चंद्रबिंदु, शिरोबिंदु, और पंचमाक्षर - हिंदी लेखन के सामान्य भ्रम

- अनुराग शर्मा


देवनागरी सहित कई भारतीय वर्णमालाओं में पंचम क्रम में आने वाले वर्ण ङ, ञ, ण, न, तथा म - पंचमाक्षर कहलाते हैं। इनमें भी पहले दो (, ) की स्थिति विशिष्ट है क्योंकि वे पूर्ण वर्णों की तरह प्रयुक्त न होकर सदा दो वर्णों के बीच अर्धाक्षर के रूप में ही प्रयुक्त होते हैं जबकि , , और अर्ध और पूर्ण दोनों प्रकार का व्यवहार करते हैं। यानी , , या की तरह मात्राएँ , और में नहीं लग सकतीं। उदाहरण के लिये जहाँ पाणिनी, विष्णु जैसे शब्दों में ण में क्रमशः इ और उ की मात्राएँ लगी हैं, या मीरा, नीरा जैसे शब्दों में म और न पर मात्राएँ लगती हैं, वैसा प्रयोग ङ, और ञ का नहीं होता है।

अब शिरोबिंदु पर एक दृष्टि

1. जब अर्ध-पञ्चमाक्षरों की स्थिति दो अक्षरों के बीच हो तो उन्हें शिरोबिंदु से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। निम्न युग्मों में एक ही शब्द के दो रूप सूचित हैं -
गङ्गा - गंगा (गँगा लिखना सही नहीं है)
गञ्जा - गंजा (गँजा लिखना सही नहीं है)
चन्द्रमा - चंद्रमा (चँद्रमा लिखना सही नहीं है)

2. शब्दों के अंत में आने वाले म् को शिरोबिंदु से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। जैसे सत्यम् शिवम् सुंदरम् को सत्यं शिवं सुंदरं लिखना। ध्यान रहे कि लिखने में ये दोनों रूप सही होते हुये भी पहला रूप अनुसरणीय है क्योंकि उसमें उच्चारण स्पष्ट है, जबकि सही शब्द और उच्चारण के अज्ञान में दूसरे को सत्यँ शिवँ सुंदरँ पढ़ा जा सकता है, बल्कि आजकल जिस प्रकार चंद्रबिंदु थोक में हटाये जा रहे हैं, इस कथन को वैसा ही पढ़ा जा रहा है। इसी प्रकार यदि आप अनुस्वार का प्रयोग करके अमृतम् गमय को अमृतंगमय लिख देते हैं तो उसे अमृ-तङ्ग-मय पढ़ा जा सकता है, बल्कि जिन्हें 'अमृतम् गमय' की जानकारी नहीं है, वे उसे अमृ-तङ्ग-मय ही पढ़ेंगे, यह निश्चित है। मैंने वैसा लिखते हुये और पढ़ते हुए देखा है।

3. स्वीकृत परिस्थितियों में चंद्रबिंदु के स्थान पर - जब चंद्रबिंदु (अनुनासिक ध्वनि) शिरोमात्राओं के साथ आता है तो सुविधा हेतु चंद्नबिंदु के स्थान पर शिरोबिंदु का प्रयोग स्वीकार्य है, बल्कि श्रेयस्कर है। उदाहरण के लिये मैं, इनमें, नहीं, उनमें, शब्दों, तथा उन्होंने, जैसे शब्दों में अनुनासिक ध्वनि होते हुये भी चंद्रबिंदु के स्थान पर शिरोबिंदु का प्रयोग परम्परा से होता रहा है। यदि आप इन शब्दों में चंद्रबिंदु की ध्वनि पहचान लेंगे तो अन्य शब्दों में भी चंद्रबिंदु के प्रयोग समझना सरल हो जायेगा। एक बार फिर, यह ध्यान रहे कि अनुनासिक ध्वनि (चंद्रबिंदु का चिह्न) स्वतंत्र स्वर या व्यंजन न होकर, किसी अन्य वर्ण का ध्वनिगुण है। जैसे मैंने शब्द में मैं की ध्वनि मैंटर शब्द में प्रयुक्त मैं की ध्वनि से भिन्न है। पहला (मैंने) अनुनासिक (चंद्रबिंदु) का उदाहरण है (यद्यपि उसमें मात्रा होने के कारण सामान्यतः चंद्रबिंदु न लगाकर शिरोबिंदु ही लगा दिया जाता है जबकि मैंटर शब्द का सही स्वरूप मैण्टर है और वह अनुस्वार (शिरोबिंदु) का उदाहरण है।

चंद्रबिंदु और शिरोबिंदु की बात चलने पर मुख्यतः दो बिंदु ध्यान में आते हैं। पहला तो चंद्रबिंदु को शिरोबिंदु से प्रतिस्थापित करने की प्रवृत्ति, और दूसरा, पंचमाक्षर का शिरोबिंदु से प्रतिस्थापन। देखने में सामान्य सी लगने वाली यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ उतनी निर्दोष नहीं हैं जितनी एक दृष्टि में देखने पर लगती हैं। मात्रा वाले मान्य उदाहरणों को छोड़कर चंद्रबिंदु हटाना किसी भी स्थिति में सही नहीं है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में तो अनर्थकारी हो सकता है।

