सामाजिक सरोकारों के प्रति दायित्वबोध कराती रामकुमार आत्रेय की लघुकथाएँ

अशोक बैरागी

राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी (कैथल)
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रामकुमार आत्रेय

   बालमुकुंद गुप्त सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित रामकुमार आत्रेय जी का हरियाणा के कथाकारों में बहुत ही सम्माननीय स्थान है। आत्रेय जी ने कहानी, कविता, हरियाणवी दोहे, लघुकथाएँ और बालसाहित्य लेखन के साथ ही 'दैनिक ट्रिब्यून' केे 'खरी-खोटी' कॉलम में लगातार तीन वर्षों तक समसामयिक विषयों पर बहुत ही धारदार और व्यंजना शब्द शक्ति के साथ लिखा है। फिर भी इनकी पहचान एक लघुकथाकार के रूप में है। आत्रेय जी का सृजन वर्तमान समय और समाज का बहुत ही जीवंत और प्रमाणिक दस्तावेज हैं। इनकी लघुकथाएँ चारों तरफ फैली विसंगतियों का ही लेखा-जोखा नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और साहित्यिक आदर्श भी प्रस्तुत करती हैं। ये हमारे दायित्वबोध को चेतन करती हैं। ग्राम्यता और अनुभव की चाशनी से रचना में सरसता और बढ़ जाती है। आत्रेय जी की दो सौ पचास से अधिक लघुकथाएँ- 'इक्कीस जूते', 'आंखों वाले अंधे', 'छोटी सी बात' और 'बिन शीशों का चश्मा' लघुकथा संग्रहों में संकलित हैं। आत्रेय जी का व्यक्तित्व जितना सीधा और सरल था कृतित्व उतना ही सधा हुआ अनुशासित और व्यंग्य तेेेजधार लिए हुए है। वे जीवन में हर प्रकार के छल-बल, दिखावे और राजनीति से दूर रहे हैं। आत्रेय जी एक साक्षात्कार में बताते हैं कि, "... एक साहित्यकार होने के नाते मैं अतिरिक्त सुविधाएँ नहीं चाहता। मैं लाइन में लगकर अपने ही नंबर पर अपना काम करवाना चाहता हूँ लेकिन जब नंबर पर भी मेरा काम नहीं होता तब मुझे बहुत पीड़ा होती है मेरी चेतना विद्रोह कर उठती है।" साहित्य-साधना के इसी तेज और प्रभाव की अनुगूंज दूर तक सुनाई देती है इसी श्रेष्ठता के कारण इनकी रचनाओं का अनुवाद मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, डोगरी और अंग्रेजी भाषाओं में हो चुका है। प्रत्येक आयु वर्ग के पाठक को ये रचनाएँ अपने में बांध लेती हैं। आत्रेय जी ने अपनी लघु कथाओं का वाचन आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अनेक बार किया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शायद ही कोई पत्रिका हो जिसने आत्रेय जी को सम्मान सहित ने छापा हो। आत्रेय जी जीवन के विविध पक्षों की गहरी समझ रखने के बाद भी स्वयं को 'गंवार' (ग्रामीण का पर्याय) कहलाना पसंद करते हैं। प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी साहित्य में वे स्वयं को केवल साक्षर मानते हैं। रामकुमार आत्रेय जी यथार्थ को अनूठी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करने वाले बेहद संजीदा और सामाजिक साहित्यकार हैं।

     आत्रेय की लघुकथाओं का तेवर और प्रभाव बहुत ही मारक है। ये लघुकथाएँ आकार में संतुलित होते हुए भी अपनी ही गति और लय में चलती हैं। साथ ही पाठक को भी अपने साथ बहा ले जाने में पूर्णतया सफल होती हैं। जमीन से जुड़े लोक कथाकार आत्रेय जी की भाषा और कथ्य के विषय में एक बात जो उन्हें अन्य लघुकथाकारों से अलग करती है वह है उनका देसीपन या रचनाओं में महकता परिवेश। ग्रामीण परिवेश के सामाजिक जीवन से जुड़ी भाषा मन को बहुत ही रुचती और उद्वेलित करती है।

