अभिनव गीतों का रचना संसार: वर्तमान परिदृश्य (मनोहर अभय)

मनोहर अभय
लेखन कैसा भी हो, उसका अपना दृष्टिबोध (विजन) आवश्यक है। बाइबिल कहती है, "बिना दृष्टिबोध के मानव समाज विनिष्ट हो जाता है।" लिखते समय रचनाकार सारी अभीप्साओं से रिक्त हो, अंतर्भूत आनन्द की जिस अजस्र धारा में डूब जाता है, उसकी वह मनोदशा शब्दातीत है। फिर भी पाठक जानना चाहेंगे कि क्या उसके लेखन का कोई दर्शन है।कोई अभीष्ट जिसे वह प्राप्त करना चाहता है। हिंदी साहित्य में नवगीतों का रचना-क्रम पिछले साठ-सत्तर साल से चल रहा है। कहते हैं ये गीत देशज संस्कृति और सोच को व्यक्त करते हैं; जबकि इनका उदय नई कविता की खुरदरी जमीन तोड़ कर हुआ। मानो चट्टानों की संधि में उभर आया हो 'कुटज'। नई कविता पश्चिम की देन है, जो तार्किकता, वैज्ञानिकता और आधुनिकता की लाल -पीली  झालरों वाली शर्ट-स्कर्ट पहन कर मंच पर अवतरित हुई। नई कविता की समानांतर धारा होने के कारण नवगीत भी कुछ काट -छाँट कर ऐसी ही पोशाक पहन कर सामने आए जिनमें बिम्ब और प्रतीकों के सलमा सितारे जड़े थे। ये गीत आज तक अपना 'खाँचा-ढाँचा ' तय नहीं कर पाए। न इनकी कोई परिभाषा है। अतुल्य कीर्ती व्यास ने जरूर इन्हें परिभाषित करने की कोशिश की: "नवगीत वह गीत है, जो गीत की शाश्वत  विशेषताओं के साथ, समय सापेक्ष आवश्यकताओं के अनुरूप सार्थक कथ्य  को नए  बिम्बों, प्रतीकों, उपमाओं व उपमानों के माध्यम से, सहज बनाकर स्वयं को अभिव्यक्त करे"। परिभाषा को अधिक स्पष्ट करते हुए वे कहती हैं, "जिस गीत में भावमयता, मनोवैज्ञानिकता, संक्षिप्तता,सहज गेयता-सम्प्रेषणीयता, ग्राह्य भाषा-शैली और नवीनता हो वही नवगीत है। यहाँ नवीनता का तात्पर्य  नवीन छंद, नवीन शब्द-योजना,तथा उपमा-उपमानों की नव्यता से है, जो परम्परागत शिल्प से आगे जाते हुए प्रतीत हों (देखें नवगीत: एक परिचय- नवगीत और हिन्दी चित्रपट गीतिकाव्य)। वस्तुतः ये परिभाषा से अधिक, नवगीतों के लक्षणों की व्यख्या है।  

किशन सरोज कहते हैं, "मैं भाषा, छंद कथ्य एवं शिल्प में वह नवीनता लाया जिसने मेरे गीतों को नवगीत बनाया.. .मेरे गीतों जैसा शिल्प एवं बिम्ब विधान कहीं और नहीं मिलेगा। मैं भले ही नवगीतकार नहीं बना,लेकिन मेरे गीत नव की श्रेणी में हैं।" (देखें किशन सरोज समग्र पृ.351)। ऐसा इसलिए हुआ कि किशन सरोज ने नवगीत के लक्षणों का पालन किया, लक्ष्मण रेखाओं का नहीं। नाम के साथ उपनाम लगाया, गीत गा कर सुनाए  कवि-सम्मेलनों में। कथ्य में रागात्मकता का आधिक्य रहा। जब नवगीत में लय, गेयता और छंद-बद्धता अनिवार्य है, तो गाने पर प्रतिबंध, हास्यास्पद ही कहा जायेगा। किशन सरोज की उपेक्षा के पीछे कारण कोई भी रहा हो, उसकी लोकप्रियता अपने समय में शीर्ष पर थी। कोई नवगीतकार आज तक इतना जनप्रिय नहीं हुआ।