रोमन या फ़ारसी लिपि में हिंदी (उनकी भाषा में हिंदुस्तानी) पढ़ने वाले अधिकांश बॉलीवुड अभिनेता, गीतकार, गायक आदि हिंदी की ण जैसी ध्वनियों का उच्चारण करने में पूर्ण असमर्थ हैं क्योंकि उन लिपियों में इस ध्वनि को ठीक से व्यक्त नहीं किया जा सकता। चंद्रबिंदु के साथ भी अभारतीय लिपियों में समस्या है यद्यपि पारम्परिक उर्दू लिपि में भारतीयता के लिये चिह्न विकसित किये गये थे परंतु वहाँ तो अब मात्रायें भी ग़ायब होती जा रही हैं। फ़िल्मों में सर्वाधिक बोले जाने वाले गायत्री मंत्र में वरेण्यम् को वरेनियम जैसा ही पढ़ा जाता है। आश्चर्य है कि अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी, और फ़्रैंच जैसी विदेशी भाषाओं के शब्दों के उच्चारण पर लम्बी-लम्बी बहसें करने वाला वर्ग भारतीय मूल के शब्दों के उच्चारण के प्रति निर्लिप्त है।

संस्कृत में केवल म् अनुस्वार जैसे प्रयुक्त होता है, जबकि हिंदी में किसी भी पंचमाक्षर को शिरोबिंदु से बदला जाने लगा है। कई लेखक तो यह अंतर समझते ही नहीं। एक और बात जो सदा ध्यान में रहनी चाहिये कि भाषा प्रधान होती है, लिपि नहीं। लेखन के या व्याकरण के नियम जकड़ने और थोक में दोहराने वाले सोशल मीडिया विद्वानों को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ग़लत लिखे शब्द से उसका उच्चारण ग़लत करने के बजाय सही बोले जाने वाले शब्द को सही लिखने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। और इस हेतु, सही लिखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना सही बोलना। लिखते समय होने वाले किसी भी संशय की स्थिति में शब्द के सही उच्चारण, उसके उद्गम, अर्थ, सम्बंधित शब्दों आदि पर ध्यान दीजिये - कितनी बार तो आपको किसी से पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

बँटा और बंटा दो भिन्न शब्द हैं जिन्हें लिखा ही नहीं बल्कि पढ़ा भी अलग जाता है। जहाँ बँटा में ब और ट के बीच में कोई अन्य ध्वनि न होकर नासिक्य ध्वनि ब के साथ ही मिली हुई है, जबकि बंटा का शुद्ध रूप बण्टा है, अण्डा, घण्टा, और बन्ता से मिलता हुआ, जिसमें ब और ट के बीच में ण की (यहाँ बोलने में लगभग न जैसी) अर्ध-ध्वनि उपस्थित है। झण्डा भी सही है, झंडा भी सही है, लेकिन उसे झँडा लिखना ग़लत है। इसी प्रकार साँप, और साँस को क्रमशः सांप और सांस लिखने में दोष है।

उर्दू में प्रचलित, न पर समाप्त होने वाले कई शब्दों जैसे जहान, आसमान, मेहमान, हिन्दुस्तान के काव्यात्मक स्वरूप जहाँ, आसमाँ, मेहमाँ, हिंदोसिताँ आदि के उपर्युक्त रूपों में भी चंद्रबिंदु का प्रयोग स्वीकार्य है। ऐसे शब्दों के वास्तविक स्वरूप गद्य तथा पद्य दोनों में मान्य हैं, जबकि चंद्रबिंदु वाले रूप काव्य में, आवश्यकता पड़ने पर स्वीकार्य हैं।

क्रांतिकारियों के प्रिय शब्द इनक़िलाब (या इन्क़लाब) को यदि आप इंकलाब लिखेंगे तो उसके पहले भाग को स्याही वाली इंक की तरह भी पढ़ा जा सकता है जो सही नहीं है। इसलिये हर पंचमाक्षर को शिरोबिंदु से प्रतिस्थापित करने की, अकर्मण्य छापाकारों की दुष्प्रवृत्ति से यथासम्भव बचना चाहिये।

धुआँ और कुआँ, कथाएँ और कविताएँ, कुँवर और कँवल, इनमें चंद्रबिंदु सही है। चंद्रबिंदु को आप बेशक चन्द्रबिन्दु लिखें क्योंकि उसका सही रूप वही है। कविताएँ में चंद्र बिंदु है जबकि ऐंकर (ऐङ्कर) में शिरोबिंदु। हुंकार में शिरोबिंदु है जबकि हूँ (मैं हूँ न वाला) में चंद्रबिंदु।

एक और बात सदा ध्यान में रहनी चाहिये कि एक प्रचलन (या विचलन) की स्वीकार्यता, किसी दूसरे (या तीसरे) नियम का निषेध नहीं होती है। अनेक सत्य एक साथ उपस्थित रह सकते हैं। मानक का अर्थ भी एक को छो‌ड़कर अन्यों को बंद करना नहीं होता। इसलिये यदि 'हिंदी' शब्द स्वीकार्य है तो उसका अर्थ हिन्दी को अमान्य करना नहीं होता है, न हो सकता है। बसंत स्वीकार्य होने मात्र से वसन्त दोषपूर्ण नहीं हो जाता है। अपनी सीमित जानकारी के बाहर के शब्दों को अमान्य करने की जो प्रवृत्ति हिंदी भाषियों, विशेषकर क्षेत्रीय स्वरूपों के परिचित विद्वानों में देखी जाती है, उससे बचना चाहिये।

सत्य यही है कि चंद्रबिंदु हिंदी की अनिवार्यता है, उसका यथोचित प्रयोग करें, सही उच्चारण को बचाने का प्रयत्न करें।

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