महात्मा गाँधी और मॉरिशस: एक अटूट संबंध

- नूतन पांडेय


 महात्मा गांधी का उद्भव बीसवीं शताब्दी के विश्व-इतिहास की महत्वपूर्ण युगांतकारी घटनाओं में महात्मा गांधी का राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में पदार्पण अद्भुत घटना है। सन 1869 में भारत के गुजरात राज्य के पोरबंदर शहर में मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में एक ऐसे महान व्यक्तित्व का जन्म हुआ, जो कई सन्दर्भों में चमत्कारिक कहा जा सकता है। सम्पूर्ण विश्व में महात्मा नाम से पुकारे जाने वाले मोहनदास गांधी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने एक ऐसा विराट चरित्र प्रत्यक्ष हो जाता है, जिसके समकक्ष विश्व के महान व्यक्तित्व बौने प्रतीत होते हैं। गांधी जी, न भूतो न भविष्यति की सूक्ति को चरितार्थ करते हुए अपने महान चरित्र और बहुमुखी व्यक्तित्व का ऐसा भव्य आवरण प्रस्तुत करते हैं जिसके सम्मुख सहजता से खड़े होने की सामर्थ्य किसी में नहीं। गांधी जी का जीवन, सिद्धांत और अनुपालन का वह अद्भुत सम्मिश्रण है, जिसमें अनुप्रयोग पहले आता है, सिद्धांत बाद में। गांधी जी के अतिरिक्त ऐसा कौन हो सकता है जिसमें यह कहने का साहस हो कि वह बदलाव, जो तुम दुनिया में देखना चाहते हो, पहले खुद में लेकर आओ। इतिहास साक्षी है कि इस मंत्र का जीवन भर संयमित रूप से पालन करते हुए गांधी ने अपने संपूर्ण जीवन में कोई ऐसा वक्तव्य या आश्वासन नहीं दिया, जिसकी वे दूसरों से तो अपेक्षा करते हों, लेकिन उसे पूरा करने का उनमें साहस न हो। गांधी जी वस्तुतः एक उपदेशक न होकर सच्चे मानवतावादी चिंतक थे। उन्होंने जिन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, वे कोरे सैद्धांतिक न होकर उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित थे और इसीलिए उनके विचार सरल और बोधगम्य प्रतीत होते हुए भी उन्हें समझना आसान नहीं।

समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, राजनीतिज्ञों और विभिन्न विचारकों द्वारा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में गांधीवाद या गांधीवादी दर्शन की उपयोगिता पर चर्चा की जाती है। एक सिद्धांत के रूप में गांधीवाद के प्रति अस्वीकार्यता की प्रवृत्ति भी बहुत से विद्वानों में देखने को मिलती है। इस अस्वीकरण के पीछे इन विद्वानों की एकमात्र धारणा या तर्क यही हो सकता है कि गांधी दर्शन मूलतः सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और समस्त मानव-कल्याण की भावना आदि जिन सिद्धांतों पर आधारित है, वे मौलिक और नवीन नहीं हैं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में निहित वे शाश्वत मूल्य हैं, जो समस्त मानवता के लिए हर युग में प्रासंगिक और कल्याणकारी हैं। यहाँ तक कि गांधी जी ने यह बात स्वयं भी स्वीकार की है कि ‘उन्होंने किसी नवीन विचारधारा या जीवन- दर्शन का प्रतिपादन नहीं किया।’ (1) इन सबके बावजूद यह भी सर्वस्वीकार्य है कि ‘गांधी दर्शन भारत की उस आचार-परक आध्यात्मिक जीवन दृष्टि तथा सांस्कृतिक परंपरा का आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्धित तथा संशोधित संस्करण है, जो शताब्दियों से सत्य, अहिंसा, सेवा, प्रेम, त्याग, सहिष्णुता, अस्तेय, अपरिग्रह, आत्म संयम आदि नैतिक मूल्यों को भौतिक जीवनमानों की अपेक्षा अधिक काम्य और वरेण्य मानती आई है।’ (2)