कभी डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने आशा व्यक्त की थी कि नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा।" पता नहीं आधुनिक निकायों और नवीन प्रविधियों का संतुलन कब होगा? सत्तर साल का वार्धक्य ढोते गीत भी, नवगीत हैं। आज के नवगीतों में वही विषाद-अवसाद, असंतोष है, वही रोष-आक्रोश जो नई कविता में रहा। उल्लास नहीं, ह्रास है। आदमी में स्फूर्ति, ऊर्जा और नई जिजीविषा पैदा करने की जगह ये हताशा, निराशा भग्नाशा पैदा कर रहे हैं। विषादोन्मुखी निरीहता। मानो युद्ध की विभीषिका देख धनुर्धारी पार्थ के पाँव काँप रहे हों, मुँह सूख रहा हो, त्वचा जल रही हो और छूट रहा हो हाथों से गाण्डीव। दिनकर के शब्द हैं:"आदमी के बारे में\मैं केवल यह चाहता हूँ कि उसके भीतर चिंगारी अभंग रहे\ अपनी आग को वह कभी बुझने न दे\  आपदाएँ पड़ें \ वीरता के साथ सहे\ चिंगारी चमकती रहे \सदा उज्जवल होकर\ उज्जवल होकर \ आदमी बचाए उसे सर्वस्व खोकर। लेकिन, हाय! सभ्यता ने तृष्णा की अति से उस आग को कुचल डाला है ...  चिंगारी जब बुझ जाती है,शैतान का काम बन जाता है"। दिनकर का एक- एक शब्द आज के परिदृश्य को चित्रांकित करता है।

 गीत शब्द सुनते ही मन में एक ओज, एक मिठास और जीने की नई अभिलाषा जाग उठती है। वह  गीत कैसा जो घर को चीरघर और बस्ती को पागलखाने जैसा देखे  (जलते जंगल जैसे देश\ और कत्लगाह से नगर \पागलखानों सी बस्ती\चीरफाड़घर जैसे घर \अपने ही बने जाल में हँस-हँस  कर फँसते लोग-- -
डॉ. ओमप्रकाश सिंह)। लगता है हम विषाद पैदा करने वाले गीत लिख रहे हैं। मैलोडी नहीं, मातमी धुन वाले शोकगीत (एलेगी)। शोक आदमी को दुर्बल बनता है। गृह-रति के साथ पलायनवादी।आज हमारा 'सामजिक' समाजोन्मुखी होने की जगह अंतर्मुखी होता जा रहा हैं, अपने में सिमटता हुआ। संयुक्त परिवार तो बिखर ही गए, एकल का स्थायित्व भी संकट में है। जब परिवार ही नहीं, तो समाज का क्या वजूद। समाज की आधार शिला तो परिवार होते हैं। ये बनते-बिगड़ते है, हमारे अपने संस्कारों से।

सांस्कृतिक चेतना
स्वाधीनता के बाद मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना में आई गिरावट चिंतनीय है। इस दौरान लिखे गीतों को  नवगीत  की प्रतिष्ठा मिल रही है। जब कि सामाजिकों की वैचारकी बहुत कुछ बदल चुकी है।यांत्रिकी और  प्राब्धिकी के विस्तार ने आदमी को मशीन बना कर रख दिया है। पदार्थों की तरह वह भी खुरदरा, संवेदन -हीन, संज्ञा- शून्य सा होता जा रहा है। अपंग को लग्जरी- कार कुचल कर निकल गयी, लोग सैल्फी लिए जा रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।लगता है आदमी के अंदर की आदमियत मर गई है। विनष्ट हो गई मानवीय मूल्यों से सम्पन्न मनुजता।आज आवश्यकता है सांस्कृतिक क्रांति (कल्चरल रिवोल्युशन) की। इस महाक्रांति का संवाहक होगा क्रांतदर्शी कवि,जागरूक साहित्यधर्मी, मुक्तचेता बुद्धिजीवी। स्रोत होगा शताब्दियों से लोकधर्म सिखाती अपनी समृद्ध संस्कृति।  जिसका मूल मंत्र है 'मनुर्भव:(मनुष्य बनो)। संस्कृति संस्कारों की जननि है। आदि शंकर कहते हैं 'हमारे भीतर जो दोष हैं, आभाव हैं उनको निकालें और सद्गुणों को ग्रहण करें। यह निकालने और ग्रहण करने की प्रक्रिया ही संस्कार है( दोषापनयेन गुणाधान संस्कारः देखें आदि शंकर का ब्रह्मसूत्र भाष्य)। यही बात आचार्य चरक (300 -200 ई.पू.) ने कही (संस्कारोहि गुणान्तरा धान मुच्चते)। संस्कार सद्विचार और सदाचार के नियामक होते हैं।किसी उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कुछ विशेष गुणों की अभिवृद्धि (वैल्यू ऐडीशन) की जाती है। ऐसे ही मनुष्य की श्रेष्ठता के लिए उसे संस्कार युक्त  किया जाता है। कर्म मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी है। ऋचा कहती है पुरुषार्थहीन (कर्म  न करने वाला) दस्यु है।  इसके विपरीत सद्कर्मी श्रेष्ठ (अकर्मा दस्युरभि  -ऋक .10\22\8)। 

