आओ हिंदी सीखें - भाग 6

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी वर्ण एवं ध्वनि व्यवस्था

भाषा के मुख्य रूप से दो रूप या भेद किए जाते हैं। एक है - मौखिक रूप, जिसे उच्चरित भाषा भी कह सकते हैं; दूसरा रूप है - लिखित। मौखिक या उच्चरित भाषा, भाषा का बोलचाल या कहे कि संवाद संप्रेषण का रूप है। इसका इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानव का है। मनुष्य जन्म के साथ से भाषा किसी न किसी रूप में रही है। इस उच्चरित या मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई है - ध्वनि। प्रत्येक भाषा की अनेक ध्वनियाँ होती हैं। इन्हीं के आपसी संयोग से शब्दों का निर्माण होता है।
इसी प्रकार लिखित भाषा, भाषा का दूसरा रूप है। मौखिक भाषा के स्थायित्व या कहें कि स्थाई रूप प्रदान करने के लिए लिखित रूप सामने आया। मौखिक ध्वनियों को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए इन ध्वनियों के लिपि चिह्न या प्रतीक बनाए। अतः लिखित चिह्नों (प्रतीकों) को वर्ण कहा जाता है। ये वर्ण भाषिक ध्वनियों के लिखित रूप होते हैं। इससे स्पष्ट है कि मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई जहाँ ध्वनि है, वहाँ लिखित भाषा की आधारभूत इकाई वर्ण है। हिंदी में वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है। परंतु वर्ण एवं अक्षर में मूलभूत अंतर है। वर्ण, वर्णमाला का वह पारंपरिक चिह्न जो एक वाक्- स्वन या एकाधिक स्वनों का दृश्य प्रतीक होता है। वर्ण भाषा का लघुत्तम खंड, जिसके टुकड़े नहीं होते हैं; वर्ण भाषिक ध्वनियों के लिखित रूप होते हैं; जैसे - अ, आ, क, ख, ग आदि।
 अक्षर - वाक्- स्वन की बड़ी इकाई है। एक या एक से अधिक स्वनों की वह इकाई जिसका उच्चारण श्वास के एक झटके (स्पंदन) से होता है। फुस्फुसी स्पंद - वाक् स्वन या वाक् स्वनों की वह इकाई जिसमें एक - एक मुखरता शिखर अनिवार्यत: रहता है। अक्षर में एक वर्ण भी हो सकता है या एकाधिक वर्ण समूह हो सकता है।
वर्णों के व्यवस्थित समूह को 'वर्णमाला' कहते हैं। हिंदी वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्ण' तथा बाद में 'व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। स्वर वर्णों की मात्राएँ होती हैं; जो व्यंजन के साथ उनकी मात्रा ही लगती हैं। वर्णों के उच्चारण में लगने वाले कालमान, समयावधि, कालावधि को मात्रा कहते हैं। अ से औ तक हिंदी में ग्यारह स्वर हैं। जिसमें 'अ' को छोड़कर सभी के लिए मात्रा चिह्न बनाए गए हैं क्योंकि 'अ' स्वर तो प्रत्येक व्यंजन में शामिल ही है। हिंदी वर्णमाला में स्वर, व्यंजन वर्णों का व्यवस्थित क्रम होता है। इसमें स्वर वर्ण, उनके मात्रा चिह्न तथा व्यंजन वर्णो का क्रम होता है। स्वरों में अनुस्वार तथा विसर्ग चिह्न भी आते हैं। व्यंजनों में वर्गीय व्यंजन जिसमें 'क' से लेकर 'म' तक के वर्ण शामिल हैं तथा अवर्गीय व्यंजन जिसमें शेष व्यंजन शामिल होते हैं। साथ ही आगत व्यंजन, जिसमें अरबी - फारसी वर्ण क़, ख़, ग़, ज़, फ़ शामिल हैं।


