संस्कृत वांङ्मय में वर्णित योग शास्त्र की उपयोगिता


विदुषी शर्मा


विज्ञ पाठकों से नम्र निवेदन: समग्रता किसी भी विषय के लिए अंतिम परिणति है। परंतु यह मुझ अल्पज्ञ की परिधि से बाहर है। इतने बड़े विषय को एक विमर्श में बांध पाना बहुत ही कठिन कार्य है और सत्य तो यह है कि जिन लेखकों की हम बात कर रहे हैं उनकी एक-एक कृति पर ऐसे न जाने कितने विमर्श संभव हो सकते हैं। इसलिए मैं करबद्ध क्षमा प्रार्थी हूँ कि यदि कुछ महत्वपूर्ण तथ्य मेरे सूक्ष्म मस्तिष्क से छूट गए हो तो कृपया अल्पज्ञ जानकर अपने बड़प्पन का परिचय देते हुए इसे यथावत स्वीकार करें। प्रस्तुत आलेख ईश्वरेच्छा से पूर्ण हुआ है, और पाठक वृंद से यह अनुरोध है कि अब इस विमर्श को इस प्रकार ग्रहण करेंगे जैसे- "संत हंस गन गन्हहि पय, परिहरि वारि विकार"।


 परिचय-----

 "अहम् बद्धो विमुक्त: स्यामिति यस्यास्ति निश्चय:,
 नात्यन्तमग्ज्ञो नो तज्ञ: सोअस्मिन शास्त्रेअधिकारवान"


 योग वशिष्ठ (1-2-2)

अर्थात जो व्यक्ति स्वयं को आबद्ध मानता है और बंधन से मुक्त होने के लिए कृत संकल्प है, वह न तो इस विषय में अज्ञानी है और न ही अधिक ध्यान रखता है, जो इस विषय को समझ सके और इसे जानने की इच्छा जिसके अंतःकरण में हो, वही मनुष्य इस शास्त्र के पथ का अधिकारी है।

 मनुष्य, मनुष्य से टूटे बिना जीवन जी सके इसी अखंडता का नाम "योग" है।

 योग आर्य जाति की प्राचीनतम विधा है जिसमें निर्विवाद रुप से यह स्वीकार कर लिया गया है कि मोक्ष का यदि कोई सर्वोत्तम उपाय है तो वह है "योग"।
इस भवसागर से पार उतरने का एकमात्र उपाय, इस संसार से "वि-योग" करके ईश्वर के साथ एकाकार हो जाने के लिए आवश्यक है उसके साथ जीवात्मा का "योग",जीव आत्मा का परमात्मा के साथ 'योग'।
+ यानि मिलन और जब हम मिलन की बात करते हैं तो मिलन सदैव श्रेयस्कर होता है। (यहाँ पदार्थों की बात नहीं है जिनमें कुछ विशिष्ट पदार्थों का मिलन विध्वंसकारी भी हो सकता है, यहाँ बात भावनाओं की हो रही है)

 क्योंकि दुराव, अलग होना, दूरियाँ बढ़ाता है और एकाकार होने के लिए एक दूसरे को समझने के लिए आवश्यक है "योग"।

 योग यानी स्वयं का "बढ़ना" या "बढ़ाना"(जब कहीं भी योग (+)होगा तो चाहे वस्तु हो या व्यक्तित्व, उसमें वृद्धि अवश्यंभावी है)।

अपनी चित्तवृत्तियों से कलुषित विचारों को त्याग कर, शुद्ध आचरण (मनसा-वाचा-कर्मणा) करके, अपने अस्तित्व को इहलोक से मोक्षत्व की ओर बढ़ाना ही "योग" है। ईश्वर से मिलाने में योग ही भक्ति और ज्ञान का प्रधान साधन है। चित्र वृत्तियों का निरोध ही योग है।

"योग" की व्यापकता----

"योगाश्चितवृत्ति निरोध:"
 यद्यपि उपलब्ध योग सूत्रों के रचयिता महर्षि पतञ्जलि माने जाते हैं परंतु योग पतञ्जलि से भी प्राचीन आध्यात्मिक प्रक्रिया है। विभिन्न सहिंताओं, ब्राह्मणों, उपनिषदों स्मृतियों, में इसका विवेचन उपलब्ध है। योग अत्यंत व्यापक विषय है। वेद, उपनिषद, पुराण रामायण, महाभारत, आयुर्वेद, अलंकार आदि कोई भी ऐसा शास्त्र नहीं है जिसमें "योग" का उल्लेख ना मिलता हो।