सोम को समर्पित प्रार्थना  है: हे सोम! आप हर्षित होकर हमारे मन को बल,कार्यकुशलता,कल्याणकारी शक्ति, श्रेष्ठता तथा मित्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करें (भद्रं नो  अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम्--ऋक10 \25 \1) 

'भद्रं' में सम्मिलित हैं दया, करुणा, आर्जव (सरलता, विनम्रता), मार्दव (मृदुलता), शील, न्याय, ज्ञान, परोपकार, संवेदनशीलता, सहिष्णुता, प्रीति, रचनाधर्मिता, सहकार, निसर्ग से संसर्ग, राष्ट्र- प्रेम और आदर्श पुरुषों (रोल मॉडल) के प्रति श्रद्धा। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः (वही परम ज्ञानी है जो सभी प्राणियों को अपने जैसा (आत्मवत्) समझता हो। ऐसा उदार संदेश ही  हमारी रचना-धर्मिता की प्राणशक्ति हो सकता है। यही मनुष्यों में उदात्त भाव भर कर उन्हें अधिक संवेदनशील बना सकता है।

संस्कृति अपने में पूर्ण कोई स्वतंत्र मूल्य नहीं।यह मूल्यों का संकुल है। इतिहास, कला, साहित्य, शिक्षा, नीति, रीति – रिवाज और  परम्पराओं का संघात। साहित्यकार हो या कलाकार संस्कृति के अमूर्त अवयवों को किसी नीतिकार या प्रवचन- कर्ता की तरह सीधे सपाट रूप में प्रस्तुत नहीं करते।वे वाह्य  उपादानों के अवलम्बन से उन्हें मूर्त रूप देते हैं, जो शिष्ट, शालीन और सुन्दर हों। सामान्य व्यक्ति के लिए  अरुणिम उषा मात्र सुबह का संकेत है।कवि के लिए उषा अमृतस्वरूपा देवि या पुरातन होकर भी यौवना है ('देव्यमतर्या' या पुराणि देवि युवति'(ऋक. 3\61\1-2)। ऋचा कहती है: ‘प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी हो गई है जैसे सद्यस्नाता हो। वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है,किन्तु हमें उस सौन्दर्य के दर्शन  कराना चाहती है। संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई, दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है। यह सद्पुरुषों को   ऐश्वर्य देती है (देखें डॉ. श्याम गुप्त का आलेख "गीत कालजयी हैं")