हिंदी ध्वनियों का वर्गीकरण

किसी भी भाषा की भाषिक ध्वनियों को स्वन (phone) भी कहा जाता है। भाषा विज्ञान के जिस अध्याय में इन ध्वनियों का वर्गीकरण किया जाता है, इसे ध्वनि विज्ञान या स्वन - विज्ञान (phonetics) भी कहा जाता है। जिन ध्वनियों के संयोग से किसी भी भाषा के अर्थवान शब्दों का निर्माण होता है, वे ध्वनियाँ भाषिक ध्वनियाँ कही जाती हैं। हिंदी की प्राप्त ध्वनियों को दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है - स्वर और व्यंजन। इन्हीं ध्वनियों को लिखकर व्यक्त करने के लिए प्रत्येक भाषा में लिखित चिह्नों की व्यवस्था की गई है। ये लिखित चिह्न वर्ण कहे जाते हैं। मानव मुख के उच्चारण अवयव दो हैं - जीभ और निचला होंठ। अधिकांश ध्वनियों के उच्चारण में ये दोनों अवयव फेफड़े से निकली हवा को अवरोध पैदा करके रोकते हैं। इस दृष्टि से स्वर और व्यंजन दो प्रकार के वर्ण सामने आते हैं। जिन ध्वनियों के उच्चारण के समय हवा बिना किसी अवरोध के निकलती है, वे स्वर कहलाते हैं तथा मुख के विभिन्न स्थानों पर उच्चारण अवयवों (जीभ अथवा निचला होंठ) द्वारा जब किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न किया जाता है, तब जो ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं; वे व्यंजन कही जाती हैं। साथ ही व्यंजन ध्वनियाँ हैं जिनका स्वतंत्र उच्चारण बिना स्वर की सहायता के नहीं हो सकता।


हिंदी स्व ध्वनियाँ

स्वर वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में फेफड़ों से आने वाली वायु बिना रुकावट तथा संघर्ष के मुख - विवर से बाहर आती है। स्वरों के उच्चारण में मुख - द्वार के स्थान को कम या अधिक तो किया जा सकता है, इसे बिल्कुल बंद नहीं किया जा सकता और ना ही इतना बंद की नि:श्वास रगड़ खाकर निकले। हिंदी में परंपरा से प्राप्त ग्यारह स्वर हैं - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ तथा एक आगत स्वर है - ऑ। इन स्वर ध्वनियों का वर्गीकरण तीन प्रकार (तरह) से किया जा सकता है -
(क) होंठों की दृष्टि से, (ख) जिह्वा के ऊपर उठे भाग की दृष्टि से, (ग) जिह्वा के व्यवहृत भाग की दृष्टि से।

(क). होंठों की दृष्टि से -
 इस दृष्टि से स्वरों के दो वर्ग हो सकते हैं, यथा वृत्तमुखी (गोलाकार) और अवृत्तमुखी (अगोलाकार, अवृत्ताकार)
1. वृत्ताकार (वृत्तमुखी) - जिन स्वरों के उच्चारण के समय होंठ गोलाकार हो जाते है, उन स्वरों को वृत्ताकार, वृत्तमुखी, गोलाकार कहते हैं, यथा - उ, ऊ, ओ, औ तथा आगत ऑ स्वर ।
2. अवृत्ताकार - जिन स्वरों के उच्चारण में होंठ गोलाकार न होकर विस्तृत होते हैं, उन स्वरों को अवृत्ताकार, अगोलाकार, अवृत्तमुखी कहते हैं, यथा - अ, आ, इ, ई, ए, ऐ।

(ख). जिह्वा के ऊपर उठे भाग की दृष्टि से -
 मुख किस मात्रा में खुलता तथा बंद होता है। इस दृष्टि से स्वरों का वर्गीकरण संवृत, विवृत, अर्धसंवृत, तथा अर्धविवृत्त नाम से चार भाग किए जाते हैं।
1. संवृत- जब जिह्वा का व्यवहृत भाग स्वरों के उच्चारण में अपनी अधिकतर ऊँचाई पर होगा तब मुखरंध्र संवृत होने के कारण जिन स्वरों का उच्चारण होता है, वे संवृत कोटि के कहे जाते हैं ; अर्थात् जिन स्वरों के उच्चारण में मुख सबसे कम खुले। संवृत का शाब्दिक अर्थ ही है - छिपा हुआ तथा ढका हुआ। इन स्वरों में प्रमुख हैं - ई तथा ऊ।
2.अर्धसंवृत - जिह्वा का व्यवहृत भाग संवृत की अवस्था से कुछ कम ऊँचाई पर होता है, तब अर्धसंवृत स्वरों का उच्चारण होता है। अर्धसंवृत का तात्पर्य मुख संवृत की तुलना में कुछ अधिक खुले। ऐसे स्वर हैं - इ तथा उ।
3. विवृत - विवृत का शाब्दिक अर्थ है- फैला हुआ, खुला हुआ अर्थात् जिन स्वरों के उच्चारण में मुख सबसे अधिक मात्रा में खुले। दूसरे शब्दों में जिह्वा का व्यवहृत भाग अपनी निम्नतम अवस्था में रहता है, तब विवृत स्वर की उत्पत्ति होती है। यथा - आ, ऐ, औ।
4. अर्धविवृत -विवृत की तुलना में मुख कम खुले अर्थात् जब जीभ का व्यवहृत भाग विवृत की अवस्था से कुछ अधिक ऊँचाई पर होता है, तब अर्धविवृत स्वरों का उच्चारण होता है।यथा - ए, ओ तथा आगत ऑ स्वर वर्गीकरण में शामिल किए जा सकते हैं।

