होने और हो सकने के बीच: कुछ उलझाते सवाल

चंद्र मोहन भण्डारी
 
मानव की जैविक विकास यात्रा उसके ‘होने’ की कथा है और सांस्कृतिक विकास यात्रा उसके ‘हो सकने’ की; सभ्यता, संस्कृति एवं उसके विकास की जाँच-पड़ताल करें तो हम कई विड़म्बनाओं एवं विसंगतियों से रूबरू होते हैं साथ ही रूबरू होते हैं सवालों के हुजूम से जिनमें कुछ के जवाब हैं, कुछ के लिये प्रयास जारी हैं और शेष हैं जिनके जवाब मिल सकने की संभावना नजर नहीं आती। ऐसे में हमारी प्राथमिकताएँ क्या हों इसपर भी प्रस्तुत लेख में चर्चा होगी।
 
जवाब कोई आये क्यों?
सवाल खुद से करना और उनके जवाब खोजने के प्रयास में उलझते चले जाना –यह इंसानी दिमाग की फितरत है और इसका कोई जवाब नहीं कि ऐसा है तो क्यों है? कुछ सवाल होते ही हैं जिनके जवाब कभी नहीं मिलते या फिर  सवाल पूछने वाला किसी के जवाब का इंतजार नहीं करता या यों कहें कि सवाल खुद ही अपना जवाब भी प्रस्तुत करता है। मिर्जा गालिब का वह शेर-

कैदे हयात ओर बंदे गम अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाये क्यों?
अब इस क्यों का क्या जवाब हो सकता है?
बात को देखते हैं थोड़ा अलग अंदाज में; गालिब के ही शब्दों में: 
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता?

अब कवि के कथन की तुलना जाने-माने दार्शनिक-गणितज्ञ रेने देकार्त के बहुचर्चित कथन से करें;
Ergo cogito, ergo sum. मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ। कवि कहता है कि मैं दु:ख पाता हूँ क्योंकि मैं हूँ। अब दोनों को जोड़कर देखें तो क्या मिलता है जरा गौर करें:
मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ और चूंकि मैं हूँ इसलिये मुझे दु:ख मिलना लाजमी है।

इसी बात पर मुझे एक चीनी लोक कथा याद आती है:
किसी देश का राजा अपने राजकार्यों के अलावा पढ़ने-लिखने का शौकीन था और उसके खास लोगों में उस राज्य के चुनिंदा मनीषी और विद्वान भी थे। राजकाज की व्यस्तता के कारण वह अधिक समय पठन-पाठन को दे न सका पर उसने अपने विद्वज्जनों से आग्रह किया कि वे जीवन से जुड़ा संपूर्ण ज्ञान संचित कर पुस्तकें लिखें जिन्हें वह फुरसत मिलने पर पढना चाहेगा। विद्वज्जन काम में जुट गये और पंद्रह-बीस सालों में उनका प्रोजेक्ट पूरा हो गया। दस भागों में पुस्तकें तैयार होकर राज-पुस्तकालय में पहुँच गईं। इस बीच राज-काज का एक भाग अपने मंत्रियों को सोंप राजा ने कुछ समय देना आरम्भ किया उन पुस्तकों के पठन में। थोड़ा पढ़ते ही उसे आँख में तकलीफ होने लगी और इस कारण हर दिन वह कुछ पेज ही पढ़ पाता। वह पहले अंक का पहला अध्याय भी न पढ़ पाया था कि उसे थकान और कमजोरी महसूस होने लगी। पढ़ने की गति और कम हो गई और दो अध्याय पूरा करते वह बीमार रहने लगा। राजवैद्य ने आराम की सलाह दी। यह तय हुआ कि कोई उन अध्यायों को पढ़कर सुना दिया करे। लेकिन तकलीफ बढ़ जाने से अब वह ध्यान से सुन भी नहीं पाता। उसने आदेश दिया कि दस अंकों की बात संक्षेप में कहकर एक ही अंक मे रख दी जाय जिसे सुन पाना आसान हो जायेगा। जब तक सार-संक्षेप तैयार होकर आया राजा की तबियत काफी खराब हो गई और कुछ दिनों में वह मृत्यु-शय्या पर आ गया। तब उसने अपने सबसे सयाने एवं अनुभवी विद्वान से कहा कि अब समय नहीं उसके पास और उसकी इच्छा है कि सारे ज्ञान का निचोड़ संक्षेप में उसके कान में बोल दिया जाय। बुजुर्ग विद्वान अपना मुँह राजा के कानों के पास तक ले गया और बोला: 
‘इंसान जन्म लेता  है दु:ख पाने और मरने के लिये।‘

