पर्या-दर्शन*: पर्यावरणीय समस्या पर गहन चिंतन

चंद्र मोहन भण्डारी

जनता के जीवन के संवेदन-सत्यों के चित्रों से

तथ्यों के विश्लेषण-संश्लेषण बिम्बों से

बनाकर धरित्री का मानचित्र

दूर क्षितिज-फलक पर टांग जो देता है

वह जीवन का वैज्ञानिक, यशस्वी कार्यकर्ता है

मनस्वी-क्रांतिकारी वह।

                    -   गजानन माधव मुक्तिबोध

[प्रस्तुत लेख में पर्या-दर्शन को को फ़िलॉसफी (eco-philosophy) के समानार्थक लिया गया है जो अधिक सुगम और सहज जान पड़ता है; साथ ही पर्या का पर्यावरणीय के स्थान पर प्रयोग किया जाना भी सुविधा एवं सरलता के लिये है।]

जीवन का वैज्ञानिक

एक शिक्षक के रूप में विज्ञान की शिक्षा देते कई बार ऐसे मौके आते रहे जब लीक से हटकर छात्रों से गुफ्तगू का अवसर मिला करता, और तब एक प्रश्न जो अक्सर सामने आता, वह था: विज्ञान की सही व सार्थक परिभाषा क्या है? निश्चय ही वस्तुपरकता, विश्लेषण-विधि का प्रयोग, प्रायोगिक सत्यापन इसके आवश्यक अंग हैं। लगभग इन्हीं पर आधारित अनेक परिभाषाएँ देखने-सुनने को मिलती हैं जो अपनी जगह सही और उपयुक्त भी हैं। पर जिस परिभाषा ने मुझे विशेष प्रभावित किया वह मुक्तिबोध रचित कविता में है जो पू्री बात कह देती है। पूरी बात- क्योंकि [क] इसमें विश्लेषण और संश्लेषण दोनों को ही बराबर का महत्व दिया गया है [ख] बात केवल सत्यों की नहीं, संवेदन-सत्यों की है और [ग] जीवन का वैज्ञानिक, जिसका जिक्र हुवा है जीवन एवं जीने की प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। जीव एवं उसके पर्यावरण के जिस संदर्भ में हम बात करने जा  रहे है इस लेख में, यह सभी बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

विश्लेषण: विज्ञान-विधि का आधार

विश्लेषण या एनालिसिस: किसी वस्तु या निकाय को इस विधि द्वारा समझने में हम पहले उसे अलग खंडों या भागों में विभक्त करते हैं और तब हर भाग का विस्तार से अध्ययन करते हैं। मशीनों की कार्यविधि का यह अविभाज्य अंग है मशीन के अलग-अलग हिस्सों का बारीकी से अध्ययन और रख-रखाव जरूरी है और उसमें खराबी आने पर यह जानने का प्रयास होता है कि किस पुर्जे में समस्या है जिसे ठीक करने की जरूरत होगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक विज्ञान की जो शुरूवात लगभग चार सौ साल पहले हुई थी उसकी सफलता में विश्लेषण-विधि की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इस विराट सफलता ने विज्ञानेतर अनुशासनों पर भी अपना प्रभाव दिखाया और अर्थशास्त्र, राजनीति जैसे अनुशासनों को विज्ञान-विधि के अंतर्गत लाने का प्रयास किया। दार्शनिक-गणितज्ञ देकार्त का विचार था कि भौतिक जगत की घटनाएँ विज्ञान के दायरे में आती हैं।  अन्य बातें जिसमें सामान्य जीवन व  मन से जुड़ी बातें शामिल हैं इस दायरे से बाहर हैं दूसरे दायरे में, जिसे समाज-विज्ञान का नाम दिया गया। यह बात तब भले सही रही हो पर आज विज्ञान ने मस्तिष्क और मन को समझने में जो सफलता हासिल की है उसने यह तो साबित कर ही दिया कि मन की बातों से विज्ञान को पूरी तरह अछूता रखना एक भूल ही होगी। जहाँ तक भौतिक जगत का सवाल है विज्ञान की पकड़ से पूरी तरह कुछ अछूता नहीं पर कुछ अनुशासन ऐसे भी थे जो विज्ञान के निकट होते भी शत-प्रतिशत उन्हीं मानकों से संचालित नहीं होते जो भौतिक जगत के लिये सही हैं। जीवित निकाय इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। वनस्पतियां, जीव-जंतु निश्चय ही जीवित निकायों में गिने जाते हैं।

