अनुवाद: अतीत-ललक (उर्दू निबंध)

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
(4 सितम्बर 1923- 20 जून 2018)

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


(यह निबंध अतीत-ललक (नास्टैल्जिया) की प्रवृत्ति पर व्यंग्य है जो मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की पुस्तक ‘चिराग़-तले’ के तेरह खटमिट्ठे निबंधों में शामिल है। इसमें आग़ा (तिल्मीज़ुर्रहमान) के रेखाचित्र के माध्यम से उन व्यक्तियों पर व्यंग्य किया गया है जो सिर्फ़ अतीत में जीते हैं और वर्तमान उन्हें नज़र ही नहीं आता। निबंध दिखाता है कि वर्तमान की उपेक्षा करके केवल अतीत में जीने वालों की स्थिति कैसी हास्यास्पद होती है। मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने एक अन्य रचना में अपनी विशिष्ट हास्यपूर्ण शैली में अतीत-ललक को एशिया का विलेन क़रार दिया है और इसे एशियाई देशों में बहुत सी बुराइयों की जड़ माना है। वर्तमान समय में भारत के राजनीतिक वातावरण के सन्दर्भ में यह निबंध बेहद सार्थक है। निबंध के कुछ वाक्य देखें:

“वे (आग़ा) सचमुच में महसूस करते कि उनके लड़कपन में गन्ने ज़्यादा मीठे और मुलायम हुआ करते थे। मेरे सामने कई बार इतनी सी बात मनवाने के लिए मरने-मारने पर तुल गए कि उनके बचपने में चने हरगिज़ इतने सख़्त नहीं होते थे।”

“उनकी शादी के विषय में उतनी ही कहानियाँ थीं जितने उनके दोस्त! कुछ का कहना था कि बी.ए. के नतीजे से इतने निराश हुए कि ख़ुदकुशी की ठान ली। बूढ़े माँ-बाप ने समझाया कि बेटा ख़ुदकुशी न करो, शादी करलो। चुनांचे शादी हो गई। मगर अभी सेहरे के फूल भी पूरी तरह न मुरझाये होंगे कि यह चिंता हो गई कि बचपन उन्हें जवानी के चंगुल में फँसाकर कहाँ चला गया और वे अपनी आज़ादी के दिनों को बुरी तरह याद करने लगे ।”

“लेकिन बीती हुई घड़ियों की कामना करना ऐसा ही है जैसे टूथपेस्ट को वापस ट्यूब में घुसाना! लाख यह दुनिया अंधेरी सही, लेकिन क्या अच्छा हो कि हम अतीत के धुंधले रेखाचित्रों में चीख़ते–चिंघाड़ते रंग भरने के बजाए वर्तमान को प्रकाशमान करना सीखें।”

बात से बात निकालना, लेखनी के हाथों में ख़ुद को सौंपकर मानो केले के छिलके पर फिसलते जाना अर्थात विषयांतर, हास्यास्पद परिस्थितियों का निर्माण, अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन, किरदारों की सनक और विचित्र तर्कशैली, एक ही वाक्य में असंगत शब्दों का जमावड़ा, शब्द-क्रीड़ा, अनुप्रास अलंकार, हास्यास्पद उपमाएं व रूपक, अप्रत्याशित मोड़, कविता की पंक्तियों का उद्धरण, पैरोडी और मज़ाक़ की फुलझड़ियों व हास्य रस की फुहारों के बीच साहित्यिक संकेत व दार्शनिक टिप्पणियाँ, और प्रखर बुद्धिमत्ता यूसुफ़ी साहब की रचना शैली की विशेषताएँ हैं। उनके फ़ुटनोट भी बहुत दिलचस्प होते हैं। इस निबंध में यूसुफ़ी साहब की रचना शैली की अनेक विशेषताएँ विद्यमान हैं। -----अनुवादक

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ख़ुदा उन का भला करे! मुझे वह शाम कभी न भूलेगी जब आख़िरकार आग़ा तिल्मीज़ुर्रहमान चाकसूई से परिचय हुआ। सुनते चले आए थे कि आग़ा अपने बचपन के साथियों के अतिरिक्त, जो अब तक एक हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते थे, किसी से नहीं मिलते और जिस सहमे-सहमे अंदाज़ से उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया, बल्कि मिलवाया उससे भी यही प्रकट होता था कि हर नए मुलाक़ाती से हाथ मिलाने के बाद वे अपनी उंगलियाँ ज़रूर गिन लेते होंगे। दुश्मनों ने उड़ा रखी थी कि आग़ा जिन लोगों से मिलने के इच्छुक रहे उन तक पहुँच न सके और जो लोग उनसे मिलने के इच्छुक थे, उनको मुँह लगाना उन्होंने अपनी शान के ख़िलाफ़ समझा। उन्होंने अपने अस्तित्व ही को अंजुमन (महफ़िल) माना, जिसका नतीजा यह हुआ कि लगातार अपनी ही संगत ने उन्हें ख़राब कर दिया। लेकिन वे स्वयं अपनी समाज-विमुखता का कारण यह बताते थे कि जब पुरानी दोस्तियाँ निभाने की हिम्मत और फ़ुर्सत नहीं तो नए लोगों से मिलने से फ़ायदा? रहे पुराने दोस्त, सो उनसे भी न मिलने में अधिक शान्ति और सुरक्षा महसूस करते। इसलिए कि वे मनोविज्ञान के किसी फ़ॉर्मूले की गुमराहकुन रौशनी में इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि मिलकर बिछड़ने में जो दुख होता है, वह थोड़ी देर मिल-बैठने की क्षणिक ख़ुशी से सात गुना तीव्र और स्थाई होता है और वे बैठे-बिठाए अपने दुखों में वृद्धि करने के पक्ष में नहीं थे। सुना यह है कि उनके कुछ मित्र केवल इस आधार पर उनको प्रिय थे कि वे उनसे पहले मर चुके थे और चूँकि उनसे भेंट की संभावना निकट भविष्य में नज़र नहीं आती थी, लिहाज़ा उनकी यादों को ममीकरण करके उन्होंने अपने हृदय के ममीख़ाने में बड़े क़रीने से सजा रखा था।