सच भी तरह-तरह का होता है। अगर एक वाक्य में ही सारे ज्ञान का निचोड़ देना हो तो शायद यही सच है। पर यह पूरा सच नहीं, इसके अलावा भी सच है जन्म और मृत्यु के बीच, और जिसे जानना इंसान का उद्देश्य रहा है और रहेगा और जिसकी तलाश इस लेख में या अन्यत्र होती रहती है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज अशक्त भी है
भुजाएँ अगर छोटी हैं
तो सागर भी सिमटा हुआ है
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

कवि के आत्मविश्वास की तारीफ करनी होगी जो पूरी जमीन पर अपना दावा करता है वरना मैं तो सोच रहा हूँ कि मामला पचास-पचास पर कहीं होना चाहिये। जो भी हो यह मामला हर एक का अपना है  पर यह भी सच है कि कथित जमीन ही इंसान की कार्यस्थली है। 
हर बात का एक संदर्भ होता है और हर बात के विश्लेषण के लिये यह देखना जरूरी हो जाता है कि किस संदर्भ में बात कही गई है?
 
जीवन व सभ्यता का आरम्भ

यहाँ बात सभ्यता और संस्कृति की हो रही है एल्डो लियोपोल्ड [1] के कथन से बात शुरू करते हैं:
निर्जन वन-प्रांतर यानि वाइल्डरनेस वह कच्चा माल है जिससे इंसान ने ठोक-पीट कर अपने लिये एक शिल्प निर्माण किया जिसे सभ्यता कहा जाता है। 

बात जिस संदर्भ में कही जा रही है एकदम सटीक जान पड़ती है। केवल सभ्यता ही नहीं, वन-प्रांतर या वाइल्डरनेस जीवन के लिये भी कच्चा माल है जिसके बिना जीवन की शुरूवात भी ठीक से नहीं हो सकती। 
वन-प्रांतर सारे विश्व में एक सा नहीं है अपितु भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है। लियोपोल्ड के ही शब्दों में:
वन-प्रांतर का कच्चा माल हर जगह एक समान नहीं है उसमें विविधता है और इसलिये उससे तैयार किया गया शिल्प भी विविधता से भरा है। शिल्पों में यह अंतर संस्कृति कहलाता है। विश्व की संस्कृतियों का वैविध्य इंगित करता है उस वैविध्य को जो उनकी जन्मदात्री वन-प्रांतर में विद्यमान था।

