हास्यास्पद वस्तुओं के सम्बन्ध में कुछ सामान्य सिद्धांत (पतरस बुख़ारी)

पतरस बुख़ारी

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क 

 (यह लेख आज से छत्तीस वर्ष पूर्व का है जब समय फ़्रांस के दार्शनिक हेनरी बर्गसां का दर्शन अत्यंत प्रसिद्ध था। पश्चिम की दुनिया में “स्वप्नावस्था”, “मस्तिष्क व शक्ति” और “हास्य” के सम्बन्ध में उनके विचारों की धूम मची हुई थी। पतरस ने उनके हास्य के दर्शन से उर्दू को पहली बार परिचित कराया। यह लेख अनुवाद नहीं  है बल्कि लेखक ने उसके दर्शन में डूबकर अंग्रेज़ी उदाहरणों को अपने समाज के अनुरूप बनाने में रचनात्मक शक्ति का प्रदर्शन किया है।)

प्रोफ़ेसर हेनरी बर्गसां (Henri-Louis Bergson) का हास्य-दर्शन


आफ़ताब अहमद
हँसी के क्या अर्थ हैं? किसी हास्यास्पद वस्तु में कौन सा हँसाने वाला तत्व होता है? हम कभी किसी के मुँह चिढ़ाने पर, कभी किसी के हास्यास्पद वाक्य पर, और कभी किसी व्यक्ति के रूप आकार पर हँस देते हैं। इन सब में समान बात कौन सी है? हम किस उपाय से हास्य की इस परी को शीशे में उतार सकते हैं जो एक आत्मा की तरह विभिन्न रूप धारण कर लेती है और हास्य सामग्री में इतनी विभिन्नता पैदा कर देती है? यह एक ऐसी समस्या है जिसपर अरस्तू से लेकर आज तक अक्सर दार्शनिक अपना सिर खपाते रहे हैं, लेकिन यह हमेशा उनके हाथों से निकल-निकलकर फिर उनके सामने आ खड़ी हुई और उनकी हँसी उड़ाती रही।

हास्य का प्राण, या हँसी की आत्मा या हास्यास्पद तत्व, जो नाम भी आप इस परी के लिए सुझाएँ, इस नाम को तर्कशास्त्र के सिद्धांतों पर किसी परिभाषा के बंधनों में जकड़ने का प्रयास निरर्थक है। हम इतना जानते हैं कि हँसी की आत्मा एक सजीव वस्तु है। इसलिए हमें इसका आदर व सम्मान करना चाहिए और एकाध वाक्य में इसके सम्पूर्ण अस्तित्व को लिख डालना इसका अपमान करना है। हम केवल यही कर सकते हैं कि यह देखें कि यह किस प्रकार जन्म लेती है और किस तरह फलती फूलती है। देखें कि किस-किस ढंग से यह तरह-तरह के रूप धारण करती है। संभव है कि हम इस दीर्घकालिक जान-पहचान व दोस्ती के कारण इसको अच्छी तरह जानने लगें और हमें इस बात की आवश्यकता ही न रहे कि कोई एक वाक्य की सीमाओं के अन्दर इसको बंद करके हमारे सामने काग़ज़ पर रख दे। और संभव है यह जान-पहचान व मित्रता हमारे लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध हो। क्योंकि हँसी की आत्मा का भी एक तर्क है। उसकी भी अपनी एक सुनिश्चित कार्यपद्धति है, चाहे वह कितनी ही आवारा और अनियंत्रित क्यों न हो। क्योंकि कई हास्यास्पद बातें ऐसी हैं जिनको पूरी दुनिया जानती है और उनसे आनन्दित होती है। जिन पर एक पूरा-का-पूरा राष्ट्र हँस पड़ता है। जिनपर एक देश-का-देश दोहरा हो-हो जाता है। तो यह कैसे संभव है कि हम हँसी की आत्मा से तो अच्छी तरह परिचित हो जाएँ लेकिन साथ ही हमें जनता-जनार्दन के विचारों का भी कुछ-न-कुछ ज्ञान प्राप्त न हो। हँसी स्वयं जीवन से जन्म लेती है और कला की बहुत ही निकट की सम्बन्धी है। तो संभव है यह जीवन और कला पर भी बहुत सा प्रकाश डाले।
 