लोगों ने इतना डरा रखा था कि मैंने झिझकते हुए आग़ा के कमरे में प्रवेश किया। यह एक छोटा सा धूमिल कमरा था जिसके दरवाज़े की तंगी से अचानक ख़याल आया कि संभवतः पहले पैत्रिक मसहरी और दूसरी भारी-भरकम वस्तुएँ ख़ूब ठसाठस जमा दी गईं, उसके बाद दीवारें उठा दी गई होंगी। मैंने अत्यंत सावधानीपूर्वक अपने आपको एक कोने में पार्क करके कमरे का निरीक्षण किया। सामने दीवार पर आग़ा की चौथाई शताब्दी पुरानी तस्वीर लगी हुई थी, जिसमें वे स्याह गाउन पहने, डिग्री हाथ में लिए यूनिवर्सिटी पर मुस्कुरा रहे थे। उसके बिल्कुल सामने, दरवाज़े के ऊपर दादा-जी के समय की एक कावाक घड़ी टंगी हुई थी जो चौबीस घंटे में सिर्फ़ दो दफ़ा सही समय बताती थी। (यह पंद्रह साल से दो बजा रही थी ) आग़ा कहते थे इस गई- गुज़री हालत में भी यह उन “मॉडर्न” घड़ियों से कई गुना बेहतर है जो चलती तो चौबीस घंटे हैं, मगर एक दफ़ा भी ठीक वक़्त नहीं बतातीं। जब देखो एक मिनट आगे होंगी या एक मिनट पीछे।

दाईं तरफ़ एक ताक़ (आले) में जो फ़र्श की बनिस्बत छत से अधिक निकट था, एक ग्रामोफ़ोन रखा था, जिसकी ऊँचाई पड़ोस में बच्चों की मौजूदगी का पता दे रही थी। ठीक उसके नीचे चीड़ का एक लंगड़ा स्टूल पड़ा था, जिसपर चढ़कर आग़ा चाबी देते और छप्पन-छुरी और भाई छैला पटियाले वाले के घिसे-घिसाए रिकॉर्ड सुनते (सुनने में कानों से अधिक याददाश्त से काम लेते थे)। उससे थोड़ा हटकर बर्तनों की अलमारी थी जिसमें पुस्तकें भरी पड़ी थीं। उनके सतर्क चयन से प्रकट होता था कि उर्दू में जो कुछ लिखा जाना था वह पचीस साल पहले लिखा जा चुका है। (उसी ज़माने में सुना था की आग़ा आधुनिक उर्दू कविता से इस हद तक विमुख हैं कि कवियों को रेडियो सेट पर भी हूट करने से बाज़ नहीं आते। अक्सर फ़रमाते थे कि उनकी जवान रगों में रोशनाई दौड़ रही है। आतिशदान पर काले फ़्रेम में जड़ा हुआ अलविदाई प्रशस्ति-पत्र था जो उनके मातहतों ने पंद्रह साल पूर्व पुरानी दिल्ली से नई दिल्ली तबादला होने पर पेश किया था। उसी समारोह में यादगार के तौर पर आग़ा ने अपने मातहतों के साथ ग्रुप फ़ोटो भी खिंचवाया जिसमें आग़ा के अतिरिक्त हर व्यक्ति बेहद संतुष्ट और ख़ुश नज़र आता था। यह पाँयती टंगा था ताकि रात को सोने से पहले और सुबह उठने के बाद समय के दर्पण में अपनी अलबेली छवि देख सकें।

मुझे अच्छी तरह याद है कि उस समय आग़ा तीन दरवेश-सूरत बुज़ुर्गों के घेरे में महाबली अकबर के युग की ख़ूबियाँ और वरदान अत्यंत आत्मविभोर होकर बयान कर रहे थे। मानो सब कुछ अपनी आँखों से देख चुके हैं। अबुल फ़ज़ल की हत्या तक पहुँचे तो ऐसी हिचकी बंधी कि मालूम होता था कि उन्हें इस दुर्घटना की सूचना अभी-अभी मिली है। इस हरकत पर वे शेख़ू को डाँट-डपट कर ही रहे थे कि इतने में पहला दरवेश बोल उठा:

“अमाँ छोड़ो भी। भला वह भी कोई ज़माना था जब लोग चार घंटे प्रति मील की रफ़्तार से यात्रा करते थे। और अमीर व रईस तक जुमा-के जुमा नहाते थे।”

उसका मुँह आग़ा ने यह कहकर बंद कर दिया: “श्रीमान जी, उस स्वर्ण युग में ऐसी सड़ी गर्मी कहाँ पड़ती थी?”

प्रोफ़ेसर शुक्ला ने आग़ा की हाँ में हाँ मिलाते हुए फ़रमाया: “हमारे समय में भी भारत वर्ष की वर्षा- ऋतु बड़ी ही सुन्दर होती थी।” (मुझे बाद में पता चला कि “हमारे समय” से उनका अभिप्राय हमेशा चन्द्रगुप्त मौर्य का युग होता था जिसपर वे तीन बार “थीसिस” लिखकर नामंज़ूर करवा चुके थे)

इस स्थान पर चुग्गी दाढ़ी वाला दरवेश एकाएकी ओछा वार कर गया। बोला :“आग़ा! तुम अपने समय से साढ़े तीन सौ बरस बाद पैदा हुए हो।”

इसपर आग़ा, शुक्ला जी की ओर आँख मारकर कहने लगे: “तुम्हारे हिसाब से यह बेचारा तो पूरे दो हज़ार साल लेट हो गया। मगर मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। क्या तुम ख़ुद को समय से पहले पैदा होने वालों में शुमार करते हो? क्या समझे?”

शुक्ला जी शर्माते लजाते फिर बीच में कूद पड़े: “यदि तुम्हारा तात्पर्य वही है जो मैं समझा हूँ तो बड़ी वैसी बात है।”

यह नोक-झोंक चल रही थी कि पहला दरवेश फिर गंभीर लहजे में बोला: “नियम है कि कोई युग अपने आपसे संतुष्ट नहीं होता। आज आप अकबर महान के युग को याद करके रोते हैं। लेकिन मुझे विश्वास है कि यदि आप अकबर के युग में पैदा होते तो अलाउद्दीन ख़िलजी के समय को याद करके आँखें छलकाते। अपने युग से असंतुष्ट होना स्वयं विकास की निशानी है।“

“सच तो यह है कि सरकारों के अतिरिक्त कोई भी अपने वर्तमान विकास से संतुष्ट नहीं होता” चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश ने कहा।

मैंने पहले दरवेश को सहारा दिया “आप सही फ़रमाते हैं। इसी बात को हम यूँ भी कह सकते हैं कि अगर कोई बाप अपने बेटे से सौ प्रतिशत संतुष्ट हो तो समझ लीजिए यह परिवार पतनोन्मुख है। इसके विपरीत अगर कोई पुत्र अपने पिता को मित्रों से मिलाने में शरमाने लगे तो यह निशानी है इस बात की कि परिवार आगे बढ़ रहा है।“

