साक्षात्कार: ओम प्रकाश गासो से अशोक भाटिया की वार्ता

ओम प्रकाश गासो

ओम प्रकाश गासो पंजाबी साहित्य और संस्कृति के वट-वृक्ष हैं। 9 अप्रैल 1933 को बरनाला (पंजाब) में जन्मे इस रचनाकार ने दो दर्जन पंजाबी उपन्यास, दो दर्जन पंजाबी गद्य-पुस्तकें, पंजाबी संस्कृति पर पाँच पुस्तकें, बाल-साहित्य, पंजाबी कविता की एक पुस्तक, हिन्दी में पाँच काव्य-पुस्तकें और तीन उपन्यास, अनेक पुस्तकों का हिन्दी से पंजाबी में अनुवाद, साहित्य संस्कृति पर दर्जनों निबन्ध लिखे हैं। उनकी कलम से और भी अमूल्य रचनाएँ निकली हैं। आपके उपन्यासों पर लोकप्रिय नाटक और सीरियल बने। विश्वविद्यालय, दूरदर्शन, आकाशवाणी, स्कूल-कॉलेज, सामाजिक- साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ गासो जी से लगभग हर रोज़ संवाद रखती हैं। पर्यावरण के लिए हजारों वृक्ष लगाना, बौद्धिक संस्कृति के लिए हजारों पाठक बनाने वाला यह सहज-सुलभ युग-पुरुष जीवन्त संस्था व इन्साइक्लोपीडिया की तरह बहुत-से रचनाकारों-कलाकारों व अन्य सुप्रसिद्ध व्यक्तियों का प्रेरणा-स्रोत है। प्रस्तुत है, अशोक भाटिया से उनकी वार्ता।

अशोक भाटियाः गासो साहिब, आप पंजाबी के प्रतिनिधि साहित्यकार हैं। आपके लिखने की शुरूआत कब और किन हालात में हुई? करीब छह दशकों की अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे पाठकों को कुछ बताएँ।

ओम प्रकाश गासोः भाटिया जी, भारत के विभाजन के समय मैं किशोर अवस्था को पार कर रहा था। विभाजन ने पंजाब की धरती को लहू-लुहान कर रक्खा था। मैं इस भयंकर भूचाल को देखता रहा, मेरी समझ से बाहर का मामला था यह कलंक। कलंक और कला के भेद को जानने को अंकुरित करने वाली आराधना मेरे मन में किस तरह से क्योंकर कैसे आ टिकी, पता नहीं। हाँ, इस प्रकार की जिज्ञासा ने मुझे संवेदना प्रदान की। इस संवेदना ने मुझे साहित्यकार बनाया हुआ है।

चल सो चल की धारणा को मैंने स्वीकार कर रक्खा है। गतिशील क्रिया के प्रकरण को प्रणाम करने वाला ओम प्रकाश गासो समाज को समझता रहता है और लिखता रहता है।

मैंने जन-जीवन को अपना आराध्य बनाया हुआ है। मैं लोगों का आराधक हूँ। लोग तो दरवेश होते हैं। कष्ट को वे अपनी किस्मत समझते हैं। मेरा साहित्य स्पष्टता की बात करता है। कष्ट और कला की ज्यों ज्यों तुलना करता रहता हूँ त्यों त्यों मेरी साहित्यिक यात्रा अग्रसर होती रहती है।

अशोक भाटियाः बरनाला को लेखकों का शहर कहा जाता है। यहाँ के माहौल में ऐसा क्या है, जो इसे कुछ अलग पहचान देता है?

ओम प्रकाश गासोः बरनाला एक शब्द ही नहीं; यह एक इतिहास भी है। बाबा आला सिंह एक शूरवीर सत्यावादी व्यक्ति था। ‘बरू’ और ‘आला’ से बरनाला बना है। ‘बरू’ एक घास का नाम है। बरू का अर्थ धूल भरी मिट्टी भी होता है। इस तरह से पटियाला रियासत के शहर बरनाला को दोहरी गुलामी का जीवन मिला। भारत अंग्रेजों का गुलाम और फिर आगे भारत की रियासतें अंग्रेजों की गुलाम। इस तरह से जब किसी चेतना को इस दोहरी गुलामी का पता चला तो वह चेतना उपन्यासकार बन गई।

देखो भाई भाटिया, जब कभी कोई समझ जीवन-धारा के स्वतन्त्र स्वरूप को लांछित होते देखती है तो उद्गार जन्म लेते हैं। बस, यह उद्गार अब उपन्यास बन गये।

अशोक भाटियाः आपका उपन्यास ‘मिट्टी दा मुल्ल’ (1972) कुम्हारों की समस्या और कबीलाई मानिसकता से उभरता है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े उपन्यास में राजनीतिक संकेत कितने असरदार होते हैं? आपका अनुभव क्या कहता है?