विश्लेषण-संश्लेषण दोनों ही

मानव शरीर की बात करें। विश्लेषण विधि के अनुसार शरीर को उसके विभिन्न अवयवों में बांटकर  

अध्ययन करते हैं जिसके प्रमुख हिस्से हैं मस्तिष्क, ह्रदय, फेफड़े, गुर्दे, पाचन-तंत्र आदि। किसी विशेष हिस्से के साथ समस्या होने पर उस दिशा में उचित समाधान का प्रयास करना होता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने इस आधार पर बहुत प्रगति की है जो आज भी जारी है। पर साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिये कि शरीर मात्र मशीन की तरह न होकर उस से अलग है वह मात्र कुछ अवयवों का समूह मात्र न होकर एक जीवंत इकाई है और उसके विकास में एक सर्वागीण या समग्रात्मक नजर होना जरूरी है और उस संदर्भ में मन की भी अपनी भूमिका है। देह-मन के इस निकाय में विश्लेषण व संश्लेषण दोनों की अपनी भूमिका है और दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। मानव कुछ अंगों का जोड़ मात्र न होकर एक प्रक्रिया है जिसकी कार्यविधि में शारीरिक एवं मानसिक सभी गतिविधियां शामिल हैं। हर बात का विश्लेषण करना संभव नहीं यानि उन्हें खंड-खंड नहीं बांट सकते। आनंद की अनुभूति या पीड़ा इस तरह विभाजित नहीं हो सकती। कुछ इसी आधार पर मन:कायिक रोगों (psychosomatic diseases) एवं संबंधित चिकित्सा की बात पर बल दिया जाता रहा है जो अंतरविषयी क्षेत्र (interdisciplinary area) है जिसमें शारीरिक एवं मानसिक प्रक्रियाओं के आपसी संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

जैव-मंडल या बायोस्फीयर  

हमारी धरती और उसका सम्पूर्ण वायुमंडल जैव-मंडल कहलाता है जो अपनी अनेक विशेषताओं के कारण धरती पर जीवन के लिये जिम्मेदार माना जाता है। कुछ विचारक मानते हैं कि जैव-मंडल स्वयं एक जीवित निकाय की तरह है और उसे इसी रूप में लेना चाहिये। दरअसल जीवन की जब बात होती है तब दो बातें महत्वपूर्ण होती हैं पहला है द्रव्य एवं ऊर्जा का नियमित नियंत्रित प्रवाह, जो एक बिंदु पर आरंभ होता है समय के साथ विस्तार करता है और अपने उत्कर्ष पर पहुंच कमजोर पड़ने लगता है और अंतत: समाप्त हो जाता है। आरंभ यानि जन्म, उत्कर्ष यानि युवावास्था और समाप्त्ति यानि मृत्यु। किसी सरिता या एक चक्रवाती तूफान के बारे में हम यह कह सकते हैं। दूसरी बात जीवन के संदर्भ में जो महत्वपूर्ण है वह है प्रतिकृति बनाने की क्षमता। जीवित निकाय अपनी प्रतिकृति बना सकता है। दोनों बातें जीव-जगत में मौजूद हैं और वे पूरी तरह जीवन की  दोनों शर्तें पूरी कर सकते हैं।

जैसा पहले चर्चित हुवा है जीवन की पहली शर्त द्रव्य-ऊर्जा के संतुलित प्रवाह से संबंधित है और इस मायने में सरिता, पृथ्वी या जैव-मंडल ऊर्जा प्रवाह को चित्रित करते हैं। इसी संदर्भ में धरती और जैव-मंडल को जीवित निकाय के रूप मे लिया जाता है। ग्रीक पौराणिक साहित्य में गाया ( Gaia or Gaea ) की परिकल्पना सदा से महत्वपूर्ण मानी जाती रही जिसमें  धरती का वैयक्तीकरण कर उसे जीवंत माना गया है और उसे धरती के सभी जीवों के लिये मातृरूप लिया गया है। भारत में और अन्यत्र भी उसे मातृ रूप लेने की परम्परा भी यही दर्शाती है।

माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या

-         अथर्ववेद

ज पर्यावरण की चर्चा हर कहीं जोर-शोर से से होती दीखती है। इसका आरंभ दर्शन के स्तर पर संभवत: अरस्तू (अरिस्टोटल) के समय में हो चुका था लगभग २३00 साल पहले, पश्चिमी जगत में पहली बार जीव-जगत की आपसी निर्भरता की चर्चा हुई थी जिसके संकेत भारतीय पौराणिक संदर्भों में भी मिलते हैं।  सांख्य-दर्शन में भौतिक जगत को विशेष स्थान दिया गया जिसे प्रकृति कहते हैं। सृष्टि प्रकृति और पुरुष  से निर्मित हुई है प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन को दर्शाते हैं जिनसे मिलकर सृष्टि अस्तित्ववान हुई है। प्रकृति की क्रियाओं को संचालित व नियंत्रित करने वाले तीन गुण – सत्व, रजस और तमस हैं। अगर गौर से देखें तो तमस को द्रव्यमान के तुल्य लिया जा सकता है जो विज्ञान में जड़त्व यानि inertia को दर्शाता है रजस गति या ऊर्जा का प्रतीक है और सत्व वह सिद्धांत है जिसके आधार पर विश्व-प्रक्रियाएँ संचालित होती हैं। इस तरह सांख्य-दर्शन किसी सीमा तक वैज्ञानिक द्दष्टिकोण के निकट प्रतीत होता है।

द्रव्य, ऊर्जा और उनके बीच होने वाली प्रक्रियाएँ ही धरती पर जीवन का आधार हैं यह बात आसानी से समझ आ जाती है। इसके लिये जिस भौतिक परिवेश की आवश्यकता है वह जैव-मंडल यानि बायोस्फीयर प्रस्तुत करता है। एक और चीज जरूरी है सूर्य से  प्राप्त ऊर्जा का नियंत्रित प्रवाह। यह नियंत्रित प्रवाह वायुमंडल की जिम्मेदारी है जो पृथ्वी के चारों ओर लगभग ४00  कि मीटर तक फैला है। ऊपरी भाग यानि लगभग ८0 कि मीटर के बाद का वायुमंडल अत्यंत विरल है और सूर्य की पराबैंगनी किरणों के कारण आयनित अवस्था में है जिसे आयनमंडल या आयोनोस्फीयर कहते हैं। यह आयनमंडल ही है जिसके कारण रेडियो तरंगें परावर्तित होकर धरती पर लौट आती हैं और रेडियो प्रसारण के लिये उपयोगी हैं। वायुमंडल का दूसरा महत्वपूर्ण घटक ओजोन परत है  जो धरती के ऊपर १५ से ३५ कि मीटर पर  स्थित है और सूर्य से आने वाली हनिकारक पराबैंगनी किरणों का अधिकांश अवशोषित कर लेती है।

बात पर्यावरण-प्रदूषण की

औद्योगीकरण और बढ़ती आबादी ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक यह संकेत देना आरम्भ कर दिया था कि जैव-मंडल की स्व-नियंत्रित साम्यावस्था प्राप्त कर सकने की क्षमता का सीमांत लगभग आ पहुंचा और अगर औद्योगीकरण सहित अन्य मानव संचालित कार्यों की रफ्तार वैसी ही बनी रही तब संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। घनी आबादी और प्रदूषण वाली जगहों पर लोगों की स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों में अत्यधिक वृद्धि ने प्रदूषण से होने वाले खतरों से आगाह करना आरम्भ कर दिया।