(ग). जिह्वा के व्यवहृत भाग की दृष्टि से -
 जब जीभ का अग्र भाग स्वरों के निर्माण में क्रियाशील होता है, तो इस प्रकार निर्मित स्वर अग्र स्वर तथा पश्च भाग की क्रियाशीलता से निर्मित स्वर पश्च स्वर और मध्य स्वर की क्रियाशीलता से निर्मित स्वर मध्य स्वर कहलाते हैं।
1. अग्र स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अगला (अग्र) भाग ऊपर - नीचे उठता, गिरता है, वे अग्र स्वर कहे जाते हैं; जैसे - इ, ई, ए, ऐ चारों अग्र स्वर कहे जाते हैं।
2. पश्च स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का पश्च (पिछला) भाग सामान्य स्थिति से ऊपर उठता है, यहाँ से उच्चरित स्वर पश्च स्वर कहे जाते हैं। जैसे - आ, इ, ऊ, ओ, औ तथा आगत ऑ पश्च स्वर हैं।
3. मध्य स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का मध्य या कहे कि केंद्र भाग थोड़ा सा ऊपर उठता है, मध्य स्वर कहे जाते हैं। यथा - हिंदी में 'अ' स्वर केंद्रीय स्वर या मध्य स्वर कहलाता है।
उपर्युक्त वर्गीकरण के अलावा दो तरह से वर्गीकरण और किया जा सकता है -
1. उच्चारण में समय की मात्रा तथा 2. वायु निर्गमन मार्ग

  1. उच्चारण में समय की मात्रा-
 समय से तात्पर्य है - स्वरों के बोलने में कितना समय लगता है, जैसे - इ एवं ई में अथवा उ एवं ऊ में या अ एवं आ में समय का अंतर देखा जा सकता है। ई, ऊ एवं आ के उच्चारण में इ, उ एवं अ की अपेक्षा अधिक समय लगता है। स्वरों के उच्चारण में लगने वाले इसी समय को पारिभाषिक शब्दावली में क्रमशः दीर्घ एवं हृस्व कहा जाता है। अर्थात् दीर्घ स्वरों में अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वरों की तुलना में समय अधिक लगता है। हिंदी में प्राप्त हृस्व स्वर चार हैं - अ, इ, उ और ऋ। शेष सभी स्वर दीर्घ है। हृस्व स्वरों को आधार स्वर, मूल स्वर, आदर्श स्वर, अचल स्वर, प्रधान स्वर, मानक स्वर आदि नामों से भी अभीहित किया जाता है। मूल भारोपीय में 'अ' हृस्व स्वर , उदासीन स्वर कहलाता है। वैदिक संस्कृत में इसे हृस्वार्द्ध भी कहा जाता है।

  2. वायु निर्गमन मार्ग -
 जिन स्वरों के उच्चारण में हवा मुख विवर से निकलती है, उन्हें हम मौखिक स्वर कहते हैं तथा जिनके उच्चारण में हवा नासिका विवर से भी निकलती है, उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं। अ, आ, इ, ई आदि मौखिक स्वरों के उच्चारण में यदि हवा नासिका विवर से भी निकले, तो हम उनको अनुनासिक स्वर कहेंगे; जैसे - अँ, आँ आदि। अनुनासिकता स्वरों का गुण है। स्वरों का उच्चारण करते समय वायु मुख के अलावा जब नाक से भी निकले तो स्वर अनुनासिक हो जाते हैं। इसका चिह्न ँ (चंद्रबिंदु) है। जिन स्वरों की शिरोरेखा पर मात्रा न हो उन पर चंद्रबिंदु लिखे, जैसे- साँस, चाँद, गाँव, कुँआ, उँगली, पूँछ, सूँघना आदि। जिन स्वरों पर शिरोरेखा पर मात्रा हो, वहाँ पर चंद्रबिंदु (अनुनासिक) को अनुस्वार रूप में लिखा जाएगा लेकिन मूलतः यह अनुनासिक स्वर ही है। जैसे - चोंच, कोंपल, में, मैं, केंचुए, गोंद, सौंफ आदि। अनुनासिकता के अतिरिक्त सब निरनुनासिक स्वर कहे जाते हैं।
इसके अतिरिक्त अनुस्वार, विसर्ग तथा अनुनासिक (चंद्रबिंदु) को अयोगवाह ध्वनि नाम से जाना जाता है। अयोगवाह के उच्चारण से पूर्व एक स्वर अवयव आता है। विसर्ग का उच्चारण 'ह' की तरह होता है। जैसे - मन:स्थिति, अतः, दु:ख आदि।