आरम्भ में यह आवश्यक मालूम होता है कि हँसी से सम्बंधित तीन मौलिक सिद्धांत बयान कर दिए जाएँ। इन सिद्धांतों का स्वयं हास्यास्पद वस्तुओं से बहुत सम्बन्ध नहीं, लेकिन इनको मद्देनज़र रखते हुए हास्य के क्षेत्र की सीमा-बंदी की जा सकती है।

बहस के दौरान में सबसे पहली बात जिसकी ओर हमें अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए यह है कि कोई हास्यास्पद सामग्री इंसानी दायरे से बाहर नहीं पाई जाती। किसी समुद्र या पहाड़ी का दृश्य संभव है कि सुन्दर हो, या संभव है कि रमणीय व आकर्षक हो, या संभव है कि बिल्कुल ही तुच्छ और कुरूप हो, लेकिन हास्यास्पद हरगिज़ नहीं हो सकता। संभव है कि कभी-कभी हमें एक जानवर को देखकर अनायास हँसी आ जाए। लेकिन इसका कारण केवल यही होता है कि हमारी दृष्टि को उस जानवर के अस्तित्व में मनुष्यों जैसा कोई व्यवहार या मनुष्यों जैसा हाव-भाव महसूस हो जाता है जो हास्यास्पद सामग्री बन जाता है। संभव है कि  कभी-कभी आप एक लंबोतरी नोकदार काग़ज़ी टोपी को देखकर हँस पड़ें। लेकिन इसमें जो चीज़ हास्यास्पद है वह उस टोपी का काग़ज़ नहीं। हँसी का कारण उस टोपी का रूप है। वह रूप जिसको यूँ अस्तित्व में लाने का कारण कोई मानव हाथ ही है। यानी टोपी की बनावट हास्यास्पद है, जो इस कारण हास्यास्पद है कि वह किसी मानव मस्तिष्क के एक विचित्र व हास्यास्पद विचार की द्योतक है। यह आश्चर्य की बात है कि ऐसा महत्वपूर्ण और स्पष्ट नुक्ता विद्वानों की खोजबीन से इस क़दर अछूता रहा है कि अक्सर लोग मनुष्य को “हँसोड़ जंतु” के नाम से पुकारते हैं। और अगर ध्यान से देखा जाए तो इंसान न सिर्फ़ “हँसोड़ जंतु” बल्कि “हास्यास्पद जंतु” भी है। अगर कोई अन्य जंतु या निर्जीव वस्तु कभी हँसी का कारण बनती है तो यह हमेशा देखा गया है कि हास्यास्पद तत्व या तो कोई मानवीय समरूपता होती है या मनुष्य के सृजन का कोई रूप, और या फिर हँसी वह काम होता है जो कोई मनुष्य उस वस्तु से ले रहा हो।