गांधीजी जी ने मानव हित के लिए जिन सिद्धांतों पर बल दिया और उन्हें व्यापकता तथा सार्वभौमिकता प्रदान की, उनकी खूबसूरती उनकी व्यावहारिकता में निहित है। गांधी जी ने सर्वदा ‘ईश्वर सत्य है’ के स्थान पर ‘सत्य ही ईश्वर है’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके पीछे उनकी यह भावना थी कि ईश्वर को सत्य मानने से हमारे पास करने को कुछ नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत यदि हम सत्य को ईश्वर मानते हैं तो हम सत्य के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सत्यमय बना सकते हैं। वे स्पष्ट शब्दों में उद्घोषणा करते हैं कि 'लाखों-करोड़ों गूँगों के हृदयों में जो ईश्वर विराजमान है, मैं उसके सिवा अन्य किसी ईश्वर को नहीं मानता। मैं इन लाखों-करोड़ों की सेवा द्वारा उस ईश्वर की पूजा करता हूँ जो सत्य है अथवा उस सत्य की जो ईश्वर है। मैं व्यक्तिगत रूप में भगवान् को नहीं मानता, मेरे लिए सत्य ही ईश्वर है।’ (3) अहिंसा, धर्म, भाषा, नैतिक-विकास, मानव समानता, सदाचारमय जीवन आदि अनगिनत मुद्दों पर विश्व के समक्ष गांधी जी ने जो सोच दी, वह समय और स्थान की सीमा से परे, सार्वदेशिक और सर्वकालिक है और इसीलिए गांधी जी के विचार समस्त मानवता के लिए आज भी उतने ही मूल्यवान और प्रासंगिक हैं, जितने वे अपने प्रवर्तन काल में थे।

 गांधी जी ने भारत को ब्रिटिश सत्ता से आजादी दिलाने के लिए सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के जिन अनूठे शस्त्रों का प्रयोग किया, वे विश्व इतिहास में अभूतपूर्व थे। ये वे ब्रह्मास्त्र थे, जिन्होंने अपनी शक्ति और सामर्थ्य से समस्त विश्व को स्तंभित कर दिया। दीन-दलित, शोषित-उत्पीड़ित के हित संधान के लिए अपनी आवाज़ उठाने वाले गांधी जी की यह अतुलनीय और असाधारण विचारधारा का ही परिणाम था कि उनके सिद्धांतों से प्रभावित होकर दलाई लामा, नेल्सन मंडेला, बराक ओबामा, मदर टेरेसा और जूनियर मार्टिन लूथर किंग जैसे न जाने कितने वैश्विक नेताओं ने उनकी विचारधारा से प्रेरणा ग्रहण की और उसके अनुसार अपनी सोच में आमूलचूल परिवर्तन किया। प्रख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन तो महात्मा गांधी से प्रभावित होकर यहाँ तक कह देते हैं कि “...आने वाली पीढियाँ मुश्किल से ही विश्वास कर पाएंगी कि गांधी जैसा हाड़-मांस का पुतला कभी इस भूमि पर पैदा हुआ होगा। वह इंसानों में एक चमत्कार था।” डॉ. फ्रांसिस नील्सन के गांधीजी के संबंध में विचार भी इसी से मिलते जुलते हैं: “गांधी जी कर्म में डायोजीनियस, विनम्रता में सैंट फ्रांसिस और बुद्धिमानी में सुकरात थे, इन्हीं गुणों के बल पर गांधी जी ने दुनिया के सामने उजागर कर दिया कि अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए ताकत का सहारा लेने वाले राजनेताओं के तरीके कितने क्षुद्र हैं इस प्रतियोगिता में, राज्य की शक्तियों के भौतिक विरोध की तुलना में, आध्यात्मिक सत्यनिष्ठा विजयी होती है।” उनके चमत्कृत व्यक्तित्व के प्रभाव से वशीभूत होकर डॉ. जे.एच. होम्स यह कहने में संकोच नहीं करते कि “गांधी जी गौतम बुद्ध के बाद महानतम भारतीय थे और ईसा मसीह के बाद महानतम व्यक्ति थे।”