हिंदी में ग्यारह स्वरों में एक स्वर 'ऋ' भी है जिसका प्रयोग हिंदी में संस्कृत शब्दों में होता है; यथा - ऋषि, ऋण, कृषि, दृष्टि आदि। किंतु उच्चारण की दृष्टि से अब यह स्वर न होकर रि (व्यंजन स्वर मिश्रित अक्षर) की भाँति उच्चरित होता है।

इन ग्यारह स्वरों के अलावा अंग्रेजी के प्रभाव से हिंदी में एक नया स्वर (ऑ) उच्चरित देखा जाता है। यथा -डॉक्टर, बॉल, हॉल, कॉलेज आदि। इसका ध्वन्यात्मक वर्णन इस प्रकार है- पश्च स्वर, अर्धविवृत, वृत्ताकार, दीर्घ स्वर।
यह भी ध्यातव्य है कि संस्कृत में स्वरों को 'अच्', व्यंजनों को 'हल्' तथा वर्णमाला को 'अल्' कहते हैं।


हिंदी व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण

व्यंजनों के उच्चारण में मुख विवर में आंशिक या पूर्ण अवरोध होता है। इसलिए व्यंजन वे ध्वनियाँ होती है, जिनके उच्चारण में वायु सबाध (अवरोध सहित) बाहर निकलती है। अर्थात् व्यंजनों के उच्चारण में फेफड़ों से बाहर आने वाली हवा को उच्चारण अवयवों के माध्यम से इसे किसी न किसी स्थान पर अवरोध का सामना करना पड़ता है, जिससे उस स्थान विशेष संबंधित व्यंजन ध्वनि, अवरोध के हटने से उच्चरित होती है। व्यंजनों के उच्चारण में उच्चारण अवयवों के माध्यम से जो अवरोध उत्पन्न होता है, उसके लिए कुछ विशेष प्रश्न भी किए जाते हैं। अतः व्यंजनों के वर्णन में मुख्यतः दो बातें विचारणीय हैं 1. स्थान और 2. प्रयत्न विधि। स्थान से तात्पर्य है - ध्वनि के उत्पादन का स्थान अर्थात् वह स्थान जहाँ पर किसी ध्वनि के उच्चारण अवयव जीभ या निचला ओठ जाकर फेफड़ों से आने वाली वायु के मार्ग में अवरोध पैदा करते हैं। इस दृष्टि से ऊपरी ओठ , ऊपरी दाँत, वर्त्स, कठोर तालु, मूर्धा, कोमल तालु, अलिजिह्वा आदि प्रमुख उच्चारण स्थान हैं।

उच्चारण अवयवों के द्वारा व्यंजन ध्वनियाँ किस प्रकार से उत्पन्न होती है। इसका विवेचन प्रयत्न विधि में किया जाता है। फेफड़ों से निकलने वाली वायु मुख विवर में कहीं रुक जाती है, कहीं रगड़ खाती है, कभी जीभ के पार्श्व भाग से और कभी नासारंध्र से होकर गुजरती है। इन सब बातों का वर्णन प्रयत्न विधि के अंतर्गत होता है। जिह्वा और कोमल तालु और स्वर तंत्रियाँ ध्वनि उत्पादन में किस प्रकार से प्रयत्न करती हैं, इन सबका अध्ययन प्रयत्न विधि के अंतर्गत आता है।

इसके अतिरिक्त घोषत्व एवं प्राणत्व की दृष्टि से भी व्यंजनों का वर्गीकरण कर सकते हैं। स्वर यंत्र में स्थित स्वर तंत्रियाँ कुछ ध्वनियों के उत्पादन के समय परस्पर समीपवर्ती हो जाती है। किंतु वायु मार्ग पूर्णत: बंद नहीं हो पाता और स्वतंत्र तंत्रियों के किनारे शिथिल रहते हैं। फेफड़ों से निकलने वाली वायु इस अवस्था में स्वर तंत्रियों के बीच के संकीर्ण मार्ग से नि:सृत होती है और इसके किनारों में कंपन होता है। इस कंपन से जो नाद या घोष जिस ध्वनि को प्राप्त होता है, उसे घोष या सघोष ध्वनि कहते हैं।

