लघुकथा: पश्मीना

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह

सफ़ेदी जब उसके बालों में उतर आई थी तब कहीं जा कर साध पूरी हो रही थी।

बचपन के नाज़ुक दौर में दिल के न जाने किस कोने में आ कर पैठ गई थी वह सफ़ेद पश्मीना शाल। उसे पाने के लिए वह जब-तब मचल उठती थी।

वह जब उसकी दिली चाहत बनी, तब उसे पता भी न था कि पश्मीना क्या होता है या उसकी क़ीमत क्या है।

उसकी कश्मीरी प्रिन्सिपल आसमानी साड़ी पर सफ़ेद शाल ओढ़े यूँ जान पड़ी थी जैसे नील गगन को किसी सफ़ेद बादल के टुकड़े ने ढक लिया हो।

माँ ने बताया था कि वह पश्मीना है। महँगा होता है। उसी दिन उसने मन में ठान लिया था कि अपनी पहली कमाई से वह ऐसी रेशमी सफ़ेदी ख़रीदेगी।

कमाना शुरू किया तो वक़्त बड़ा बेरहम हो चला। अकेली हो गई माँ को संभालना और घर का टिमटिमाता चिराग़ जलाए रखना पहली ज़रूरत बन गई। पश्‍मीना की चाह किसी तहखाने में दब कर रह गई। शादी का समय आया तो ज़रूरी शौक के साथ माँ की सफ़ेद साड़ी में कोई पेबंद न लगने पाए यह उसकी ज़िम्मेदारी बन गई।

वर्मा जी के साथ नया जीवन शुरू हुआ। लेकिन जल्‍द ही नैया हिचकोले लेने लगी। फिर तो लहरों के खेल ने और कई नई ज़रूरतों को जन्म दिया।

इस सबके बीच बस यूँ ही एक बार उसने वर्मा जी के सामने अपनी प्रिन्सिपल के रूप का आसमानी बखान कर दिया था। वर्मा जी ने भी उसे दिल में बिठा लिया। फिर कुछ जोड़ गाँठ कर वर्मा जी निकाल ही लाए उसके तहे ख़्वाबों की शाल।

पर किसी ख़ास मौक़े पर पहनने के उद्देश्य से उसने उसे उतने ही गहरे संभाल कर रख लिया जितने गहरे वह उसके दिल में उतरी हुई थी।

कहीं मैली न हो जाए इस डर से उसने कभी उसे अपने शरीर का स्पर्श ही नहीं होने दिया। जब भी वर्मा जी ने कभी ओढ़ने को कहा तो बस एक ही जवाब दिया उसने, “अरे! कहीं ख़ास जगह चलेंगे तब ओढ़ेंगे, आख़िर इतनी महंगी है।”

वर्मा जी भी कभी नाराज़गी से तो कभी स्नेह से उसे कंजूस कह कर बात को आया-गया कर देते र‍हे।

और आखिर आज वह मौक़ा आया ही गया जब वर्मा जी ने उसे अपने हाथों से उसके दिल में बसी सफ़ेद पश्मीना उढ़ा कर भर्राई आवाज़ में कहा, “कंजूस! चलो ख़ास जगह चलने का वक़्त आ गया है।”

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