    बड़े-बड़े नामचीन विद्वान आलोचक भी आत्रेय जी की रचनाओं के प्रशंसक रहे हैं। एक विशेष घटना का उल्लेख करते हुए आत्रेय जी बताते हैं कि, "....पृथ्वीराज कालिया (तत्कालीन निदेशक, हरियाणा साहित्य अकैडमी) मेरी बांह पकड़ कर मुझे नामवर सिंह के पास ले गए। कालिया जी ने नामवर सिंह से कहा- यह वह रचनाकार है जिनकी रचनाओं में हरियाणा की माटी की गंध मौजूद है। इनका नाम रामकुमार आत्रेय है। इनकी रचनाओं की गंध इतनी प्रखर है कि आप उसे माटी की आवाज भी कह सकते हैं।" वैसे तो प्रत्येक कथाकार का जीवन उसके साहित्य में न्यूनाधिक अधिक मात्रा में आ ही जाता है। फिर भी मेरा मानना है कि आत्रेय जी कथन शैली, पात्र, कथा और भाषा सभी का चुनाव अपने आस-पास के परिवेश से करते हैं। कहीं-कहीं तो यह सब बिल्कुल निजी से लगते हैं। ऐसा लगता है कि इस पात्र, कथा और घटना के केंद्र में स्वयं आत्रेय जी का वास्तविक जीवन है। आत्रेय जी की लघुकथाएँ पढ़कर उनके जीवन का खाका आसानी से खींचा जा सकता है। सामाजिक सरोकारों से लबरेज लघुकथाएँ कथारस में डूबी हुई है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वह स्वयं बोल रहे हों बल्कि वे अपना उद्देश्य कहानी के पात्रों से बड़ी ही कलात्मकता और सहजता से कहलवाते हैं। उनमें कहीं भी आत्ममुग्धता नजर नहीं आती। आत्रेय जी ने बहुत कम लिखा पर जितना लिखा उतना बड़ा ही जानदार और शानदार लिखा है। वे प्रत्येक घटना और पात्र को पहले जीते हैं फिर उसे कलमबद्ध करते हैं। राधेश्याम भारतीय को दिए एक साक्षात्कार में आत्रेय जी बताते हैं, "..कहानी लिखते समय मैं पात्रों के साथ इतना जुड़ जाता हूँ कि मैं टेंस हो उठता हूँ ...ऐसे में दुखी होकर उन पात्रों से पीछा छुड़ाने के लिए कहानी को अलविदा कहना पड़ता है, यही कारण है कि मैं वर्ष भर में दो से तीन कहानियाँ ही लिख पाता हूँ।" आत्रेय जी की लघुकथाओं में भावना और संवेदना का अनुपात बहुत ही संतुलित है। लघुकथा पढ़ने के बाद पाठक स्वयं को ठगा-सा महसूस करता है। इनकी रचनाओं में समाज, राजनीति, जाति, धर्म, गाँव-देहात, किसान, मजदूर और स्त्री जीवन से जुड़ी बेसिक प्रोफाइल सामने आती है जो पाठक को सोचने के लिए विवश करती हैं कि ऐसा क्यों हुआ? काश ऐसा ना होता? यानी आत्रेय जी जहां लघुकथा को समाप्त करते हैं, असल जीवन की कहानी शुरू ही वहां से होती है। आत्रेय जी का व्यक्तिगत जीवन भी बहुत ही संघर्ष और परिश्रम से भरा रहा है। वह आम आदमी के दुख-दर्द, उसकी तकलीफ को स्वयं जीते हुए उसे रचना में उकेरते हैं।

    मैं स्वयं 2015 से उनकी लघुकथाओं का पाठक रहा हूँ और अनेक बार उनसे मिला भी हूँ। उनकी कुछेक लघुकथाओं का ही मैं यहां विश्लेषण कर रहा हूँ जिनसे उनकी रचना प्रक्रिया, उनके सरोकार और लिखने का उद्देश्य स्पष्ट हो जायेगा। उनकी ये रचनाएँ मेरे सहित और भी अनेक पाठकों को बहुत उद्वेलित करती हैं। 'भीख के दस दिन' यह माँ की ममता की बेमिसाल कहानी है। बेटा भी माँ के प्रति समर्पित है परंतु बेटे के समर्पण के आगे माँ की ममता बहुत बड़ी है। माँ को मरते दम तक भी अपनी नहीं बल्कि अपने इकलौते बेटे की चिंता सता रही है क्योंकि माँ को सभी ओर से जवाब मिल चुका है और वह उस अवस्था में पहुँच चुकी है कि अब उसका बचना नामुमकिन है। माघ के महीने में सूतक होने पर उसका बेटा कड़कड़ाती सर्दी में नहाने के कारण बीमार न हो जाए। माँ को दिन-रात यही चिंता सता रही है। इसलिए वह ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि, "हे प्रभु! मुझे दस दिन और भीख में दे दो।" यह है माँ की ममता की पराकाष्ठा। माँ अपने बेटे के लिए कितना बड़ा बलिदान और त्याग करती है, इसके पीछे उसकी वत्सल और स्नेहीमयी करुणा ही विद्यमान है। ममता का मूल्य माँ भी जानती है और आत्रेय भी जानते हैं। आत्रेय जी की संवेदना इतनी गहन और परिष्कृत है कि वे अपने परिवेश से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना को कहानी के शिल्प में ढालकर कथातत्व रूपी मनको में पिरो देते हैं।उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति का समन्वय ही उन्हें इस ऊंचाई तक ले कर आया है। 'काश मेरी भी सास होती' लघुकथा बताती है कि जब मनुष्य को अपने रिश्ते-नाते और जिम्मेदारियां बोझ लगने लगती हैं तो वह इनसे छुटकारा पाने के लिए न जाने कैसे-कैसे ढोंग-ढकोसले और झूठ का ताना-बाना बुनता है। विडंबना देखिए कि हम अपने बड़े बुजुर्गों से उस वक्त मुंह फेर लेते हैं जब उन्हें हमारी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यही अनैतिकता हमें अमानव बनाती है। अपने ही घर में जलालत और उपेक्षा का दंश झेलते बुजुर्गों की एकदम सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है। उनके लाचार आंसुओं से भी हृदय नहीं पसीजता। कहानी में दोनों बहनें अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से भागती नजर आती हैं। दोनों ही अपने-अपने सास-ससुर को अपने से अलग कर देना चाहती हैं ताकि उनके लिए कुछ काम, उनकी सेवा न करनी पड़े। एक बहन ने बड़ी धूर्तता से अपने सास-ससुर को अलग कर गाँव जाने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन बड़ी बहन का ससुर मजबूर है क्योंकि उसकी घरवाली मर चुकी है। वह असहाय वृद्ध घर के कोने में दुबककर अपने दिन तोड़ रहा है। वह अपनी वृद्धावस्था के कारण घर छोड़कर कहीं नहीं जा सकता और लड़की को इस बात का मलाल है कि "काश! उसकी भी सास होती तो वह भी इसे लेकर कहीं निकल जाती।" बड़ी बहन का ससुर कहता है कि, " यदि मेरी घरवाली जिंदा होती तो मैं एक दिन भी यहां नहीं रहता।" इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस बुजुर्ग के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा? साथ ही बहू का अपने ससुर के प्रति यह कहना कि, "उसकी मौत पर ही मुझे इस परेशानी से छुटकारा मिलेगा।" बुजुर्गों के प्रति हमारी संवेदनहीनताऔर तार-तार हुए संबंधों का बखिया उधेड़ती बहुत ही सशक्त रचना है। यहां आत्रेय जी बड़े कौशल के साथ कहानी को यू-टर्न कराते हैं।

   दुख ही हमारा सच्चा साथी है, वही हमें जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वहीं दुख की अधिकता बड़े-बुजुर्गों को तोड़ देती है। 'सुख और दुख' कहानी इन्हीं भावों को स्पष्ट करती है। अज्ञेय जी की एक उक्ति 'दुख सबको मांजता है' इस लघुकथा पर चरितार्थ होती है। पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि दुखों का अंत हो जाता है। परंतु यह सत्य है कि माँ अपने रहते अपने बच्चे को कभी दुखी नहीं देख सकती, उसके लिए उसे चाहे कितना कष्ट -पीड़ा क्यों ना सहनी पड़े। गौतम बुद्ध ने कहा है कि संसार दुखों का घर है और इच्छाएँ दुखों का कारण है। अप्रत्यक्ष रूप से यह भाव माँ पर भी लागू होता है लेकिन माँ की ममता इन शास्त्रीय कथनों से बहुत ऊंची है। 