दूसरी बात जिसका बयान कर देना आवश्यक है यह है कि अक्सर बार हँसी के समय भावनाएँ लुप्त हो जाती हैं। ऐसा मालूम होता है मानो कोई हास्यास्पद वस्तु अपना प्रभाव पैदा ही नहीं कर सकती जब तक मानव मन पूर्ण शान्ति और ठहराव की अवस्था में न हो। इससे यह न समझा जाए कि हम एक ऐसे व्यक्ति की हँसी नहीं उड़ा सकते जिसपर हम तरस खाते हों, या जिससे हमारा प्रेम या लगाव का सम्बन्ध हो। लेकिन यह बात अवश्य है कि ऐसे व्यक्ति की हँसी उड़ाने के अवसर पर हम उतनी देर के लिए दया और प्रेम का मुँह बंद कर देते हैं। चंद ऐसे व्यक्तियों के समूह में, जो केवल मस्तिष्क-ही-मस्तिष्क रखते हैं और जिनका हृदय (इन अर्थों में कि वह भावनाओं का भण्डार होता है) लुप्त हो, शायद कोई व्यक्ति भी कभी रोता हुआ न पाया जाए। लेकिन हँसने वाले तत्व फिर भी उसमें मौजूद होंगे। उसकी तुलना में एक समूह अत्यंत संवेदनशील स्वभाव वाले व्यक्तियों का है जिनका हृदय जीवन के महत्त्व के साथ पूर्ण रूप से लयबद्ध है। यानी वे व्यक्ति जिनको दिलवाले या भावुक कहा जाता है और जिनके स्वभाव में हर एक घटना एक भावुक दशा पैदा कर देती है (जो हमेशा पराकाष्ठा को पहुँचती रहती है) ऐसे व्यक्ति न तो हँसी से परिचित हैं न उसे समझ सकते हैं। जो ध्वनियाँ आपके कानों तक पहुँचती हैं, या जो हरकतें या हाव-भाव आपके सामने प्रकट होते हैं, अगर आप उनके साथ हार्दिक लगाव पैदा करलें, अगर आप विचार व कल्पना में औरों के व्यवहारों में उन्हीं की तरह शरीक हो जाएँ और उन्हीं की तरह सब कुछ महसूस करने लगें, संक्षिप्त में यह कि अगर आप अपनी हमदर्दी की भावना को पूरी तरह विस्तार देदें तो तुच्छ-से-तुच्छ वस्तु आपकी दृष्टि में इतनी अधिक महत्वपूर्ण बन जाएगी मानो किसी चमत्कार ने वस्तुओं की प्रकृति को अचानक बदल दिया है। इसका एक परिणाम यह होगा कि सारी इन्द्रियों पर एक अन्धकार छा जाएगा और आपको हँसी से वंचित कर देगा। अब यदि आप जीवन के संघर्षों से अलग हटकर और अपने आपको बिल्कुल निर्लिप्त करके उसको देखें तो कई बातें आपके लिए हास्यास्पद बन जाएँगी। यदि कहीं संगीत के साथ नियमित ताल पर नाच हो रहा हो तो आप उससे आनंदित होते हैं। लेकिन अगर आप अपने कानों को इस तरह बंद कर लें कि संगीत की ध्वनि आप बिल्कुल न सुन सकें तो नृत्य का नक़्क़ारा हास्यास्पद हो जाता है। शायद ही कोई अन्य मानव क्रिया ऐसी हो जो इस प्रकार की परीक्षा में पूरी उतरेगी। यदि हम क्रियाओं व चेष्टाओं को भावनाओं के लयबद्ध संगीत से पृथक करके उन पर दृष्टि डालें तो उनमें से कई ऐसी होंगी जो तुरंत शालीनता व गरिमा से गिरी हुई नज़र आएँगी। सिद्ध हुआ कि किसी हास्यास्पद वस्तु के पूर्ण रूप से प्रभावकारी होने के लिए भावनाओं का एक अस्थाई अस्तमन आवश्यक है। हास्य-उत्पादन का सम्बन्ध बुद्धि और विवेक और केवल बुद्धि और विवेक से है।