“मगर इसको क्या कीजिए कि आजकल के युवा अपने स्वार्थ के लिए बाप को भी बाप ही मान लेते हैं! क्या समझे?” आग़ा ने कहा।

सबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि आग़ा पहली ही मुलाक़ात में मुझसे बेतकल्लुफ़ हो गए ـــــــــــ इतने कि दूसरी संगत में उन्होंने मुझे न सिर्फ़ अपनी पहलौठी का शेर बड़े राग-सुर के साथ सुनाया बल्कि मुझसे अपने वो संपादकीय भी पढ़वाकर सुने जो सत्तरह –अट्ठारह साल पहले उन्होंने अपनी मासिक पत्रिका “गुमशुदा गीत” में पुरानी पीढ़ी के बारे में निम्नलिखित नोट के साथ प्रकाशित किये थे:

“पाठकों का संपादक की राय से सहमत होना आवश्यक नहीं।”

यह मेलजोल दिन-बदिन बढ़ता गया। मैं इस विशेष निकटता पर गर्व महसूस करता था, हालाँकि जलने वालों को ــــــــــ और ख़ुद मुझे भी अपने चरित्र में प्रकट रूप से कोई ऐसी बात नज़र नहीं आती थी जो आग़ा की पसंद का कारण हो। आख़िर एक रोज़ उन्होंने ख़ुद यह गुत्थी सुलझा दी। फ़रमाया “तुम्हारी सूरत हूबहू हमारे एक मामूँ से मिलती है जो मैट्रिक का नतीजा निकलते ही ऐसे ग़ायब हुए कि आज तक कोई ख़बर नहीं।

अंग्रेज़ों का तरीक़ा है कि वे किसी इमारत को उस समय तक सम्मान नहीं देते जब तक वह खंडहर न हो जाए। इसी प्रकार हमारे यहाँ कुछ सतर्क सज्जनगण किसी व्यक्ति के बारे में भले बोल उस समय तक नहीं बोलते जब तक कि उसका चेहलुम1 न हो जाए। आग़ा को भी सुदूर अतीत से, चाहे वह अपना हो या पराया, गहरा आत्मीय प्रेम था, जिसका एक सबूत उनकी 1927 मॉडल की फ़ोर्ड कार थी जो उन्होंने 1955 में एक बूढ़े पारसी से लगभग मुफ़्त ली थी। उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि चलती भी थी और इस धीरज व संयम के साथ कि मोहल्ले के लौंडे-ठलुए जब और जहाँ चाहते चलती गाड़ी में कूदकर बैठ जाते। आग़ा ने कभी रोक-टोक नहीं की। क्योंकि अगले चौराहे पर जब यह धकड़-धकड़ करके दम तोड़ देती तो यही सवारियाँ धक्के लगा-लगाकर वांछित गंतव्य तक पहुँचा आतीं। इस स्थिति में पेट्रोल की बचत तो ख़ैर थी ही, लेकिन बड़ा लाभ यह था कि इंजन बंद हो जाने के कारण कार ज़्यादा तेज़ चलती थी। वाक़ई इस कार का चलाना कला के चमत्कार से कम न था क्योंकि इसमें पेट्रोल से अधिक ख़ून जलता था। आग़ा दिल-ही-दिल में कुढ़ते और अपने कृत्रिम दाँत पीसकर रह जाते। लेकिन कोई यह कार भेंट में लेने के लिए भी तैयार न होता। कई बार तो ऐसा हुआ कि तंग आकर आग़ा कार को शहर से दूर पीपल के नीचे खड़ा करके रातों-रात भाग आए। लेकिन हर बार पुलिस ने कार सरकारी ख़र्च पर ठेल-ठालकर आग़ा के घर सुरक्षापूर्वक पहुँचा दी।

सारांश यह कि इस कार को जुदा करना इतना ही दुश्वार निकला जितना इसको रखना। फिर यह बात भी थी कि इससे बहुत से ऐतिहासिक हादसों की यादें जुड़ी थीं जिनमें आग़ा बेइज़्ज़ती के साथ बरी हुए थे। आख़िरकार एक सुहानी सुबह फ़ोर्ड कम्पनी वालों ने उनको सन्देश भेजा कि यह कार हमें लौटा दो। हम इसकी पब्लिसिटी के लिए अपने पुराने मॉडलों के म्यूज़ियम में रखेंगे और इसके बदले चालू वर्ष के मॉडल की बड़ी कार तुम्हें पेश करेंगे। शहर के हर कॉफ़ी हाउस में आग़ा की ख़ुशनसीबी और कम्पनी की दरियादिली के चर्चे होने लगे। और ये चर्चे उस समय समाप्त हुए जब आग़ा ने इस पेशकश को तिरस्कारपूर्वक ठुकरा दिया।

कहने लगे “दो लूँगा!”

कम्पनी ख़ामोश हो गई और आग़ा मुद्दतों उसके स्थानीय कारिंदों के निकम्मेपन और अदूरदर्शिता पर अफ़सोस करते रहे। कहते थे “लालची कहीं के! पाँच साल बाद तीन देनी पड़ेंगी! देख लेना!”

वे सच्चे दिल से इस युग को कलजुग कहते और समझते थे। जहाँ कोई नई चीज़, नई सूरत नज़र पड़ी और उन्होंने किचकिचा के आँखें बंद कीं और अतीत की स्मृतियों के अथाह समुद्र में ग़ड़ाप से ग़ोता लगाया। और कभी ऐसा नहीं हुआ कि कंधे पर एक आध लाश लादे बरामद न हुए हों। कहीं कोई बात अप्रिय लगी और उन्होंने “हाय री यादें!” कहकर बीते समय और बिछड़ी हुई सूरतों की तस्वीर खींचके रख दी। ज़रा भी कोई अमरीकी तौर-तरीक़ा या फ़ैशन बुरा लगा और उन्होंने कोलम्बस को गालियाँ देनी शुरू कीं। वे सचमुच में महसूस करते कि उनके लड़कपन में गन्ने ज़्यादा मीठे और मुलायम हुआ करते थे। मेरे सामने कई बार इतनी सी बात मनवाने के लिए मरने-मारने पर तुल गए कि उनके बचपने में चने हरगिज़ इतने सख़्त नहीं होते थे। कहते थे आप मानें या न मानें, यह और बात है, मगर यह ठोस हक़ीक़त है कि पिछले पंद्रह-बीस साल में क़ुतुब मीनार की सीढ़ियाँ घिसने की बजाय और ज़्यादा ऊँची हो गई हैं। और इसके सबूत में अपनी हालिया दिल्ली की यात्रा का अनुभव हाँफ-हाँफकर बयान करते। चूँकि हममें किसी के पास पासपोर्ट न था, इसलिए इस मौक़े पर बहस का पल्ला हमेशा उनके पक्ष में झुक जाता। इसी प्रकार की और बातों के अलावा उनका यह भी विश्वास था कि बकरी का गोश्त अब उतना नर्म नहीं होता जितना उनके समय में हुआ करता था। संभव है इसमें कुछ सच्चाई भी हो, मगर वे एक क्षण को भी यह सोचने के लिए तैयार न थे कि इसमें दाँतों का क़ुसूर और आँतों का फ़ितूर भी हो सकता है। वे रेशेदार गोश्त के लिए क़साई की बेईमानी से अधिक बकरी के अपने व्यभिचारों को ज़िम्मेदार ठहराते थे। चुनांचे कभी-कभी ख़लाल2 करते-करते उस ज़माने को याद करके उनका गला रुंध जाता जब बकरियाँ अल्लाह मियाँ की गाय3 हुआ करती थीं।