'मुहूर्त' लघुकथा में श्रवण कुमार वास्तव में बुजुर्ग माँ के मरने का मुहूर्त खोज रहा है कि वह कब मरे और उसे मुक्ति मिले। फिर वह आराम की जिंदगी शहर में रहकर जिएगा। कलयुगी श्रवण कुमार के लिए माँ और पुराना मकान दोनों एक जैसे ही हैं जिनके प्रति उसके मन में कोई सम्मान नहीं है। दूसरी ओर गोस्वामी जी कथाकार सरोकारों और संवेदनाओं का जीवंत प्रमाण हैं। आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी के लिए शहर के नए मकान में बुजुर्ग मां-बाप का होना अपशकुन जैसा माना जाता है। वह उन्हें शहर में अपने साथ रखना ही नहीं चाहते, इससे उनके स्टेटस पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही शहर में रहते हुए उनकी देखभाल और दवा दारू का खर्च बढ़ेगा। गाँव में उसे अधिक खर्च नहीं करना पड़ता। सुविधाओं और दवा-दारू के अभाव में वह जल्द ही चल बसेगी। आखिर श्रवण कुमार भी यही चाहता है। जब वह कहता है कि, " इस गिरने को हो आए मकान पर पैसा खर्च करना सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं होगा।" वास्तव में गिरने को आ आया मकान केवल मकान नहीं बल्कि उसकी माँ की शेष वृद्धावस्था का प्रतीक है। और ऐसा करके वह माँ की सेवा न करने के इस लांछन से भी बच जाएगा। यह रचना हमारे सिकुड़ते जा रहे परिवार और बढ़ते व्यक्तिगत स्वार्थों को स्पष्ट करती है। ऐसे परिवार में पति-पत्नी और संतान के अलावा बुजुर्ग माता-पिता को भी स्थान नहीं है। जब तक छल-बल और स्वार्थ की राजनीति होती रहेगी तब तक समाज में स्वतंत्रता और समानता की स्थापना नहीं हो सकती और सुदामा पहले की तरह दीन-हीन बने रहेंगे। 'सुदामा की गरीबी' ऐसी ही एक लघुकथा है जो पुलिस प्रशासन की समाज के दबंग और भ्रष्ट लोगों के साथ घालमेल को स्पष्ट करती है। ऐसी अनैतिक व्यवस्था होने पर हमेशा निर्धन, कमजोर और असहाय को ही सताया जाता है। उसका हक छीन लिया जाता है जो स्वस्थ समाज की संकल्पना या निर्माण का शुभ लक्षण नहीं है। रामकुमार जी स्वयं शिक्षक रहे हैं, उन्होंने शिक्षा जगत की खामियों को बहुत गहराई से और नजदीकी से देखा है। आज शिक्षा का स्तर और शिक्षक की गरिमा दोनों में गिरावट आई है। 'शिक्षक समाज' ऐसी लघुकथा है जो आजकल के मौलिक सृजन, कार्य कौशल और गुणवत्ता में आई कमी को स्पष्ट करती है। ऐसे में शिक्षक और दूसरे प्रशासनिक अधिकारी पिछले चोर दरवाजे या बेईमानी से वह सब हासिल कर लेना चाहते हैं जिसके वे अधिकारी ही नहीं हैं। यह समाज और नैतिक मूल्यों के पतन की ओर इशारा करती है। साठगांठ करके तुम उनको सम्मान दे दो, वह तुम्हें सम्मानित कर देंगे। जिन बातों पर हमें लज्जा आनी चाहिए उन्हें हम गर्व और अधिकार से कहते हैं। चंद्रशेखर आज की इसी युवा जेनरेशन का प्रतिनिधित्व करता हुआ कहता है, " सम्मान करो, सम्मान पाओ, इस हाथ से दो और उस हाथ से लो।" ऐसी टिप्पणी सोचने को विवश करती है कि हम शिक्षक और शिक्षा के महान आदर्शों से गिरकर कहां आ गए। आज के युवाओं के लिए आदर्श जीवनमूल्य, परिश्रम, जिम्मेदारी का निर्वाह, अपने पेशे के प्रति सम्मान, कार्य के प्रति समर्पण और निष्ठा जैसे गए दिनों की बात हो कर रह गई है। समय से पहले सब कुछ पा लेने के लिए हमने अपन ईमान को बेच दिया। 'डर' बहुत ही छोटे आकार में सार्थक और प्रतीकात्मक लघुकथा है। यह शासन-प्रशासन पर भी अप्रत्यक्ष् रूप से व्यंग्य करती है। शोषण और दबाव का शिकार हमेशा कमजोर और निस्सहाय व्यक्ति ही बनता है। शक्तिशाली से तो राजा भी डरता है। लघुकथा का शीर्षक पूरी कहानी को व्यंजित करता है। 