तियाँ पड़ी हुई थीं। मैंने उसे भूरिया नाम दे दिया था । वह अपना मुँह टांगों के बीच डाले दीन-हीन सिकुड़ी हुई मुद्रा में बैठा रहता था। वह कुछ दिनों का ही मेहमान लग रहा था। उसका बदन कांपता रहता था। उसकी जबान बाहर निकली हुई रहती थी। उसकी आँखों में दर्द और पसरी हुई उदासी को आसानी से पढ़ा जा सकता था।

उस दिन आखिर संकरी और घुमावदार गलियों को पार करता हुआ मैं उस जगह पर पहुंच गया जिसे नीचे की ओर हम आठवीं मंजिल की बालकनी से उत्सुकता देखा करते थे। मन में उस जगह पर पहुँचकर ऊपर बालकनी और फ्लैट को देखने की मेरी इच्छा बलवती थी। मुझे वहाँ पहुँचने में करीब आधा या पौन घंटा लगा होगा। पर वहाँ पहुँचकर मुझे किसी बच्चे जैसी खुशी महसूस हुई। मुझे लगा अभी मेरे भीतर एक बच्चा जिंदा है जिसे नई जगह देखकर खुशी होती है। मैंने सोसायटी की बाउंड्री से बाहर ऊपर नजरें उठाकर बी ब्लाक की बहुमंजिला इमारत में अपने फ्लैट की बालकनी को ढूँढ मोबाइल के कैमरे से तड़ातड़ तीन-चार फोटो ले ली। मैं वहाँ कब से पहुंचना चाहता था। ऊपर फ्लैट की बालकनी से नीचे बाउंड्री के पार की इमारतें और जमीन का एक खाली टुकड़ा तो दिखता था पर उधर पहुंचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। नीचे सोसायटी की बाउंड्री इतनी ऊँची थी कि वहाँ से उस पार देखना संभव नहीं था और उसे पार करना भी। फ़्लैट की बालकनी से रोज नीचे की ओर हम अचरज से देखा करते थे। यहाँ हम से आशय मैं और जीवनसंगिनी सुलभा से है।

नीचे सोसायटी के उसी तरफ बाहर जमीन का बड़ा-सा टुकड़ा खाली था, जबकि आसपास एक दूसरे से सटे चार-चार, पाँच-पाँच मंजिला मकान खड़े थे। उस खाली टुकड़े पर एक कोने में नींव खुदते देख अचरज हो रहा था। क्योंकि अब तो मकान बीम-कालम से बनते हैं, नींव वाले नहीं। वह अब पुराने जमाने की बात हो गई है। वहाँ एक छोटा-सा मकान आकार ले रहा था। उसकी दीवारें ईटों की बजाय ब्लॉक्स से बन रही थी। देखते-देखते उस मकान की दीवारें खड़ी हो गई थीं। मकान की ड्राइंग बहुत सरल थी-दो छोटे-छोटे कमरे और उसको जोड़ने वाला एक गलियारा। ऊपर पतरे भी चढ़ने लगे थे। इसी दौरान ऊपर मुंडेर पर पतरे रखते-रखते कारीगर नीचे गिर गया। हम धक्क रह गए। कुछ ही समय बाद जब फिर वही कारीगर ऊपर आकर के काम करने लगा, तब कहीं जाकर राहत मिली। शायद उसे कोई खास चोट नहीं आयी थी।

हमारे ब्लाक की यह इमारत चौदह फ्लोर की है और पूरी सोसायटी में ऐसे आठ ब्लॉक हैं, जिसमें सात सौ पचास फ्लैट हैं। यहाँ काम करने वाली बाइयाँ ही एक सौ साठ हैं। अभी तो पूरे फ्लैट भरे भी नहीं हैं। आसपास की ऊँची इमारतों के बीच एक वह छोटा-सा सिर्फ़ दो कमरों वाला एक मकान का आकार लेने की हिमाकत कर रहा था। उसकी यह हिमाकत अच्छी लग रही थी।