"योग" शब्द की उत्पत्ति---

 योग संस्कृत की मूल धातु "युज" से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना, संलग्न करना अथवा मिलाना यानि इस लोक की आत्माओं का परमात्मा से मिलन, उस परम शक्ति ईश्वर से एकाकार होने की प्रक्रिया ही "योग" है।

"योग" शब्द का स्त्रोत----

 योग का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि सनातन धर्म में सृष्टि पर वेदों की उत्पत्ति का है। श्रीमदभगवत गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्टतया यह कहा है कि उन्होंने स्वयं योग का रहस्य सबसे पहले आदि देव सूर्य भगवान को सुनाया था। फिर सूर्य देव ने यह विद्या मनु (आदि पुरुष) को दी थी। तत्पश्चात यह हस्तांतरित होते हुए इक्ष्वाकु वंश के राजाओं तक पहुँची, जिन्होंने इसका हर प्रकार से संरक्षण किया। इसका प्रमाण निम्न श्लोक है,

 इम विवस्ते योगं प्रोक्तावानहमव्ययम।
 विवस्वान मनवे प्राहमनुरक्क्षितवाक्वेब्रवीत।।
(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4-श्लोक 1)

अर्थात हे अर्जुन योग के इस रहस्य को सर्वप्रथम मैंने सूर्य को कहा, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
 इस प्रकार योग के प्रथम रचयिता तो स्वयं श्री कृष्ण भगवान ही है।

 "हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता: नान्य: पुरातन:"

 हिरण्यगर्भ (श्री विष्णु या श्री कृष्ण) से पौराणिक इस ग्रंथ का कोई और रचयिता नहीं है अर्थात हिरण्यगर्भ ही इस योग के जन्मदाता है।

योग का संप्रत्यय----


योग वास्तव में अपने आप में अनूठा है जो केवल शरीर से संबंधित तत्व नहीं है। योग का अर्थ 'जोड़ना' है। 'जोड़ना' यानी अधिकाधिक गतिविधियों में खुद को 'जोड़ना' या संलग्न करना और अधिकाधिक कर्मों में, अधिकाधिक वैशिष्ट्य में, शून्य में, बुद्ध तत्व में, ज्ञान में, वैराग्य में, चिंतन में, ब्रह्म आदि में स्वयं को जोड़ना। योग का अर्थ इतना सरल नहीं है। पूरा जीवन भी लग सकता है इसे समझने में, जानने में, आचरण करने में, सर्वोच्च सत्ता के बारे में जानने में और उसी के साथ एकाकार हो जाने में, (समाधि) यानी "पूर्णत्व" को प्राप्त कर लेना योग है।
फिर भी सांसारिक अर्थो में इसके भाव को जानने का प्रयास करते हैं। इसकी उत्पत्ति और उत्तरोत्तर विकास कैसे हुआ ? योग का महत्व आदि।


योग और महर्षि पतञ्जलि----


 योग दर्शन के आदि आचार्य हिरण्यगर्भ है। 'हिरण्यगर्भ' (यह यह ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है) के सूत्रों के आधार पतञ्जलि मुनि ने "योग दर्शन" का निर्माण किया था। योग दर्शन के 4 पाद हैं और 195 सूत्र हैं।

इन चारों में प्रत्येक प्रकार के मनुष्यों के मस्तिष्क में उठने वाले प्रत्येक प्रश्न का उत्तर, मन की, चित्त की विभिन्न अवस्थाओं आदि का वर्णन विस्तार से मिलता है।
ये चार पाद हैं---

 1 समाधिपाद---
प्रथम समाधिपाद में समाधि के रूप तथा भेद, चित्त एवं उसकी वृतियाँ इनका वर्णन है। "योग: चित्त-वृत्ति निरोध:" इस पाद में योग के लक्षण बताए गए हैं। तदन्तर समाधि का सविस्तार निरूपण किया गया है। इसलिए इस प्रथम पाद को समाधिपाद कहते हैं। इसकी सूत्र संख्या 51 है।

 2 साधन पाद---
 इस द्वितीय पाद को बाद में क्रिया योग, क्लेश तथा अष्टांग योग वर्णित है। द्वितीय पाद में व्युत्थित चित्त को समाहित करने हेतु "तप: स्वाध्याय" और "ईश्वर प्रणिधान" रुप में क्रिया योग के द्वारा यम-नियमादि पाँच साधनों को बताया गया है। इस पाद में सूत्र संख्या 55 है।