ओम प्रकाश गासोः अशोक भाटिया साहिब, आप थोड़ा सा मेरे से दूरी पर रहते हैं। इस कारण अपना यह प्रथम संवाद उस दूरी को समाप्त कर रहा है। मैं इस संवाद को पूरे-पूरे मन से आस्थापूर्वक इस कारण से स्वीकार करता हूँ, क्योंकि हिन्दी के रचना संसार को मेरे हिन्दी के पाँच काव्यों और तीन उपन्यासों आदि की कोई जानकारी नहीं।

भारतीय जनजीवन में कुम्हारों की, जिनको प्रजापत कहा जाता है, बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है। ’मिट्टी दा मुल्ल’ मेरा चैथा पंजाबी उपन्यास है। मेरा सर्वप्रथम पंजाबी उपन्यास ‘सुपने ते संस्कार’ है। यह उपन्यास रियासती जीवन की जागीरदारी पर एक जीवित कटाक्ष की तरह है। राजनीति समाज पर किसी न किसी रूप में अपना अंकुश बनाये रखती है। राजनीति दमनकारी भी होती है। दमनकारी राजनीति के दुमछल्ले जागीरदार हैंकड़बाज होते है। ‘मिट्टी दा मुल्ल’ इस हैंकड़बाजी का विरोध करता है। एक प्रजापत पात्र स्वयं को शक्तिषाली बना कर जागीरदार से दोश्दो हाथ करके स्वाभिमान को बिकने से बचाता है। संघर्ष है, चलता रहता है। अंत में प्रजापत पात्र विजयी होते हैं। यह वास्तव में श्रमिक वर्ग की सामन्तों पर जीत की क्लासिक कहानी बन पड़ी है। इस नावेल पर भाजी (गुरशरण सिंह) द्वारा बनाया नाटक आज तक सैकड़ों बार पंजाब और देश में मंचित हो चुका है, और अब भी हो रहा है।

अशोक भाटियाः अपने जीवन-संघर्षों के बारे में कुछ खुलासा करें। इस संघर्ष ने आपके लेखन को कितना प्रभावित किया?

ओम प्रकाश गासोः मैं अपने घर में अनचाहा बच्चा था। मेरा बचपन लावारिस बना रहा। पिता श्री प्राइमरी अध्यापक थे। सहज और साधारण पुरुष थे। उनकी इच्छा मुझे पुरोहित बनाने की थी ताकि जज़मानी और पुरोहितबाजी का धन्धा चलता रहे। साधुश्सन्तों के डेरोंऔर ऋशिकुल इत्यादि में संस्कृत भाषा और पद्धति को सीखने में जीवन के दसश्बारह वर्ष नष्ट हो गये। आखिर तेरह वर्ष की उम्र में उर्दू के कायदों को मैंने पकड़ा। बस फिर तो मैं स्कूल से विश्वविद्यालय तक तेज़ गति से अग्रसर होता रहा। मद्रास में वाई.एम.सी. कॉलेज से शारीरिक शिक्षा का कोर्स करने 1952-53 में जा पहुँचा। विवाह हो चुका था। घर में कन्या का जन्म हो चुका था। जिम्मेवारी को समझ लेने वाला ओम प्रकाश गासो आय और व्यय की अहमीयत को समझता था। 1954 के दिसंबर में अध्यापक लग गया।

मेरे घर में मेरा बड़ा भाई ज्ञानी अध्यापक था। पंजाबी भाषा का रसाला ‘प्रीतलढ़ी’ आता था। संघर्ष ने मुझे सचेत बनाया। समाज की विकृति को देखकर मैं संवेदनशील बनता गया। मैं बेशक निर्धन था, पर मेरी भाव-धारा धनी बनती गई। मेरा मन जन-साधारण से जुड़ता गया। रियासतों में प्रजातंत्र क्रियाशील था। प्रजातंत्र को पढ़ता रहा, राजसी बातों को पकड़ता रहा।

मेरे मान्यवर भाटिया साहिब इस प्रकार से मेरे जीवन की जीवन संघर्ष से मित्रता बनती रही।

अशोक भाटियाः आपने मिन्नी कहानी के शुरूआती दौर में रोशन फूलवी के साथ ‘तरकश’ नाम से मिन्नी कहानी-संकलन 1973 में निकाला था। मिन्नी की कहानी को सामने लाने के पीछे आपकी क्या सोच थी? तब मिन्नी कहानी की क्या स्थिति और संभावनाएँ थीं?