हमने उन्हें नशा करते नहीं देखा। फिर भी उनका दावा था कि मेरे लड़कपन में सरौली आम ख़रबूज़े के बराबर होते थे। हमने कभी इसका खंडन नहीं किया। इसलिए कि हम अपने गए-गुज़रे ज़माने में रोज़ाना ऐसे ख़रबूज़े बहुत अधिक संख्या में देख रहे थे जो वाक़ई आम के बराबर थे! बात सरौली पर ही समाप्त हो जाती तो सब्र आ जाता, लेकिन वे तो यहाँ तक कहते थे कि पिछले वक़्तों के लोग ज़बरदस्त लम्बे-चौड़े होते थे। सबूत के तौर पर वे अपने ताया जी की रसौली (ट्यूमर) के साइज़ का हवाला देते जो स्थानीय मेडिकल कॉलेज ने स्प्रिट में सुरक्षित कर रखी थी। कहते थे आप सिर्फ़ इसी से उनकी सेहत का अंदाज़ा कर लीजिए। यह सुनकर हम सब एक दूसरे का मुँह देखने लगते, इसलिए कि अव्वल तो हमारे बुज़ुर्ग उनके बुज़ुर्गों के मुक़ाबले में अभी बच्चे ही थे। दूसरे, हममें से किसी के बुज़ुर्ग की रसौली अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई थी।

इस कलजुग का असर जहाँ और चीज़ों, ख़ास तौर पर खाने-पीने की चीज़ों पर पड़ा वहाँ मौसम भी इसके चंगुल से बच न सका। शुरू जनवरी की एक सर्द शाम थी। आग़ा ने ठंडी साँस भरकर कहा, “क्या समय आ लगा है! वर्ना बीस साल पहले जनवरी में ऐसी कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ती थी कि पाँचों वक़्त तयम्मुम4 करना पड़े।” चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश ने सवाल किया, “कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि तुम उस ज़माने में सिर्फ़ ईद की नमाज़ पढ़ते थे?” लेकिन बहुत कुछ बहस-मुबाहिसे के बाद यह तय पाया कि पर्यावरण विभाग के रिकॉर्ड से आग़ा को क़ायल किया जाए।

आग़ा दोनों हाथ घुटनों में देकर बोले “साहब! हम तो इतना जानते हैं कि बीस बरस पहले इतनी कम सर्दी पड़ती थी कि एक पतली सी दुलाई में पसीना आने लगता था और अब पाँच सेर रूई के लिहाफ़ में भी सर्दी नहीं जाती! क्या समझे?”

वे कुछ और दलीलें पेश करना चाहते थे लेकिन उनकी किटकिटी बंध गई और बहस एक दफ़ा फिर उन्ही के पक्ष में समाप्त हो गई।

पुराने शिक्षा पाठ्यक्रम के वे बड़े प्रशंसक और समर्थक थे। अक्सर कहते कि हमारे बचपन में किताबें इतनी आसान होती थीं कि बच्चे तो बच्चे, उनके माँ-बाप भी समझ सकते थे। इसी धुन में अपनी यूनिवर्सिटी का उल्लेख बड़ी ललक से करते और कहते कि हमारे समय में परीक्षक इतने लायक़ होते थे कि कोई लड़का फ़ेल नहीं हो सकता था। क़स्में खा-खाकर हमें यक़ीन दिलाते कि हमारी यूनिवर्सिटी में फ़ेल होने के लिए असाधारण योग्यता दरकार थी। जिस शहर में यह यूनिवर्सिटी स्थित थी, उसे वे अरसे से उजाड़ नगर कहने के आदी थे। एक दिन मैंने आड़े हाथों लिया “आग़ा! ख़ुदा से डरो! वह शहर तुम्हें उजाड़ दिखाई देता है? हालाँकि वहाँ की आबादी पाँच हज़ार से बढ़कर साढ़े तीन लाख हो गई है!”

“मुसलमान हो ?”

“हूँ तो।”

“जहन्नुम पर ईमान है?”

“है।”

“वहाँ की आबादी भी तो रोज़-बरोज़ बढ़ती जा रही है! क्या समझे?”

‘अख़्तर’ शीरानी5 की एक बड़ी मशहूर कविता है जिसमें उन्होंने वतन के लोगों का कुशल-मंगल पूछने के बाद, देश से आने वाले की ख़ूब ख़बर ली है। इस भोले-भाले प्रश्नपत्र के तेवर साफ़ कह रहे हैं कि कवि को पक्का विश्वास है कि उसके परदेस सिधारते ही न सिर्फ़ देश की रीति-रस्म बल्कि मौसम भी बदल गया होगा। और नदी-नाले और तालाब सब एक-एक करके सूख गए होंगे। आग़ा अपने पैत्रिक गाँव चाकसू (ख़ुर्द) से भी कुछ इसी प्रकार की आशाएँ रखते थे।

चाकसू (ख़ुर्द) दरअसल एक प्राचीन गाँव था। जो चाकसू (कलाँ) से छोटा था। यहाँ लोग अब तक हवाई जहाज़ को चील-गाड़ी के नाम से याद करते थे। लेकिन आग़ा अपने मस्तिष्क की लार से उसके इर्द-गिर्द यादों का रेशमी जाला बुनते रहे, यहाँ तक कि उसने एक परतदार कोये का रूप धारण कर लिया जिसे चीरकर (आग़ा की तो क्या बात) सारे चाकसू-वासी बाहर नहीं निकल सकते थे। इधर चंद दिनों से वे उन सँकरी और अंधेरी गलियों को याद करके फूट-फूटकर रो रहे थे, जहाँ बक़ौल उनके जवानी खोई थी। हालाँकि हम सबको उनके जीवन की स्मृतियों में जीवन कम और स्मृतियाँ ज़्यादा नज़र आती थीं, लेकिन जब उनके नॉस्टेल्जिया ने शिद्दत पकड़ ली तो दोस्तों में यह तय हुआ कि उनको दो-तीन महीने के लिए उसी गाँव में भेज दिया जाए जिसकी भूमि उनको स्मृति दोष के कारण स्वर्ग दिखाई देती थी।

