काव्य: प्रीति गोविन्दराज

प्रीति गोविन्दराज
कोरोना

भय में उलझा मानव पल-पल
जाने न, शत्रु किस द्वारे से आये
आँखों से उड़े निद्रा-कण यूँ
कि फिर वह वापस हाथ न आये!
चहुँ दिशाओं से उमड़ती सूचनाएँ
अलक्षित को कैसे गढ़ लूँ;
अदृश्य काया, बोले न बैन
दर्शन, आहट हो तो पढ़ लूँ!
बेचैनी बढ़ाये नित्य समाचार
सूक्ष्म कोरोना फैलाये त्रास,
शांत नहीं मन किसी का
बाहर सूनापन, भीतर उदास।
स्वजन हैं तो समीप
पर चुरा गया कौन उल्लास?
देख संक्रामक रोग की वृद्धि
गहराये तनाव का बदरा
चेतना जागृत, किन्तु संभ्रांत
उदित कब हो उन्मुक्त सवेरा?
*************

शादी (नज़्म)

माँ, अपने लिये सबके चेहरे पे चमक
बस एक ही रोज़ देखी थी
जिस रोज़ मेरी शादी हुई थी ,
सिर्फ उसी दिन मेरी कीमत थी।
सास ने बावर्ची की जब ज़िम्मेदारी
अगली सुबह पकड़ा दी
अपने घर के नुस्खे भी दिये,
आपके सालन ने दिल में हलचल मचा दी।
सुबह-सुबह की दस्तक दरवाज़े पर
गुलामी की है मोहर;
टूटते बदन की, या सिरदर्द की मेरे
किसी को नहीं खबर!
“कुछ और सोने दे माँ”
“कल मेरे फ्रेंड्स आ रहे है!”
“पापा से कह देना पैसे चाहिए”
मेरे अपने अल्फ़ाज़ आज खुदगर्ज लग रहे हैं!
आँखों से मगर बरसते भी नहीं
दिल की बात, किसी से अब कहते नहीं;
जो बिन कहे, समझते थे उनकी
आज तक कदर की ही नहीं!
इस घर में औरों से फैले
सामान जब समेटा करती हूँ,
तो अपने घर में दुपट्टे, सैंडल वापस
जगह पे मिले याद करती हूँ!
बहन के दुपट्टा लेने पर
गुस्से में तूफान उठाती थी जो
आज ज़ेवर भी चुपचाप
ननद को थमाती है वह।
बंद कमरे तक सहमी उनकी हमदर्दी
उनकी मुहब्बत है बुज़दिल-सी
कमरे के बाहर बेज़ुबान नौकरानी
चले खामोश मशीन-सी।
ननद की सहेलियों को शर्बत पिलाती हूँ
तो प्यास आज़ादी की हो आती है
परवाज़ की ज़रा सी हसरत,
आँखों से बह, आरिज़ों पे उतर जाती है!
सोचो अगर अपने पुराने नखरे
पे जो उतर आऊँ
यहाँ तो सिसकी भी आए
तो होंठों में दबाऊँ!
सबको औकात में रखने वाली, माँ
अब तेरी नाज़ोंवाली पहचानी न जायेगी
बेजान मुस्कुराकर हुक्म सहने वाली
अपनी नाज़ो की शादी कैसे कर पायेगी?
माँ, क्या उसकी शख़्सियत बची रहेगी?
उसकी ज़िद, उसके शौक बरकरार रहेंगे
बेरंग कनीज़ ज़िंदगी कब तक चलेगी,
आनेवाले नसलों की नाज़ो क्या यूँ ही ज़िंदा रहेंगी?

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। वे व्यवसाय से मैं कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।