नतीजा यह हुवा कि इस विषय पर चर्चाएँ, गोष्ठियां, सम्मेलन आम हो गये पर जमीनी हकीकत में कोई ठोस  कार्यवाही देखने को नहीं मिली। निकट भविष्य में भी इस दिशा में वैश्विक या राष्ट्रीय स्तर पर कुछ विशेष संभावना नहीं नजर आती और इसका कारण समझना कठिन नहीं। हम क्यों न अपने देश की ही बात करें। भविष्य की बात क्यों हो जब ‘आज’ ही समस्या से ग्रसित हो चुका है। अपने देश की राजधानी में वायु प्रदूषण अक्सर खतरे के स्तर से ऊपर पहुंच जाता है। जल का हाल भी अच्छा नहीं और हम कौन सा कदम उठाने जा रहे हैं जो हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त कर सके? क्या हम छोटी-बड़ी हजारों औद्योगिक इकाइयों को बंद कर सकेंगे? क्या हम अनधिकृत रूप से काम कर रही इकाइयों पर भी कोई कार्रवाई कर सकेंगे?

दिल्ली में २०१९ के अंतिम महीनों में हुए भीषण अग्निकांड में उतना नुकसान न होता अगर औद्योगिक इकाइयों के लिये स्वीकृत सामान्य दिशा-निर्देशों का आंशिक पालन भी हो पाता। यह स्थिति कमोबेश अन्य नगरों पर भी लागू होती है। इस समस्या का समाधान तो दूर की बात हमारे नेतृत्व को इन बातों से कोई खास लगाव है भी नहीं। हमें जीने के लिये आज भर का सोचने की सामर्थ्य है कल तो अभी दूर ही लगता है। कल से पहले आज सामने जो खडा है मुंह बाये।  यही बात राजनीति से जुड़ी पार्टियों के लिये भी सही है कल की चिंता में आज को वे नहीं बिगाड़ना चाहते। बस आज उन्हें जो अपने अस्तित्व के लिये जरूरी लगता है वे केवल इतना ही देख और सोच पाते हैं। 

जरूरतों एवं आदतों का दुष्चक्र

मानव की विकास यात्रा की दशा और दिशा निर्धारित करने में जो सबसे महत्वपूर्ण घटक था और है वह है मानव-मन की बनावट और बुनावट। इस बनावट व बुनावट की खूबियां भी हैं और कमियां भी जिनका जिक्र पहले के  लेखों [१, २] में किया गया है जिसका केवल संक्षिप्त विवरण ही यहाँ देना संभव होगा। मानव मन की कार्यशैली में पैटर्न की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमारे संस्कार, आदतें एक प्रकार के पैटर्न हैं जो  हमारे कामों को आसान भी कर सकते हैं और मुश्किल भी। ये पैटर्न हमारा काम आसान कर देते हैं पर धीरे-धीरे यह मन को अपनी गिरफ्त में ले लेते है जिनसे बाहर निकलना कठिन हो जाता है। हमारी आधुनिक जीवन शैली के भी हम लती हो चुके हैं जैसे हम सदियों से उनके लाभ लेते रहे हों जबकि बात कुछ ही समय पहले की है जब औद्योगिक क्रांति ने मानव की सांस्कृतिक विकास यात्रा में दूसरी बार विराट परिवर्तन प्रस्तुत किया। पहला विराट परिवर्तन कृषि-क्रांति के साथ हुवा था।

लाखों वर्षों से मानव अपने इसी रूप में धरती पर विद्यमान है पर उसकी गतिविधियों ने प्रकृति के संतुलन को अधिक प्रभावित नहीं किया। लेकिन औद्योगिकीकरण के बाद केवल दो-तीन सदियों में हालात लगभग बेकाबू होते नजर आने लगे। थोड़े समय में ही मानव की नई जीवन शैली ने पर्यावरण को प्रभावित कर अपूर्णीय क्षति पहुंचाना शुरू कर दिया। लाखों, करोड़ों वर्षों में जो संतुलन बना रहा वह महज दो सौ सालों में डगमगाता दीखने लगा।