वैज्ञानिकता
शास्त्रकारों ने कविता में रमणीयता, लावण्यता, और रसात्मकता की बात कही है, जो सामाजिक को आनंदानुभूति करा सके। लेकिन नवगीतकार न रमणीयता से आकर्षित होते हैं, न आनंदानुभूति से।उन्हें लावण्यता नहीं, खुरदरापन चाहिए जिसमेँ वैज्ञानिकता,तार्किकता और आधुनिकता हो। पश्चिम की देन, वैज्ञानिकता  दर्शन,कला और  धर्म से प्राप्त ज्ञान को स्वीकार नहीं करती।यह  विज्ञान को  समस्त ज्ञान का मूल स्रोत मानती है। अनुभूति के स्तर पर भारतीय रससिद्ध कवियों ने इस त्रिपुटी को रमणीयता में सन्निहित किया है। जलवृष्टि करते बादलों के विषय में वैज्ञानिक कहते हैं ‘मेघ धुएँ, आग,पानी और वायु का संघात है। वायु में धुएँ के रूप में  सूक्ष्मातिसूक्ष्म धूलि कण छाए रहते हैं। पानी के संघर्ष से इन कणों को विद्युत (आग) घेर लेती है। फिर भाप के रूप में ये अंतरिक्ष में व्याप्त जल को अपने में समाहित कर मेघ रूप धारण कर लेते हैं। सत्य होते हुए भी यह कथ्य नितांत नीरस है, माधुर्य रहित। मनोभावों से रिक्त। अब पढ़िए कालिदास को "धुएँ, पानी, धूप और हवा का जमघट बादल कहाँ? कहाँ संदेश  की वे बातें जिन्हें सचेतन  इन्द्रियों वाले प्राणी ही पहुँचा पाते हैं? उत्कंठा वश इस पर ध्यान न देते हुए यक्ष ने मेघ से ही याचना की।जो काम के सताए हुए हैं, वे जैसे चेतन के समीप, वैसे ही अचेतन के समीप भी स्वभाव से दीन हो जाते हैं("धूम ज्योति: सलिल मरुतां सन्निपात: ... पू.मेघ 1 \5)। यही छान्दोग्योपनिषद के ऋषि ने कहा (धूमो भूत्वा  अभ्रं भवति, अभ्रं  भूत्वा मेघो  भवति, मेघो  भूत्वा प्रवर्षति ( 5 \10)। कालिदास ने जहाँ रमणीयता के साथ मेघ को परिभाषित किया, वहीं वैज्ञानिक सोच पर तीखा व्यंग्य किया 'क्व मेघ:’ जैसे शब्द जोड़ कर ("धूम ज्योति: सलिल मरुतां सन्निपात:'क्व मेघ:)।हे !वैज्ञानिक तुम्हारा मेघ धुएँ, आग,पानी और  वायु का विच्छिन्न टुकड़ा कितना हेय और निकृष्ट है।यहाँ ' क्व' पद की व्यंजना अत्यंत तीव्र है(देखें डॉ.वासुदेव शरण अग्रवाल कृत मेघदूत की व्याख्या)।

एक प्रश्न और।मेघ कब और कैसे बरसते हैं? वैज्ञानिक बोला जब पानियों से भरे मेघ बिजली से रगड़ खाते हैं; जब बिजली तड़कती है। विद्युत् रूप शक्ति से ही मेघों में विद्योतन और गंभीर गर्जन होती है (विद्युद्वाआपां ज्योति:--शतपथ ब्राह्मण) कालिदास कहते हैं: हे मेघ! जिसे तुम अंक में धारण किए रहते हो उस विद्युत् से कभी विलग मत होना। उस से विप्रयुक्त हो कर तुम्हारी श्री, तुम्हारा मघ शून्य में   विलीन हो जाएगा (मा भूदेवं क्षणमपि च विद्युता विप्रयोग: -उ.मे -52)। अर्थात हे मेघ! तुम  जिस जल को धारण किए हो उसे  विद्युत् विहीन हो कर धरती पर बरसा नहीं सकते। कालिदास विद्युत् को ‘व्योम विहारिणी मेघप्रिया कहते हैं, जिसे मेघ अंक में लिए पानियों का स्फुरण करता देश-देश में घूमता है। कालिदास ने  मेघ को ‘कामरूप’ की संज्ञा भी दी है। वह इच्छानुसार रूप धारण कर सकता है(तोयोत्सर्गद्रतत रगति स्तत्परं वर्त्म तीर्ण --1 \19)।कभी तिरछे और दीर्घ प्रसारित रूप में उसे पृथ्वी पर उतरने में आसानी होती है। कभी वर्षा के कारण  वह हल्का होकर द्रुतगति से आकाश पर रपटता चलता है। वैज्ञानिक भी कहते हैं मेघ आकाश में कभी तिरछा, कभी लम्बा, कभी पिछले भाग से पृथ्वी की ओर लटकता है।