लेकिन हँसी के लिए यह बात भी आवश्यक है कि एक मनुष्य का मस्तिष्क दूसरे मनुष्यों के मस्तिष्कों से बहुत दूर न हो। और यह तीसरा बिंदु है जो ध्यान देने योग्य है। अगर आप अपने आपको बिल्कुल अकेला और मित्रहीन महसूस करें तो आप हास्यास्पद वस्तुओं से प्रभावित नहीं हो सकते। हँसी के लिए हमेशा एक गूँज, एक प्रतिध्वनि अर्थात भागीदारी और सहचारिता का होना आवश्यक है। आप स्वयं हँसी की ध्वनि को ध्यान से सुनिए। यह स्पष्ट व पारदर्शी, नपी-तुली और शुद्ध ध्वनि नहीं। स्वयं इस ध्वनि के स्वभाव में गूंजते रहने की इच्छा निहित प्रतीत होती है कि एक धमाके की तरह एकाएक जैसे ज़ोर से फटकर शुरू होती है और एक अविच्छिन्न कंपन के साथ जारी रहती है। मानो पहाड़ों में बादल गरज रहे हैं, लेकिन इसके होते हुए भी यह नहीं हो सकता कि यह गरज अनंत तक गूंजती रहे। इसके प्रसारण का दायरा जितना भी विस्तृत हो, अंततः दायरा ही है और इसलिए सीमित है। यानी हमारी हँसी हमेशा एक समूह या एक दायरे तक सीमित होती है। आपको रेल की यात्रा में कभी यह देखने का अवसर प्राप्त हुआ होगा कि आपके कुछ सहयात्री आपस में ऐसी बातें कर रहे हैं जो उनके लिए निश्चित रूप से हास्यास्पद हैं, क्योंकि वे दिल खोलकर हँसते हुए नज़र आ रहे हैं। अगर आप भी उनकी संगत में शरीक होते तो आप भी निश्चित रूप से हँसते। लेकिन चूँकि आप उनसे अलग हैं, आपको हँसी नहीं आती। एक दफ़ा एक शहर की जामा मस्जिद में उस शहर के बड़े मौलवी प्रवचन दे रहे थे। उनका प्रवचन इतना प्रभावशाली था कि सब उपस्थित जन फूट-फूटकर रो रहे थे, सिवाय एक के जो बिल्कुल शांत बैठा था। जब उस व्यक्ति से उसके बिल्कुल प्रभावित न होने का कारण पूछा गया तो उसने उत्तर दिया “ मैं इस शहर का रहने वाला नहीं। मैं तो अजनबी हूँ।” रोने के सम्बन्ध में उस व्यक्ति ने जो विचार प्रकट किया वह हँसने के सम्बन्ध में और भी अधिक सही है। हँसी हमें एक अनियंत्रित अवस्था मालूम होती है। लेकिन यह सही है कि एक हँसने वाले को हँसने के लिए दूसरे हँसने वालों के साथ (चाहे वे वास्तव में मौजूद हों या केवल कल्पना में) साज़िश करनी पड़ती है और कभी-कभी तो वह केवल दूसरों की मदद ही से हँसता है। आप देखते हैं कि थिएटर में तमाशा देखने वालों की संख्या जितनी अधिक होती है उतनी ही हुजूम की हँसी भी अधिक निरंकुश होती है। और आप देखते हैं कि एक भाषा में बहुत सी हँसी की बातें ऐसी होती हैं जिनका अनुवाद अगर किसी दूसरी भाषा में किया जाए तो वह हँसी से रिक्त रह जाती है। इसका कारण यह है कि उनकी हँसी एक विशेष समुदाय के रीति-रिवाज व विचारों से सम्बन्ध रखती है। जिन्होंने इस नुक्ते को नज़रअंदाज़ किया है वही लोग हैं जिनके निकट हँसी एक अत्यंत तुच्छ मनोरंजन से अधिक ध्यान देने योग्य बात नहीं और जो हँसी को मानव जीवन के अन्य संघर्षों से बिल्कुल ही असम्बद्ध सी वस्तु मानते हैं। अक्सर लोग हँसी की यूँ व्याख्या करते हैं कि “हँसी एक मानसिक तुलना का नाम है” या “हँसी एक अनुभूत अशिष्टता का नाम है।” संम्भव है ये परिभाषाएं ठीक हों। लेकिन ये इस प्रश्न का उत्तर देने में बिल्कुल अक्षम हैं कि आख़िर कुछ वस्तुओं पर हमें  हँसी क्यों आती है? क्या कारण है कि कुछ अनुभूतियाँ तो ऐसी हैं कि उनको देखते या सुनते ही हमारे पेट में बल पड़-पड़ जाते हैं, हालाँकि और हज़ारों वस्तुएँ भी दुनिया में मौजूद हैं जिनका बिल्कुल कोई असर नहीं होता? हँसी का सत्य समझने के लिए हमें हँसी को हँसी के घर में जाकर देखना चाहिए। और यह स्पष्ट है कि हँसी का घर इंसानों की सोसायटी है।
उपर्युक्त विस्तृत बहस से तीन बातें स्पष्ट होती हैं।

1. हास्यास्पद सामग्री मनुष्य के दायरे से बहर नहीं पाई जाती।
2. हँसते समय भावनाएँ स्थगित हो जाती हैं।
3. हँसी के लिए एक से अधिक (वास्तविक या काल्पनिक) हँसने वालों का होना आवश्यक है। यानी हँसी उस समय पैदा हो सकती है जब मनुष्यों का एक समूह अपना ध्यान अपने एक व्यक्ति की ओर इस प्रकार केन्द्रित करता है कि अपनी भावनाओं को स्थगित कर देता है और केवल अपनी बुद्धि व विवेक से काम लेता है।