अरबों साल पहले जब अमीबा के रूप में सरलतम जीवन का आरम्भ हुआ तब धरती का जैव-मंडल, वायु, जल और सूर्य किरणों के सम्मिलित प्रभाव में ही संभव हुआ होगा। जीव-जगत का आरम्भ अमीबा से मानें तब वनस्पति-जगत के आरम्भिक चरणों में काई या फ़फूंदी आई होंगी और दीर्घ समयान्तराल में जैविक विकास प्रक्रिया के तहत जटिल रचनाएं सामने आई होंगी। आज से साठ लाख साल पहले चिंपाजी नामक प्राणी सामने आया जिसकी एक शाखा ने दो पैरों पर खड़े होकर चलने की कोशिश की और उसकी एक शाखा आज के इंसान में रूपांतरित हो गई।
आज से लगभग एक लाख साल पहले तक का इंसान  अपने बड़े और विकसित दिमाग के बावजूद अभी वनवासी ही था बहुत-कुछ अन्य जीवों की तरह। एक बड़े अंतराल में विकसित दिमाग के बावजूद इंसान का जीवन व रहन-सहन अन्य जीवों की तुलना में बस थोड़ा ही अलग था। दिमाग विकसित था जरूर लेकिन उसकी सामर्थ्य खुद उसे पता नहीं थी और पता होती भी कैसे? कम्प्यूटर को अच्छे सोफ्टवेयर की जरूरत जो थी और उसके लिये भाषा ज्ञान जरूरी था। भाषा कोई हो उस सोफ्टवेयर के लिये इसकी जरूरत थी और यह वह समय था जब भाषा ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हुआ। यह एक तरह से सांस्कृतिक विकास की शुरूवात थी। इंसानी  दिमाग में भाषा के विकास के सारे जरूरी प्रावधान मौजूद थे बस उन्हें प्रयोग में लाते हुए उनकी क्षमता बढ़ाने की जरुरत भर बाकी थी जो उस दौरान किया गया। नतीजा यह हुआ कि विश्व के हर कोने में इंसान स्वतंत्र रूप से भाषा विकास में सफल रहा। यह मानव के सांस्कृतिक इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि विकास मार्ग पर आगे का रास्ता भाषा की मदद से ही  तय करना था। वैसे यह भी कहना उचित होगा कि इस उपलब्धि में मानव की अपनी हिस्सेदारी बहुत कम थी। कुदरत ने ऐसा बड़ा दिमाग किसी भी जीव को दिया होता तो वह हमारी जगह होता और हम होते चिड़ियाघरों में। 
भाषा के विकास ने इंसान को विचार प्रवाह में सहायता की और संप्रेषण प्रभावकारी होने से वैचारिक परिपक्वता हासिल होने लगी। अब रात में तारों भरा आकाश निहारते कल्पना की उड़ान भी शुरू होने लगी और धीरे-धीरे पौराणिक कथा आकार लेने लगी। आकाश, तारे, बादल, इन्द्रधनुष, आकाशीय बिजली, मौसमों में बदलाव, दिन-रात का आवर्ती चक्र -- सवालों के हुजूम थे और कल्पना के साथ कुछ तर्क के मेल से दर्शन की परम्परा भी आरम्भ होने लगी। अब इंसान सही मायनों में एक विचारशील प्राणी था अन्य जीवों से एकदम अलग। सांस्कृतिक विकास में तेजी आना आरम्भ हो चुकी थी, साथ ही कृषि के आविष्कार ने यायावर इंसान [2] को घुमंतू जीवन से निजात दिला दी जिसका बड़ा लाभ यह मिला कि अब इंसान के पास अधिक समय था सोचने का और सारा समय भोजन व सुरक्षा की चिंता में न लगाकर जीवन को अधिक सुविधाजनक एवं आकर्षक बनाने का। यह समय था जब कलात्मक अभिरुचि के भी निखरने का अवसर मिला। गुफाओं में तथा अन्यत्र भी भित्ति-चित्रों में इसकी झलक देखी जा सकती है। मानव सभ्य एवं सुसंस्कृत प्राणी बन चुका था यद्यपि उसकी पाशविक प्रवृत्ति कम होने के बजाय और भी पैनापन लेने लगी जिसके उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

बात सभ्यता के विकास की 

गौर से देखें तो यह साफ नजर आता है कि कुदरत में उपलब्ध हर चीज-  हवा, पानी, लकड़ी, पत्थर, लोहा आदि, और कुदरत का ही दिया विचारशील दिमाग- इन सबने मिलकर एक विकास कथा की शुरूवात की जिसमें कुदरत की चीजों का दोहन होता गया, वन-प्रांतर सिमटता गया और इंसान की अपनी सुख-सुविधा के लिये बनाई चीजें धरती पर छाती गईं। बात इतने तक ही सीमित रहती तो शायद स्वीकार्य होती लेकिन तथाकथित विकास प्रक्रिया में पर्यावरण की गुणवत्ता  पर असर पड़ना आरम्भ हो गया। बात कितनी अजीब सी है कि जिन संसाधनों के कारण धरती पर जीवन का और सभ्यता का विकास हुआ उन्हीं पर सबसे बड़ी मार पड़ी और वे दयनीय हालत में पहुँच गई। यह कैसी विडम्बना है? सभ्यता के विस्तार ने उन संसाधनों व कारणों को नष्ट करना आरम्भ कर दिया जो उसके विकास में सहायक रहे थे।

पर इंसान के पास यह सब सोचने की फुरसत नहीं। ऐसा नहीं कि वह कुछ जानता नहीं पर उसकी अपनी मजबूरियाँ हैं और वह जिस जीवन शैली का लती हो चुका है उस से बाहर निकलने का कोई सरल रास्ता है भी नहीं। वह अपने ही मन की अंध-गुफाओं का कैदी [3] हो चुका है यद्यपि इसे भी स्वीकार करने के लिये वह तैयार नहीं।  