कैसे नकार सकते हैं वैज्ञानिकता के पक्षधर साहित्य या दर्शन के सत्य को। कवि और वैज्ञानिक दोनों ही सत्य के साधक हैं। एक सत्य को रमणीयता के साथ प्रस्तुत करता है, दूसरा सीधी सपाट नीरस भाषा में। प्रश्न है वैज्ञानिकता दर्शन,कला और धर्म से प्राप्त ज्ञान को क्यों नहीं स्वीकार करती, जबकि सारा ज्ञान सृष्टि के रोम- रोम में भरा है।मनुष्य ने खोजा है, रचा नहीं।  पेड़ से गिरते सेब को देख न्यूटन ने उसे ऊपर की ओर उछाला। वह फिर नीचे आ गिरा। बन गया  न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत। वैदिक ऋषि पूछता है 'बिना स्तम्भों के अंतरिक्ष कैसे खड़ा है'? उत्तर भी खोज लिया ऋषि ने। सब लोकों का सूर्य्य के साथ आकर्षण है।  सूर्य्य आदि लोकों का देवादिदेव (विराट शक्ति) के साथ आकर्षण है। देवादिदेव के रचे आकर्षण में  प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं।उनसे सब लोकों का दिन -दिन और क्षण-क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है। अतः सब लोक अपनी-अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर-उधर विचलित नहीं हो सकते। 

(यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे।आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे।। ऋग्वेद अ० 6/ अ० 1 / व० 6 / म० 3)। 

वैदिक ऋषि की जिज्ञासा परख नली में नहीं परखी गई। न उसने सेव को ऊपर नीचे उछाल कर अपनी बात कही। द्रष्टा इन पचड़ों में नहीं पड़ता। फिर भी उसके रूपक संसृति के रहस्यों को पूरी वैज्ञानिकता के साथ उद्घाटित करते हैं।

वस्तुस्थिति यह है कि सत्य की खोज में वैज्ञानिक भावना के महत्व को भूल गया है। बिना भावना के आदमी और आदमियत की निर्मिति दिवा स्वप्न हैं।  सच पूछा जाए  तो "आज तक निरपेक्ष सत्य की सिद्धि किसे हुई है? इसलिए कवि कल्पना के वर्ण -व्यंजक छंद पात्रों में भर कर मानवी हृदय को प्रदान  करते हैं। रससिद्ध कवि को भी यदि विज्ञानानुगत विमर्श से शांति मिल सकती, तो मेघदूत जैसे काव्य का जन्म नहीं होता"(डॉ.वासुदेव शरण अग्रवाल)। जो पार्थिव तत्वों से परे सोच  नहीं सकते, उनमें भावुकता ढूँढना विस्मय सूचक है। किशन सरोज की पंक्ति याद आ गई "नीम तरु से फूल झरते हैं \तुम्हारा मन नहीं  छूते\  बड़ा आश्चर्य है?"

वैज्ञानिक  सोच से उपजी बौद्धिकता पर डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने कहा यह "गीत की शत्रु है क्योंकि ये उसके(गीत) आधार अर्थात रागात्मक जगत को निगल जाती है (देखें गीत युगबोध और आघुनिकता पृ.16)। नवगीतकार डॉ,रामदरश मिश्र का कहना है 'बौद्धिकता को लेकर गीत ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रह सकता '। इसके पक्षधर कहते हैं कि प्रयोगधर्मिता के लिए बौद्धिकता परम आवश्यक है। डॉ.बच्चन ने बल दे कर पुनः कहा "अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में सहज ही जो ‘नया’ आ जाए उसका मैं विरोधी नहीं हूँ। परख यही होगी कि ‘नये’ में भावों को उद्‌बुद्ध करने की शक्ति है या नहीं। अन्यथा ऐसी अभिव्याक्ति को मैं सफल गीत नहीं मानूँगा।