चुनांचे पिछले मार्च में आग़ा एक लम्बी मुद्दत (तीस वर्ष) के बाद अपने गाँव गए। लेकिन वहाँ से लौटे तो काफ़ी दुखी थे। उन्हें इस बात से दुख पहुँचा कि जहाँ पहले एक जोहड़ था जिसमें दिन भर भैंसें और उनके मालिकों के बच्चे पड़े रहते थे, वहाँ अब एक प्राइमरी स्कूल खड़ा था। इसमें उन्हें साफ़-साफ़ चाकसू कलाँ वालों की शरारत मालूम होती थी। ज्यों-त्यों एक दिन गुज़ारा और पहली ट्रेन से अपनी पुरानी यूनिवर्सिटी पहुँचे। मगर वहाँ से भी शाम-ही-शाम वापस आए। बेहद दुखी और निराश। उन्हें यह देखकर बड़ी मायूसी हुई कि यूनिवर्सिटी अब तक चल रही है! उन जैसे संवेदनशील आदमी के लिए यह बड़े दुख और अचंभे की बात थी कि वहाँ मार्च में अब भी फूल खिलते हैं और गुलाब सुर्ख़ और पौधा हरा होता है। दरअसल एक आदर्श “ओल्ड बॉय” की तरह वे उस समय तक इस स्वस्थ ग़लतफ़हमी में गिरफ़्तार थे कि सारी चौंचाली और तमाम ख़ुशदिली और बेफ़िक्री उनकी नस्ल पर समाप्त हो गई।

आग़ा की उम्र का भेद नहीं खुला। लेकिन जिन दिनों मेरा परिचय हुआ वे उम्र की उस कठिन घाटी से गुज़र रहे थे जब जवान उनको बूढ़ा जानकर कतराते और बूढ़े कल का लौंडा समझकर मुँह नहीं लगाते थे। जिन लोगों को आग़ा अपना हमउम्र बताते रहे, उनमें अक्सर उनको मुँह-दर-मुँह चाचा जी कहते थे। ख़ैर, उनकी उम्र कुछ भी हो, मगर मेरा विचार है कि वे उन लोगों में से थे जो कभी जवान नहीं होते। जब कभी वे अपनी जवानी के दुष्टाचरण के क़िस्से सुनाने बैठते तो नौजवान उसको सरासर फ़र्ज़ी समझते। वे ग़लती पर थे। क्योंकि क़िस्से ही नहीं, उनकी सारी जवानी पूरी तरह फ़र्ज़ी थी। वैसे यह कोई अनहोनी बात नहीं। इसलिए कि कुछ व्यक्ति उम्र की किसी न किसी मंज़िल को फलाँग जाते हैं। मिसाल के तौर पर शेख़ ‘सादी’6 के बारे में यह विश्वास करने को जी नहीं चाहता कि वे कभी बच्चा रहे होंगे। ‘हाली’7 जवान होने से पहले बुढ़ा गए। मेहदी अफ़ादी8 जज़्बाती तौर पर अधेड़ पैदा हुए और अधेड़ मरे। ‘शिबली’ ने प्राकृतिक आयु के विरुद्ध संघर्ष करके साबित कर दिया कि प्रेम प्रकृति का अतिया 9 (इनाम) है। इसमें बूढ़े-जवान की शर्त नहीं।

मोमिन है तो बे-तेग़ भी लड़ता है सिपाही

और ‘अख़्तर’ शीरानी जब तक जिए नित्य नौजवानी से ग्रसित रहे और अंत में इसी हालत में देह त्यागी इससे ‘अख़्तर’ शीरानी की बुराई या आग़ा की भर्त्सना प्रयोजन नहीं कि मेरे कानों में आज भी आग़ा के वो शब्द गूँज रहे हैं जो उन्होंने टैगोर पर नुक्ताचीनी करते हुए कहे थे “बुरा मानो या भला, लेकिन जवान मौलवी और बूढ़े कवि पर अपना दिल तो नहीं ठुकता। क्या समझे?”

उनकी शादी के संबंध में उतनी ही कहानियाँ थीं जितने उनके दोस्त! कुछ का कहना था कि बी.ए. के नतीजे से इतने निराश हुए कि ख़ुदकुशी की ठान ली। बूढ़े माँ-बाप ने समझाया कि बेटा ख़ुदकुशी न करो, शादी करलो। चुनांचे शादी हो गई। मगर अभी सेहरे के फूल भी पूरी तरह न मुरझाये होंगे कि यह चिंता हो गई कि बचपन उन्हें जवानी के चंगुल में फँसाकर कहाँ चला गया और वे अपनी आज़ादी के दिनों को बुरी तरह याद करने लगे। यहाँ तक कि उस नेक बीबी को भी दया आ गई और वह हमेशा के लिए अपने मायके चली गई।

उससे महेर10 माफ़ करवाने के ठीक पंद्रह वर्ष बाद एक वृद्ध महिला से केवल इस कारण विवाह किया कि पैंतीस वर्ष और तीन पति पूर्व महोदया ने चाकसू में उनके साथ अमावस की रात में आँख मिचौली खेलते समय चुटकी काटी थी, जिसका नील उनके स्मृति-पटल पर ज्यों-का-त्यों सुरक्षित था। लेकिन आग़ा अपनी आदत से मजबूर थे। उसके सामने अपनी पहली पत्नी की उठते-बैठते इस क़दर प्रशंसा की कि उसने बहुत जल्द तलाक़ ले ली। इतनी जल्द कि एक दिन उंगलियों पर हिसाब लगाया तो बेचारी का वैवाहिक जीवन इद्दत11 की मुद्दत से भी मुख़्तसर निकला! आग़ा हर साल बहुत पाबंदी और धूम-धाम से दोनों तलाक़ों की सालगिरह मनाया करते थे। पहली तलाक़ की सिल्वर-जुबली में प्रस्तुत लेखक को भी शरीक होने का इत्तिफ़ाक़ हुआ।

दूसरी शादी अर्थात ख़ाना-बरबादी के बाद शादी नहीं की, हालाँकि आँखों में अंतिम दम तक सेहरे के फूल खिलते और महकते रहे।