ओम प्रकाश गासोः फूलवी भला पुरुष था। महाजन होने पर भी उसकी सोच और उसका जनहित वाला व्यवहार बेहद उपयोगी और सुन्दर था। फूलवी को मेरे में पूरी रुचि थी। मेरे प्रति उसका व्यवहार उपासना जैसा था। मेरी जगह पर फूलवी मिन्नी कहानी देखता था, वह साहित्य का योगी पुरुष। उसके आत्मीय भाव से मैं प्रसन्न था।
प्रिय भाटिया भाई, यूँ समझिए कि उपन्यासकार और मिन्नी कहानी लेखक के सुमेल से ‘तरकश’ संकलन का जन्म हुआ है। मिन्नी कहानी को मैं अभूतपूर्व कलाश्साधना की तरह स्वीकार करता था, अब भी करता हूँ।

तीक्ष्ण धार होती है मिन्नी कहानी।
भावनात्मक कला का शिखर होती है मिन्नी कहानी
संक्षेप मे सार्थक संदेश का सूचक होती है मिन्नी कहानी
काव्यमय कारक होती है मिन्नी कहानी
सूत्र, संकल्प और सिद्धान्त का प्रकरण होती है मिन्नी कहानी

उपन्यास लिखना आसान होता है। एक मिन्नी कहानी को लिखना काफी कठिन होता है। मैं मिन्नी कहानीकार को अपने से बड़ा और सिद्धहस्त लेखक समझता हूँ।

आज का समय अपनी चंचलता और अस्त व्यस्तता के कारण ‘मिन्नी कहानी’ का सेवक है और उसको मिन्नी कहानी मानसिक प्रसन्नता प्रदान करती है। मिन्नी कहानी के इस सद्गुण को मैं ‘तरकश’ को प्रकाशित करने वाले 1973 के समय भी जानता था।

देखो न भाई अशोक, आज से लगभग पचास वर्ष पहले पंजाबी-भाषा की मिन्नी कहानी अपने जन्म-काल में थी। माँ जैसे अपने बेटे को धीरे-धीरे चलने के वास्ते उसकी बाँह पकड़ कर संभालती और सुरक्षित रखती है, वैसी ही मेरी भूमिका रही होगी उस समय। समय को तसदीक और तमन्ना प्रदान करने वाले आप जैसे प्रबुद्ध ‘मिन्नी कहानी’ लेखकों को मैं तो प्रेम-पूर्वक प्रणाम ही कर सकता हूँ।

अशोक भाटियाः ‘तरकश’ का संपादन करके भी आप मिन्नी कहानी लेखन की दिशा में प्रवृत्त नहीं हुए - इसकी क्या वजह थी?

ओम प्रकाश गासोः मुझे स्पष्टता और स्वीकृति ने प्रसन्नता प्रदान की है। सहज भाव और स्वभाविक धारणा को करने वाली मेरी इच्छा आनंद से ओत-प्रोत है।

मैं  मिन्नी कहानी की कला को चरमशक्ति मानता हूँ। बहुत बड़ी अनुभूतशील चेतना की तपस्या से मिन्नी कहानी उपजती है। मिन्नी कहानी का एक-एक शब्द सूत्र का स्वरूप होता है। मिन्नी कहानी का एक वाक्य उपन्यास के एक कांड की तरह होता है। मिन्नी कहानी के एक वाक्य में व्याख्या नहीं, वेदना होनी चाहिये।
देखो न अशोक भाटिया जी कितना बड़ा-भारी और मर्यादित कर्म है ‘मिन्नी कहानी’ लिखने का कर्त्तव्य। मिन्नी कहानी न लिखने की कोई वजह नहीं, सामर्थ्य की बात है। मिन्नी कहानी लिखना मेरी सामर्थ्य से बाहर है। मैं तो साधारण सा उपन्यासकार हूँ। कई बार किसी उत्तम किस्म की मिन्नी कहानी को पढ़कर रचना और रचनाकार के समक्ष सिर झुका कर खड़ा रहता हूँ।

इस प्रकार से खड़ा होने का अपना ही एक प्रिय सा प्रकरण बनता है। कितना शोभनीय होता है वह पल जब एक उपन्यासकार ‘मिन्नी कहानी’ के सामने सिर झुकाकर खड़ा होता है। यह तो कला-क्षेत्र का वह बोध है, जो विनम्रता से जन्मता है।

अशोक भाटियाः मिन्नी कहानी की आज की स्थिति आपको कितना आश्वस्त करती है?