समय के साथ मानव की जरूरतों की फेहरिस्त लम्बी हो चुकी है और आबादी भी जिस रफ्तार से बढी है वह धरती के सीमित संसाधनों पर अनावश्यक दबाव बढ़ा रही है और जैव-मंडल के संतुलन को भी अवांछित रूप से प्रभावित कर रही है। सारी विश्व आबादी के लिये यह जीवन शैली सिद्धांत रूप मे मान्य होते भी उपलब्ध नहीं हो सकती। इसकी एक वजह तेजी से बढ़ रही उपभोक्ता संस्कृति भी मानी जा सकती है जिसे नियंत्रित करने का कोई तरीका खोज पाना लगभग असंभव लगता है। एक तरह का दुष्चक्र या कहें भूलभुलैया है जिसमें हम जानकर भी फंसते जा रहे हैं और चाहते हुए भी बाहर निकलने का रास्ता नहीं खोज पाते। यह बात सिर्फ आज या कल भर के लिये नहीं अपितु आने वाले दीर्घकाल के लिये है। हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जिन्हें जीवन जीने के लिये कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। आज मीडिया के प्रभाव से उपभोक्ता संस्कृति की तड़क-भड़क उन्हें भी देखने को मिलती है और खास कर किशोर मन को एक स्वप्निल संसार की ओर आकृष्ट करती है जो जमीनी हकीकत से दूर है और दीर्घ परिसर में कुंठा एवं तनाव का कारण बन जाता है।

पर्यावरणीय-दर्शन या पर्या-दर्शन

अब तक पर्यावरण की हमारी चिंता हमारे अपने हित के लिये रही है और चू्ंकि हमारा हित पर्यावरण के संरक्षण से जुड़ा है हमें सिद्धांत रूप में यह स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा है कि मानव की गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरूरत है। यह नियंत्रण स्वैच्छिक भी हो सकता है और अनिवार्य भी।

गहन पर्या-चिंतन बनाम सतही पर्या-चिंतन

पर्यावरण की चिंता महज इसलिये कि अत्यधिक प्रदूषण मानव के लिये हानिकर हो सकता है और उसे मानव की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नियंत्रित किया जाना है एक स्वार्थपूर्ण एवं सतही सोच है जबकि जरूरत इस बात की है कि पर्यावरण की रक्षा लगभग वैसे ही की जानी चाहिये जैसे किसी जीवित निकाय की। यह एक प्रकार का दर्शन है जो मानव एवं प्रकृति के रिश्ते की बुनियाद निर्धारित करता है। आर्ने नैस [३] ने गहन पारिस्थितिकी ( deep ecology) की इस द्दष्टि को विकसित किया जिसे हम गहन पर्या-चिंतन भी कह सकते हैं।  वारविक फाक्स [४] (Warwick Fox) ने प्रकृति के अनुभवों को आत्मसात कर एक नई पर्या-द्दष्टि के विकास पर बल दिया और उसे निजेतर पारिस्थितिकी (Transpersonal Ecology) या निजेतर पर्या-द्दष्टि की संज्ञा दी जिसे कई विचारकों ने निजेतर मनोवैज्ञानिक संदर्भों [५] के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया।

भारतीय संदर्भ में पर्या-द्दष्टि व पर्या-दर्शन

भारतीय सभ्यता के मूल तत्वों का विकास नगरों में नहीं अपितु दूरस्थ अंचलों में हुवा और इसीलिये किसी केन्द्रीय सत्ता का प्रभाव उनपर नगण्य ही था। यह बात ध्यान देने की है कि भारतीय चिंतन में विविधता को स्वीकृति मिलने का आधार भी यही है जो अन्यत्र नहीं दिखाई देता। दार्शनिक स्तर पर पर्या-चिंतन यहाँ के लिये स्वाभाविक था पर आधुनिक जीवन शैली के चलते उसपर भी अवांछित प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अंतर्राष्टृीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा व प्रतियोगिता ने रही सही कसर भी पूरी कर दी और न चाहते भी विकास की अंधी-दौड़ नें सबको शामिल होना लाजमी हो गया। यह हालात की मजबूरी बन चुका है। इस बात को गहराई से समझने का प्रयास करेंगे।         