कुछ व्यंजनों के उच्चारण में वायु प्रवाह की अधिकता रहती है तो कुछ के उच्चारण में उसकी अल्पता। वायु प्रवाह के आधिक्य में यह स्फोटन जितना स्पष्ट होता है उतना कम प्रवाह में नहीं। वायु के अधिक जोर से निकलते समय एक प्रकार की 'ह' ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस विशेषता संयुक्त व्यंजन महाप्राण कहलाता है और इस विशेषता से रहित व्यंजन अल्प्राण कहलाता है। अल्पप्राण व्यंजन कम वायु और शिथिल स्फोट के साथ उत्पन्न होता है जबकि महाप्राण व्यंजन अधिक वायु और स्फोट के साथ प्रकट होता है। व्यंजनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है - उच्चारण स्थान के आधार पर, उच्चारण प्रयत्न के आधार पर, स्वर तंत्रियों/घोषत्व/नादत्व के आधार पर, प्राणत्व (श्वास प्रक्षेप) के आधार पर।

(क). उच्चारण - स्थान के आधार पर -
  1. कंठ्य - कंठ या गले के स्पर्श कर बोली जाने वाली ध्वनियाँ परंपरागत व्याकरण में कंठ्य ध्वनियाँ कहलाती हैं। यथा - क, ख, ग, घ, ङ, अ, आ, ऑ, ह ।
  2. तालव्य - मुख के तालु के स्पर्श होकर बोली जाने वाली ध्वनियाँ तालव्य नाम से अभिहित है। हिंदी में ये ध्वनि है - च, छ, ज, झ, ञ, श, य, तथा इ, ई।
  3. मूर्धन्य - कठोर तालु के पीछे का भाग मूर्धा कहलाता है। इस स्थान के साथ जिह्वा के संपर्क से बोली जाने वाली ध्वनि मूर्धन्य कहलाती है। यथा - ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, ऋ, र आदि।
  4. दंत्य - जब जीभ की नोंक ऊपर के दाँतों के पास कुछ क्षणों के लिए वायु को रोक लेती है, तो उस स्थान से उच्चरित ध्वनियों को दंत्य कहा जाता है। ये ध्वनियाँ हैं - त, थ, द, ध, न, ल, स।
  5. ओष्ठ्य - जब नीचे का होंठ ऊपर के होंठ का स्पर्श करके हवा को पूरी तरह मुख विवर में कुछ क्षणों के लिए रोक लेता है, तो यहाँ से निसृत ध्वनियों को ओष्ठ्य ध्वनियाँ कहा जाता है। ये हैं - प, फ, ब, भ, म तथा उ, ऊ, स्वर।
  6. वर्त्स - मसूढ़ा को ही वर्त्स कहा जाता है। दंत मूल का भाग ही वर्त्स कहलाता है। जीभ की नोंक जब इष्ट भाग को स्पर्श करके वायु को रोकती है तो ये ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं। यथा - र, ल, न, स, ज़ वर्त्स ध्वनियाँ हैं।
  7. स्वर यंत्रमुखी - कंठ विवर (गलबिल) के भीतर विद्यमान स्वर यंत्र के ऊपर की कंठ दीवार से उत्पन्न ध्वनियाँ स्वर यंत्र मुखी या जिह्वामूलीय कहलाती है। हिंदी 'ह' तथा विसर्ग (:) स्वर यंत्र मुखी वर्ण हैं। परंपरागत व्याकरण में इसे कंठ्य भी कहा जाता है।
  8. दंत्योष्ठ्य - नीचे का होंठ तथा ऊपर के दांँत पास आने पर दंत्योष्ठ्य ध्वनियों का उच्चारण होता है। हिंदी की फ़ तथा व ध्वनियाँ दंत -ओष्ठय हैं।
इसके अतिरिक्त ङ, ञ, ण, न, म को पंचमाक्षर या नासिक्य नाम दिया जाता है। 'ह' को काकल्य भी कहा जाता है। आगत व्यंजन क़, ख़, ग़ का उच्चारण स्थान जिह्वामूलीय है। आगत 'ज़' दंततालव्य वर्ण है।