ओम प्रकाश गासोः मिन्नी कहानी रचना का अपना एक अद्भुत क्षेत्र है। मैं ज्यादा तौर पर उपन्यास ही पढ़ता हूँ। हिन्दी का मैगज़ीन ‘पाखी’ है उसमें प्रकाशित ‘मिन्नी कहानी’ को पढ़ने का अवसर मिल जाता है। समय के अवसाद में कदम-कोदम पर मिन्नी कहानी की वस्तु बिखरी पड़ी है। बात उस वस्तु को पकड़ने की है। आज मिन्नी कहानी कहाँ पहुँची है, इस का उत्तर तो मैं न दे पाऊंगा क्योंकि इस के वास्ते बहुत बड़े अध्ययन की आवश्यकता है।

अशोक भाटियाः पंजाब में आतंकवाद के दौर मे आपने ‘तत्ती हवा’ (गर्म हवा) 1986 और ‘मौत दर मौत’ (1987) दो उपन्यास लिखे। ‘मौत दर मौत’ का नाट्य-रूपांतर कर सुप्रसिद्ध रंगकर्मी गुरशरण सिंह ने इसका अनेक बार मंचन किया। पंजाब की साझा संस्कृति को उभारने वाले इन उपन्यासों ने विमर्श को बदलने में किस तरह अपनी भूमिका निभाई?

ओम प्रकाश गासोः भाटिया साहिब, साहित्य अपने समय की आँख होता है। राजनीति के स्वार्थी सिलसिले समाज के वास्ते दुखदाई बने रहते हैं। सामाजिक पीड़ा का प्रकरण बनकर मेरे उपन्यास अपना कार्य करते रहते है। ‘मौत दर मौत’ और ‘तत्ती हवा’ के पहले भी मेरा एक उपन्यास ‘लोहे-लाखे’ प्रकाशित हुआ था। ‘तत्ती हवा’ नाँवल को पढ़ कर तो मुझे मार देने तक की योजना बन रही थी। ‘लोहे-लाखे’ क्रोधित विस्फोट को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास था।

भाटिया साहिब, जनसाधारण को साहित्य समझाता रहता है, समझ कारगर बनी रहती है। ‘मौत दर मौत’ के मंचन को देख कर उससे प्रभावित होकर उसमें भाग लेने वाली बीबा बलवंत ने जो बात मुझे सुनाई वह उस रचना के प्रभाव का प्रमाण थी। आधी रात को नाटक के समाप्त होने पर एक आतंकवादी, नाटक की प्रमुख पात्र बीबा बलवंत के घर आता है। ए.के. सैंतालीस को उसके पैरों में रखकर मरने और मारने के अपने काम छोड़ देने की सौगन्ध खाता है। बीबा बलवंत को साथ ले जाकर ए.के.संतालीस को सतलुज के पानी में फेंक देता हैं।
भाटिया साहिब कहानी काफी लम्बी है।

मुझे मेरे पाठक आमतौर पर मिलते ही रहते हैं। ‘तत्ती हवा‘ उपन्यास का पंजाबी विश्ववि़द्यालय पटियाला ने अंगरेजी भाषा में ‘Hot Wind’ के नाम से अनुवाद भी करवाया है। मेरे उपन्यास सार्थक अनुबंध की तरह होते हैं। ‘मिट्टी दा मुल्ल’ के नाटकीय रूप को भारतीय नाट्य-मुकाबलों में प्रथम स्थान मिला था।

अशोक भाटियाः इसी संदर्भ में आपके उपन्यास ‘बुझ रही बत्ती दा चानण’ (1995) पर दूरदर्शन जालंधर ने ‘परछावें’ सीरियल बनाया था। यह उपन्यास आज के संकीर्ण वातावरण में क्या और कितना कारगर संदेश देता है?

ओम प्रकाश गासोः विखंडित मंशा से उत्पन्न हर प्रकार का उपद्रव मानवता के वास्ते दुखदाई बना रहता है। ‘बुझ रही बत्ती दा चानण’ मेरा वह उपन्यास है जो मानवीय स्नेह वाले संकल्प को तोड़श्मरोड़ करने वाली इच्छा के उलट जाने वालों का पर्दाफाश करता है।

इस रचना का स्वभाव मधुर है। मधुरता से पैदा होने वाला व्यवहार इस पुस्तक को प्रिय बनाता है। डा. हरजीत सिंह और रवि दीप द्वारा निर्देशित ‘परछावें’ की आंचलिक पेशकारी विमोहित करने वाली है।

लोगबाग इस सीरियल को अपना समझते थे। इस प्रकार मूलभावना कोमलता की ओर अग्रसर होती थी। मैंने लोगों को इस सीरियल द्वारा पेश की जाने वाली स्पष्टता को ग्रहण करते हुए खुद देखा है। कठोरता और कोमलता की बातों वाला व्यवहार इस सीरियल में मुखर होकर दर्शकों के समक्ष आता है।