3 विभूति पाद---
इस पाद में धारणा, ध्यान और समाधि के अनंतर योग के अनुष्ठान से उत्पन्न विभूतियों का वर्णन है। तृतीय पाद में 'धारणा', 'ध्यान' और 'समाधि' रूप तीन अंतरंग साधनों को बताया गया है। इन साधनों से अवतान्तर फलों के रूप में अनेक विभूतियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए इस पाद को विभूति पाद कहा गया है।
 इस पाद में सूत्र संख्या 55 है।

4 कैवल्य पाद---
चतुर्थ कैवल्य पाद में समाधि, सिद्धि, विज्ञान वाद, निराकरण और कैवल्य का निर्णय किया गया है। चतुर्थ पाद में जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि से प्राप्त होने वाली पाँच सिद्धियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। तदनंतर प्रस्तुत शास्त्र का मुख्य प्रयोजन "कैवल्य" प्राप्ति बताई गई है। इसलिए इस पाद को कैवल्य पाद की संज्ञा प्रदान की गई है। इस पाद में सूत्र संख्या 34 है।

 योग प्राप्ति और साधन विमर्श---

 योग का स्वरूप जानने के पश्चात उसकी प्राप्ति के 'साधन' के विषय में जिज्ञासा होती है। अतः योग सूत्र में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। योग सूत्र में ऐसा कोई प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर प्राप्त न हो पाए। यह ग्रंथ बहुत विशाल है। सभी प्रकार के प्राणियों का, उनकी चित्त वृत्तियों का, उनकी विभिन्न मानसिकताओं का, उनकी विभिन्न परिस्थितियों, विषयक विभिन्नता आदि का बहुत ही सटीक, प्रामाणिक, वृहद वर्णन प्राप्त होता है। प्रत्येक विषय वस्तु पर बहुत ही गहनता से अन्वेषण के द्वारा ही विश्लेषण किया गया है। इनमें से प्रमुख हैं--

1 चित्र विमर्श।
2 वृति विमर्श।
3 निरोध विमर्श।
4 युग भेद विमर्श।
(इसमें योग के दो भेद बताए गए हैं- संप्रज्ञात योग और असंप्रज्ञात योग)

 5 योग प्राप्ति साधन विमर्श।
(इसके भी आगे दो उपभेद हैं उत्तमाधिकारी तथा मध्यमाधिकारी योग प्राप्ति साधन। इसके पश्चात इन दोनों के लिए जो उचित मार्ग है उसका भी विस्तार से वर्णन मिलता है, जैसे उत्तमाधिकारी हेतु "अभ्यास वैराग्य" और मध्यमाधिकारी हेतु "क्रिया योग"।)

 6 विभूति विमर्श।
 7 कैवल्य विमर्श।

इन सभी विषयों के माध्यम से योग का जीवन में स्थान, उसका महत्व, जीवन का लक्ष्य, मोक्ष प्राप्ति आदि अन्य विषयों के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है।

योग के आठ अंग (अष्टांग योग)----
वर्तमान समय में "योग" के पर्याय के रूप में महर्षि पतञ्जलि के योग सूत्र एवं योग दर्शन को ही मान्यता प्राप्त है। इसीलिए हम उन्हीं का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं

 अष्टांग योग के माध्यम से महर्षि पतञ्जलि ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत ही सुंदरता से तन-मन से स्वस्थ रहने के लिए उपाय बताए हैं। क्योंकि एक स्वस्थ तन में ही एक स्वस्थ मन का निवास होता है। इसलिए सबसे पहले अपने तन को स्वस्थ रखना चाहिए, और जहाँ तक की मन की बात आती है तो मन एक बहुत बड़ा कार्यवाहक है, शरीर को चलायमान करने के, लिए दिशा देने के लिए। यह आम व्यक्ति के लिए कुछ अलग हो सकता है परंतु जो दार्शनिक हैं, आध्यात्मिक व्यक्ति हैं, योगी हैं उनके लिए मन एक बहुत बड़ा विषय है, जिसे अपनी इंद्रियों के वश में करना है और उसे उचित दिशा की ओर अग्रसर करना है। इसीलिए इन सभी के लिए अष्टांग योग का वर्णन किया गया है, जिसमें प्रत्येक स्तर के मनुष्य के लिए हर शारीरिक, व मानसिक गतिविधि है। यह एक यात्रा के समान है जो शरीर से प्रारंभ होकर ईश्वर तक पूर्ण होती है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसमें कितने स्तर प्राप्त कर पाते हैं, कितनी लंबी यात्रा तय कर पाते हैं, वर्णन तो यहाँ "पूर्णता" (समाधि) तक है।