'अच्छाई का बीज' लघुकथा बहुत ही सभ्य, संस्कारित और नैतिकता से लबरेज युवा की कहानी है। कितना अच्छा हो अगर यही निस्वार्थ सेवा और परहितार्थ का बीज जन-जन के हृदय में रोपित हो, तो दुनिया स्वर्ग बन जाएगी। यहां बड़े बुजुर्गों के प्रति सम्मान का भाव भी है और स्वार्थ रहित परोपकार भी है। आत्रेय जी ने कलयुग की सोच और मानसिकता को भी बुजुर्ग के मन के भावों माध्यम से और बड़ी कुशलता से स्पष्ट किया है। कहानी का मूल भाव और सार्थकता उस युवक की बात से स्पष्ट होती है। वास्तव में युवक द्वारा उपकार का बदला लेन का तरीका बहुत ही अनोखा है। ऐसी लघुकथाएँ शीतल हवा के झोंके की भांति मन को सुकून और दिल को तसल्ली देने वाली है। युवक कितनी सुंदर बात कहता है कि, "जब भी आप सड़क या कहीं किसी घायल या लाचार इंसान को देखें तो उसे तुरंत नजदीक के नर्सिंग होम में पहुँचा दें। मैंने आपके इलाज के लिए जो पांच सौ रुपये खर्च किए हैं, उन पैसों को आप उस घायल व्यक्ति पर खर्च कर दें।" जीवन का यही वह उज्जवल पक्ष या संस्कार हैं जो जीवन को आदर्श बनाता हैं और मानव को महामानव।

   'संपादक का पत्र' लेखकीय आदर्शों, अनुशासन और सकारात्मक सोच की सृष्टि करने वाली रचना है। केवल एक पत्र के माध्यम से आत्रेय जी नव लेखकों को लिखने का आदर्श नमूना, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी और उस चीज को दिखाने का प्रयास किया है जो शायद ही कोई देख पाता है। ऐसा लगता है यह लघुकथा ना होकर वास्तव में किसी संवेदनशील समाजशास्त्री का वास्तविक पत्र है। यहां आत्रेय जी यह कहना चाहते हैं कि कोरा यथार्थ या आंखों देखा वर्णन यूं का यूं ही परोस देना ही साहित्य नहीं होता। साहित्यकार की जिम्मेदारी समाज को सकारात्मक ऊर्जा देना होती है ना कि नकारात्मक भाव पैदा करना। समाज में अनेक विसंगतियां होते हुए भी उनका समसामयिक और आदर्श समाधान प्रस्तुत करना ही लेखक का दायित्व है। यहां मुझे आत्रेय जी कही एक बात बहुत याद आती है कि, "प्रत्येक घटना लघुकथा नहीं होती। घटना को लघुकथा बनाते हैं कथाकार के शब्द, उसका अनुभव और उसकी संवेदना बल्कि साहित्यकार को उसमें छुपे मर्म, संदेश, आदर्शों को सामने लाना होता है। भाषा को तराशना पड़ता है तब कहीं जाकर एक मुकम्मल लघुकथा बनती है।" प्रत्येक लेखक पहले एक सामाजिक व्यक्ति भी होता है अपने लिखे हुए की सामाजिक उपयोगिता और व्यवहारिकता को देखना भी लेखक की जिम्मेदारी होती है। साहित्य लेखन का उद्देश्य है कि उसके लिखे हुए का सुखद प्रभाव पड़े और लोगों को अच्छा करने के लिए नई रोशनी मिले। मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हो ऐसा प्रयास करना चाहिए। 'संपादक का पत्र' लघुकथा को पढ़कर मुझे महान कथाकार सुदर्शन की कहानी 'हार की जीत' याद आती है। यहां संपादक महोदय के कथन और बाबा भारती के कथन में बहुत अधिक वैचारिक साम्यता नजर आती है। सुदर्शन जी भी इसी लहजे में बाबा भारती से आदर्श वचन और जीवन का सार कहते हैं, जिससे डाकू खड़ग सिंह के जीवन की दिशा ही बदल जाती है। ठीक ऐसे ही यहां पर भी प्रकाशनार्थ भेजी रचना समाज पर अपना नकारात्मक प्रभाव छोड़ती। इसीलिए संपादक महोदय लेखक को पत्र लिखकर कहानी न छापने की बात कहते हैं। 'बड़ा लेखक' रचना बड़ा लेखक खोने का दर्प पालने वालों की कुत्सित मानसिकता पर व्यंग्य करती है। यह लघुकथा लेखकीय अहंकार, उनकी शोषण प्रवृति व नई नई प्रतिभाओं को लामबंद करके गलत दिशा की ओर मोड़ना और ऊर्जा से भरे ऐसे युवाओं को अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए प्रयोग करना आदि बिंदुओं की ओर ले जाती है। और बड़ा प्रश्न यह भी उठता है कि क्या साहित्य लिखकर सिखाने की वस्तु है? यह लघुकथा हमारे लेखकों के खोखले और दोगले चरित्रों को उजागर करती है। साहित्य तो अनुभव और समाज से जुड़कर लिखा जाता है अकेले में तो केवल प्रशस्ति गान लिखे जाते हैं। यहां आत्रेय जी ने बहुत ही सुंदर और समसामयिक विषय को बड़े ही कौशल से अभिव्यंजित किया है। ऐसी लघुकथाएँ लंबे समय तक अपना असर छोड़ती है। 