साहित्य का उद्देश्य मनुष्य की भावना को सहज बनाना भी तो होता है। इस कला से लोग सहज बन कर सही सोच को अपनाने वाले बने।

मुझे अपनी कृति पर प्रसन्नता थी। मैं खुद सीरियल को देख कर गद्गद हो जाता था। डी.डी. पंजाबी से यह कई बार प्रसारित हो चुका है।

अशोक भाटियाः  पंजाब की संस्कृति पर आपकी पाँच पुस्तकें है। पंजाबी युनिववर्सिटी, पटियाला ने भी आपसे पुस्तकें लिखवाई हैं। मालवा की लोक संस्कृति को उभारने में भी आपका काम है। इसे आप कितना सार्थक मानते हैं?

ओम प्रकाश गासोः धरती से उपजी हर प्रकार की कुदरती वस्तु संतोषजनक होती है। विकृत मनुष्य की विकृत भाव-धारा ने किस्म-किस्म की समस्याओं को पैदा कर रक्खा है। मेरे संस्कार स्वाभाविक से हैं। मैं अपने आस-पास को अपना ही समझता हूँ। पंजाब को लुच्ची (अश्लील) गायकी ने प्रदूषित कर रखा है। पंजाब का किसान भी फकीर और दरवेश नहीं रहा। मेरे इस प्रांत की बौद्धिकता का भी पतन हो रहा है। धन बहुत है, मन गरीब है। इस प्रकार की दुष्टता को देखकर मैं विरासत की शुद्धता को लेकर सैद्धांतिक स्वरूप वाली पुस्तकें लिखता रहा हूँ। उनकी काफी अच्छी मान्यता बन गई है। पाठक-वर्ग इस को पढ़कर प्रसन्न होता रहता है। आमतौर पर मेरे पाठक मुझे सीधे और सपाट रूप में मिलते ही रहते हैं।

पंजाब के मालवा-आंचल की संस्कृति की अपनी एक विशेष रूपरेखा है। मेरी पुस्तक ‘मलवई सभ्याचार’ ने इसको सही ढंग से अंकित किया है। इसके तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

मेरा हर प्रकार का साहित्यिक सिलसिला ठीक-ठाक चल रहा है। विश्वविद्यालय पटियाला ने ‘ओम प्रकाश गासो की साहित्यिक जीवनी’ रचना लिखवाई और प्रकाशित की है। उसमें मेरा अपनापन पूर्ण रूप से उजागर हुआ है। मैं अपनी उस रचना को पढ़कर भाव-विभोर हो उठता हूँ क्योंकि उस रचना में समय के स्वभाव को दर्शाया गया है। समय और साहित्य की आपसदारी तो अटूट होती है। समाज का इस प्रकार की आपसदारी से लगाव बना रहता है।

अशोक भाटियाः  आप साठ वर्षों से मित्र मंडल प्रकाशन चला रहे है। स्वयं पुस्तकें प्रकाशित कर लागत मूल्य पर अब तक 50 हजार पुस्तकें अपने थैले में से वितरित कर चुके हैं। अपना प्रकाशन और पाठक संबंधी अपने कुछ अनुभव साझा करें।

ओम प्रकाश गासोः अनूठे रंग का यह प्रयोग प्रतिबद्ध भावना का सूचक है। लोगों में अच्छी पुस्तकें पढ़ने की प्रबलता बनी हुई है। मुझे तो मेरा पाठकवर्ग अपने कन्धों पर उठा लेता है। विश्वास को आस्था और अक्षर कहा जा सकता है। मुझे मेरे पाठकों से बहुत सारा धन मिलता ही रहता है। मैं सही साफ़ धारणा और धाराओं का उपासक हूँ। अडिग चिन्तन सहयोगी बना रहता है। मेरा थैला मेरा पुस्तक-भंडार होता है। भाटिया साहिब, जब  आप 12.01.2020 को एक मिन्नी कहानी उत्सव पर शिरोमणि साहित्यकार के रूप में आये थे, उस दिन भी मेरे थैले की तीस पुस्तकों को पाठकों ने खरीदा था। आप भी तो मुझे इस मित्र मंडल प्रकाशन के वास्ते पाँच सौ रुपये देकर गये हैं।

मैं और मेरे सहयोगी इस बात को लेकर चल रहे हैं कि अपना मुल्क साहित्यक पुस्तकें पढ़ने में पिछड़ रहा है। हम अपने साधारण से प्रयत्न से किसी न किसी कला-पूर्ति को प्राप्त कर ही लेंगे। हम अपने इस उद्देश्य में पूर्ण तौर पर सफल हो रहे हैं।

अशोक भाटियाः पर्यावरण पर आपकी पहल बड़ी चर्चित और सराहनीय है। अब तक आप करीब 50 हजार पेड़ लगाकर पाल-पोसकर बड़े कर चुके हैं। यह आपने कब से, किसकी प्रेरणा से किया? इसमें क्या सामाजिक संस्थाओं और सरकारी क्षेत्र का भी सहयोग मिला?