सोलह फरवरी की सुबह मैंने वरथुर रोड पकड़ा। मैं उस पर आगे बढ़ता जा रहा था। यह संकरा रोड कोई दो किलोमीटर के बाद ख़त्म हो गया था। इस रोड को आड़ा काटते हुए एक फोर या फोर से भी अधिक लेन वाली व्यस्त सड़क थी। ऐन सुबह ही उस सड़क पर तेज आवागमन का ऐसा शोर था कि लग रहा था कि जैसे कोई नदी बाढ़ से उफनती हुई चली जा रही हो। दिन में तो यह शोर और अधिक होता होगा। मैं वरथुर रोड के उसी मुहाने से वापस लौटने लगा। रास्ते में मैंने ड्राइविंग सिखाने वाली कई कारों को आते-जाते देखा।

सत्रह को रविवार था। रविवार का दिन मेरे लिए खास होता है। कुछ अच्छा-सा लगता है। इसी दिन अख़बार में कहानी-कविताओं और रोचक लेखों से युक्त रविवारीय पृष्ठ आते हैं। बुक स्टाल पर रखी पत्र-पत्रिकाओं को मैं खड़ा रहकर गौर से देखता हूँ। मुझे बुक स्टाल पर सिवाय 'राजस्थान पत्रिका' के हिन्दी का कोई अखबार नजर नहीं आया। बाकी के सारे अखबार और पत्रिकाएँ अंग्रेजी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषा के थे। बेटा विनय इंडियन एक्सप्रेस बुलवाता था। 'राजस्थान पत्रिका' पहले ही खासतौर से मेरे लिए विनय ने लगवा दिया था।

डीआरडीओ के गेट से घुसकर केंद्रीय विद्यालय के गेट से निकला। फुटपाथ पर दीवार से सटा मेरा परिचित मरियल-सा कुत्ता भूरिया आगे की टाँगों के बीच अपना सिर टिकाए हुए बैठा था। वह रह रहकर काँप जाता था। जैसे उसे हिचकी चल रही हो। आगे का रास्ता दो सड़कों में फट जाता है। मैं वर्थुर रोड छोड़कर सीधे बैंगनाहल्ली बस स्टॉप की ओर बढ़ जाता हूँ। रास्ते में कई दुकानें हैं। कुछ दुकानों में खाल उधड़े मुर्गे और बकरे बिकने के लिए लटके हैं। बस स्टॉप पर तीन-चार आबनूसी रंग की औरतें रंगीन फूल-मालाओं को करीने से पल्ली पर सजाए बैठी थीं। वापस लौटकर मैं गेट नंबर तीन से अंदर घुसा। भीतर एक ऐसा बड़े-बड़े हरे पत्तों वाला पेड़ था जिसके पत्ते लाल होकर झड़ रहे थे। नीचे लाल पत्तों की एक चादर-सी बिछी थी।

शाम को सोसायटी वाकिंग ट्रेक पर एक कटे बालों वाली लड़की बुची नाक, काले मुँह, छोटे पाँव और छोटी ही पूँछ वाले कुत्ते को जंजीर से बंधे घूम रही थी। उसे देख सहसा कब्बन पार्क में देखी एक सुनहरे रंग की विदेशी युवती की याद हो आयी जिसका जूड़ा शंकर भगवान की जटाओं जैसा बंधा था। बड़भागी बूची नाक वाले कुत्ते को देख भूरिया के भाग पर मन ही मन तरस आया।

अट्ठारह फरवरी को डीआरडीओ के गेट नंबर पाँच से घुसकर केन्द्रीय विद्यालय के पास वाले गेट से निकल फिर दाहिनी ओर आगे बढ़ा। मुझे दाढी़ सेट करवानी थी। इधर मैंने सैलून की चार-पाँच दुकानें देखी थीं। एक सैलून वाले ने दाढ़ी की सेटिंग के लिए फिफ्टी रुपीज बताए। मैं आगे बढ़ा। अगला सैलून वाला ख़ाली भी था।