'पिछला दरवाजा' भ्रष्ट तंत्र और भोले-भाले लोगों को रिश्वतखोरी सिखाने का कार्य करता है। 'पिछला दरवाजा' रिश्वतखोरी का प्रतीक है और यहां आत्रेय जी की दाद देनी होगी कि वह कितने छोटे-छोटे विषयों पर कलम चलाते हैं। साथ ही वे हमें आगाह करते हैं कि छोटी-छोटी चीजों को लेकर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है, इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। परस्पर स्नेह, सहयोग, सहनशीलता, धैर्य, और सारी नैतिकताएँ सूखती जा रही हैं। 'मजा' लघुकथा जहां खानपान के संस्कार की ओर इशारा करती हैं वहीं ग्रामीण और शहरी लोगों के बीच सोच के मौलिक अंतर को भी स्पष्ट करती है। खानपान का जो सात्विक संस्कार था, वह तन, मन, आत्मा और बुद्धि के अनुकूल था। उससे शरीर बलिष्ठ होता, मन तृप्त हो संतोष से भर उठता और आत्मा में आनंद की अनुभूति होती थी। आज यह सब हम बाजार के सामान के माध्यम से कैसे पा सकते हैं। आत्मीय संतोष और आनंद मजे में बदल गए हैं। ठेठ ग्रामीण जीवन के खाने में जो सोंधी गंध, रस, स्वाद और अपनापन समाया होता है भला शहर के लोग क्या जाने?

   'कीमती डिबिया' लघु कथा में गरीबी के विराट फलक को दिखाया है। गरीबी हमें अपनों की याद दिलाती है फिर वह चाहे मित्र सगे हों, माता-पिता हों या फिर अपना देश ही क्यों ना हो। विदेशों में काम करने को मजबूर लोगों को अपने देश की गरीबी भी अभिशाप की तरह नजर आती है। रिश्ते-नातों के साथ ही जमीन-जायदाद भी गरीबी की भेंट चढ़ जाते हैं। देशराज के लिए डिबिया में सहेज कर रखे पिता के आंसू हीरों से भी कीमती हैं जो उसे निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन आंसुओं से ही उसे निरंतर श्रम करने का संबल मिलता है। लघुकथा यह भी दिखाती है कि बच्चों की जिद के आगे मजबूर माता-पिता को झुकना पड़ता है। मां-बाप के उस त्याग, समर्पण, ममता का महत्व बाद में पता लगता है। जैसे देशराज को पता लगा कि उसके विदेश जाने की जिद में उसे कितनी बड़ी हानि उठानी पड़ी है। देश छूटा, जमीन जायदाद बिकी और इससे भी बड़ा उसने अपने मां-बाप को सदा-सदा के खो दिया। आत्रेय जी बताना चाहते हैं कि पैसा ही सब कुछ नहीं है। जितना परिश्रम हम विदेश में करते हैं उतना ही श्रम अगर अपने देश में करें तो आसानी से गुजर बसर कर सकते हैं। लघुकथा कई कोणों के बीच घूमती है। यहां देशराज अकेला एक व्यक्ति नहीं बल्कि उन सब प्रवासी मजदूरों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें मजबूरीवश अपना घर-परिवार, माता-पिता और देश तक छोड़ जाना पड़ता है। देशराज को अपने किए का पश्चाताप भी है। यह अंदर तक झकझोर देने वाली कहानी है। 'कब की बात' छोटी-सी लघुकथा में एक बच्चे द्वारा प्रांजल भाषा में बहुत ही मर्मभेदी और व्यंग्यात्मक टिप्पणी की गई है। कथाकार द्वारा कितनी सहजता से यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान में अच्छाई और ईमानदारी का दौर समाप्त हो चुका है।आजकल तो केवल झूठ का ही व्यापार किया जा रहा है और बच्चे भी इस कटु सच्चाई से वाकिफ हैं। गागर में सागर भरने वाली कहानी हमारे वर्तमान, हमारी तकनीकी और हमारी जीवन शैली पर एक साथ अनेक प्रश्न उठाती है। आत्रेय जी ने एक-एक शब्द बड़ी ही सुंदरता से गढ़ा है। इसमें सहज अभिव्यक्ति और बाल मनोविज्ञान बड़े ही कौशल के साथ आया है। यथार्थ की ऐसी सृजनात्मक अभिव्यक्ति पूरे मानव समाज को सोचने के लिए विवश करती है। माँ भी जानती होगी कि सच्चाई और ईमानदारी का व्यवहार तो सदियों पूर्व होता था। 