सम्मान एवं अहिंसा का अंतर्संबंध

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


मानव की बुनियादी आवश्यकता स्वयं को जानने और दूसरों का सम्मान करने की है। सम्मान का भाव हो तो हिंसा की उत्पत्ति संभव ही नहीं होती है। वहाँ तो केवल विनम्रता और आदर की वजह से प्रेम की व्याप्ति होती है। पहले यह सम्मान व्यक्ति, या समाज द्वारा ही निर्मित हुए। बाद में इसे धर्म के द्वारा संचालित किया जाने लगा, धर्म गरिमा का निर्धारण करने लगे। अब इसे धर्म की जगह राज्य संचालित कर रहे हैं। राज्य कहते हैं कि हम अपने नागरिकों को सम्मान देंगे। लेकिन सभी के सम्मान में बहुत ही बारीक सा अंतर है। यह देखा गया है कि मनुष्यों द्वारा संचालित व्यवस्था में ही सम्मान की स्थिति ज्यादा टिकाऊ रही है। धर्म ने इसे अवश्य आदर्श स्थिति देने की कोशिश की। लेकिन जब धर्म को भय बनाकर सम्मान पा लेने की इच्छा जागृत हुई, तब से सामाजिक परिवर्तन के समक्ष प्रश्न भी खड़े होने लगे हैं। जो सम्मान के प्रति धर्म आदर्श रूप में था, उसका भी स्वरूप बदल गया। राज्य संविधान के अनुसार इसे नागरिकों को हस्तांतरित करने की वकालत करते रहे हैं। राज्य गरिमामय जीवन बनाकर नागरिकों को सम्मान देने की बात करते हैं। लेकिन सम्मान की स्थिति अगर दुनिया की साढ़े सात अरब आबादी में परखी जाय तो स्थितियां बहुत भयानक लगती हैं। कुछ राज्यों में लोकतान्त्रिक सरकारों द्वारा दिया जाने वाला सम्मान भी अब हिंसक सम्मान लगने लगा है और राजशाही के सम्मान से भी अधिक बनावटी भी लग रहा है। इसका प्रमुख कारण कोई एक नहीं है अपितु पूरी तरीके से सभ्यता के संकट के रूप में इसे देखा जा रहा है। हिंसा की ऐसे में संभावना अधिक हो जाती है और सम्मान भी नागरिकों के लिए भ्रम सा बनने की स्थिति में हो चुका है। योजनाओं के माध्यम से सम्मान की प्राप्ति नागरिकों के लिए और राज्यों में बर्चस्व के बीच की खींचतान का हिस्सा जो बन गया है। पूंजीवादी धड़ा राज्यों को नागरिक-जन्य योजनाओं को जमीनी स्तर पर अपनी शर्तों पर पहुँचाना चाहते हैं जिससे नागरिक और योजनाओं के बीच काफी अंतर बन जाता है। इससे जिस गरिमा की कल्पना किसी योजना के साथ की गयी होती है उसके विनिमय में वह सफलता नहीं मिलती, जो मिलनी चाहिए। वह योजना मनुष्य के लाभ की जगह सरकार के लाभ और कॉर्पोरेट के लाभ की हो जाती है और सम्मान भी इस प्रकार कहीं और हस्तांतरित हो जाते हैं।

भारत अत्यंत उदारवादी देश है। यहाँ की सभ्यता का भी विस्तार इसी उदारवादी दृष्टि से हमें मिलती है क्योंकि हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान की संकल्पना रही है। हमें हमारे शास्त्र सिखाते हैं- “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ पर देवता विचरण करते हैं। और कहा गया है-“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः’, चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम” अर्थात- अभिवादनशील, विनम्र और नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले में चार गुणों का विकास होता है- आयु, विद्या, यश और बल। भारतीय साहित्य में ऐसे अनेकों दृष्टांत हैं जहाँ आत्म को समझने के लिए कहा गया है जिसकी चर्चा पहले कर चुका हूँ लेकिन दूसरों को जानने में भी स्वयं को जानने की संकल्पना भी भारतीय साहित्य में है। इसे आत्मसात करने और व्यव्हार में लाने के भी लाभ मनुष्य को वैयक्तिक रूप से मिलता है। जैसा की बताया गया है कि यदि हम विनम्र होकर बड़ों की सेवा करते हैं तो भी प्रसन्नता की प्राप्ति परोक्ष रूप से होती ही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मनुष्य की सबसे बड़ी विपन्नता है कि वह दूसरों का सम्मान बहुत दबाव में करता है। धर्म या राज्य की भी विपन्नता मैं इसी में देखता हूँ। अपने लाभ के लिए प्रदत्त सम्मान का विधान जो करता है, वह विपन्न नहीं तो और क्या है? अब दुर्भाग्य से दुनिया के राज्य भी इस आचरण के आदी हो गए हैं और वे अपने नागरिकों का सम्मान जिस भाव से करने चाहिए नहीं करते। उनके लाभ के पैमाने अब मनुष्य भली-भाँति समझने लगा है। इसके पीछे मुख्य कारण यही हैं की मनुष्य द्वारा संचालित राज्य कल्याणकारी राज्य बन पाने से रह जाते हैं। फलतः वे गरिमा को भी किसी अन्य की इच्छा से हस्तांतरित करना चाहते हैं।