यूँ तरंग में हों तो उन्हें हर बुद्धिमान और बालिग़ महिला में अपनी जीवन-संगिनी बनने की योग्यता नज़र आती थी। ऐसे नाज़ुक व नायाब क्षणों में वे किताबों की अलमारी से बियर पीने का एक ग्लास निकालते जो एक यादगार नुमाइश से दूध पीने के लिए ख़रीदा था। अब उसमें शिकंजबीन भरके घूँट-घूँट हलक़ में उंडेलते रहते और अतीत के नशे से चूर होकर ख़ूब बहकते। अपने आप पर संगीन तोहमतें लगाते और नारी-जाति को नुक़सान पहुँचाने के सम्बन्ध में अपनी 55 वर्षीय योजनाओं की घोषणा करते जाते। फिर जैसे-जैसे उम्र और अनुभवहीनता बढ़ती गई वे हर मौन महिला को अर्ध-सहमत समझने लगे। न जाने क्यों और कैसे उन्हें यह आशंका हो गई थी कि हव्वा की सारी बेटियाँ उन्ही की घात में बैठी हैं, मगर किसी अल्लाह की बंदी की हिम्मत नहीं पड़ती कि उनकी मग़रूर गर्दन में घंटी बाँध दे। लेकिन सिवाय आग़ा के सब जानते थे कि वे नारी जाति के समक्ष आपादमस्तक “!” बनकर गए जबकि उन्हें साकार “?” होना चाहिए था। एक दिन चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश ने दबी ज़ुबान से कहा कि “आग़ा तुम चौखट ही चूमते रह गए। खटखटाने की हिम्मत तुम्हें कभी नहीं हुई।” हँसे। कहने लगे, “मियाँ! हम तो दरवेश हैं। एक घूँट लिया, दिल शाद किया, ख़ुशवक़्त हुए और चल निकले12 । मलंग के दिल में सबील (प्याऊ) पर क़ब्ज़ा करने की इच्छा नहीं होती।”

सिनेमा देखने के शौक़ीन थे। हालाँकि इसके मौक़े बहुत कम मिलते थे। सिर्फ़ वो चलचित्र चाव से देखते जिनमें उनके ज़माने की प्रिय एक्ट्रेसें हीरोइन की भूमिका निभा रही हों। मगर दिक़्क़त यह थी कि उनके चेहरे या तो अब स्क्रीन पर नज़र ही नहीं आते थे, या फिर ज़रुरत से ज़्यादा नज़र आ जाते थे। उनमें से जो जीवित थीं और चलने फिरने के क़ाबिल, अब वे हीरोइन की नानी और सास की भूमिका बहुत अच्छी तरह निभा रही थीं, जिससे ज़ाहिर है आग़ा को क्या दिलचस्पी हो सकती थी। अलबत्ता छठे-छमाहे “पुकार” या “माता हारी” क़िस्म की फ़िल्म आ जाती तो आग़ा के दिल का कमल खिल जाता। चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश का बयान है कि आग़ा ग्रेटा गार्बो पर सिर्फ़ इसलिए फ़िदा थे कि वह उन्ही की उम्र की थी। हालाँकि इस प्रकार की फ़िल्में देखकर हर स्वस्थ आदमी को अपनी सुनने और देखने की क्षमता पर संदेह होने लगता, लेकिन आग़ा को उसके दृश्य और डायलाग मुँहज़ुबानी याद हो चुके थे और वे इस मामले में, हमारी आपकी तरह अपनी पाँच इन्द्रियों के बिल्कुल भी मोहताज न थे। ये बासी फ़िल्में देखते समय उन्हें एक बाढ़ पर आए हुए बदन की जानी-पहचानी तेज़ और तीखी महक आती जो अपने ही वजूद के किसी कुंज से फूटती हुई महसूस होती थी।

बासी फूल में जैसे ख़ुशबू, फूल पहनने वाले की13

उनके मिटते हुए चेहरे में और उन जगहों पर जहाँ पचीस साल पहले दिल बुरी तरह धड़का था, उन्हें एक बिछड़े हुए हमज़ाद (छायापुरुष) का अक्स दिखाई देता जो समय के उस पार उन्हें बुला रहा था।

सब जानते थे कि आग़ा की ज़िन्दगी बहुत जल्द एक ख़ास बिंदु पर पहुँचकर ठहर गई-----जैसे ग्रामोफ़ोन की सूई किसी मीठे बोल पर अटक जाए। लेकिन कम मित्रों को मालूम होगा कि आग़ा अपने मानसिक हकलेपन से बेख़बर न थे। अक्सर कहा करते कि जिस समय मेरे हमजोली कबड्डी में समय बरबाद करते होते, तो मैं अकेले जोहड़ के किनारे बैठा अपनी याददाश्त से रेत और गारे का लाल क़िला बनाता जिसे मैंने पहली बार उस ज़माने में देखा था जब हलवा सोहन खाते हुए पहला दूध का दाँत टूटा था। बड़े होकर आग़ा ने यह शाहजहानी शौक़ (हमारा संकेत हलवा सोहन से दाँत उखाड़ने की ओर नहीं, क़िलों के निर्माण की ओर है) त्यागा नहीं। बस थोड़ा संशोधन कर लिया। अब भी वे यादों के क़िले बनाते थे। अंतर केवल इतना था कि अब बेहतर मसाला लगाते और रेत के बजाय असल संगमरमर बहुत अधिक मात्रा में इस्तेमाल करतेــــــــــــ बल्कि जहाँ सिर्फ़ एक सिल की गुंजाइश होती, वहाँ दो लगाते। बुर्ज और मीनार नक़्शे के मुताबिक़ बेजोड़ हाथी दाँत के बनाते। काफ़ी मुद्दत तक शीशे की प्राचीर पर अपनी मंजनीक़ लगाकर वे बौनों की दुनिया पर पथराव करते रहे। इन क़िलों में दुश्मन के प्रवेश करने का कोई रास्ता नहीं था। बल्कि आग़ा ने ख़ुद अपने निकलने का भी कोई रास्ता नहीं रखा था।

यह नहीं कि उन्हें इसका अहसास न हो। अपना हाल उनको बख़ूबी मालूम था। इसकी जानकारी हमें यूँ हुई कि एक दिन बातों ही बातों में यह बहस चल निकली कि अतीत-प्रेम कमज़ोरी पैदा करता है। पहले दरवेश (जिनका रूपया उनकी जवानी से पहले जवाब दे गया) ने समर्थन करते हुए फ़रमाया:

“जितना समय और रूपया बच्चों को “मुसलमानों के विज्ञान पर उपकार” रटाने में ख़र्च किया जाता है, उसका दसवाँ हिस्सा भी बच्चों को विज्ञान पढ़ाने में ख़र्च किया जाए तो मुसलमानों पर बड़ा उपकार होगा। विचार कीजिए तो अमरीका के विकास का कारण यही है कि उसका कोई अतीत नहीं।”

चुग्गी दाढ़ी वाला दरवेश बोला: “पुरानी दास्तानों में बार-बार ऐसे भुतहे रेगिस्तान का उल्लेख होता है, जहाँ आदमी पीछे मुड़कर देख ले तो पत्थर का हो जाए। यह रेगिस्तान हमारे अपने मन के अन्दर है, बाहर नहीं!”

