व्यंग्य: पुण्य ‘सेल’ में मिल रहा है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

नियंत्रण के साथ मंदिरों के पट खुले तो आस्था लौट आई। भिखारी भी लौट आए। पेट बाँधने वाला उनका गमछा नाक-मुँह ढाँपने लगा। उनके पेट में भूख फिर पलने लगी। किसी जमाने में दर्शनार्थी उनके पास आकर कटोरे में चिल्लर डाल जाते थे। अब छः फीट की दूरी थी और घोर उपहास उड़ाने वाली आँखें भी। मनुष्य की दूसरे मनुष्य के प्रति ऐसी घृणा किसी काल में नहीं रही होगी। एक वक्त था प्रभु भक्तों को चरणों पर सिर टिकाने देते थे। कोरोनाकाल में प्रभु दूर से ही प्रणाम स्वीकारने लगे। प्रबंधकों को डर था कि कहीं कोई भक्त प्रभु को कोरोना चिपका गया तो कांटेक्ट ट्रेसिंग में प्रभु के साथ-साथ वे सब पकड़े जाएँगे। हमने पुण्य किए होंगे जो हमसे कोरोना नहीं चिपका। हाँ, जब कई भक्तों के ईर्ष्यालु पड़ोसियों को कोरोना निपटा गया तो उनकी प्रार्थनाएँ डबल हो गईं। पड़ोसीजी जाते-जाते भी इलाके को हॉटस्पॉट घोषित करवा गए। वे एक पॉजिटिव मोक्षमार्गी थे पर वे अपने परिवार, यार-दोस्तों, अड़ोसी-पड़ोसी सबको संदिग्ध बना गए थे।

कोरोनाकाल में किसी भी सिद्ध, अ-सिद्ध या प्रसिद्ध ज्योतिषी की भविष्यवाणियाँ सही नहीं निकलीं। बैठे ठाले और असमाप्त खालीपन के समय में मैंने भी अपनी कुंडली को गौर से देखा। सबसे पहले राहू को ढूंढा। वह कहीं भी बैठा हो, भले चीन जैसा भद्र दिखता हो, पर रहता नीच ही है। मैंने सोचा, मैं इस पतित को पावन कहूँगा तो वह दुष्टता नहीं करेगा। पर राहू ऐसा दुष्ट है कि उसे समझाने जाओ तो वह पाकिस्तान जैसा ज्यादा आतंकवादी बन जाता है। दुष्ट से दोस्ती करने जाओ तो भी वह दगाबाजी नहीं छोड़ता। दुष्ट होते ही दुष्ट हैं। फटा दूध खट्टा पड़ जाएगा, गटर में बह जाएगा पर काम कभी नहीं आएगा। राहू ऐसा ही निकला।

भगवान को हाथ जोड़कर, उन्हें अपना सारा विश्वास अर्पित कर मैं वापस आ रहा था तो पंडित जी मिल गए। परस्पर, घर के सब लोगों की कुशलक्षेम पूछी। मैंने पंडितजी के चरणों में अपनी कुंडली रख कर कहा ‘मेरा राहू खराब है, कुछ उपाय बताएँ।’ वे आयकर वकील जैसे सध कर बोले- ‘केतु के जाप करा लो।’ मैं दुविधा में पड़ गया। नाराज राहू है, ये केतु को खुश करना चाह रहे हैं। वायरस कोरोना फैला रहा है और ये भूत उतार रहे हैं। मुझे लगा उन्हें केतु की पूजा विधि अच्छी तरह याद होगी। विशेषज्ञ ऐसे ही होते हैं। पेटदर्द ले कर किडनी विशेषज्ञ के पास जाओ तो वह किडनी निकाल कर किसी दूसरे में फिट कर देता है। वैसे ही पंडित जी किसी का केतु मुझमें फिट करने की जुगाड़ में दिखे। मैंने जोर दे कर कहा, ‘पंडित जी मुझे तो राहू को शांत कराना है’। वे बोले- ‘टेढ़ी अंगुली से घी जल्दी निकलता है। बाबू को लिफाफा दे दो तो वह अफसर से फटाक से दस्तख्त करा लाता है।’ उनकी बात में व्यंग्य था पर तर्क सही था।

मैंने पूछा, ‘क्या करना होगा।’ वे बोले- ‘अनुष्ठान हम करेंगे व्यवस्था तुम करोगे। मंत्रोच्चार हम करेंगे स्वाहा तुम करोगे। केतु को प्रसन्न हम करेंगे, पर वरदान तुम ही मांगोगे।’ मैंने पूछा- आपकी दक्षिणा। ‘तुम्हारी जो श्रद्धा हो, पहले काम तो होने दो’ वे बोले। वे सच्चे पंडित थे, परिणाम के बाद पेमेंट। मैंने कहा- आप अनुष्ठान शुरू करवा दीजिए। उन्होंने अपना बिजनेस कार्ड दिया और बोले हमारे वेब पेज पर जा कर साइन अप कर दीजिए। अपनी श्रद्धानुसार पुण्य का जैसा पैकेज लोगे वैसा फल मिलेगा। मैं पैकेज पढ़ने लगा। कई विधि-विधानों पर सत्तर प्रतिशत डिस्काउंट था। एक अनुष्ठान की रकम देने पर दूसरा अनुष्ठान मुफ्त में था। एक यूनिट पुण्य का पेमेंट करने पर दो यूनिट पुण्य का बोनस था। बैंक रुपयों को डॉलर में बदलते हैं, पंडितजी रुपयों को पुण्य में बदल रहे थे। देवमार्ग पर बैठा भिखारी करुणा भरी आवाज दे रहा था- बाबूजी बहुत दिनों से रोटी नहीं मिली। उसके पास बैठा अपाहिज डफली बजा रहा था। वह गा रहा था- तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा। सब भक्त दस लाख पाने की आशा में कतार में लग रहे थे। सामाजिक दूरी बनी हुई थी तो वे एक पैसा नहीं दे पा रहे थे।

सब भक्त खुश हैं। पुण्य सेल में मिल रहा है, सत्तर फीसदी छूट। लोग मोबाइल पर धड़ल्ले से पैकेज खरीद रहे हैं। दूर से ही सही, श्रद्धा को पुण्य में बदलने के लिये पंडित जी तैयार हैं। उनके भी पेट का सवाल है।
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