मैंने विनोद कुमार से दाढ़ी सेट करवायी। उससे कुछ बातचीत भी हुई । वह कन्नड़ में बोल रहा था। सब कुछ समझ में तो नहीं आ रहा था पर कुछ-कुछ समझ रहा था। उसने बताया कि वह अपनी दुकान का किराया 6000 /- देता है। दाढ़ी सेट करवाने के बाद जब मैं उसे पैसे देने लगा तो पैसे न लेते हुए वह बार-बार 'राईटऽ–राईटऽ' कह रहा था। पहले तो मैं समझ नहीं पाया। कहीं अधिक पैसे तो नहीं माँग रहा। वैसे पहले ही पूछ लिया था, चालीस ही तो बताया था। वह मेरे दाएँ हाथ की ओर इशारा कर रहा था। आखिर में मुझे समझ में आ गया कि वह दाएँ हाथ से पैसे देने का कह रहा है। मैं उसे बाएँ हाथ से पैसे देने की कोशिश कर था। उसके लिए राइट ही राइट था और मेरे लिए राइट लेफ्ट दोनों बराबर थे।

उन्नीस फरवरी को मैं अखबार देख रहा था। इंडियन एक्सप्रेस में बेंगळुरु में मधुमक्खियों की समस्या पर विस्तार से लिखा था। मधुमक्खियों की समस्या को लेकर बीबीएमपी को पंद्रह-बीस शिकायतें रोज मिल रही थी। बीबीएमपी समय पर सबकी मदद नहीं कर पा रही थी। लोग निजी तौर पर आदिवासियों से 1000/- तक देकर अपने निवास से मधुक्खियाँ हटवा रहे थे। मनुष्य बहुत खुदगर्ज है। उसने अपने घर बनाने के लिए पशु-पक्षियों के घर उजाड़ दिये हैं । अब मूक पशु-पक्षी और ये मधुमक्खियाँ जाए तो जाए कहाँ। वहाँ सोसायटी में भी मधुमक्खियों का प्रकोप था। घूमते हुए मैंने एकाध जगह पर मरी हुई मधुमक्खियों के ढेर देखे।

बीस फरवरी को सोसायटी में ही बाहर तीन-चार राउंड लगा आया, आगे नहीं गया क्योंकि 9 बजे तो मुझे तैयार होकर कैब से एअरपोर्ट निकलना था। अक्सर उस ब्लाक के गार्ड से बात हो जाती थी। गार्ड उन्नीस-बीस साल का लड़का ही था। वह असम राज्य से था। वहाँ अधिकतर गार्ड पूर्वोत्तर भारत के ही थे। लड़के ने बताया कि उसका भाई उसे यहाँ लाया था। हैंडीमेन कंपनी ने उसे यहाँ गार्ड का काम दिया है। उसकी नीली वर्दी पर कंपनी का मोनोग्राम लगा रहता था। वह चार साल से घर नहीं गया था। बता रहा था कि यहाँ रात को मच्छर बहुत काटते हैं।

नौ बजे के करीब टैक्सी में बैठा। चुपचाप बैठने के बजाय मैंने टैक्सी ड्राइवर से बात करने की सोची। जानने की इच्छा हुई कि बेंगळुरु एअरपोर्ट के नाम के साथ केम्पेगौड़ा क्यों जुड़ा है। केम्पेगौड़ा आखिर कौन हैं? टैक्सी ड्राइवर कृष्णा ने बताया कि कोई पाँच सौ साल पहले केम्पेगौड़ा ने बेंगळुरु को बसाया था। उन्हीं के नाम पर यहाँ के हवाईअड्डे का नाम केम्पेगौड़ा अन्तरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पड़ा।

अंत में डॉ. हंसा दीप का जिक्र ज़रूरी है जिनके कारण यह यात्रा संस्मरण संभव हुआ। जब हंसा जी को पता लगा कि मैं बेंगलुरु में हूँ तो उन्होंने लिखा कि बेंगलुरु एक ख़ूबसूरत शहर है । यहाँ की जलवायु बहुत अच्छी है । इतने अच्छे शहर में हो तो एक यात्रा-संस्मरण तो बनता है। यह संस्मरण उसी आग्रह का परिणाम है। उनका बहुत-बहुत धन्यवाद।

2 comments :

  1. काफी सूक्ष्म अवलोकन के साथ लिखा गया है यह संस्मरण . बैंगलुरू में रहते हुए बैंगलुरू का संस्मरण पढ़ना रोचक लगा . सचमुच यह शहर अब मेरा भी अपना होगया है . छुट्टियां हुई और चलो बैंगलुरू ....

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  2. बहुत ही रोचक संस्मरण पिछले 10 सालों से आना लगा हुआ है पढ़कर आत्मीयता हुईबहुत सूक्ष्म दृष्टि ।

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