कृषि-क्रांति के बाद दूसरा बड़ा परिवर्तन आया अठारहवीं-उन्नीसवीं सदियों में हुई औद्योगिक क्रांति के साथ; रहन-सहन, जीवन-यापन एवं शिक्षा में आमूल परिवर्तन देखने को मिला। यह सब सारे विश्व में एक साथ नहीं हुआ। शुरूवात यूरोप में हुई और धीरे-धीरे विश्व के अधिकांश क्षेत्र इसके प्रभाव में आ गये यद्यपि आज भी कई सुदूर इलाकों में  इसका असर नहीं के बराबर है। विश्व के एक बड़े भाग में जीवन की गुणवत्ता में  वृद्धि जरूर दिखायी दी, पर बढ़ते औद्योगीकरण के प्रभाव में पर्यावरण प्रभावित होने लगा। वह स्वच्छ परिवेश जो लाखों सालों से धरती को मिलता रहा था मात्र तीन सौ सालों में प्रदूषित हो गया।

आखिर क्यों?

आज हमें विज्ञान की सहायता से बहुत जानकारी मिल रही है और हमारे कई सवालों के जवाब मिल चुके हैं या मिल रहे हैं। धरती पर जीवन का आरम्भ कैसे हुआ और कब हुआ इसका कुछ अनुमान लगाना संभव हो रहा है। खगोलशास्त्री इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति की भी जानकारी देते हैं जो करीब 15 अरब साल पहले घटित हुआ होगा उनकी गणना के अनुसार। अपनी बात के समर्थन में कुछ तर्क भी पेश करते हैं जिसे समझने के लिये उनकी भाषा को समझना जरूरी है यानि आधुनिक गणित की भाषा और भौतिकी। उनकी अधिकतर बातें सही साबित होती आई हैं  पर कुछ सवाल ऐसे हैं जिन्होंने विज्ञानियों को भी चक्कर में डाल दिया है। और जो सवाल सबसे मुश्किल है वह है कि जीवन का विकास क्योंकर हुआ, खास कर मानव का विकास। यह सब क्यों हुआ, इसका कोई जवाब नहीं उनके पास और निकट भविष्य में भी इसके समाधान की संभावना नहीं दीखती। कुदरत में जो भी घट रहा है वह सब किसी उद्देश्य की ओर इंगित करता है ऐसा अभी तक नजर नहीं आता। जैविक विकास कैसे हुआ इस बारे में काफी कुछ जाना जा चुका है और आगे भी जानकारी मिलते रहने की संभावना है पर क्यों का कोई जवाब नहीं। जैविक विकास क्यों हुआ, मानव जीव का उदभव क्यों हुआ और उसका दिमाग इतना अधिक विकसित क्योंकर हुआ कि वह अपने और पूरी सृष्टि के बारे मे जानने के लिये प्रयासरत होने लगा? इस क्यों का कोई जवाब नहीं, वैज्ञानिकों के पास भी।

मानववादी अवधारणा

कुछ विचारकों का अनुमान है कि इसके पीछे संभावित उद्देश्य हो सकता है जिसे मानव से जोड़ा जा सकता है और इसलिये इसे मानववादी सिद्धांत या एंथ्राँपिक सिद्धांत [4]  कहा जाता है। इसे प्रतिपादित कई रूपों में किया गया है। ब्रैंडन कार्टर ने 1974 में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड में ऐसे लक्षण होने चाहिये जिनका प्रयोजन एवं निष्कर्ष जीवन और चेतना का विकास है और चूंकि इस नजरिये से मानव सबसे सक्षम है यह माना जा सकता है कि जीवन के विकास का प्रयोजन एक चेतन मन की जरूरत की ओर इशारा करता है। यह महज एक अनुमान है पर बात में कुछ दम तो है यद्यपि कोई प्रमाण नहीं दिया जा सकता।  दूसरी ओर अगर ऐसा नहीं है तब एक ही विकल्प बचता है और वह है संयोगवश ऐसा होना (a matter of chance)। यानि यह सब प्रायोजित नहीं, इसके पीछे कोई उद्देश्य भी नहीं बस संयोगवश  यह सब हो गया। बात कुछ अटपटी तो लगती है पर निश्चित जानकारी के अभाव में कई विचारक यही मानते आये हैं।
एंथ्राँपिक सिद्धांत वाली बात कोई प्रमाण न होते भी अधिक संभव लगती है। मेरी कल्पना में एक विचार आता है जिसे महज कल्पना की उड़ान भी कह सकते हैं। मान लें ब्रह्मांड या प्रकृति अपने को देखना चाहें, समझना चाहें  तो उसके लिये एक चेतन मन की जरूरत पड़ेगी और उसके लिये जीव का विकास चाहिये। स्वयं को ठीक से समझने के लिये एक विकसित मस्तिष्क और उसके साथ जुड़ा मन चाहये। हम मानव या अन्य  जीव भी ब्रह्मांड के  अंश ही तो हैं उसकी आँखें हैं और हमारे नजरिये से प्रकृति स्वयं को निहार रही है।  लेकिन इसमें भी एक पेंच है जो मामले को उलझाता है। मानव मस्तिष्क तो बहुत बाद में आया सारी विकास-प्रक्रियाओं के अंतिम चरणों में। नियोजन की यह रूपरेखा क्या पहले बन चुकी थी अगर ऐसा है तो मन की अनुपस्थिति में कैसे? 