(ख). उच्चारण प्रयत्न के आधार पर -
 प्रयत्न की दृष्टि से हिंदी भाषा की व्यंजन ध्वनियों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-
  1. स्पर्श व्यंजन (स्पृष्ट) - जिन ध्वनियों के उच्चारण में मुख विवर में उच्चारण अवयव ऊपर उठकर किसी उच्चारण स्थान का स्पर्श करके कुछ क्षणों के लिए वायु का मार्ग अवरुद्ध करते हैं। तब जो व्यंजन उच्चरित होते हैं, उन्हें स्पर्श (स्पर्शी) व्यंजन कहा जाता है। जैसे- 'कवर्ग' (क, ख, ग, घ) के व्यंजनों में जीभ का पश्च भाग ऊपर उठकर गले के अगले भाग का स्पर्श करता है। इसी तरह 'तवर्ग' (त, थ, द, ध) के व्यंजनों में जीभ की नोंक ऊपर के दाँतो के पास जाकर स्पर्श करती है और वायु का मार्ग अवरुद्ध करती है। इसी प्रकार 'पवर्ग' के व्यंजनों में निचला होंठ ऊपर के होंठ का स्पर्श कर वायु का मार्ग अवरुद्ध करता है। प्रमुख स्पर्श ध्वनियाँ हैं - क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ तथा आगत व्यंजनों में क़ स्पर्श (स्पर्शी) व्यंजन है। यानि चवर्ग को छोड़कर प्रत्येक वर्ग के एक से चार तक के वर्ण स्पर्शी वर्ण हैं।
  2. संघर्षी व्यंजन - जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण अवयव (जीभ और निचला होंठ) मुख विवर में उच्चारण स्थान का स्पर्श नहीं करते लेकिन उसके इतने निकट पहुँच जाते हैं कि दोनों के मध्य बहुत कम जगह रह जाती है। इस से वायु मुख विवर में रगड़ खाते हुए या संघर्ष करते हुए निकलती है, इन वर्णों को संघर्षी व्यंजन कहते हैं। संस्कृत में इनको ऊष्म ध्वनियाँ कहते हैं। उदाहरणार्थ 'श' वर्ण के उच्चारण में जिह्वाफलक ऊपर उठकर तालु के निकट आ जाता है और हवा सी - सी की ध्वनि के साथ घर्षण करती हुई बाहर निकलती है। इसी तरह 'स' वर्ण के उच्चारण में जिह्वा की नोंक मसूढ़े के बहुत निकट आ जाती है। ऊष्म व्यंजन हैं - श, ष, स, ह तथा आगत व्यंजन ख़, ग़, ज़, फ़ ।
  3. स्पर्श - संघर्षी - जब ध्वनि के उच्चारण में वायु मुख विवर में रुकने के बाद घर्षण करती हुई बाहर आए तो ऐसी ध्वनियाँ स्पर्श - संघर्षी कहलाती हैं। अर्थात् जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्पर्श भी होता है और संघर्ष भी। हिंदी में च, छ, ज, झ स्पर्श - संघर्षी वर्ण हैं। इन्हें ऐसे भी समझा जा सकता है कि वे ध्वनियों जिनके उच्चारण में जीभ पहले तो उच्चारण स्थान का स्पर्श करती है और फिर हटकर उच्चारण स्थान के इतनी निकट रह जाती है कि वायु को घर्षण करते हुए ही बाहर निकलना पड़ता है।
  4. अंत:स्थ - अंत: स्थ का शाब्दिक अर्थ है - भीतर या बीच में स्थित। स्पर्श और ऊष्म वर्णों के बीच पड़ने वाले य, र, ल, व चार वर्ण हैं। इनके उच्चारण में श्वास का अवरोध व्यंजनों की तुलना कम मात्रा में होता है। इनका उच्चारण स्वर एवं व्यंजनों की तरह होता है। इन चार वर्णों में य तथा व को अर्द्धस्वर, संघर्षहीन सप्रवाह, ईषत् स्पृष्ठ आदि नाम भी दिये गए हैं। अर्द्धस्वर इसलिए कहा जाता है कि ये स्वरों की भाँति मुखर हैं और न स्वराघात वहन करते हैं। अतः हिंदी में ये व्यंजनों के अधिक निकट हैं। 'र' को लुंठित या प्रकंपित नाम दिया गया है। 'र' के उच्चारण में जीभ मुख के मध्य आ जाती है और बार - बार झटके से आगे - पीछे गिरती (लुढ़कती) है। इससे 'र' को लुंठित व्यंजन कहते हैं। 'ल' को पार्श्विक नाम दिया गया है। 'ल' के उच्चारण में जीभ का अग्र भाग मुख के बीच आने से अपने एक या दोनों तरफ पार्श्व बना लेती है। अर्थात् जीभ की नोंक दंतमूल (मसूढ़ा) के स्पर्श करती है और उसके दोनों तरफ से वायु बाहर निकलती है।
  5. उत्क्षिप्त - जिस ध्वनि के उच्चारण में जिह्वाग्र मुड़कर कठोर तालु की ओर जाती है और झटके के साथ नीचे आती है, उसे उत्क्षिप्त ध्वनि कहते हैं। हिंदी में इन्हें ताड़नजात, द्विगुण व्यंजन, नव विकसित वर्ण नाम भी दिया गया है। ये वर्ण है - ड़, ढ़।
  6. नासिक्य - जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर यंत्र से आती हुई वायु नासिका से निकलती है, नासिक्य ध्वनि कहलातीहै। हिंदी के प्रत्येक वर्ग की पंचम ध्वनि नासिक्य है - ङ, ञ, ण, न, म।
  7. ऊष्म - हिंदी में श, ष, स, ह को ऊष्म ध्वनि भी कहा जाता है। इनका विस्तृत उल्लेख संघर्षी ध्वनियों में किया गया है। इनके उच्चारण में शरीर में नव ऊर्जा ऊर्जस्वित होती है, इसलिए ऊष्म ध्वनि अभिधान प्राप्त हुआ।