'मां! यह कब की बात है?' यह सूत्र वाक्य वर्तमान के पूरे परिवेश को व्यंजित करती है। 'एक करोड़ छिहतर लाख' लघुकथा विभिन्न विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल खोलती है। कुछ अफसर अपने कमीशन के चक्कर में अनावश्यक वस्तुएँ खरीद कर खराब होने के लिए छोड़ देते हैं। इससे सरकारी खजाने का बहुत अपव्यय होता है। ऐसा करने से जहां हमारे नैतिक मूल्यों का पतन भी होता है वहीं वही हमार आचार-विचार, व्यवहार और चरित्र की भी पोल खुलती है। रिश्वत और कमीशन खोरी का यह एक विशाल और विचारणीय प्रश्न इस कहानी में आत्रेय जी ने उठाया है। एक करोड़ छिहतर लाख की खरीदी गई मशीन आज अनुपयोगी खड़ी है कमीशन लेने वाले अधिकारी रिटायर हो चुके हैं। देखा जाए तो यह सीधे तौर पर गबन है। अब इसकी भी क्या गारंटी की जो मशीन खरीदी गई है वास्तव में वह असली भी है या नहीं क्योंकि उन्हें मशीन की उपयोगिता और गुणवत्ता से नहीं बल्कि अपने कमीशन से मतलब है।

     'बिन शीशों का चश्मा' गंभीर टिप्पणी करने वाली प्रतीकात्मक लघुकथा है जो बालक और गांधी जी के संवादों के माध्यम से कई मुद्दों को बड़ी सहजता से उठाती है। बाल मनोविज्ञान के साथ-साथ मुख्य मुद्दा आज के दौर में गांधीवाद की अप्रासंगिकता है। गांधी के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से न अपनाकर केवल उसके नाम को भूनाना चाहते हैं और गांधी के नाम पर तरह-तरह के कार्यक्रम किए जाते हैं। विभिन्न राष्ट्रीय अवसरों पर गांधी के सिद्धांत और जीवन मूल्य केवल भाषणों का विषय होते हैं।जिस प्रकार हमारे घरों में बड़े बुजुर्ग केवल दिखावे के चौकीदार हैं ठीक वैसे ही देश में गांधी और उसके मूल्य केवल दिखाने भर के रह गए हैं। गांधी की मूर्ति का कथन हमारी इसी सोच पर बहुत ही गंभीर और सार्थक टिप्पणी करती। गांधी की मूर्ति का कथन है कि, " अच्छा है मैं भी अपने नाम पर होने वाले नाटक को नहीं देख पाऊंगा।" गांधीजी देखने वाला असली चश्मा क्यों नहीं चाहते? क्योंकि गांधी भी जानते हैं उनके नाम पर केवल दिखावा किया जा रहा है। इसीलिए बापूजी की मूर्ति बिना शीशे वाले चश्मे को ही अपना हिस्सा बना लेती है ताकि वह समाज में अपनी दुर्गति और उपेक्षा को ना देख सके। चारों तरफ गांधीजी के नाम और काम पर समर्पित होने का तो ढोंग किया जा रहा है। वर्तमान में गांधी कहां है? यहां तो सर्वत्र गोडसे हैं। यह लघुकथा हमारी सोच, नैतिकता, बुजुर्गों की उपेक्षा और कथनी और करनी की भिन्नता पर तीव्र व्यंग्य करती है क्योंकि गांधीजी के विचार, दर्शन, उनकी शिक्षाएँ बहुत पहले ही समाज से खारिज हो चुकी हैं। 'बिन शीशों का चश्मा' लघुकथा का इंदौर की एक संस्था ने आत्रेय जी से अनुमति लेकर नाट्य रूपांतरण भी किया है। इसके साथ ही 'एकलव्य की विडंबना' लघुकथा को इलाहाबाद की गलियों में स्ट्रीट प्ले के रूप में अनेक बार प्रस्तुत किया गया है। यह सब इन रचनाओं के वैचारिक फलक और भावात्मक विस्तार एवं प्रभाव को स्पष्ट करता है। इनकी रचनाएँ लोकप्रियता के मानकों पर खरी उतरती हैं। आत्रेय जी की लघुकथाओं को लेकर शोध होना, अन्य भाषाओं में अनुवाद और नाट्य रूपांतरण होना इनकी लोकप्रियता का जीवंत प्रमाण है।

