कहानी: पूर्णविराम के पहले

डॉ. हंसा दीप

हंसा दीप


मैं रोज उस बस में चढ़ती थी जो मुझे सीधे काम तक ले जाती थी। हमारे संस्थान की बस थी वह जिसमें आने और जाने के लिये ड्रायवर को टिकट देने होते थे। टिकट भी बस में नहीं दिए जाते थे, पहले से खरीद कर रखने पड़ते थे। छह डॉलर का एक टिकट, आने-जाने के कुल बारह डॉलर। काम अपनी जगह था और आने-जाने के टिकट का पैसा अपनी जगह। संस्थान का हर शिक्षक, हर काम करने वाला इसकी सवारी करता तो टिकट देना ही पड़ता था। हाँ छात्रों के लिये अपने पहचान पत्र के साथ आना-जाना मुफ्त था। मुफ्त तो क्या उनकी फीस में सब कुछ उनसे वसूल लिया जाता था। उनसे बगैर कहे ले लिया जाता था और हमसे कहकर लिया जाता था। कान इधर से पकड़ो या उधर से, बात एक ही थी। 
आज कुछ नया था। रोज समय पर आने वाली बस पाँच मिनट लेट थी। रोज जो ड्रायवर बस चलाती थी वह ड्रायवर भी नहीं थी चालक की सीट पर, एक नया चेहरा था। उम्र में वह मेरे बराबर की ही लग रही थी। बस भी नयी थी। नयी बस और नयी ड्रायवर से भला मुझे क्या फर्क पड़ता, मुझे तो अंदर बैठकर अपनी तैयारी करनी थी, दो कक्षाओं में आज क्या पढ़ाना है उसी के गुंताड़े में दिमाग था। अपनी पावर पाइंट की फाइल चेक करनी थी। इधर बैठी और उधर उतर गयी, कुछ ऐसा ही काम था मेरा। “कोई चालक होए हमें का हानि” वाली तर्ज में मुझे तो तटस्थ मुद्रा में सफर तय करना होता था। इस बदलाव से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ना था, सो नहीं पड़ा।
एक सप्ताह तक तो सब कुछ ठीक रहा। अब वह वाकिफ थी मेरे रोज के यात्री होने पर और मैं उससे वाकिफ थी कि इस समय वही होगी मेरी सारथी। रोज मेरे चढ़ने-उतरने के बाद वह अच्छी सी मुस्कान देती थी, मैं भी उस मुस्कान को दुगुना करके लौटाते हुए “धन्यवाद” और “आपका दिन शुभ हो” कहकर निकल जाती थी।
एक दिन उस ड्रायवर ने पूछा – “क्या आप शिक्षक हैं?”
मैंने कहा “हाँ।” बस वहीं से “यह सब” शुरू हुआ, “यह सब” यानि उसकी अनुकंपाओं का सिलसिला। बगैर टिकट के उस बस में बैठने के बारे में कभी भूल कर भी नहीं सोचा था मैंने लेकिन इसके बाद जब भी बस में चढ़ते हुए अपना टिकट उस महिला ड्रायवर को देने लगती तो वह “थेंक्स” कहकर मुस्कुरा देती। शुरू के एक दो दिन तो अच्छा लगा मुझे, बहुत अच्छा लगा। रोज के बारह डॉलर बच रहे थे, बुरा क्यों लगता भला। मैं भी अपने सफर को दुगुने आनंद से पूरा करने लगी। चाहे बहुत पैसा कमा रही थी पर मुफ्त की तो पाई-पाई भी अद्भूत खुशी देती है। कई बार खरीददारी के समय किसी स्टोर की कार्ट में पच्चीस सेंट का सिक्का लगा हुआ मिल जाता तो आँखों में चमक आ जाती थी, कुछ ऐसी चमक कि जमाने भर की दौलत हाथ लग गयी हो, फिर ये तो पूरे के पूरे बारह डॉलर थे। पूरे सफर में अद्भुत मुस्कान रही मेरे चेहरे पर।
इसके पहले उस टिकट के बगैर कभी बस में चढ़ने के बारे में मैंने सोचा भी नहीं था, मैंने क्या किसी ने भी नहीं सोचा होगा। बड़े ओहदे पर रहकर छोटे-मोटे घपलों के बारे में सोचना अपनी इज्जत के कांकरे करना था। किराया अपनी जगह, नौकरी अपनी जगह। सालों से यही नियम चल रहा था।
