सज्जाद ज़हीर (1899-1973)

सैयद सज्जाद ज़हीर

उर्दू के लेखक, अनुवादक, मार्क्सवादी चिंतक और प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक एवं रहनुमा, सज्जाद ज़हीर का जन्म 5 नवम्बर 1899 में लखनऊ में हुआ था। आरंभिक शिक्षा लखनऊ में हुई। ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री प्राप्त की। 1935 में सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद ने पैरिस में आयोजित ‘इंटरनेशनल कांग्रेस फ़ॉर डिफ़ेन्स ऑफ़ कल्चर’ में भाग लिया और उससे प्रभावित होकर लन्दन में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की। भारत आकर उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कांफ्रेंस 9 अप्रैल 1936 में आयोजित की और उसके महासचिव हो गये। यहीं से भारत में प्रगतिशील आन्दोलन की शुरुआत हुई। भारत विभाजन के बाद सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान चले गए और वहाँ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ पाकिस्तान के संस्थापकों में से थे। 1951 में रावलपिंडी षडयंत्र केस में, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ पाकिस्तान द्वारा हुकूमत का तख़्ता पलटने की कोशिश की गई थी, गिरफ़्तार हुए और चार वर्ष तक जेल में रहे। रिहा होने पर उनको भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की नागरिकता प्रदान की।

सज्जाद ज़हीर के साहित्यिक जीवन की शुरूआत “अंगारे” की पाँच कहानियों से हुई। यह संग्रह 1932 में प्रकाशित हुआ, जिसमें कुल दस कहानियों में से पाँच के लेखक सज्जाद ज़हीर थे। इस संग्रह ने भारत में हलचल मचा दी थी और ब्रतानवी सरकार ने इसपर प्रतिबन्ध लगा दिया था क्योंकि इससे कुछ मुसलामानों की धार्मिक भावना आहत हुई थी।  इसके अलावा सज्जाद ज़हीर ने एक उपन्यास “लन्दन की एक रात” (1935) भी लिखा। “रोशनाई” इनका संस्मरण है जो प्रगतिशील आन्दोलन के आरंभिक दिनों के बारे में है। जेल से अपनी बेगम और उर्दू की मशहूर लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर को लिखे हुए पत्र “नुक़ूश-ए-ज़िन्दां” के नाम से 1944 में प्रकाशित हुए। सज्जाद ज़हीर ने फ़ारसी के शायर हाफ़िज़ शीराज़ी पर एक आलोचनात्मक रचना लिखी। इसके अलावा उन्होंने कई भाषाओं से उर्दू में अनुवाद भी किया, जैसे रवीन्द्र नाथ टैगोर का उपन्यास “गोरा”, शेक्सपियर का नाटक “ओथेलो” और फ़्रांसीसी लेखक व दार्शनिक वोल्टेयर की रचना “कान्दीद”। ग्यारह सितम्बर 1973 में उनकी मृत्यु कज़ाख़िस्तान में हुई, जहाँ वे एक साहित्य सम्मलेन में भाग लेने गए हुए थे।

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