अहिंसा पर आग्रह

गांधी जी के अप्रतिम प्रयोग – सत्य व अहिंसा के -  कम ही समझे जा सके, कुछ आंशिक रूप में सैद्धांतिक आधार पर स्वीकार  किये जा सके। पर जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो साफ लगता है कि यथार्थ के धरातल पर उनका असर नहीं के बराबर है। सिद्धांत रूप में अहिंसा को स्वीकृति देने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत बड़ी है पर आज अपने जीवन, समाज या देश में उसे लागू कर सकना लगभग असंभव है। मान भी लें कि कोई देश अहिंसा पर आग्रह को जमीनी हकीकत में लाने की कोशिश करता है तो उसकी अपनी आजादी भी खतरे में पड़ लायगी। यह एक तरह की अंतर्राष्ट्रीय मजबूरी है जिसका कोई निदान अभी नहीं दिखाई देता। इसका अनुप्रयोग गहन या निजेतर पारिस्थितिकी (deep or transpersonal ecology) के संदर्भ में आंशिक रूप में स्वीकृत हो सकता है और कुछ हद तक यथार्थ के धरातल पर भी। यह निश्चित है कि जो भी इस दिशा में पहल करेगा वह तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में पिछड़ जायगा।

गांधी जी इन बातों को न केवल समझते थे अपितु अहिंसा के मूल विचार को उन्होंने व्यापक संदर्भ में पहचाना था। पहले चर्चित गहन पर्या-द्दष्टि या निजेतर पर्या-दर्शन की ही तर्ज पर उनका अहिंसा का व्यापकीकृत सिद्धांत उनके सामाजिक कार्यों के साथ चलता रहा था। इस संदर्भ में उनका कथन चर्चित हुवा था- प्राकृतिक-संसाधन हमारी जरूरतों के लिये पर्याप्त हैं पर हमारी लालसा पूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं (Nature has enough for our need but not so for our greed)। पहले गहन व निजेतर पर्या-दर्शन का जिक्र किया गया था उस कड़ी में अहिंसक पर्या-दर्शन भी जुड़ जाता है। नैस, फाक्स और गांधी से जुड़े तीन विचार – गहन, निजेतर एवं अहिंसक पर्या-दर्शन – उन आंदोलनों के जनक थे जिन्हें अलग-अलग नामों से लोगों ने सैद्धांतिक स्वीकृति तो दी पर उसपर चलने का न कोई रास्ता वे तय कर सके और न ही उनकी इच्छाशक्ति में वह दम दिखाई दिया। गांधी जी के साथ एक बात और भी थी कि भारत की आजादी और सांप्रदायिक सौहार्द जैसी ज्वलंत समस्याओं ने ही उनका सारा समय ले लिया। ऐसा नहीं कि पर्या-दर्शन को कभी उन्होंने अपने जीवन में नजरअंदाज किया हो या उसपर अपने स्पष्ट विचार साझा न किये हों पर  आजादी व साम्प्रदायिक सौहार्द्र जैसी विराट और ज्वलंत समस्याओं से निजात पाना उस समय ज्यादा जरूरी हो गया था।

 यही नहीं थी बापू पूरी पहचान तुम्हारी

सत्य अहिंसा के इतर अन्य मसलों की भी

व्यस्त तुम्हारे जीवन में आयी थी बारी।

पर्यावरण प्रदूषण बन गया एक चुनौती

सहज रूप में तुमने उसकी नींव रखी थी

कुदरत से भी ना हो हिंसा ऐसी तुमको सोच मिली थी

यह अर्थ गहन, यह भाव प्रखर

प्रदूषण जीवन के प्रति हिंसा ही है

यह गहन समझ निजेतर मंतव्यों में

जीव जगत के साथ जैव मंडल भी शामिल

ज्ञान निजेतर संबंधों का होना था आदर्श सभी का

पर है कितना अनुकरणीय

दौड भाग की इस दुनिया में कहना मुश्किल;

वह दर्शन, वह मंतव्य सत्य अहिंसा कठिन डगर

दूर दीखता कभी कभी धुंधला सा गंतव्य।

 