न था कुछ तो खुदा था न होता तो खुदा होता। (गालिब)

वास्तव में सभ्यता का आरम्भ मानव के बौद्धिक विकास से जुड़ा है और जैसे-जैसे यह विकास कथा आगे बढ़ी मानव के जीवन-यापन में अंतर आना भी आरम्भ होने लगा। मानव जीव का जीवन व रहन-सहन उसकी बौद्धिक क्षमता के कारण अन्य जीवों से अलग होता चला गया और यह अंतर (मानव एवं अन्य जीवों के बीच) सभ्यता को परिभाषित और  परिमाणित करने लगा [5]। यह अंतर ही सभ्यता का पर्याय बन गया। पर इस अंतर की वृद्धि के साथ वह कच्चा माल अपनी गुणवत्ता व क्षमता खोने लगा जो इसके जन्म एवं विकास का कारण था। तात्पर्य यह कि सभ्यता (यानि मानव-जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि) परिवेशीय गुणवत्ता में गिरावट के समानुपाती होने लगी। जीवन व सभ्यता का आधार खिसकने लगा और कुछ ही सदियों में ऐसे हालात पैदा हो गये कि मानव जीवन व सभ्यता की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखाई दिया।  पहले सभ्यता की गुणवत्ता परिवेशीय गुणवत्ता की गिरावट के समानुपाती थी पर अब वह सीमा आ पहुँची है जब यह संभव नहीं क्योंकि उपरोक्त संबंध एक सीमा तक ही कारगर हो सकता था। उस सीमा के परे परिवेशीय परिवर्तन लगभग विस्फोटक स्थिति में आकर धरती पर समस्त जीवन को प्रभावित करने की स्थिति में आ गये [5]। 

सभ्यता के मानदंड

यह सोचने की बात है कि आज हमारी सभ्यता के मानदंड क्या हैं? अगर बड़े शहर, गगनचुम्बी इमारतें,  राजमार्ग और उनपर दौड़ती आकर्षक गाड़ियाँ ही वे मानदंड हैं तब निश्चय ही हमारी सभ्यता विकासोन्मुख है। अगर जीवन की चमक-दमक व ऐश्वर्य सभ्यता का मानदंड है तब जरूर हम अधिक सभ्य होते जा रहे हैं। पर जरा गौर करें जिस चेतन मन की वजह से  सभ्यता की बात आरम्भ हो सकी उसके लिये भी उन मानदंडों में कोई जगह या कोई प्रावधान है? जीवन में मानवीय मूल्यों, अभिप्रायों का कोई अर्थ है या सब केवल दिखावा और छलावा है? 