 योग के आठ अंगों (अष्टांग योग) के अनुष्ठान से अशुद्धियों का (तन और मन) नाश हो जाता है, ज्ञान की प्राप्ति होती है, विवेक बढ़ता है, धार्मिकता, नैतिकता में आस्था हो जाती है, आचरण शुद्ध हो जाता है, आत्मा पवित्र हो जाती है, निर्मल विचारों का आगमन होने लगता है, शुद्ध, सात्विक व्यवहार को प्रोत्साहन मिलता है, ईश्वर की सार्वभौमिक उपस्थिति की अनुभूति होने लगती है। कण-कण में, हर जीवंतता में ईश्वर की उपस्थिति दिखाई देने लगती है, 'उसकी' बनाई हर सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज में भी जीवन दर्शन होने लगता है, सर्वोच्च सत्ता को समझने का प्रयास करने लगता है, संसार से अलगाव आरंभ हो जाता है और अंत में आत्मा को समझने का प्रयास करते हुए, ईश्वर को समझने का प्रयास करते हुए, व्यक्ति इस संसार की असलियत को जानने के बाद, उस सर्वोच्च शक्ति में ही एकाकार हो जाता है। यह अवस्था 'समाधि' कहलाती है।
 यह अटल सत्य है कि इस चरण तक बहुत ही कम लोग पहुँच पाते हैं। यह अटल, अकाट्य सत्य है। स्वामी विवेकानन्द जी ने यह अवस्था प्राप्त कर ली थी। हमारे पौराणिक ऋषि मुनियों में महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण हेतु अपनी अस्थियों का दान करने के लिए 'समाधि' को का आत्मसात किया था।

योग के आठ अंग निम्न हैं--

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, तथा समाधि।

संस्कृत भाषा, योग (पतञ्जलि) और गीता का संबंध

हमने पतञ्जलि योग के बारे में पढ़ा और जाना। हमने देखा कि जो भी ज्ञान हमें प्राप्त है, उसका साधन "संस्कृत भाषा" है। हमारे हिंदू धर्म में जितने भी ग्रंथ हैं, श्रुतियाँ, वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण, काव्य, महाकाव्य, स्तुतियाँ आदि सब संस्कृत भाषा में है। इस प्रकार संस्कृत भाषा एक सेतु का काम करती है। संस्कृत भाषा ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार में आमजन के लिए सेतु का काम सदियों से करती आ रही है और अब तक कर रही है। पौराणिक काल में संस्कृत जन-जन की भाषा हुआ करती थी। परंतु समय बीतने के साथ यह सीमित होती गई, और आज यह बहुत ही सिमट कर रह गई है। इसीलिए इन्हीं ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए इन सब का हिंदी में अनुवाद किया गया, टीकाएँ की गई ताकि आम जन तक इस ज्ञान को पहुँचाया जा सके। इसीलिए संस्कृत तो हमारी धरोहर है, जो हमारे इतिहास को, हमारी पहचान को, हमारे आर्यव्रत भारत को सहेज कर सदियों से रखे हुए हैं, और आगे भी यह प्रयत्नरत है। इसलिए संस्कृत का कोई पर्याय नहीं है। यह अपने आप में अनेक भाषाओं की जननी है। पौराणिक और देवभाषा होने के साथ-साथ यह एक प्रामाणिक, वैज्ञानिक भाषा भी है। संस्कृत भाषा के शब्द आगे पीछे होने पर भी सामान्यतः उनका अर्थ नहीं बदलता है। सरकार भी संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही है, एवं इसे मान्यता दे रही है ताकि हमारा भारतवर्ष पुन: उसी स्थान पर स्थापित हो जहाँ पर वह पहले था, क्योंकि जितना ज्ञान, जितना साहित्य (चाहे वह किसी भी भाषा में हो किसी भी विषय पर हो), जितनी संस्कृति, जितनी विविधता, जितने संस्कार, जितने मानवीय मूल्य, जितनी नैतिकता, जितनी धार्मिकता, जितनी वैश्विकता, भारत में है, वह कहीं नहीं क्योंकि हमारा अनादि काल से यही नारा रहा है, यही पहचान रही है कि

"अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम"।।
(महोपनिषद, अध्याय 4 श्लोक 71)

"सर्वे भवंतु सुखिना: सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दु:ख भाग् भवेत्"

 यह हमारी संस्कृति की पहचान है जिसमें जाति-पाति का भेदभाव, किसी अमीर गरीब का भेदभाव, लिंग का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। अपितु हमारे यहाँ तो न केवल सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा की बात की गई है, अपितु वनस्पति की, अंतरिक्ष आदि की शांति की भी बात की गई है जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है हमारा शांति पाठ----

"ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:"॥

 यह प्रार्थना पूरी पृथ्वी के लिए है, पूरे अंतरिक्ष के लिए पूरी मानव जाति के लिए, इस पृथ्वी पर जितने भी जीव है जलचर, नभचर, थलचर, 84 लाख योनियों के जीवों के कल्याण की बात की गई है, और हम सभी को यह सब संदेश संस्कृत भाषा के माध्यम से प्राप्त हो पाया है। इसलिए संस्कृत हमारी पहचान है। यह हमेशा से ही हमारे लिए आदरणीय थी, आदरणीय है और आदरणीय ही रहेगी।

अब हम बात करते हैं श्रीमद्भगवद्गीता की। यह ग्रंथ भी सभी ग्रंथों की तरह संस्कृत भाषा में ही है। इसमें सभी प्रकार के योगों का वर्णन है। यह एक सार्वकालिक ग्रंथ है। यदि हम यह कहें कि पतञ्जलि के योग का यदि कोई पूरक ग्रंथ है, तो वह है श्रीमद्भगवद्गीता। क्योंकि पतञ्जलि सूत्र और योग दर्शन, अष्टांग योग के जितने भी सूत्र हैं उनको श्रीमद भगवत गीता के श्लोकों के द्वारा आधार प्रदान किया गया है, एवं उन्हें पूरक के तौर पर सबल आधार प्रदान करने के लिए प्रयोग में लाया गया है। यदि हम महर्षि पतञ्जलि योग के पूरक ग्रंथ के रूप में श्रीमद भगवद गीता का नाम लेते हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
श्रीमद्भगवद्गीता एक सार्वकालिक ग्रंथ है। यह अनुपम है क्योंकि इस अकेले ग्रंथ में इतनी विविधता है, कितने ही विषयों का समावेश है जैसे ज्ञानयोग, भक्ति योग, वैराग्य योग, दर्शन योग, सांख्ययोग, उपासना योग आदि। यानी एक पूर्ण ग्रंथ जो पूर्णतया प्रमाणिक है।

 श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संस्कृत भाषा में वर्णित हैं। योग दर्शन की पूर्ण एवम् विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए गीता का आश्रय लिया जा सकता है।

गीता में वर्णित 18 अध्यायों में विभिन्न प्रकार के योग

 1 अर्जुन विषाद योग अध्याय 1
 2 सांख्ययोग अध्याय 2
 3 कर्मयोग अध्याय 3
 4 ज्ञान कर्म संन्यास योग 4
 5 कर्म सन्यास योग अध्याय 5
 6 आत्म संयम योग अध्याय 6
 7 ज्ञान विज्ञान योग अध्याय 7
 8 अक्षरब्रह्मयोग अध्याय 8
 9 राज विद्या राज गुहा योग अध्याय 9
 10 विभूतियोग अध्याय 10
 11 विश्वरूप दर्शन योग अध्याय 11
 12 भक्ति योग अध्याय 12
 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञविभाग योग अध्याय 13
 14 वित्त विभाग योग अध्याय 14
 15 पुरुषोत्तम योग अध्याय 15
 16 देवासुर संपद विभाग योग अध्याय 16
 17 श्रद्धा त्रय विभाग योग अध्याय 17
 18 मोक्ष सन्यास योग अध्याय 18