(ग) स्वर तंत्रियों/ घोषत्व/ नादत्व के आधार पर -
 हमारे गले ( कंठ) में एक स्वर यंत्र होता है जिसमें मांसपेशियों की बनी दो झिल्लियाँ होती है जिन्हें 'स्वर तंत्रियाँ' कहते हैं। फेफड़ों से निकलकर मुख तक आने वाली हवा इन स्वर तंत्रियों से टकराती है जिससे झंकृत हो जाती हैं और इनमें कंपन पैदा हो जाता है। इनके कंपन एवं अकंपन होने को लेकर सघोष तथा अघोष नाम दिया जाता है। जिनके उच्चारण में नाद या घोष, कंपन उत्पन्न होती है उन्हें घोष या अघोष व्यंजन कहा जाता है तथा जिन ध्वनियों के उच्चारण में घोष, नाद, कंपन उत्पन्न नहीं होता इन्हें अघोष नाम दिया जाता है।
  1. घोष / सघोष - सभी स्वर तथा प्रत्येक वर्ग का तृतीय, चतुर्थ और पंचम व्यंजन और ज़, ड़, ढ़, य, र, ल, व, ह घोष या सघोष व्यंजन हैं। इनकी संख्या 31 बताई गई है।
  2. अघोष - प्रत्येक वर्ग का प्रथम एवं द्वितीय व्यंजन तथा फ़, श, ष, स एवं विसर्ग व्यंजन कहलाते हैं।

(घ). श्वास (प्राणत्व) की मात्रा के आधार पर -
 प्राण शब्द का अर्थ है -वायु, हवा। कुछ व्यंजनों के उच्चारण में मुख से कम मात्रा में वायु निकाली जाती है, तो कुछ व्यंजनों में अधिक कम वायु प्रक्षेप वाले वर्णों को अल्पप्राण तथा अधिक वायु प्रक्षेप वाले व्यंजनों को महाप्राण व्यंजन नाम दिया जाता है।
  1. अल्पप्राण - प्रत्येक वर्ग का तृतीय, पंचम व्यंजन तथा य, र, ल, व, ड़ और सभी स्वर अल्पप्राण हैं।
  2. महाप्राण - प्रत्येक वर्ग का द्वितीय तथा चतुर्थ व्यंजन और श, ष, स, ह विसर्ग (:) एवं ढ़ महाप्राण व्यंजनों की श्रेणी में आते हैं।