आधुनिकता
एक ओर आधुनिकता को वैज्ञानिकता का उपांग माना जाता है। दूसरी ओर मॉडर्निटी की उपज।  यह आस्था, विश्वास और परम्पराओं को तिलांजलि देते हुए घोषित करती है 'ईश्वर को रिटायर कर के, पेंशन दे देनी चाहिए (जे. जे. होली ओक-- देखें पुरुषोत्तम अग्रवाल 'अकथ कहानी प्रेम की')। व्यख्याकारों ने आधुनिकता  में वैज्ञानिक प्रवृति से लेकर यथार्थवादी लोकधर्मिता, पुरातन के प्रति संशय, पूंजीवाद, सामंतवाद, विश्व युद्ध का विरोध और न जाने क्या -क्या नहीं भर दिया। वैसे आधुनिकता भी तीन तरह की बताई गई है औपनिवेशिक-आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता और देशज-आधुनिकता। तीनों परम्परा विरोधी हैं। उत्तर-आधुनिकता को चिढ़ है राष्ट्रवाद से। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं 'कोई आधुनिकता परम्परा बोध के बिना संभव नहीं। हर परम्परा में आधुनिकता की संभावना होती है।किसी समाज की देशज आधुनिकता परम्परा के नैरंतर्य  में विस्फोट को धारण करती है। भारत में वर्णाश्रमवाद की आलोचना नई नहीं है। कबीर का समय भारतीय परम्परा में आधुनिकता के उदय का नहीं, बल्कि घनीभूत होने का समय था'।

यदि पुरुषोत्तम अग्रवाल की बात माने तो  शायद ही कोई ऐसा कवि होगा जो आडम्बर, पाखण्ड, विडंबनाओं और अंधविश्वासों का समर्थक हो। अरे! कवि तो असमय सोए हुए को जगा देता है। बना देता है निष्क्रिय को, कर्मशील। बिहारी की दो पंक्तियों ने  विलास में डूबे सवाई राजा  जयसिंह को रनिवास से खिंच कर दरबार के बिठा दिया था।

नवगीतकारों के बारे में क्या कहें ?उनके लिए  किसी के पद चिन्हों पर चलने का आग्रह, दुराग्रह है। उन्हें परम्पराएँ नहीं चाहिए (मैं तुम्हारे चरण चिन्हों पर चलूँ \मैं तुम्हारे दिए साँचों में ढलूँ \ऐसा दुराग्रह क्यों \ऐसी दुर्दशा क्यों (उमाकांत मालवीय)। अरे! परम्परा की कोख से ही जन्म लेती है आधुनिकता। ऐसे विचारकों  की कमी नहीं हो जो बौद्धिकता से आधुनिकता को जोड़ते हैं।वे भावनाओं से आर्द्र भोगी हुई अनुभूतियों की  अभिव्यक्त को महत्व नहीं देते।जब कि हीगेल ने गीत के लिए इच्छा, विचार और भाव पर बल दिया है। डॉ. नगेन्द्र कहते हैं 'गीत वास्तव में काव्य का सबसे तरल रूप है। वाणी का द्रव।  क्योंकि इसका माध्यम स्वर है और छंद का लय'। गीत की अनिवार्यता है राग, लय, गेयता। कहना न होगा कि आधुनिकता संस्कृति नहीं, सभ्यता है। हमें संस्कृति चाहिए। सभ्यता ऊपरी ताम-झाम है।आज कुछ, कल कुछ।

दृष्टिबोध (विज़न)
दृष्टिबोध या विज़न ऐसा  अभीष्ट है जिसे कालान्तर में एक द्रष्टा आकार या परिणाम रूप में प्राप्त करना चाहता है। यह स्वप्न नहीं है। स्वप्न आकार ग्रहण नहीं कर सकते, जबकि दृष्टिबोध के लिए अभीष्ट का  परिणाम आवश्यक है।  सकारात्मक हो या नकारात्मक।  आशा की जाती है कि कालान्तर में:
अभिनव गीतों की सर्जना से यान्त्रिक होता मानवीय जीवन, पूरी गरिमा के साथ, संवेदनशील होगा।