एक व्यक्ति बाज़ार में दौड़ता चला जा रहा है। एकाएक वह ठोकर खाकर गिर पड़ता है। लोग हँस देते हैं। अब अगर लोगों को यह मालूम होता कि वह गिरा नहीं बल्कि जानबूझकर यूँ ज़मीन पर बैठ गया है तो वे उस पर न हँसते। लोग हँसते इसलिए हैं कि उस व्यक्ति का ज़मीन पर यूँ बैठ जाना उसकी एक अनियंत्रित क्रिया थी। यानी हँसी का कारण उस व्यक्ति के व्यवहार का यूँ एकाएक परिवर्तित हो जाना नहीं, बल्कि इस परिवर्तन में ‘अनियंत्रण’ के तत्व का पाया जाना है। उस व्यक्ति को चाहिए था कि जिस पत्थर से उसे ठोकर लगी है उससे हटकर चलता या अपनी रफ़्तार बदल देता। उसने ऐसा नहीं किया और चूँकि उसके बदन में अचानक कतराकर निकल जाने की योग्यता न थी या शायद वह किसी और विचार में मग्न था (यानी उसका विचार अनुपस्थित था) और उसके शरीर में इतनी लचक और मुड़ने-तुड़ने की योग्यता न थी कि वह विचार के पुनः उपस्थित हो जाने पर अपने बिगड़े संतुलन को तुरंत संभाल लेता। इसलिए उसके होशोहवास अपनी पहली क्रिया अर्थात आगे को चलने के व्यवहार ही में व्यस्त रहे। हालाँकि परिवर्तित परिस्थितियाँ कुछ और चाहती थीं। यही कारण था कि वह गिर पड़ा और यही वजह थी कि लोगों को हँसी भी आयी।

अब एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण लीजिए जिसका नित्यकर्म अत्यंत नियमित और संतुलित है और जो छोटी से छोटी बात में भी अपने नित्यक्रम से बाल बराबर भी विचलित नहीं होता। उसकी सारी वस्तुएँ एक सुनिश्चित क़रीने और क्रम से रखी रहती हैं और वह बहुत ही नियमित रूप से उनको इस्तेमाल करता है। अब मान लीजिए कोई शरारती लड़का आकर उन सारी वस्तुओं का क्रम बदल देता है । अब वह व्यक्ति मेज़ पर से क़लम उठाने लगता है तो उसके हाथ में चाक़ू आ जाता है। जब वह अलमारी में से चिकित्साशास्त्र की किताब निकालता है तो उसकी जगह “मख़ज़नI” की पुश्ती निकल आती है। जब वह कुर्सी पर बैठने लगता है तो  धम्म से ज़मीन पर जा गिरता है। सारांश यह कि उससे कोई काम ठीक नहीं हो सकता। आदत उसको मजबूर करती है कि जब उसे कुर्सी पर बैठने की ज़रुरत हो तो वह एक विशेष स्थान पर पहुँचकर बैठ जाए। अब यदि असामान्य रूप से कुर्सी वहाँ मौजूद नहीं, तो चाहिए यह था कि वह अपनी बैठने की क्रिया को रोक लेता या उसकी दिशा को मोड़ देता। लेकिन उसने ऐसा न किया। बल्कि एक मशीन की तरह सीधी रेखा में चलता रहा। तो मतलब यह कि जो व्यक्ति इस प्रकार की शरारत का निशाना बनाया जाता है उसकी स्थिति भी एक प्रकार से उसी व्यक्ति जैसी  है जो दौड़ने में ठोकर खाकर गिर पड़ता है। हास्यास्पद-सामग्री दोनों परिस्थितियों में एक ही है और वह यह कि इन दोनों व्यक्तियों में इन विशेष अवसरों पर कतराकर निकल जाने या लचक जाने की योग्यता पर्याप्त मात्रा में नहीं होती। और चूँकि हम एक इंसान से इस बात की आशा रखते हैं कि वह बहुत सचेत रूप से कोई काम करे और उसमें लचक व मुड़-तुड़ जाने की योग्यता पाई जाए। इसलिए हमें उन पर हँसी आती है। इन दो व्यक्तियों की हास्यास्पद स्थितियों में अंतर इतना है कि एक स्थिति में तो गिरने का कारण संयोग था और दूसरी स्थिति में एक लड़का। इन दो कारणों से उन दो व्यक्तियों में तुरंत कतराकर निकल जाने की योग्यता की कमी प्रकट हुई।