सोमवार से शुक्रवार तक पूरे सप्ताह मुफ्त का सफर करके मुझे बहुत खुशी मिलनी चाहिए थी और मिली भी परन्तु सप्ताहांत तक यह खुशी का अतिरेक मुझे कचोटने लगा। सप्ताह खत्म होते-होते, शुक्रवार आते-आते मेरा माथा ठनका, ऐसा ठनका कि मुझे लगने लगा कि दाल में कुछ काला है। ध्यान से सोचा तो लगा कि काला ही नहीं है बल्कि बड़ा-सा कंकड़ है जो अब मुझे चुभने लगा है, खटकने लगा है उसका टिकट न लेना। यूँ बगैर किसी स्वार्थ के किसी पर कोई ऐसा उपकार क्यों करने लगा।
किसी का अतिरिक्त अच्छा होना शंकाओं को जन्म दे ही देता है और शंकाओं के घेरे में तो बुरी बातें ही आती हैं जो एक-एक करके हमला करती रहती हैं। सो एक के बाद एक बुरे ख्याल आने लगे मुझे। आखिर वह इसके बदले में कुछ न कुछ तो चाहती ही होगी मुझसे। वह सब कुछ सोच लिया मैंने जो मेरे अधिकार क्षेत्र के दायरे में था और जिसकी अपेक्षा कोई भी मुझसे कर सकता था।
सबसे पहली वजह तो यह हो सकती है कि मेरी कक्षा में उसका कोई बेटा या बेटी है जिसे वह अच्छे नंबर दिलाना चाहती हो। लेकिन उसे देखकर कभी ऐसा नहीं लगा कि ऐसा कुछ हो सकता है। मेरी कक्षाओं के छात्रों के चेहरे एक के बाद एक सामने आकर हाजिरी देने लगे यह कहते हुए कि “नहीं, वह मैं नहीं हूँ जिसके बारे में सोचा जा रहा है।”
दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि किसी ने मेरी ईमानदारी टटोलने के लिये इस ड्राइवर को मेरे पीछे लगा दिया हो। संभावना थी लेकिन ऐसी छ: डॉलर वाली साजिश बचकानी लगी जिसके होने के कोई आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आए। तो फिर ऐसा क्या चाहती होगी वह, मेरे पास तो ऐसा कुछ नहीं है। हमारा साथ बस इस पैंतालीस मिनट के सफर का ही था फिर न तो वह मुझसे मिलती न मैं उससे। मेरा अब तक चुप रहकर अपने टिकट के पैसे बचा लेना भी मुझे अपना घटिया और तुच्छ व्यवहार लगा - “मैं इतनी गयी-गुजरी हूँ कि इस छोटी-सी हरकत से खुश हो रही हूँ।”
मुझे उसके इस उपकार को किसी न किसी रूप में परिभाषित तो करना ही था। दिमागी जलजले ने अपने करतब दिखाने शुरू कर दिए। यह सोचते हुए कि ड्रायवर की इस मेहरबानी को मैं क्या नाम दूँ, इसका क्या मतलब निकालूँ। मेरी एक शिकायत से उसकी नौकरी भी जा सकती है व किसी और की एक शिकायत पर मेरा टिकट बचाना मुझे भी विभागीय संकट में डाल सकता है।
अब मुझे मेरे आदर्शों की दुहाई याद दिलाने लगी कि मैं टिकट के पैसे बचाकर एक बड़ा गुनाह कर रही हूँ। अगर वह गलत काम कर रही है तो मैं क्यों उसका साथ दे रही हूँ। अंदर का शिक्षक कुलबुलाने लगा उसे एक चेतावनी वाला भाषण देने के लिये। सारे आदर्शवादी विचार अपनी-अपनी सफाई देने लगे - “शिक्षक सिर्फ क्लास में ही तो शिक्षक नहीं होते क्लास के बाहर की दुनिया में भी तो उनका कोई न कोई रोल होता ही है।”
“कैसी शिक्षक हो तुम, क्या यही सिखाती हो अपने छात्रों को!”