 गीता एक बहुत ही गूढ़ ग्रंथ है। चाहे वह वैचारिक दृष्टि से हो, आत्मिक दृष्टि से हो, व्यावहारिक दृष्टि से हो, धार्मिक दृष्टि से हो, अलौकिक दृष्टि से हो, ज्ञानरूपी दृष्टि से हो, प्रेम और समर्पण रूपी दृष्टि से हो, किं बहुना किसी भी दृष्टि से यह ग्रंथ अलौकिक है, अनुपम है, सार्वकालिक है। संस्कृत भाषा में योग की उपस्थिति हर ग्रंथ में उपलब्ध होती है। यह बात हम पूर्व में भी कह चुके हैं। वर्तमान समय में या पौराणिक काल में भी कर्म पर आधारित योग पर बल दिया गया है, क्योंकि किसी भी शक्ति को (शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक) प्राप्त करने के लिए "कर्म" सभी प्रकार के जीवों के लिए अवश्यंभावी है। भगवान के श्री कृष्ण ने यही कहा है कि


"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि"॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

इस श्लोक का अर्थ है: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भगवद्गीता के सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है, जो कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)



 कर्म योग का संस्कृत में इससे अच्छा उदाहरण हमें प्राप्त हो ही नहीं सकता क्योंकि यह साक्षात श्री कृष्ण जी की वाणी है।
 तो दूसरी ओर कवि केशव प्रत्येक जाति के लिए स्वयं यानी अपने-अपने पद, अपने बल, अपने सामर्थ्य के अनुसार सभी को कर्म योग करना अपरिहार्य बताते हैं--


"सुगम सरल तर रूचिर विचार द्वारा,
 जीवन कली को बन पवन खिलाती गीता।

 ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारों वर्ण मित्र,
 सबको "स्वकर्म" हितकर है बताती गीता"।

 इसलिए हम सभी को निष्काम भाव से अपने कर्म का निर्वाह करना चाहिए। इसी प्रकार एक कर्म योगी ईश्वर की ओर से आए हुए सारे कर्तव्य को भली-भांति करता हुआ भी अंदर से अलग रहता है क्योंकि वह जानता है कि यह संसार मिथ्या है और असली तत्व शरीर नहीं, अपितु उसमें निवास करने वाली आत्मा हैऔर ये आत्मा अजर, अमर है।
यथा


"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही" ॥

(अध्याय 2 श्लोक 22)


भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है॥

"नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत" ॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23)

इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)


इसमें योगशास्त्र के "कैवल्य" की बात समाहित है।

"हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:"॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 37)

इस श्लोक का अर्थ है: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे... इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो। (यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने वर्तमान कर्म के परिणाम की चर्चा की है, तात्पर्य यह कि वर्तमान कर्म से श्रेयस्कर और कुछ नहीं है।

प्रस्तुत श्लोक में कर्मों के विभिन्न प्रकार तथा उनकी गति का वर्णन किया है। इस संसार में अपने कर्म योग का निर्वाह विभिन्न क्षेत्र में लोग, विभिन्न प्रकारों से, विभिन्न मानसिकता, विभिन्न कारणों से करते हैं इसका वर्णन किया गया है।

 इस प्रकार हमने कुछ उदाहरण देकर स्पष्ट करने का प्रयास किया कि जब 'कर्म योग' होगा तभी अन्य योग संभव हो पाएंगे।
श्री कृष्ण जी कहते हैं कि कर्म सन्यास और कर्म योग यह दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं परंतु उन दोनों में भी कर्म सन्यास से कर्म योग साधना में शुभम होने से श्रेष्ठ है, यानी कर्म योग अन्य सभी प्रकार के योग का साधन है। कोई भी अन्य प्रकार का योग कर्म योग के बिना असंभव है।

और अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि 'कर्मयोग' के द्वारा ही सभी कुछ संभव है। योग किसी भी प्रकार का हो जीवन को स्वस्थ, सुंदर, सात्विक, उन्नत, प्रगतिशील एवं सार्थक बनाता है। इसलिए निरंतर कर्मशील रहते हुए अंत में मोक्ष प्राप्त करने के लिए, ईश्वरीय सत्ता में एकाकार होने के लिए अंतिम परिणति को प्राप्त करने के लिए, समाधि, मोक्ष की आवश्यकता है। इसलिए श्रीमद भगवत के यह दो श्लोक जो हमारी आस्था के परिचायक है और भगवान की भगवान की उपस्थिति का परिचय देते हैं, हमें पूर्णता की ओर अग्रसर करते हैं।


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)

इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूँ अर्थात अवतार लेता हूँ।


परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 8)

इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूँ।


और अंत में सबसे यही कहना चाहूँगी कि - करो योग, रहो निरोग। जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्।

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