सम्मान की यह दशा बहुत ही सोचनीय है। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी गरिमा में देखना सच्चे मनुष्य का आभूषण है। जॉन रस्किन ने 'अनटू दिस लास्ट' में जो अपनी बात की थी उसे गाँधी जी ने अपनी पुस्तक सत्य के साथ मेरे प्रयोग में लिखा- मेरा यह विश्वास है कि जो चीज मेरे अन्दर गहराई में छिपी पड़ी थी, रस्किन के ग्रंथरत्न में मैंने उनका प्रतिबिम्ब देखा, और इस कारण उसने मुझ पर अपना साम्राज्य जमाया और मुझसे उसमें अमल करवाया। जो मनुष्य हममें सोयी हुई उत्तम भावनाओं को जाग्रत करने की शक्ति रखता है, वह कवि है। सब कवियों का सब लोगों पर समान प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि सबके अन्दर सारी सद्भावनाएँ समान मात्रा में नहीं होती। मैं 'सर्वोदय' के सिद्धान्तों को इस प्रकार समझा हूँ -
1. सब की भलाई में हमारी भलाई निहित है,
2. वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक सी होनी चाहिये, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको एक समान है, तथा 
3. सादा मेहनत-मजदूरी का, किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है

इस प्रकार गरिमा में सभी हैं, समान गरिमा के साथ सभी का सम्मान हो, यह रस्किन ने बहुत पहले कही। यदि सभी लोग समान गरिमा के साथ सह-अस्तित्व के साथ लोग जिएँ तो उससे बड़ा अहिंसक समाज नहीं हो सकता लेकिन विडंबना यही है कि अमीर और गरीब की खाईं बहुत गहरी है। इस दुनिया में अमीर, अमीरी में सुखभोग करता है और दुनिया की अधिकांश आबादी जो गरीब है उसे गरिमापूर्ण जीवन नहीं मिलता। यह अतिक्रमण किसी न किसी तरीके से पूजीवादी लोग राज्य के सहयोग से करते हैं। जो समाज द्वारा आदर्श सम्मान की स्थिति थी उसे सुखभोग ने कम किया है। मध्यमवर्गीय समाज अपनी जिंदगी में सम्मान अपने परिवार, समाज, जरूरतमंद लोगों को इसलिए नहीं दे पाते क्योंकि उनके पास जीविका के लिए इन्हीं पूंजीवादियों के संसाधन होते हैं। इन संसाधनों के माध्यम से जब वे जीवन निर्वाह के लिए यत्न करते हैं तो अपने ही परिवार के बृद्ध, निःशक्त और माँ-बाप तक परित्यक्त जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं और थोड़ी सी जीवन की खुशियाँ पाने के इच्छुक युवा अपने ही लोगों को सम्मान न देकर स्वयं की जिंदगी संवारने में लग जाते हैं। सरकारों के पास ऐसी परिस्थितियों को बस में करने के कोई उपाय नहीं होते हैं। इसलिए दुनिया के विभिन्न सरकारों की रिपोर्ट्स यह बताती हैं कि एक बड़ी आबादी दूसरों की ओर सम्मान के लिए बेचारगी महसूस करने लगी है और हैपीनेस इंडेक्स-आनंद मापांक में कहीं न कहीं ऐसे राज्य पीछे हो गए हैं। धर्म ने इस प्रकार जो गरिमा प्रदान करने की जिम्मेदारी ली थी वह कहीं न कहीं विफल हुआ है। राज्य भी विफल हुए हैं और अब सरकारें तो अपना मुह छिपा रही हैं। और अब संयुक्त राष्ट्र नागरिकों को सम्मान प्राप्त करने के लिए सतत विकास लक्ष्य-2030 को सामने लेकर आया है। उसे यह उम्मीद है कि राज्य एसडीजी-2030 के 17 सूत्रीय लक्ष्य को हासिल करके नागरिकों को सम्मान प्रदान कर देंगे लेकिन यह कितना बड़ा भ्रम है, इसे हम अभी नहीं तो 2030 तक अवश्य देख लेंगे क्योंकि अब 2030 भी बहुत दूर नहीं है।