“शिक्षक कहलाने से पहले अपनी इस भूमिका को ठीक से निबाहना तो सीखो।”
मेरा दूसरा ‘स्व’ बचाव पक्ष का काम कर रहा था - “मैंने थोड़े ही कहा था उससे कि टिकट मत लो।”
“मैं तो रोज देती रही और वह आँखों से मना करती रही।”
“यह उपकार आखिर क्यों करती रही वह...।”
अपने सवालों और अपने ही जवाबों से घिरी मैं इसी उलझन में बस से उतरने लगी। आज मैंने उसे धन्यवाद भी नहीं कहा, उसके शुभ दिन की परवाह भी नहीं की। उपेक्षित निगाहों से उतरी तो देखा कि मैं बस की आखिरी सवारी थी सो वह भी बस लॉक करके मेरे साथ ही कॉफी की लाइन में आ गयी थी। मेरे पीछे खड़ी वह मुझे देखते हुए बहुत ही अजीब ढंग से मुस्कुरा रही थी। उसकी इस मुस्कान ने मुझे हिला दिया, मेरे खुराफाती दिमाग ने बहुत कुछ सोच लिया। क्या मैं उसे पसंद आ गयी। टीपटाप दिखती, खाती-कमाती शिक्षक पर डोरे डालने लगी थी वह। सामाजिक संबंधों में तो विश्वास रखती थी मैं लेकिन उल्टे सामाजिक संबंधों के लिये अभी भी उतनी ही रूढ़िवादी विचारधारा रखती थी। महिला के पीछे महिला आकर ऐसी मुस्कुराहट दे रही थी। मुझे अब तक के पढ़े-सुने वे सारे किस्से याद आने लगे। पक्का होता जा रहा था कि अब मैं भी उन किस्सों में से एक किस्से का मुख्य पात्र बनती जा रही हूँ, सबके गॉसिप का एक आधुनिक विषय। रसीले और चटखारे ले-लेकर सुनने-सुनाने जैसा, एक महिला प्रोफेसर और एक महिला ड्रायवर के बीच के अंतरंग रिश्तों की कहानी.... और भी बहुत कुछ।   
उसकी रोज की इस अर्थपूर्ण मुस्कान को अनुवादित करती मैं उससे कतराने लगी। उसकी निगाहें जैसे मेरी बोटी-बोटी को छेद देतीं, शरीर में एक सिहरन हो जाती जो किसी अनावश्यक स्पर्श में बदलती और उसकी कल्पना से मुझे झुनझनी होने लगती। उसकी आँखों में गहरे कुछ ऐसा दिखता कि एक सम्मिलन की याचना बंध जाती। उससे आँखें नहीं मिलाती मैं। उसके टिकट न लेने पर मैं उसे ऐसा ‘लुक’ देती कि उसे लगे कि वह जो कर रही है, गलत कर रही है।
मैं उसके झाँसे में कतई आने वाली नहीं। आखिर ऐसा है क्या मुझमें, कुछ भी तो नहीं। घने काले बालों की जगह सफेदी जहाँ-तहाँ झाँकती रहती है तिस पर जगह-जगह से झलकती खोपड़ी की बाल रहित चमकती चमड़ी है। चेहरे पर यहाँ-वहाँ सूरज की रोशनी से जली चमड़ी के काले-काले छितराए से दाग-धब्बे हैं। आँखों पर छह नंबर का चश्मा चढ़ा