पहले दरवेश ने बिफरकर देवमाला से तर्कसंगत नतीजा निकालते हुए कहा: “अपने अतीत से लगाव रखने वालों की मिसाल एक ऐसे प्राणी के जैसी है जिसकी आँखें गुद्दी के पीछे लगी हुई हों। छान-बीन कीजिए तो बात-बात पर “याद अय्या मायका” और “हाय री यादें!” की हाँक लगाने वाले वही निकलेंगे जिनका कोई भविष्य नहीं।”

आग़ा ने अकस्मात् अतीत की हरी घाटी से सिर निकालकर फ़ायर किया: “‘हाय री यादें!’ की भी एक ही रही। अपनी तो धारणा है कि जिसे अतीत याद नहीं आता उसकी ज़िन्दगी में शायद कभी कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन जो अपने अतीत को याद ही करना नहीं चाहता वह ज़रूर लोफ़र रहा होगा। क्या समझे?”

मुद्दतें गुज़रीं। ठीक याद नहीं बहस किन मर्माहत चरणों से गुज़रती इस अमूर्त बिंदु पर आ पहुँची कि अतीत ही असल सत्य है। इसलिए कि एक न एक दिन यह अजगर वर्तमान और भविष्य दोनों को निगल जाएगा। देखा जाए तो हर लम्हा और हर पल, हर क्षण और हर निमिष अतीत की जीत हो रही है। आने वाला कल आज में और आज बीते हुए कल में बदल जाता है। इसपर पहले दरवेश ने यह फ़ैसला फ़रमाया कि “एशिया का हाल उस व्यक्ति जैसा है जिसने

गए जनम की तमन्ना में ख़ुदकुशी करली

प्राच्य संस्कृति ने कभी पल के रूप-स्वरूप से प्यार करना नहीं सीखा। जीना है तो फिसलते-सरसराते लम्हों को दाँतों से पकड़ो। बीतते क्षण को बेझपक छाती से लगाओ कि इसकी नस-नस में अतीत का गुनगुना रक्त दौड़ रहा है। इसकी जीती-जीती कोख से भविष्य जन्म लेगा और अपनी छलबल दिखाकर अंततः उसी की ओर लौटेगा।”

यहाँ चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश ने अचानक ब्रेक लगाया: “आपके नन्हे-मुन्ने क्षण की कुलीनता में कोई संदेह नहीं। लेकिन बीती हुई घड़ियों की कामना करना ऐसा ही है जैसे टूथपेस्ट को वापस ट्यूब में घुसाना! लाख यह दुनिया अंधेरी सही, लेकिन क्या अच्छा हो कि हम अतीत के धुंधले रेखाचित्रों में चीख़ते–चिंघाड़ते रंग भरने के बजाए वर्तमान को प्रकाशमान करना सीखें।”

आग़ा ने एक बार फिर तुरुप फेंका: “भई, हम तो रसोईघर पर सफ़ेदी करने के क़ायल नहीं!”

बात यह है कि बहुत कम लोग जीदारी से अधेड़पन का मुक़ाबला कर पाते हैं। मूढ़ हों तो उसके अस्तित्व से ही विमुख। और थोड़ा बुद्धिमान हों तो पहला सफ़ेद बाल नज़र पड़ते ही अपनी काया को अतीत की अंधी सुरंग के शीतल अंधेरों में ठंडा होने के लिए डाल देते हैं। और वहाँ से निकलने का नाम नहीं लेते जब तक कि समय उनके सिरों पर बर्फ़ के गाले न बिखेर दे। बाल सफ़ेद करने के लिए यद्यपि किसी त्याग और तपस्या की आवश्यकता नहीं, फिर भी एक रचे-बसे गरिमामय आत्मसमर्पण के साथ बूढ़े होने की कला और एक आन के साथ पस्पा होने के पैंतरे बड़ी मुश्किल से आते हैं। और यह एक बुढ़ापे तक ही सीमित नहीं। सुन्दरता और जवानी से लुत्फ़ उठाने का सलीक़ा कुछ-कुछ उस समय पैदा होता है जब वाह एक गहरी आह और आह एक लम्बी कराह में बदल चुकी होती है।

क़ुदरत के खेल निराले हैं। जब वह दाँत देती है तो चने नहीं होते। और जब चने देने पर आती है तो दाँत नदारद। आग़ा की त्रासदी यह थी कि जब क़ुदरत ने उन्हें दाँत और चने दोनों दिए तो उन्होंने दाँतों को इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन जब दाँत इस्तेमाल न होने से कमज़ोर होकर एक-एक करके गिर गए तो उन्हें पहली दफ़ा चनों के सोंधे अस्तित्व का अहसास हुआ। पहले तो बहुत सटपटाए। फिर दाँतों को याद करके ख़ुद रोते और दुनिया को रुलाते रहे। लालित्यपूर्ण वर्णन एक तरफ़, लेकिन वास्तविकता यह है कि आग़ा ने बचपन और जवानी में शतरंज के सिवा कोई खेल नहीं खेला। हद यह है कि जूते के तस्मे भी खड़े-खड़े अपने नौकरों से बंधवाए। मगर ज्यों ही पचपन के पेटे में आए, इस बात से बड़े दुखी रहने लगे कि अब हम तीन क़िस्तों में भी एक बैठक नहीं लगा सकते। इसमें वे कुछ अतिश्योक्ति से काम लेते थे, क्योंकि हमने अपनी आँखों से देखा कि न सिर्फ़ एक ही हल्ले में अड़अड़ा के बैठ जाते, बल्कि अक्सर-बेशतर बैठे ही रह जाते। इस लिहाज़ से चुग्गी दाढ़ी वाले दरवेश भी कुछ कम न थे। जीवन भर कैरम खेला और जासूसी उपन्यास पढ़े। अब इस हालत को पहुँच गए थे कि अपने जन्मदिन की मोमबत्तियाँ तक फूँक मारकर नहीं बुझा सकते थे। लिहाज़ा उनके नाती को पंखा झलकर बुझाना पड़ती थीं। इसके अलावा नज़र इतनी मोटी हो गयी थी कि औरतों ने उनसे पर्दा करना छोड़ दिया। उम्र का अनुमान बस इससे लगा लीजिए कि तीन कृत्रिम दाँत तक टूट चुके थे। अनंत की यात्रा की इन सामग्रियों के साथ, शुक्ला जी और आग़ा के सामने अक्सर चौपाई के पर्दे में अपनी एक कामना खुल्लम-खुल्ला अभिव्यक्त करते जिसे कमोबेश अर्ध-शताब्दी से अपना ख़ून पिला-पिलाकर पाल रहे थे। सारांश इस सतत लालसा का यह था कि निन्यानवे वर्ष की आयु पायें और मरने से पहले एक बार ــــــــ बस एक बार आपराधिक छेड़-छाड़ के मामले में गिरफ़्तार हों। एक बार ज़ुकाम हुआ था। मुझसे फ़रमाइश की “मियाँ! ज़रा तुम मेरी चौपाई तरन्नुमI से पढ़कर सुनाओ।” मैं हिचकिचाया। फ़रमाया “पढ़ो भी। शरीयत और शायरी में काहे की शरम!”