परिभाषा
आज के गीतकार गीत को 'परिभाषित या इसके लिए कोई विशिष्ट आचार संहिता ज्ञापित' करने के पक्षधर नहीं हैं। वह गीत क्या जिसे परिभाषा के पाश में बाँधा  जाए। विष्णु विराट चतुर्वेदी ने अपने वक्तव्य में नवगीत के लक्षण अवश्य गिनाए, परिभाषा एक नहीं ( देखें उत्तरायण दिसम्बर 2016)।  लक्षण तो शताब्दियों से गिनाए जा रहे हैं (सुस्वरं सरसं चैव सरांग मधुराक्षरं\ सालंकारं प्रमाणं च षडविधं गीत लक्षणं --अमरकोश)। डॉ. भगवत शरण उपाध्याय ने अवश्य कहा 'गीत कविता की वह विधा है जिसमें स्वानुभूति प्रेरित भावावेश की आर्द्र और कोमल आत्मभ्व्यक्ति होती है’। इसी तरह केदारनाथ सिंह ने कहा ‘गीत कविता का एक अत्यंत निजी स्वर है। गीत सहज, सीधा, अकृत्रिम होता है(देखें डॉ. श्याम गुप्त 'गीत कालजयी है)। इन परिभाषाओं  को ध्यान में रख कर अभिनव गीत के लिए कहा जासकता है:
अभिनव गीत एक व्यावहारिक काव्य प्रादर्श  (मॉडल)  है जिसकी  कहन में नव्यता है। यह रचना के विवेक, सत्य  की खोज तथा भावों  की अंतरंगता में डूबी ऐसी रागात्मक अभिव्यक्ति है जो  समूची सृष्टि को मानवीय परिप्रेक्ष्य में देखती है। साथ ही यह युगीन स्थितियों से संवाद करते रस बोध के धरातल पर  प्राबधिकी के दुष्प्रभाव से त्रस्त्र  मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना को उद्दीप्त करता है।

उद्देश्य
(एक) मानवीय मूल्यों के संरक्षण को समृद्ध करती सांस्कृतिक क्रान्ति का आवाहन।  
(दो) संहारक शक्तियों से संत्रस्त अपने में सिमटते मनुष्य का सामाजिक सन्दर्भों से जुड़ाव।
(तीन) यांत्रिकता के व्यामोह से व्यक्ति और समाज की मुक्ति।
(चार) निसर्ग से आदमी का संसर्ग काट कर सृष्टि की सृजनधर्मी शक्ति में अवरोध डालने वाली वैज्ञानिक सोच में बदलाव।
(पाँच) नव्यतम शब्द सौष्ठव के साथ मानवीय संवेदना की सौंदर्यमयी अभिव्यक्ति।  
(छह) अति बौद्धिकता और आधुनिकता के सम्मोहन से मुक्त मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना की समृद्धि।

प्रतिमान
उपरोक्त दृष्टिबोध और उद्देश्य उस पुनर्जागरण और सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता की सम्पूर्ति कर सकेंगे जो समय के कपाटों पर दस्तक दे रही है। इसलिए कि गीतकार गीतों के खोखले शंख में नव से नवतर,अभिनव, स्वर ढाल  सके। वह:
- हिंस्र और परुष होते आज के आदमी को संवेदनशीलता के उच्चतम शिखर पर प्रतिष्ठित करें, मानवीयता और मानव मूल्यों से समृद्ध
- आत्मनिष्ठा के कवच से मुक्त समाजोन्मुखी और समय- सापेक्ष सर्जना के लिए प्रतिबद्ध हो  
- दुहरे आचरण से बचे।  जैसा दिखता है, वैसा लिखे
- अभावों से ग्रस्त- संत्रस्त, हारे- थके, पराजय बोध से पीड़ित आदमी की जिजीविषा को नई आशा और विश्वास दे सके  
- बड़े-बड़े आयुधों से भी अधिक शक्तिशाली है शब्द- शक्ति। इसका सार्थक प्रयोग कर सके।  संयम के साथ  शब्दों में अर्थ भरे, जो  व्यर्थ न जाएँ।
- कोरी नारेबाजी, हंगामे से बचें
- सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय भाव का संरक्षण इस प्रकार करे कि आदमी का संसर्ग निसर्ग से हो।  प्रकृति के साथ उसका अधिकतम नैकट्य हो जिस से पर्यवरण की रक्षा की जा सके
-समष्टि गत चिंतन के लिए अति बौद्धिकता, आत्मरति, और संकीणता से मुक्त स्वस्थ सामाजिकता का पोषण करे, न कि समाज को वर्गों या खंडों में बांटे।