रहता है। न तो अधिक लंबी हूँ न अधिक छोटी। हाँ, कपड़े और जूते मेरे बहुत अच्छे होते हैं शायद इसीलिये मैं उसे भा गयी। एक सामान्य सी महिला की कदकाठी पर दूसरी सामान्य सी महिला का यह अतिरिक्त अनुकंपा वाला व्यवहार बर्दाश्त के बाहर था। यह मेरे स्व की तौहीन था, तिरस्कार था, मेरी ही नजरों में मेरा अपमान था।
हो सकता है कि यह ड्रायवर मेरे पीछे और मेरे पैसों के पीछे लग गयी हो। इसे टिकट नहीं लेना है तो आखिर क्यों नहीं लेना है। पहले मुझे यह पता करना होगा कि इसके पीछे का राज क्या है। मेरे पास ऐसी तिकड़मबाज गतिविधि के लिये समय नहीं था पर उस ड्रायवर को सबक तो सिखाना था। मेरी भलमनसाहत का मेरे कुछ पैसे बचवाकर कौनसा फायदा उठाना चाहती है यह। मेरे कथित आदर्श रास्ते में हठियाए खड़े थे। मेरा गुस्सा परत दर परत जमता जा रहा था। हर यात्रा के साथ उसकी मुस्कान बढ़ती जा रही थी और मेरा गुस्सा। वह जितनी विनम्रतापूर्वक मुस्कुराती उतनी ही मेरी भौंहें तन जाती थीं। मेरे जीवन में ऐसे कई पल आए थे जब मुझे इस तरह ब्लैकमैल किया गया था लेकिन हर बार इनका सामना करके सही साबूत बच कर निकली थी। हालांकि तब तो जरूरतों का अंबार था फिर भी मैंने घास नहीं डाली थी तो अब तो ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं थी मेरे सामने।
अब मैंने उसके ढीले स्क्रू टाइट करने की कमर कस ली थी। यह मेरे व्यवहार से छलक-छलक कर बाहर आ रहा था कि मैं इस साजिश का भंडाफोड़ करके रहूँगी। अनुमान लग रहे थे, कई सायास थे, कई अनायास थे और कई एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर नयी गांठें बांध रहे थे।
हर एक नये दिन के जुड़ते, मेरी सोच की उग्रता बढ़-बढ़कर उस बिन्दु तक पहुँच गयी थी जहाँ से मुझे पूर्णत: उकसाने का काम पूरा हो गया था। अब घड़ा भर चुका था। आज मैंने उसके बस से बाहर आते ही उसे बात करने के लिये रोका। वह खुश थी, बहुत खुश मानो उसकी कोई मनोकामना पूरी हो गयी हो। मैं आगबबूला थी और वह मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान आग में घी का काम करके मेरे ज्वालामुखी की ज्वाला को धधका रही थी।
और मैंने सीधे-सीधे, बगैर किसी लाग-लपेट के पूछ लिया कि आख़िर मुझसे टिकट न लेने के पीछे उसकी मंशा क्या है। वह बोली – “क्या आपके पास पाँच मिनट का समय है?”