ओम प्रकाश गासोः देखो सत्कारीय अशोक भाटिया जी, वृक्षों से मेरा आत्मीय रिश्ता बेहद प्रिय अनुभूत संदर्भ का सूचक है। बहुत पुरानी बात है यूँ समझें कि सन चवालीस-पैंतालीस में जब मैं दस-बारह वर्ष का था उस समय मेरे घर में मुझे कुछ भी समझा नहीं जाता था। उस समय बरनाला एक कस्बानुमा शहर था। बरनाला चाहे रियासत पटियाला का जिला था पर आज जैसी चकाचैंध करने वाली इसकी रूपरेखा उस समय नहीं थी। अब तो यह शहर इस तरह से है, जैसे कोई कुत्ता चोरी का घी खाकर मोटा हो जाता है।

हाँ, तो मैं अपने घर के ग्रामीण से मुहल्ले से बाहर के खेत-खलिहानों की ओर चल पड़ता था। कोई न कोई शांत पगडंडी पर मेरे पैर चलते रहते थे। पीली-पीली सरसों के भरे-भरे खेतों से बातें करते-करते मैं काफी दूर निकल जाता था। धरती, खेत, किसान, कुदरत और कुदरती करामातों से मेरी दोस्ती बढ़ती गई। वृक्ष मेरे उस समय से मित्र बने हुए हैं। पच्चास हजार तो नहीं, दस हजार के आस पास मैंने वृक्ष लगाये हैं। सिलसिला चल रहा है। इस बार फरवरी 2020 में जब वृक्षों में फुटारा पड़ता है, दो सौ वृृक्ष लगाने हैं मनाल गाँव की गोशाला में।

देखो मेरे प्रभु, जब कोई इच्छा मनुष्य के मन से उत्पन्न होती है तो वह प्रिय प्रकरण बन बैठती है। मेरे मन ने वृक्ष लगाने को भला समझा। बस यह भलापन ही मुझे प्रेरित करता रहता है। भारतीय समाज के बारे में मुझे नोबल पुरस्कार प्राप्त अमर्त्य सेन की कही बात याद आ रही है। उन्होंने कहा है कि भारत तो बातूनी है। समाज और सियासत की तमाशेबाजी को लोगबाग जानते ही हैं। मेरे पास अपना थोड़ा-बहुत धन होता है, उससे वृक्ष लगा कर उनको सँभालता आ रहा हूँ। इस साल मुझे बीस हजार रुपया वृक्षारोपण पर लगाना है, सो वह धन मेरे पास है।
बात बड़ी साफ है कि समय और समाज के साथ-साथ प्रकृति पुरुष के वास्ते बहुत कुछ करती है, पर हम उसके वास्ते क्या करते हैं?

भाटिया साहिब, सरकारीतंत्र डमरू तो बहुत बजाता रहता है परन्तु अधिकारी-वर्ग अहंकार का शिकार बना रहता है। इस अंहवाद से साध्य-सोपान पिछड़ रहे हैं। मुझे मेरा समाज सत्कारीय समझता है, इससे बड़ा भला क्या सहयोग होगा।

अशोक भाटियाः  आज के हिंसक, धार्मिक उन्माद और जातिगत संकीर्णता से ग्रस्त वातावरण और राजनीति के बारे आप क्या सोचते हैं?

ओम प्रकाश गासोः भाटिया साहिब, मैंने अपनी किशोर उम्र में ही धार्मिक मूर्खता के कारण पंजाब की धरती को लहू-लुहान होते देखा है। भारत के विभाजन का दोष-पूर्ण निर्णय हमारे देश की राजनीति का दुखदाई और विस्फोटक पक्ष था। इस धरती पर रहने वाला समाज रोता और विलाप करता रहा, महात्मा जी अहिंसा की कहानी कहते रहे। मैंने हिंसा की कठोरता, निर्ममता, दुष्टता, दर्द, भीषणता और भंयकरता को अपनी विवेकशील चेतना द्वारा समझने की पूरी-पूरी कोशिश की थी।