हालाँकि आग़ा सारी उम्र समय की चलती चाकी के पाटों के बीच पिसते रहे, लेकिन चाकसू की याद से एक पल ग़ाफ़िल नहीं रहे। चुनांचे उनकी मैयत अंतिम वसीयत के अनुसार सात सौ मील दूर चाकसू ख़ुर्द ले जायी गयी। और चाकसू कलाँ की ओर पाँव करके उसे क़ब्र में उतारा गया।

निःसंदेह आग़ा जन्नती (स्वर्गवासी) थे। क्योंकि वे किसी के बुरे में नहीं थे। उन्होंने अपने अस्तित्व के सिवाय किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाया। उनके जन्नती होने में यूँ भी संदेह नहीं कि जन्नत एकमात्र ऐसी जगह है जिसका वर्तमान और भविष्य उसके अतीत से बेहतर नहीं हो सकता!

लेकिन न जाने क्यों मेरा दिल गवाही देता है कि वे जन्नत में भी ख़ुश नहीं होंगे और ‘हाय री यादें!’ कहकर जन्नत वासियों को उसी बीती दुनिया की पुरानी दास्तान सुना-सुनाकर ललचाते होंगे जिसे वे जीते जी जहन्नुम समझते रहे।

(चिराग़ तले)

अनुवादक : डॉ. आफ़ताब अहमद

वरिष्ठ व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क



I तरन्नुम से: गाकर



संदर्भ

1. चेहलुम: किसी की मौत के चालीस दिन बाद एक रस्म जिस में मृतक की रूह को लाभ पहुँचाने के लिए क़ुरान की तिलावत की जाती है और ग़रीबो व रिश्तेदारों को खाना खिलाया जाता है।
2. ख़लाल करना: छोटे तिनके से दाँतों में फँसे भोजन को खोदकर निकालना।
3. अल्लाह मियाँ की गाय: बेहद सीधी-सादी ; भोली-भाली
4. तयम्मुम करना: दोनों हथेलियाँ, उँगलियों समेत, सूखी और पवित्र मिट्टी या किसी ऐसी साफ़ दीवार जिस पर गर्द की तह जमी हो, पर फेरना और फिर हथेलियों को मुँह और बाज़ुओं पर फेरना तयम्मुम करना कहलाता है। मुसलमानों को नमाज़ या क़ुरान पढ़ने के लिए वज़ू करने का पानी न उपलब्ध हो या पानी से बीमारी का ख़तरा हो तो तयम्मुम करके नमाज़ पढ़ी जा सकती है। (अनुवादक)
5. अख़्तर’ शीरानी: (1905-1948) उर्दू की रूमानी शायरी के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी शायरी में सौन्दर्य बोध, सौन्दर्य पूजा और स्त्री-प्रेम को प्रमुखता प्राप्त है।
6. शेख़ ‘सादी- तेरहवीं शताब्दी के फ़ारसी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार।‘गुलिस्ताँ’ व ‘बोस्ताँ’ उनकी दो विश्वविख्यात उपदेशप्रधान रचनायें हैं। कई सौ साल तक ये रचनाएँ फ़ारसी पाठ्यक्रम का मूल ग्रन्थ रही हैं।
7. मौलाना अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ (1837–1914): उर्दू के प्रसिद्ध शायर व लेखक। सर सैयद आन्दोलन के एक स्तंभ। अपनी रचना मुसद्दस-ए-हाली और उसकी भूमिका लिखने के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं।, भूमिका को उर्दू शायरी की आलोचना की पहली पुस्तक होने का श्रेय प्राप्त है।
8. मेहदी अफ़ादी- उर्दू साहित्य में रूमानी और ललित निबंध लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं। (अनुवादक)
9. अल्लामा शिबली नोमानी- उर्दू, फ़ारसी और अरबी के विद्वान्, इतिहासकार ,आलोचक, शायर, धर्मशास्त्री। सुप्रसिद्ध मदरसा नदवतुल-उलेमा (लखनऊ) के संस्थापक । वृद्धावस्था में उनके अतिया फ़ैज़ी नाम की एक सुन्दर और बहुत पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिला से इश्क़ के चर्चे सुनने में आते हैं। उन्होंने अतिया फ़ैज़ी को पचास से ज़्यादा ख़त लिखे। अतिया फ़ैज़ी के साथ उर्दू के महान शायर अल्लामा इक़बाल का नाम भी जोड़ा जाता रहा है। (अनुवादक)
10. महर: वह धनराशि जो पति द्वारा पत्नी को देय होती है। इसे पत्नी से पहली बार एकांत में मिलने पर तुरंत या पत्नी की माँग पर अदा करना होता है। पत्नी यह रक़म माफ़ भी कर सकती है। एक मान्यता है कि पति-पत्नी से उस समय तक संभोग जायज़ नहीं जबतक उसने पत्नी का महर अदा न कर दिया हो या उससे माफ़ न करवा लिया हो। (अनुवादक)
11. मुसलमानों में तलाक़ या पति की मृत्यु के बाद औरत चार महीने दस दिन तक दूसरा विवाह नहीं कर सकती और न ग़ैर मर्दों से मिल सकती है। इस समय को इद्दत कहते हैं।
12. मक़सद जिनके देखने से वो घर से जब इक पल निकले
टुक देख लिया, दिल शाद किया, ख़ुशवक़्त हुए और चल निकले (नज़ीर अकबराबादी)
13. दिल में मेरे अब तक है मस्ती उस बिछड़े मतवाले की
बासी फूल में जैसे ख़ुशबू फूल पहनने वाले की

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