लेकिन इन दोनों में यह बात भी समान है कि जो हास्यास्पद परिणाम प्रकट हुआ उसका कारण बाहरी था। यानी उन व्यक्तियों के अपने अस्तित्व में नहीं जन्मा था। अब अगर इस लचक की कमी के प्रकट होने के लिए सड़क पर किसी पत्थर या पेड़ के होने या किसी शरारती लड़के की शरारत की ज़रुरत न हो, बल्कि यह कमी प्राकृतिक और स्वाभाविक ढंग से स्वयं अपने भण्डार में से अपने प्रकट होने के लिए कोई अवसर निकाल ले तो हास्यास्पद-सामग्री का स्रोत बाहरी न रहेगा बल्कि आतंरिक बन जाएगा। एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण लीजिए जिसका मस्तिष्क अपने पिछले व्यवहारों के बारे में व्यस्त रहता है और इस बात की ओर कभी ध्यान नहीं देता कि वह फ़िलहाल क्या कर रहा है। यानी उसके विचार वर्तमान समय से हमेशा एक क़दम पीछे रहते हैं। अगर आप उससे कोई प्रश्न पूछते हैं तो वह उसका वही उत्तर देता है जो सुबह उसने किसी और बात के बारे में दिया था। अगर उसके सामने एक गाड़ी आकर ठहर जाती है तो  वह उस पर उसी तरह चढ़ना शुरू कर देता है जिस तरह वह सुबह अपने मकान की सीढ़ियों पर चढ़ता था। यानी चढ़ता चला जाता है। इसका अर्थ यह है कि उसकी इन्द्रियों और बुद्धि दोनों में लचक और मुड़ने-तुड़ने की ऐसी कमी और अभाव है कि वह वर्तमान समय में वो ध्वनियाँ सुनता है जो कुछ समय पहले ध्वनित हुईं, और वह कुछ देखता है जो आँखों से कब का ओझल हो चुका। उसकी इन्द्रियों और बुद्धि में इतनी लचक नहीं कि वह उन पर ज़ोर डालकर उनके गिर्द-पेश के हालात के साथ तालमेल बिठाता रहता। जबकि उसके लिए अनिवार्य यह है कि उसके व्यवहार वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार हों। ऐसी हालत में हास्यास्पद-सामग्री और उसके प्रकट होने का कारण उस व्यक्ति के अस्तित्व के अन्दर उपस्थित है। ऐसा व्यक्ति कभी-कभी  बहुत हास्यास्पद होता है। और यदि आप थोड़ा ध्यान दें तो आपको शेख़ चिल्ली की कई ऐसी बातें याद आ जाएँगी जो इस विचार की तर्जुमानी करेंगी।