मानव को दानव बना रखा था सियासी स्वार्थ ने। सियासी स्वार्थ से पैदा होने वाला किसी भी किस्म का कोई भी अन्याय लोक-पक्ष के वास्ते घातक बना रहता है।

बड़ी सीधी और साफ सी बात है कि जन-साधारण को तो जीवनश्यापन के लाले पडे़ रहते हैं। सत्ताधारी सिलसिले हकूमत हासिल करने के वास्ते भिन्न-भिन्न प्रकार के हथकंडे खड़े करते रहते हैं। ओम प्रकाश गासो ही नहीं, हजारों संवदेनशील व्यक्ति इस तथ्य को समझ कर लोकश्पक्ष के वास्ते कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।

मैं तो अपनी रचनाओं में जन-चेतना के वास्ते एक पाठ की तरह सोचने और समझने की कला को प्रस्तुत करता रहता हूँ ताकि लोग किसी झंझट में न फँसे। समाज के वास्ते साहित्य शिक्षा भी होता है। जानता हूँ, भली प्रकार महसूस करता हूँ कि इस प्रकार के शिक्षकों की आज अवहेलना हो रही है, पर कठिन अवस्था में कार्यरत रहना भी तो एक संकल्प की तरह होता है। मैं तो साहित्यकार को एक संकल्प भी मानता हूँ। संकल्प विचलित नहीं होता।

अशोक भाटियाः  नए माहौल में साहित्य अपनी भूमिका कारगर रूप में कैसे निभा सकता है?

ओम प्रकाश गासोः भाटिया साहिब इस धरती पर न्यायशील अध्याय की पूर्ति को संभालने वाली शक्ति का अपना एक शक्तिशाली इतिहास पढ़ने को मिलता रहता है। वे लोग विभूति बनकर हमारे लिये पथ प्रदर्षक की तरह हैं। मैं तो एक साधारण सा पूरक हूँ। प्रेरणामयी प्रवक्ता-पुरुष मेरे गुरु बने रहते हैं। सचेत-साधना की तरह होता है साहित्य। लोग तो दरवेश होते हैं। उनकी समझ से बाहर रहती है सत्तावाद की चंचलता और शैतानीयत। समझ और संजीदगी के पाठ को पढ़ कर लोग समय को संभालते रहते हैं। समय के कष्ट की कहानी कहने वाले कलाकार सामाजिक सूत्र की भूमिका बने रहते हैं। प्रकाश को प्रकाशित करता रहता है साहित्य। अन्धेरे की आँख नहीं होती। साहित्य का कर्म और धर्म आँख जैसा होता है। खुली आँख वाला जन-साधारण बहकावे से दूर रहता है। रचनाएँ इस बहकावे का वर्णन बन कर उपयोगी अर्थों को बढ़ाती रहती है।
बस इस प्रकार की क्रियाशील कला को बार-बार ग्रहण करने को मन करता है।

अशोक भाटियाः पंजाब के शिरोमणि पंजाबी साहित्यकार पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के दो लाख रुपये के सौहार्द सम्मान सहित आपको अब तक बीसों पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। लेकिन दो दर्जन से भी अधिक लोकप्रिय उपन्यासों के लेखक और पर्यावरण बचाने की मुहिम में निरंतर संलग्न समाजसेवी ओम प्रकाश गासो से भारतीय साहित्य अकादमी सम्मान अब तक दूर क्यों रहा? क्या इसके पीछे कोई राजनीति है? साहित्य अकादमी या पद्मश्री सम्मान को आप किस दृष्टि से देखते है?

ओम प्रकाश गासोः अशोक भाटिया साहिब, आपके इस प्रश्न की भावना को मैं तो एक प्रिय पुरस्कार की तरह ही मानता हूँ। पुरस्कारों की देरी और दूरी का भी अपना एक आनंद होता है। पुरस्कृत रचनाओं को मैं बड़े ध्यान से पढ़ता रहता हूँ। उनमें किस दर्शन को दिखाया गया है, समझने की भरसक कोशिश करता हूँ। मुझे मेरी यह आराधना अंकुश में रखती है। मैं विचलित नहीं होता। मुझे मेरे पाठक अपनी आस्था को जब मुझे भेंट करते हैं तो मुझे लगता है जैसे कोई पुरस्कार मिल गया है। पुरस्कारों के लेनदेन में राजनीति का चलन तो चलता ही रहता है। सम्मान और पुरस्कारों को मैं आदरणीय दृष्टि से देखता हूँ। पुरस्कारों के वितरण में कुछेक अनधिकारी भी आ जाते हैं। अधिकार की उपेक्षा को अन्याय कहा जा सकता है। सिलसिले चलते रहते हैं। कभी सिलसिला अषुद्ध हो जाता है। शुद्धता को स्वीकार करने वाला ओम प्रकाश गासो आप जैसे पुरुषों के प्यार से भरा-भरा सा महसूस करता रहता है।