इसलिए हिंसा की व्याप्ति और अहिंसा की संभावनाओं का जब हम विश्लेष्ण करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले समय को भी हम सजग नागरिक बहुत गंभीरता से लें। सम्मान अंततः मनुष्य का प्रथम बुनियादी मांग नहीं है, अपितु उसे मनुष्य होने के कारण मिलना चाहिए। यह कृपा पर आधारित तो कदापि नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसकी तह में जाएँ तो समझ में आएगा कि मनुष्यों द्वारा ही निर्मित व्यवस्था में सम्मान देने-लेने की अप्रत्याशित पहल मनुष्यों के लिए ही सबसे ज्यादा हिंसक हो चुके हैं। लोकतंत्र में सामान गरिमा के साथ जीने के हक को इस प्रकार ग्रहण लग चुका है। शेक्सपियर ने एक बार कहा था-राजा है, लेकिन मैं जैसा भी हूँ, इन्सान हूँ। यह भावना भी व्यक्ति की सेल्फ रिस्पेक्ट-स्वयं का सम्मान जैसी अवधारणा को जन्म देते हैं। दुनिया के आन्दोलन अगर आप देखें तो पाएंगे कि गरिमा हेतु अपनी जिम्मेदारी साझा करते हुए लोगों ने आगे कदम बढ़ाया और किसी न किसी रूप में अपने आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए कार्य किया जिसमें किसी न किसी रूप में प्रत्येक वैयक्तिक का भी सम्मान जुड़ा हुआ था। सम्मान के लिए जुडाव बहुत आवश्यक है। दूरियां सम्मान को कम करते हैं। इसीलिए रिश्ते-नाते भी समाज में सम्मान के लिए स्थापित हुए। अब एकाकी जीवन, एकाकी लाभ, एकाकी उत्कृष्टता और एकाकी तरक्की की होड़ लगी है तो सम्मान कहाँ से होगा? यदि सामूहिक प्रगति-परहित की भावना का संचार मनुष्य या समुदाय में हो तो सम्मान बढ़ता है। इसीलिए सम्मान के लिए संस्था का निर्माण हुआ। परिवार समाज की सबसे छोटी संस्था मानी गयी। राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति, परिवार के प्रति और धरती के प्रति सम्मान तो तभी आ सकते हैं जब प्रेम सबके हृदय में हो। प्रेम दिखावा के विषय न हों। यह प्रेम मनुष्य अपने समाज और राष्ट्र से करें और राष्ट्र को प्रदर्शित करने वाले राज्य अपने नागरिकों से प्रेम करें तो निःसंदेह सम्मान की अभिवृद्धि होगी। अहिंसक व्यवस्था कायम होगी। सम्मान के माध्यम से लोगों के सुख की अभिवृद्धि की जा सकती है। यह सम्मान जब विस्तारित होगा तो व्यक्ति अपनी समस्त व्यवस्था, प्रकृति और जीव-जंतु सबका सम्मान करने लगेगा और यह सम्मान की भावना क्या आपको यह नहीं लगता कि मनुष्य की सबसे खूबसूरत रचनात्मक पहल होगी जो टिकाऊ शांति को स्थान देगी? निःसंदेह इस रचनात्मक पहल पर सभी का ध्यान जाना आवश्यक है किन्तु यह तभी संभव है जब सबका हृदय उद्दात्तभाव से इसे स्वीकारे और सम्मान के प्रति अपनी भावना को दृढ़ बनाए। सम्मान एवं अहिंसा के अंतर्संबंध की अनुभूति यदि हम मनुष्यों को समझ आ जाए तो निःसंदेह एक सहिष्णु व शुभकारी भविष्य की ओर आगे बढ़ जाएँ।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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