  विचार की अनुपस्थिति का जो परिणाम प्रकट होता है उसका हास्यास्पद होना कभी-कभी अन्य  कारणों से और भी अधिक ऊर्जा प्राप्त करता है। उदहारण स्वरूप अगर आपको किसी व्यक्ति के विचार के यूँ अनुपस्थित रहने के  सारे इतिहास का ज्ञान हो, उसकी बेहोशी मानो आपकी आँखों के सामने पैदा हो, और आपको यह बात भी ज्ञात हो कि वह कैसे बढ़ती रहती है और किन कारणों से विकसित हो रही है तो  आपको और भी अधिक हँसी आएगी। मान लीजिए एक व्यक्ति रात-दिन मजनूँ व फ़रहाद के क़िस्से पढ़ता रहता है और चौबीस घंटे उसका दिल और दिमाग़, प्रेम के पागलपन, आवारगी, आत्म-विस्मरण, मस्ती  और अन्य भावनाओं में व्यस्त रहता है, यहाँ तक कि मजनूँ और फ़रहाद का चरित्र उसे इतना मनमोहक व आकर्षक प्रतीत होता है कि वह उसका अनुकरण करने लग जाता है। अब वह अपने आपको बिल्कुल मजनूँ समझता है और उसके विचार और इरादे उसकी ओर उन्मुख होते-होते बिल्कुल उसी की तरह हो गए हैं। अगर कुछ समय तक उसकी यही हालत रही तो एक दिन ऐसा आएगा कि वह अगर और लोगों की संगत में शरीक होगा तो इस प्रकार मानो एक अटूट स्वप्न में मग्न है और वह इसी स्वप्नावस्था में इधर-उधर चल फिर रहा है। उसकी बातें इस तरह की होंगी जैसे कोई नींद में बड़बड़ा रहा हो। अब उसकी तमाम गतिविधियाँ किसी दूसरी दुनिया से सम्बन्ध रखती हैं। ऐसे व्यक्ति में हास्यास्पद-सामग्री किसी हद तक शक्तिशाली व सघन होती है। जब आप उससे समय पूछते हैं तो वह एक शेर पढ़ देता है और कभी वह आपको अपना प्रियतमा समझके आपका स्तुतिगान करने लग जाता है। ऐसे व्यक्ति के विचार की अनुपस्थिति में यह बात शामिल है कि उसका विचार अनुपस्थित तो अवश्य है लेकिन इसके अतिरिक्त किसी और जगह उपस्थित भी है। जहाँ वह परिवेश से बेख़बर है वहाँ विचारों से अवगत भी है। यानी सिर्फ़ यही नहीं कि वह गिर्द-पेश में बेकार है बल्कि वह एक और दुनिया में व्यस्त भी है। ऐसा व्यक्ति उस व्यक्ति से अधिक हास्यास्पद है जिसके विचार के सम्बन्ध में आप सिर्फ़ जानते हैं कि अनुपस्थित है लेकिन यह नहीं मालूम कि आख़िर वह है कहाँ? परन्तु जब आप को इस बात का ज्ञान हो जाए कि वर्तमान घटनाओं से बेख़बर उसका मस्तिष्क किस बात में व्यस्त है तो वह अधिक हास्यास्पद हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को आम तौर पर जुनूनी या पागल कहते हैं। इन दीवानों को देखकर जब हमें हँसी आती है तो हमारे जीवन के वाद्य में वही तार कंपित हो उठते हैं जो किसी ऐसे व्यक्ति को देखकर कंपित हुए थे जो एक शरारती लड़के की शरारत का निशाना बनता है या जो बाज़ार में दौड़ता हुआ फिसल कर गिर पड़ता है। ये दीवाने भी एक उद्देश्य की ओर दौड़ रहे थे और इस दौड़-धूप में किसी सख़्त और खुरदरे सत्य से ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं। वास्तविकता तो यह है कि ये लोग इस बात में बढ़े हुए हैं कि इनकी बेख़बरी निरंतर व संगठित होती है और एक विशेष केंद्र के गिर्द चक्कर लगाती रहती है। इनकी आपबीती और इनके जीवन की दुर्घटनाएँ कार्य-कारण की एक विशेष कड़ी में जकड़ी हुई हैं जो सचेत मनुष्यों के तर्क से किसी प्रकार कम नहीं। इनकी बुद्धि में लचक की एक ऐसी कमी है जिसके होते हुए ये अपने होशोहवास का तालमेल अपनी दुनिया से मोड़कर इस दुनिया की चेतना के साथ स्थापित नहीं कर सकते।