बातें और भी हैं सामान्य भाषा में जिसे हम जंगली कहा करते हैं वह एक नकारात्मक और उलझाने वाली धारणा को इंगित करता है। वैसे ही सभ्य होना एक सकारात्मक और वांछित स्थिति की झलक देता है। यह सही है और नहीं भी। सारी बात इसपर आकर टिक जाती है कि हम सभ्यता से क्या समझते हैं। अन्य जंतुओं की तरह पहले इंसान जंगल में रहता था और जंगली था यानि जंगल का निवासी। जंगली का दूसरा अर्थ तब विकसित हुआ जब इंसान जंगल में न रहकर कृषि करने लगा और ग्रामवासी हो गया। अब उसके अलावा बाकी सब जीव-जंतु जंगली थे। इंसान ने जैसे-जैसे तरक्की की समाज को ज्यादा सुचारु एवं सुव्यवस्थित किया वह सभ्य होता गया और जो जंगल के निवासी थे वे असभ्य; जंगली असभ्य का पर्याय बन गया। यहाँ तक बात कुछ समझ आती है पर अपने गहन-मन-अभ्यंतर में इंसान आज भी जंगली ही है, सामान्य जंगली नहीं अपितु एक चालाक व खतरनाक। क्या इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा नहीं है? जिस धरती व वन-प्रांतर ने उसे सब कुछ दिया उसने सब उजाड़ कर रख दिया जीव-जंतुवों की हजारों प्रजातियाँ समाप्त कर दी, जल-थल-नभ को प्रदूषित कर स्वयं अपने अस्तित्व के लिये संकट पैदा कर दिया। मानव के उत्थान और पतन की कथा[6] लिखी जाने लगी है।      

यह सब मुश्किल सवाल हैं जिनके जवाब आसान नहीं। हम अधिकतर खुद को छलते रहे हैं सारी मानव जाति खुद को छल रही है। जिस परिवेश से हमने जीवन पाया और उसके विकास के लिये जरूरी संसाधन पाये आज वह परिवेश और जीवन, दोनों विघटन के कगार पर हैं। इंसान का इंसान से रिश्ता तनावग्रस्त रहा है और अन्य जीवों के प्रति बेहद खराब। आज बहुत से जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं कई वनस्पतियाँ भी वैसी ही हालत मे हैं और परिवेशीय गुणवत्ता बेहाल है। इतना होने पर भी इंसानों की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी एवं अभावों की जिन्दगी जी रहा है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग वैभव एवं विलासिता में मग्न हैं। सांस्कृतिक विकास का यह भी एक अध्याय है।

सांस्कृतिक विघटन को विकास कहना भी अपने को गलतफहमी में रखने का बढ़िया तरीका है।

बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक 

इन सारे सवालों के मूल में मानव मस्तिष्क की बनावट और बुनावट है जो चार अरब वर्षों के जैविक विकास का नतीजा है। यह एक जटिल विषय है जिसका सविस्तार वर्णन यहाँ संभव नहीं। पर कुछ बात साफ नजर आती है कि मानव मन बौद्धिक रूप से सक्षम है और इसलिये उसकी बौद्धिक उपलब्धियाँ भी स्पष्ट नजर आ जाती हैं। लेकिन मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता। मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर पर बौद्धिक रूप से अत्यंत सक्षम -- यह कथन मानव मन को औसतन परिभाषित कर सकता है और यह उसकी समस्याओं के मूल में है। मन की दो स्थितियाँ उसके वैचारिक वर्णपट की विरोधी अवस्थाओं को परिभाषित करती हैं एक छोर पर अवधारणात्मक मन (conceptual mind) है और दूसरे छोर पर विवेकी मन (perceptual  mind).
 
जिदु कृष्णमूर्ति के विचारों का समावेश करते हुए पैटर्न संचालित मन को हम अवधारणात्मक कह सकते हैं क्योंकि हमारी कई धारणाऐं व अवधारणाऐं भी पैटर्न आधारित हुआ करती हैं।  दूसरा मन जो पैटर्नों से अप्रभावित है वह विचारशील या विवेकी मन (perceptive mind) है। जिसे हम विवेक कहते हैं वह बौद्धिक-मनोवैज्ञानिक समन्वय से प्राप्त सहज संतुलित निष्कर्ष माना जा सकता है।

संतुलन की आवश्यकता

ऐसा मन और उसे आधार देता यह मस्तिष्क क्योंकर विकसित हो सका इसका जवाब शायद ही कभी मिल सके और विज्ञान भी इसमें अधिक सहायक न हो सकेगा ऐसा प्रतीत होता है। जो भी हो हमें इसी मन के साथ जीना व काम चलाना है और इसकी अच्छाइयों व कमियों को समझकर आगे का रास्ता तय करना है।  जिस सवाल का जवाब दिया जा सकता है और जो अधिक प्रासंगिक भी है वह है: जो और जैसा भी है उसे स्वीकारते हुए हमें आगे क्या करना चाहिये जो सही अर्थों में सभ्यता एवं संस्कृति के विकास को परिभाषित कर सके। सही अर्थ क्या हैं यह भी निश्चित रूप से तय करना होगा।