   कह सकते हैं कि आत्रेय जी ने अपनी रचनाओं में आम आदमी के दुख, दर्द, तकलीफ, परिश्रम, संघर्ष और सोच को शब्दों के माध्यम से पिरो कर समाज को नई रोशनी देने का सार्थक प्रयास किया है। आत्रेय जी की लघुकथा में कथारस का स्वाभाविक प्रवाह है।लघुकथा उपदेशों से बोझिल न होकर अपनी ही गति और लय में चलती हैं। इनमें जहां वैचारिक गहनता है वहीं सूक्ष्म भावना-संवेदनाओं का स्पंदन है। ये रचनाएँ अपनी व्यंग्यात्मक तेवर के कारण समाज की विसंगतियों, गले सड़े अंगों पर जबरदस्त प्रहार करती नजर आती हैं। ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े होने के कारण इनकी अधिकांश रचनाओं में गाँव-देहात और उसमें फैली जाति, धर्म, अर्थ से संबंधित कुरीतियां, सांप्रदायिकता, रंगभेद का दंश,आर्थिक विषमता, शोषण, गरीबी, अशिक्षा, किसान-मजदूर की पीड़ा, रिश्ते-नाते, व्यक्ति का दोगला चरित्र, बड़े बुजुर्गों के प्रति घटता मान-सम्मान, घर-परिवार का बिखरता ताना-बाना, विभिन्न संस्थाओं में फैले भ्रष्टाचार को उजागर किया है। आत्रेय जी नारी सशक्तिकरण के प्रबल पक्षधर रहे हैं। यद्यपि इनकी अधिकांश रचनाओं में बहू या पुत्रवधू की जगह माँ बहुत ही सशक्त और आदर्श भूमिका में सामने आती है फिर भी महिलाओं के प्रति इनकी संवेदनाएँ उनके सरोकारों का अहम हिस्सा है। आत्रेय जी की लघुकथाएँ मानवीय रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की राह दिखाती हैं । इन रचनाओं का वैचारिक फलक और प्रभाव बहुत ही व्यापक है। "वही लिखो जो तुमने जिया है और जो नया लिखना है उसे पहले जिओ।" अमृतराय की यह टिप्पणी आत्रेय जी की रचना प्रक्रिया पर पूर्णता लागू होती है। आत्रेय जी कई बार स्वयं भी बताते थे कि फलाँ आदमी या उस घटना को देखकर मैंने फलां कहानी लिखी थी। लघुकथाओं के कथानक और पात्र उनके निजी जीवन से ही बुने गए हैं। 'बिन शीशों का चश्मा' बहुत ही कलात्मक और संवेदित करने वाली रचनाओं का संचयन है। आत्रेय जी की रचनाओं की भाषा एकदम बहुत बड़ा चमत्कार भले ही नहीं करती हों फिर भी उनकी अपनी गति और लय है। प्रतीकात्मकता का निर्वाह जरा मुश्किल कार्य होता है परंतु इसे भी आत्रेय जी ने बड़ी सहजता से कर दिखाया है। 'बिन शीशों का चश्मा', 'डर' और 'कब की बात' जैसी प्रतीकात्मक लघुकथाएँ अपने केंद्रीय भाव को बड़ी सहजता से पाठक के सामने लाती हैं और कथारस का प्रवाह कहीं भी अवरुद्ध नहीं होता। पूरी कहानी अपनी ही लय और गति में सरपट दौड़ती है। इस संग्रह सभी लघुकथाएँ जीवन के विविध रंग, रस, गंध, और स्पर्श लिए 'पुष्पगुच्छ' की तरह महकती हुई पाठकों को सरोबार कर देती हैं। इनमें हर आयु-वर्ग के पाठक को जिज्ञासा तत्व के साथ अपने में बांधे रखने की अद्भुत क्षमता है।

 समग्र रूप में कहा जा सकता है कि आत्रेय जी की लघुकथाओं की भाषा और शैली की सहजता, सरलता और प्रतीकात्मकता उल्लेखनीय है। इनकी लघुकथाओं में जीवन के श्याम और उजले पक्ष के विभिन्न चित्र दिखाई पड़ते हैं। उनमें लघुता के साथ-साथ कथातत्व भी बहुत ही सरस और भावपूर्ण है। शीर्षक सार्थक और छोटे होने के साथ कथा के केंद्रीय भाव को स्पष्ट करते हैं। ये रचनाएँ अपने समय व समाज से सीधा संवाद करती हैं तथा भावी पीढ़ी को नवीन सोच के साथ-साथ सकारात्मक दृष्टि प्रदान कर उन्हें ऊर्जावान भी बनाती हैं। यह कृति सामाजिक सरोकारों के प्रति दायित्वबोध को चेतन करती हैं। मानवीय भावों और जीवनमूल्यों के प्रति आत्रेय जी की संवेदना उल्लेखनीय है। मानव समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई पड़ती है।


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