उपर्युक्त व्यक्ति के एक विशेष विचार में इस क़दर हठ और ज़िद है कि वह मस्तिष्क में से बाहर ही नहीं निकलता। इसलिए विचार उसके मस्तिष्क में जगह नहीं पा सकते। उसका परिणाम यह होता है कि वह व्यक्ति हास्यास्पद हरकतें करता है। अब ज़रा इससे आगे चलिए और ग़ौर कीजिये कि जो सम्बन्ध एक विशेष विचार की हठ का मनुष्य के मस्तिष्क से है, वही सम्बन्ध कुछ दोषों को मनुष्य के चरित्र से है। यहाँ पर यह समझ लेना चाहिए कि दोष दो प्रकार के होते हैं। कुछ दोष ऐसे होते हैं कि मानव आत्मा अपनी सम्पूर्ण शक्तियों और ऊर्जाओं समेत उनमें कूद पड़ती है और अपने जीवन से उन दोषों को मानो जीवन प्रदान करके उनको अपने साथ-साथ घसीटती चली जाती है और इस प्रकार विभिन्न रूपों में उन्हें प्रकट करती रहती है। ऐसे दोष पीड़ादायक व दुखमय होते हैं। इसके विपरीत हास्यास्पद दोष मानो एक चौखटा सा होता है जिसमें मनुष्य को खड़ा कर दिया जाता है। बजाय इसके कि वह हममें प्रवेश कर जाए, वह हम पर सवार हो जाता है। बजाय इसके कि हम उसको अपनी विविधता के रंगों में रंग दें, वह हमें अपनी एकरूपता का वस्त्र पहना देता है। नाटक और कामेडी में अंतर सिर्फ़ इसी से है। संभव है कि नाटक में कुछ ऐसे दोषों का चित्रण किया गया हो जिनको विशेष नाम दिए जा सकते हैं। लेकिन वो कुछ इस प्रकार से पात्रों का अभिन्न अंग बन जाते हैं कि हमें उन दोषों के नाम भूल जाते हैं। हम उनकी विशेषताओं को भुला देते हैं। यहाँ तक कि हमें उन दोषों का विचार तक नहीं आता। इसके बजाय हमारी दृष्टि में सिर्फ़ वह पात्र होता है जिसके व्यक्तित्व में इन दोषों को भर दिया जाता है। इसीलिए एक नाटक का नाम कोई व्यक्तिसूचक संज्ञा होता है। मसलन ओथेलो, हैमलेट इत्यादि। लेकिन एक हास्यास्पद दोष चाहे वह एक व्यक्ति से बहुत ही ज़्यादा चिपका हुआ हो, फिर भी अपनी पृथक प्रकृति और अस्तित्व क़ायम रखता है। वह स्वतः पात्र बन जाता है जिसके इर्द-गिर्द जीवित पात्र घूमते रहते हैं। अक्सर यह देखने में आता है कि हास्यास्पद दोष पात्रों को कठपुतलियों की भांति नचाते हैं। इसीलिए एक व्यक्ति जितना अधिक अपने अस्तित्व से अचेत होता है उतना अधिक  हास्यास्पद भी होता है। एक नाटक के पात्र को अगर यह बात ज्ञात हो जाए कि वह क्या है, उसमें कौन से दोष हैं , और उन दोषों को हम किस घृणा की दृष्टि से देखते हैं, तो संभव है कि वह अपने आपमें कोई सुधार या परिवर्तन न पैदा करना चाहे। लेकिन जहाँ दोषयुक्त पात्र को अपने हास्यास्पद होने का अहसास हुआ वहीं वह अपने व्यक्तित्व में सुधार शुरू कर देता है या कम-से-कम यह प्रभाव पैदा करने का प्रयास करता है कि अब उसमें वह बात नहीं रही या कुछ न कुछ परिवर्तन आ गया है। लोगों की हँसी नैतिकता की सुधारक है।

सो हम देखते हैं कि उस व्यक्ति में जो दौड़ते हुए गिर पड़ता है, और उस व्यक्ति में जो किसी शरारत का शिकार बनाया जाता है, और उस व्यक्ति में जो एक काल्पनिक दुनिया में रहता है, और उस व्यक्ति में जिसके चरित्र के दोष हास्यास्पद होते हैं, उन सब में लचक या तुरंत परिवर्तन कर सकने की कमी के प्रभाव पाए जाते हैं और यही सामग्री हँसी के प्रकट होने का कारण होती है। जीवन संघर्ष और समाज के तक़ाज़े हमसे हमेशा इस बात की माँग करते रहते हैं कि हमारा ध्यान हर समय निर्ममता और जागरूकता के साथ वर्तमान घटनाओं को दृष्टि में रखे और साथ ही हमारे शरीर और मस्तिष्क में वह लचक पाई जाए जिसकी बदौलत हम अपने आपको परिवेश के साथ लयबद्ध करते रहें। अगर हमारे शरीर में इसका आभाव हो तो हम विभिन्न रोगों और दुर्घटनाओं से पीड़ित रहते हैं। अगर यह अभाव हमारे मस्तिष्क में पाया जाए तो नाना प्रकार की मूर्खताएँ और नानाप्रकार के जूनून हमारे जीवन में हस्तक्षेप करते रहते हैं। अगर यह अभाव हमारे चरित्र में पाया जाए तो हमारा अस्तित्व गिर्द-पेश के समाज में बेजोड़ सा रह जाता है। तरह-तरह की विपत्तियाँ हमको घेर लेती हैं और विभिन्न प्रकार के अपराध हम से घटित होते हैं। हँसी मानो समाज की एक उठी हुई ऊँगली है जो समय-समय पर हमारे अन्दर सुधार करती रहती है। इसका सम्बन्ध केवल हृदय के सूक्ष्म भावों से नहीं। हालाँकि यह कौन नहीं जानता कि हम हँसते सिर्फ़ उस समय हैं जब हम अहंकार की सुरक्षा की चिंताओं से मुक्त होकर एक दूसरे को सिर्फ़ कला-प्राणी और दिलचस्प कलाकृतियों के रूप में कल्पना करने लग जाते हैं।

“पतरस” (मख़ज़न- जनवरी 1922)


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