अभी-अभी 550 भले पुरुषों को गुरु नानक देव जी के 550 जन्मवर्ष पर पुरस्कृत किया है पंजाब से। मैं भी उसमें से एक था। बहुत अच्छा उत्सव था। आप जैसी कुषाग्रता का कथन मुझे याद है।
कथन था कि दर्जनों रास्तों पर बिजली ने चकाचौंध कर रक्खी है, पर बाबा नानक के दिखलाये रास्ते पर अन्धेरा है।

भाटिया साहिब, प्रकाश और अन्धेरे के बीच द्वन्द्व युद्ध चलता ही रहता है। मुझे लिखने और समाज की बात करने की प्रेरणा अपने उन लोगों से मिली है जो कष्ट में थे, जिनको आर्थिक अन्याय के कारण नारकीय समय में से गुजरना पड़ता था। पीड़ा से उपजा मानवीय सतह वाला पुरस्कार सर्वोपरि होता है। पुरस्कार, सत्ता और सियासत पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर इसके विपरीत जीवन को जीवन से मिलने वाला सत्कार सर्वमान्य होता है।

अशोक भाटियाः साहित्य में अभी और क्या विशेष कार्य करने की योजना है?

ओम प्रकाश गासोः संकट-ग्रस्त संसार की समस्यायें हर पल हर क्षण हर समय कुछ न कुछ करने को कहती रहती हैं। आज प्रकृति को बहुत सारे बिगाड़ का सामना करना पड़ रहा है। साहित्यकार, समय, समाज और समस्या के साथ-साथ समाधान जैसी बातें ज्यों-ज्यों अंकुरित होती रहती हैं, त्यों-त्यों क्रियाशील कर्म का जन्म होता रहता है।

देखो मान्यवर भाटिया साहिब, आशा और निराशा, न्याय और अन्याय, अराजकता, अनर्थ और अनिष्ट जैसे अध्याय मेरे सामने आते रहते हैं। मैं उनको पढ़ने और पकड़ने में प्रयत्नशील रहने वाला प्राणी हूँ। इस प्रकार की पकड़ को लेकर लिखने की कला पनप पड़ती है।

बस इस तरह के विवेक बोधिचित्त से लिखने वाला संकल्प मुझे सुन्दर लगता है। सो इस संकल्प की पूर्ति को पूर्ण करने की भावना वाला मैं भावुक बिन्दु हूँ। बिन्दु का विस्तार जरूर होगा।

अशोक भाटियाः आज के युवा लेखकों को कोई संदेश?

ओम प्रकाश गासोः देखो मान्यवर भाटिया साहिब, संवेदना का आयुश्वर्ग उसकी तीव्रता, संजीदगी और गंभीरता से बनता है। युवा लेखक की संवेदना किसी वयोवृद्ध लेखक से बड़ी तेज भी हो सकती है। क्षीण और हीन अवस्था का अनुपात चिन्तन धारा की ओर संकेत करता रहता है। देखा जाये तो लेखक का दर्जा उसके चिन्तन पर टिका रहता है।

जीवनधारा में आयु और अवस्था का अपना एक विशेष प्रकार का महत्व बना रहता है। युवा लेखक की भावना बड़ी ताजा और तंदरुस्त होती है। आज अपना यह वर्तमान बड़ा कुटिल बनता जा रहा है। समाज और समाज की कुटिलता के साथ-साथ युवा लेखक को सियासी शैतानीयत को भी समझना होगा। समाज को सियासत ने तमाषा बना रक्खा है।

आज का यह समय जन-साधारण के स्थान पर कुछेक सत्ताधारी घरानों के हाथों में है। भारतीय प्रबन्ध नाखुश हैं। भविष्य में बहुत सी किस्मों के अन्धेरे छा जाने का भय है। इस प्रकार से युवा-चेतना के ऊपर बहुत भारी जिम्मेवारी आ चुकी है। कला और कर्त्तव्य को समक्ष रखकर देखना जरूरी बन गया है। प्रेम-पूर्वक प्रार्थना ही प्रकाश की धारणा है।

संपर्क
ओम प्रकाश गासो
गासो स्ट्रीट, नजदीक आर्य हाई स्कूल,
बरनाला-148101 (पंजाब)
Email: gassoravinder@gmail.com

अशोक भाटिया
बसेरा- 1882, सेक्टर-13, करनाल-132001 (हरियाणा)
Email: ashokbhatiahes@gmail.com

सेतु, मार्च 2020

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