मैंने कहा – “बिल्कुल है, आप तो बताइए मुझे...” मेरी आवाज तीखी थी।
“आपको देखकर मुझे मेरे उस हीरो की याद आती है जिसने मुझे खुद से परिचय करवाया था।”
“मतलब, मैं कुछ समझी नहीं?” कारण जानने की हड़बड़ाहट का सीधे-सीधे संदेश था उसके लिये कि वह पहेलियाँ न बूझे।
इसके बाद वह कह रही थी, मैं अवाक सुन रही थी - “बचपन में एक शिक्षक ने मेरी मदद की थी जिस वजह से मैं आज अपने पैरों पर खड़ी होकर जमाने से लड़ पायी हूँ। मैं और मेरी माँ दोनों होमलेस की तरह इधर-उधर भटकते रहते थे। मैं अपने पेट को भरने के लिये लोगों का सामान उठाकर भागने की हिम्मत करने लगी थी। एक दिन मैं कूड़े-कचरे से एक कागज का टुकड़ा उठाकर पढ़ रही थी तब उधर से गुजरते हुए वे रुक गयीं, माँ से बात की, माँ को समझाया कि मुझे पढ़ाए।”
“फिर” मैं जैसे साँस थामे आगे सुनने के लिये बेताब थी।
“फिर अगले दिन आयीं वे, एक सामाजिक संस्थान में हम दोनों के रहने की व्यवस्था करके वे यह पक्का करती रहीं कि मैं स्कूल जाती रहूँ। जब तक थोड़ी बड़ी होकर मैं समझती कि उन्होंने मेरे लिये क्या किया है, अपना वह ऋण लौटाने के बारे में सोचती तब तक वे कहीं जा चुकी थीं। मैंने उन्हें बहुत ढूँढा, बहुत कोशिश की अपना कर्ज चुकाने की लेकिन वे मिली ही नहीं। वे नहीं होतीं तो आज मैं भी किसी चोर-उचक्के का जीवन जी रही होती। आपके चेहरे को देखकर लगा कि आप में भी वह सब कुछ है जो मैंने बचपन में उनकी नज़रों में देखा था...तो बस आपसे टिकट न लेने का मन किया।”
मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। वह मुझे स्नेह से देख कर कह रही थी “उन्होंने जो किया मेरे लिये वह इस टिकट के सामने तो कुछ भी नहीं पर बस मेरे मन को थोड़ी-सी तसल्ली मिलती रही।”
मुझे काटो तो खून नहीं, मेरे पैरों तले की धरती खिसक रही थी। मेरा मान-स्वाभिमान अपने अभिमान के तले दब गया था और मैं बहुत अदना-सा महसूस कर रही थी। वह मेरी  गुरु थी जो  गुरुमंत्र देकर मुझे अपनी शिष्य की तरह घड़ रही थी। कई शिष्यों की शिक्षक को शिक्षक मिलना कोई आम बात नहीं थी। 
उसका बस ले जाने का समय हो गया था, वह उसी मुस्कान के साथ जाने लगी और मैं उसे जाते देखती रही अपलक। चाहती तो उसे गले लगाकर अपना अपराध बोध कम कर सकती थी लेकिन हौसला नहीं जुटा पाई। बगैर कुछ जाने, बगैर कुछ समझे जितने आरोप किसी के ऊपर लगाए जा सकते हैं मैं लगा चुकी थी। उस बेरुखी से, उस बेहूदी सोच से मैंने खुद को अपनी नज़रों में नीचे गिरा दिया था, पर मेरे जंगलीपन को इंसानियत के घेरे में संजो कर वह मेरी अनर्गल सोच पर पूर्णविराम लगा गयी थी।
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2 comments :

  1. बहुत ही खूबसूरत कथा। अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हम कभी कभी कितनी गलत धारणाएँ बना लेते हैं।
    इट्स एन ऑय- ओपनर..!

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  2. अच्छी कहानी। व्यक्ति के पूर्वाग्रह नई रोशनी के प्रवेश को भी शंका की दृष्टि से देखते हैं। वस्तुतः इसमें अब दोष किसी का एकबारगी निर्धारित कर पाना जल्दबाजी और मुश्किल दोनों है क्योंकि जहां सबसे निकट माने जाने वाले खून के रिश्ते भी स्वार्थ की लपेट में आ चुके हैं। जब खून के रिश्ते ही शक की जद में आ चुके हैं ऐसे में अन्य सामाजिक रिश्तों को पवित्र मन से स्वीकार कर पाना असंभव सा प्रतीत होता है।
    पाश्चात्य देशों में तो समलैंगिक रिश्ते पहले से ही चर्चा का विषय रहे हैं भारत में भी शहरों में स्थित पार्कों एवं अन्य अन्य विशिष्ट स्थलों पर समलैंगिक लोग स्थाई या अस्थाई साथी ढूंढते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में कोई सज्जन जो वास्तव में अच्छा इंसान हो सकता है अचानक बात करे या संबंध बनाना चाहे तो व्यक्ति मनमस्तिष्क आशंकाओं से भर जाता हैं।

    आपने कहानी में मानसिक द्वंद की अच्छी प्रस्तुति की है।

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