हमने बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्षों की बात की है और एक संतुलन की जरूरत हमारी प्राथमिकता हो सकती है। बौद्धिक सक्षमता विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास से जुड़ी है और इसने हमारा जीवन सुगम किया है इसमें संदेह नहीं। पर इसने एक फूहड़ उपभोक्ता संस्कृति को भी जन्म दिया है जिसका निरंतर विस्तार होता दीखता है। साथ ही इसने मानव को अकल्पित संहारक शक्ति भी दी है। और यह भी सच है कि विश्व की आधे से अधिक आबादी अभावों से जूझ रही है और यह उपभोक्ता  संस्कृति अमीरों व गरीबों दोनों के लिये अहितकर है साथ ही उस परिवेश के लिये भी जिसकी गुणवत्ता के बिना जीवन ही न होता और न होती सभ्यता। यह मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों का घोर दुरुपयोग है जिसकी भरपाई करना मुश्किल होता जा रहा है। यह सब मानव की मनोवैज्ञानिक अक्षमता के कारण है जो उसे बौद्धिक विकास का नियंत्रित एवं संतुलित प्रयोग करने से रोकती है। दूसरी ओर अभावों में जीने वाली आबादी इस सबको आदर्श मानकर उसे हासिल करना चाहती है। यह फूहड़ उपभोक्ता संस्कृति इंसान की पाशविक प्रवृत्तियों का दस्तावेज है वैसे ही जैसे निरंतर चलते आ रहे संघर्ष, युद्ध व शोषण। 

हाल के दशकों में परिवेशीय गुणवत्ता पर बहुत चर्चा हुई है और आगे भी होती रहेगी। सैद्धांतिक स्वीकृति के बावजूद कोई ठोस कदम निकट भविष्य में लिये जा सकेंगे ऐसा नहीं लगता। इसमें बहुत कुछ दिखावा है शब्दाडम्बर है पर कु्छ इसके इतर भी है  जो हमें सही दिशा की ओर प्रेरित कर सकता है। आरने नेस, वारविक फाक्स ने हमें राह दिखाई है जो महात्मा गांधी के अहिंसक जीवन दर्शन के निकट है [7]। फाक्स इसे निजेतर परिवेशीय चिंतन की संज्ञा देते हैं और जो निेजेतर मनोविज्ञान (transpersonal psychology) के अंतर्गत जीवन से जुड़ी अस्तित्ववादी उलझनों का आंशिक समाधान प्रस्तुत कर सकता है। निज से इतर जाने की बात में दूसरे मानव, प्राणिमात्र, वन-प्रांतर सभी आ  जाते हैं। 

वन-प्रांतर या वाइल्डरनैस के बिना सभ्यता की बात बेमानी होगी और लियोपोल्ड के अनुसार वन-प्रांतर का एक सांस्कृतिक मूल्य है और वह निर्भर करता है मानव की बौद्धिक-वैचारिक विनम्रता पर।

इस विनम्रता की तलाश एवं विकास हमारा संकल्प होना चाहिये अन्यथा सभ्यता और संस्कृति की हमारी पहचान अधूरी और बेमानी ही रहेगी। मानव को सब कुछ परिवेश से मिला है जिसमें उसका दिमाग और बुद्धि शामिल हैं और जिनपर वह इतराता रहा है। उसको उस परिवेश के प्रति विनम्र होना ही होगा अगर विनाश से बचना है और इसका कोई विकल्प भी नहीं। 

संदर्भ
[1] Aldo Leopold, Sand County Almanac, Oxford University Press, London, 1949.
[2] चन्द्रमोहन भंडारी,  यायावर की वापसी, सेतु, मार्च 2020. 
[3] चन्द्र मोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु, नवंबर 2019. 
      [4] B J Carr, M J Rees, The Anthropic Principle and the structure of the physical world, 
         Nature, 278, 605-612,1979.
     [5]Chandra Mohan Bhandari, Evolution of Culture, Indian Ruminations, June 9,
          2016.
      [6] Jared Diamond, The Rise and Fall of the Third Chimpanzee, Vintage 2002. 
      [7] चन्द्रमोहन भंडारी, पर्या-दर्शन: पर्यावरणीय समस्या पर गहन चिंतन, सेतु, अक्टूबर 2020.

सेतु, नवम्बर 2020

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