हिंदी व्यंजन वर्ण: सामान्य विशेषताएँ
  1. मूल व्यंजन - क से ज्ञ तक व्यंजन हिंदी के मूल व्यंजन वर्ण हैं।
  2. आगत व्यंजन - आगत स्वरों की भाँति अन्य भाषाओं अरबी - फारसी आदि के शब्द हिंदी में आ जाने से कुछ नयी ध्वनियाँ हिंदी में आ गई हैं। ये ध्वनियाँ हैं - क़, ख़, ग़, ज़, फ़। ये अरबी - फारसी शब्दों में ही नीचे नुक्ता लगाकर लिखी जाती हैं।
  3. नवविकसित व्यंजन - हिंदी में कुछ नव विकसित व्यंजन वर्ण हैं, जो संस्कृत वर्णमाला में नहीं थे। ये किसी अन्य भाषा की ध्वनियाँ या किसी दूसरी भाषा से प्रभावित भी नहीं है। ये स्वतः ही हिंदी के संरचनात्मक विकास का परिणाम है। इन्हें उत्क्षिप्त, ताड़नजात, द्विगुणी वर्ण आदि नामों से अभिहित किया जाता है। हिंदी के पूर्व में मूर्धन्य ड, ढ तथा नव विकसित उत्क्षिप्त ड़, ढ़ को लिखने के नियम हैं। ध्यातव्य रहे।
ड, ढ लिखने के नियम हैं -
  1. शब्द के आरंभ में - डाली, डरना, ढोल, ढक्कन आदि।
  2. उपसर्ग के बाद में - अडिग, निडर, सुडौल, निढाल, बेढंग आदि।
  3. संयुक्त अक्षरों में - हड्डी, कबड्डी, लड्डू, चड्ढा, बुड्ढा आदि।
  4 अनुस्वार के बाद में - खंड, दंड, घमंड आदि।
  5. आगत शब्दों में - डालडा, रेडियो, पाउडर, इडली, रोड आदि।

उपर्युक्त पाँच अवस्थाओं के अलावा शब्द के मध्य एवं अंत में नव विकसित ड़, ढ़ ध्वनियों का प्रयोग होता है। जैसे - लड़का, पढ़ना, पढ़, सड़क, साँड़, ढूँढ़, खाँड़ आदि।

4. संयुक्त व्यंजन - संयुक्त व्यंजन शब्द का अर्थ है - जहाँ दो या दो से अधिक व्यंजनों का सहयोग हो रहा हो। संयुक्त व्यंजनों में एक से अधिक व्यंजन एक इकाई के रूप में उच्चरित किए जाते हैं। परंपरागत संयुक्त व्यंजन हैं - क्ष, त्र, ज्ञ, श्र और द्य । संयुक्त व्यंजनों व्यंजन गुच्छ भी कह दिया जाता है। इनकी पहचान यह है कि इनमें एक से अधिक व्यंजन आकर संयुक्त हो जाते हैं तथा इन व्यंजनों के मध्य कोई स्वर नहीं आता। यथा - सप्ताह, स्वप्न, स्त्री, विख्यात, विद्वान, लक्ष्य आदि।

5. व्यंजन द्वित्व - संयुक्त व्यंजनों में तो अलग-अलग व्यंजन संयुक्त होकर एक इकाई बनाते हैं परंतु जब समान व्यंजन संयुक्त होते हैं तब वह 'व्यंजन द्वित्व' कहे जाते हैं, जैसे - पक्का, कच्चा, अड्डा, मिट्टी, पट्टा, बच्चा, अस्सी आदि।
इस प्रकार हिंदी वर्ण एवं ध्वनि व्यवस्था के अंतर्गत परंपरित एवं नव विकसित वर्ण, ध्वनियाँ हिंदी वर्णमाला में शामिल हैं।

हिंदी वर्णमाला हमें संस्कृत से मिली है। समयानुसार इसमें परिवर्तन होते रहे। कुछ वर्ण, ध्वनियाँ लुप्त हो गई या कहे कि आज उनका व्यवहार केवल लिखित रूप में पुस्तकों में देख सकते हैं। बोलचाल में वे ध्वनियाँ अपना स्थान एवं महत्व खो चुकी। उनके स्थान पर कुछ नई ध्वनियाँ आई, कुछ अन्य भाषाओं से ध्वनियाँ हमें मिली। सामासिक एवं सहिष्णु संस्कृति वाले भारतवर्ष के लोगों ने जिस प्रकार अन्य संस्कृतियों को महत्व दिया उसी प्रकार अन्य वर्ण, ध्वनियों एवं शब्दों को भी महत्व देते हुए अपनाया। इस प्रकार सर्वाधिक व्यवहृत स्वर ध्वनि जो अंग्रेजी से मिली है - ऑ तथा अरबी - फारसी से मिली पाँच व्यंजन ध्वनियाँ क़, ख़, ग़, ज़, फ़। इनको सहृदयता से अपनाया गया। आज देवनागरी लिपि एवं हिंदी वर्तनी के मानकीकरण में इनको स्थान देना शेष है परंतु व्यावहारिक दृष्टि से इनका प्रयोग बहुत वर्षों से जारी है।

1 comment :

  1. उपयोगी। सेतु प्रबन्धन का आभार व विद्वान लेखक को धन्यवाद। अरबी फारसी वाली ध्वनियाँ राजभाषा नियमावली व विधान में बहुत पहले से स्थान प्राप्त हैं।

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