उपसंहार
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अभिनव गीत न तो नवगीत अथवा अन्य किसी गीत विधा के विरोध में हैं, न स्पर्धा में। ये अपने में पूर्ण है, नव्यता की खोज में एक विनम्र प्रयास है।अभिनव और नवगीत में अंतर स्पष्ट करता है अभिनवगीत की भावधारा को प्रवहमान करने वाले प्रो राघवेंद्र तिवारी का यह ताजा गीत:" आसमान बस खड़े-खड़े \मेरे घर आया\या घर की सीढ़ी पर\हो पहाड़ उग आया \या विनम्र हो उठा नदी\का जल आकर्षन \या समीप का पेड़ मगन\हो करता नर्तन\या सूरज, लगता जैसे \उनका खत आया\या देहरी पर आ अटका \पछुआ का झोंका \या किताब से भाग गया\सम्भावित मौका\या बारिश ने आज\अभी बादल लौटाया\या कमीज़ से आ\चिपका मेंहदी के रंग का\बाल एक आड़ा टेढ़ा\मौसम के ढंग का\दिवसमान ने या अपना\रूमाल गिराया"।अभिनव गीत को व्याख्यायित करता एक और गीत देखिए "बैठ मेरे पास \गीत अभिनव तुम सुनाओ \मैं भरूँगा राग नूतन। \शब्द में हो \शंख ध्वनि\औ' स्वरों में चेतना\बीज मन्त्रों में भरी \भोगी हुई  संवेदना \लिख दिया लो गीत \शेष है बस\ प्राक्क्थन। \खोल दीं सब खिड़कियाँ \द्वार पर पर्दे नहीं \भारती के भाव हैं \दरबार के सिजदे नहीं\आँसुओं में नहाए\वंचितों के वचन।पत्तलों पर परोसे \रस भरे व्यंजन\ ललचते आस्वाद को \रसिक रंजन\शुद्ध  हैं, परिशुद्ध हैं \नहीं जूठन।ओस भीगे फूल की\परखिए ताजी महक\बदलती हवाओं की \गूँजती मीठी खनक \रसवंती फिजाओं का \  नवल नर्तन। खेत खलिहान की  खुशबू \ कामगारों की खुशी \लावारिसों का पालना \असहाय की खोई हँसी\भूमिधर के शीश पर \श्रम बिंदु का चन्दन।अब न नाचेंगीं व्यथाएँ \देकर फटे रूमाल \पौर कन्याएँ चलेंगी \ऊँची किए मशाल \रोशनी का कीजिए\शत बार वन्दन।(डॉ.मनोहर अभय)। चलते चलते बता दें कि स्वयं नवगीतकारों को लग रहा है किउनकी कहाँ की साख गिर रही है (घट रही है साख शब्दों की \समय रहते सम्हलिए \सजग होकर लेखनी में\ डालिए  ईमान चलिए --डॉ. रवीन्द्र  उपाध्याय)

 आशा की जाती है कि अभिनव गीत उन अभीप्साओं की सम्पूर्ति करेंगे 'जिन्हें  जागरूक नवगीतकार लम्बे समय से  संजोए हैं: "टूटी  बिखरी संज्ञाओं को \आओ क्रिया पदों से जोड़ें।संस्कार की सुप्त भूमि में\बीज विशेषण वाले छोड़ें" (कुमार शैलेन्द्र) या 'आओ प्रिय! ‌हम शुष्क जीवन में\तनिक भाव सरिताएँ उलीचें' (डॉ. मंजू श्रीवास्तव) अस्तु।

1 comment :

  1. Dharmpal Mahendra JainFebruary 1, 2021 at 9:48 AM

    'अभिनव गीतों का रचना संसार' नवगीत के रचना विधान पर एक संदर्भ आलेख की तरह बन पड़ा है। डॉ. मनोहर अभय के इस विषय में आधिकारिक अध्ययन और लगन को सलाम।

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