अक्सर प्रतीत होता है मुझको

यह सब एक विरासत सी है

अरे याद है हमें मनीषी आइंस्टाइन का कथन

 “कि वक्त में आने वाले लोग यकीन न कर पायेगे

जन्मा और चला था इस धरती पर तुमसा कोई’’।

 

( युगांतर अभिप्राय, सेतु पत्रिका, जुलाई २०१८ ) 

 

गांधी पारम्परिक संदर्भ में वैज्ञानिक नहीं थे इसके बावजूद यह पर्यावरणीय द्दष्टि किसी भी मायने में वैज्ञानिक द्दष्टिकोण से अलग नहीं मानी जा सकती। कुछ यही बात नैस और फाक्स के लिये भी कह सकते हैं. अंधाधुंध औद्योगीकरण का गांधी समर्थन नहीं करते थे और जिस ग्राम-स्वराज के वे पक्षधर थे वह आज भले ही अनुकरणीय न हो परन्तु दीर्घ परिसर में वह संभवत: एक स्वस्थ विकल्प प्रदान कर सकने में सक्षम है कुछ आवश्यक संशोधनों के साथ। अगर बात केवल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की ही हो तब जीवन से जुड़े मसले पूरी तरह परिभाषित नहीं हो सकेंगे, इसलिए सत्य की खोज के साथ जीवन से जुड़े संवेदनशील मसले भी साथ लेकर चलना होगा यानि बात संवेदन-सत्यों की हो तब बात पूरी हो सकेगी। यह पूरी बात गहन, निजेतर या अहिंसक पर्या-दर्शन से अंतरंग रूप से जुड़ जाती है।

अल्डुवस हक्सले के चर्चित उपन्यास ‘ द आइलैंड’ में एक यूटोपिया [६] यानि आदर्श समाज की कल्पना है  जो विज्ञान का पक्षधर है पर अधिक औद्योगीकरण का नहीं, सभी शिक्षित हैं पर विकास की अंधी दौड़ में शामिल नहीं। क्या यह सब गांधी के ग्राम स्वराज से मेल नहीं खाता? नाम उसे कु छ भी दें निजेतर या गहन या अहिंसक पर्या-दर्शन, इस दिशा में सार्थक प्रयास मानव के अपने हित में होगा। ऐसा न होने पर संभावित स्थिति रस्किन बान्ड [७] की नजर में:

देर हो चुकी कुछ करने के लिये

आबादी का प्रसार, जरूरतों का अंबार

धरती उतनी ही पहले जैसी;

कुदरत की फिक्र मत करो दोस्त

कुछ देर भले हो

वह खुद को फिर संभाल लेगी

इंसान के चले जाने के बाद।

 

* इकोलोजी के लिये हिंदी में समानार्थी शब्द है पारिस्थितिकी, इकोलोजिकल के लिये हमें

पारिस्थितिकीय शब्द का प्रयोग करना होगा; सरलता के लिये इको के स्थान पर पर्या शब्द 

लेने से पर्या-दर्शन को इको-फिलासफी के रूप में लिया गया है।


संदर्भ

[1] वी रामचन्द्रन, The Emerging Mind, Profile Books Ltd., 2003.
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु हिंदी, अक्टूबर 2019.
[3] Arne Naess,”The shallow and the deep, Long-range ecology movement”, Inquiry 16:95-100 (1973).
[4] Warwick Fox,”Transpersonal Ecology”, ’pychologising’ ecophilosophy, Journal of Transpersonal psychology, 22(1), 59 (1990).
[5] Ken Wilber, The Spectrum of Consciousness, M B Publishers Pvt Ltd, Delhi(2002),
Published by arrangements with Theosophical Pub House, USA (1977).
[6] Alduous Huxley, The Island, Harper and Row Publishers (1962).
[7] Ruskin Bond’s poem:
     Too late to do anything now/For we are too many and the earth is no bigger,
     Do gooders’ don’t sespair, Nature will repair her own/Long after we are dust.

सेतु, अक्टूबर 2020

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