 गांधी जी की गणना उन इने गिने महापुरुषों में होती है, जिन्होंने न केवल भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को गति और दिशा दी बल्कि यूरोप, मध्यपूर्व, एशिया और लैटिन अमेरिका आदि देशों में चल रहे सामाजिक एवं राजनैतिक आंदोलनों को भी प्रभावित किया। उन्होंने देश की परिधि को लांघकर समस्त विश्व के उपेक्षित, पीड़ित, वंचितों के लिए अपनी वाणी को मुखर किया। इन्हीं वैयक्तिक खूबियों, चरित्र की अटूट शक्ति, उद्देश्य की पवित्रता और निस्वार्थ मानव सेवा की भावना के कारण गांधी जी के वैचारिक प्रभाव ने देश-काल की सीमाओं को लांघकर विश्व व्यापी स्वरूप ग्रहण कर लिया। निस्संदिग्ध रूप से गांधी जी अपने समय के सर्वाधिक प्रभावशाली, चर्चित और लोकप्रिय व्यक्ति माने जाते हैं। बीसवीं शताब्दी के पांचवे दशक तक झुग्गी-झोंपड़ी से लेकर संसद तक कोई ऐसा स्थान नहीं रहा, जहाँ गांधी जी के नाम की गूँज न हो। पीड़ित, उपेक्षित और दलित व्यक्ति जहाँ गांधी जी को अपने मसीहा के रूप में देखते थे, वहीँ चिन्तक और विचारक उनके सिद्धांतों का अनुसरण करके महत्वपूर्ण नीतियाँ निर्धारित करते थे। समस्त मानवीय चेतना पर गांधी जी के इस व्यापक प्रभाव का एक बहुत बड़ा कारण गांधी जी के सिद्धांतों का सहज और सरल होना है। उनका दर्शन एक ओर जहाँ लघुमानव के हित में सन्नद्ध दीखता है, पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के उद्धार के लिए निरंतर चिंता करता है वहीँ दूसरी ओर वह हाशिये पर खड़े मनुष्य को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने की ईमानदार कोशिश भी करता है।

 बैरिस्टर के रूप में अपने जीवन का आरंभ करने वाले मोहन दास के जीवन की परिवर्तनकारी घटना दक्षिण अफ्रीका में उनका प्रवास माना जाता है। प्रिटोरिया के रेलवे स्टेशन पर गांधी जी के प्रति हुआ दुर्व्यवहार इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज है। इस बात की चर्चा समय-समय पर गांधी जी ने अपने आलेखों में की भी है कि दक्षिण भारत में अश्वेतों के प्रति किये जा रहे दुर्व्यवहार ने उनकी मानसिक विचारधारा और दर्शन को नया स्वरूप प्रदान किया। उनका मानना था कि “मैं गया तो वहाँ पैसा कमाने था, लेकिन वहाँ जाकर मेरे जीवन का दृष्टिकोण ही बदल गया।”

 दक्षिण अफ्रीका और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए किये गए उनके अप्रतिम संघर्ष के साथ-साथ ऐसे अनगिन व्यक्ति और देश हैं जिनके स्वर्णिम भविष्य के निर्माण में गांधी जी का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। मॉरिशस ऐसा ही एक देश है, जिसके इतिहास में गांधी जी का आगमन एक परिवर्तनकारी घटना के रूप में देखा जाता है। मॉरिशस में गांधी जी के क्षणिक प्रवास ने मॉरिशसवासियों के ह्रदय में न केवल अन्याय, अपमान और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए चिंगारी का काम किया बल्कि दबे, कुचले, शोषित, पीड़ित लोगों को आत्मसम्मान और आत्म गौरव के साथ जीवन जीने की दिशा भी निर्धारित की। इस शोध आलेख में महान चिन्तक, विचारक और विश्व-पथप्रदर्शक गांधी जी के करिश्माई व्यक्तित्व और विचारधारा का मॉरिशस और मॉरिशस वासियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका विशद विश्लेषण किया गया है। शोध आलेख में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि गांधी जी के संक्षिप्त प्रवास का द्वीप के राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक और साहित्यिक मनोधारा पर किस तरह के सकारात्मक और दीर्घकालिक परिणाम देखने को मिले।

 जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है कि दक्षिण अफ्रिका के अपने दीर्घ प्रवास में गांधी जी ने अनुभव किया कि वहाँ रहने वाले भारतीयों और अश्वेतों के प्रति सरकार का व्यवहार अत्यंत निंदनीय था। रंगभेद के चलते इन लोगों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता था, यहाँ तक कि उन्हें मताधिकार भी प्राप्त नहीं था। यह सब देखकर गांधी जी ने उपेक्षितों को उनके अपेक्षित अधिकार दिलाने के लिए संगठित और एकजुट किया और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए देश में नताल इन्डियन कांग्रेस की स्थापना की। इक्कीस वर्षों तक दक्षिण अफ्रिका में रहने के बाद वे भारत आकर अपने देश की आजादी के लिए कृत संकल्पित हो गए और अंतिम सांस रहने तक इस देश की निस्वार्थ सेवा करते रहे। दक्षिण अफ्रिका प्रवास ने गांधी जी के व्यक्तित्व को एक नया रूप दिया, वे एक बैरिस्टर के रूप में वहाँ गए थे, लेकिन वे दलितों और शोषितों के मसीहा और उनके हितैषी के रूप में वापिस लौटे। सच कहा जाए तो यह इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे मोहनदास का उस महात्मा की काया में प्रवेश था, जिसने गांधी जी के नेतृत्व में चलाये जा रहे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के माध्यम से समस्त मुक्ति आंदोलनों को एक नई राह दिग्दर्शित की। हिन्दी के वरिष्ठ लेखक श्री गिरिराज किशोर ने अपने बहुचर्चित उपन्यास पहला गिरमिटिया में गांधी जी को पहला गिरमिटिया कहकर उनके व्यक्तित्व के इसी पहलू को छुआ है।

 इतिहास विदित है कि महात्मा गांधी जी के योगदान को दक्षिण अफ़्रीका और भारत के संदर्भ में विशेष रूप से स्मरण किया जाता है, इस विषय में अनेक पुस्तकें और कॉलम भी लिखे गए हैं, लेकिन मॉरिशस में गांधी जी के प्रवास और तदुपरांत इस देश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की विचारधारा में आये परिवर्तन और प्रभाव पर इतिहास अधिक रोशनी नहीं डालता। किन्तु यह सत्य है कि मॉरिशस के लोग और यहाँ का कण-कण महात्मा गांधी के प्रति कृतज्ञ है। यहाँ की सड़कें, यहाँ के अस्पताल, शिक्षा संस्थान, यहाँ के हॉल, यहाँ के वृद्धाश्रम और सबसे बढ़कर यहाँ के साहित्य के पन्ने इस बात की गवाही देते हैं कि इस देश के लोगों में महात्मा गांधी के प्रति अगाध सम्मान और कृतज्ञता की जो धारा प्रवाहित हो रही है समय के प्रवाह से भी न तो उसकी गति कभी मंद पड़ेगी और न ही कभी क्षीण ही होगी।

 मॉरिशस बहुसंस्कृति, बहुभाषा और बहुजातीय देश है। मॉरिशस की आधी से अधिक जनसंख्या भारतवंशियों की है, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती और सिख सम्मिलित हैं। लगभग दो शताब्दी पूर्व दास प्रथा की समाप्ति के पश्चात् भारत के पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार से बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर गन्ने की खेती के लिए एग्रीमेंट अर्थात शर्तबंदी प्रथा के अंतर्गत यहाँ लाये गए थे। एग्रीमेंट शब्द बिगड़ते-बिगड़ते गिरमिटिया बन गया और इन मजदूरों को गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा। कहने को तो गिरमिटिया व्यवस्था दास प्रथा के उन्मूलन के परिणामस्वरूप सामने आई थी, लेकिन वास्तव में यह दास प्रथा का ही नवीन रूप थी, जहाँ गिरमिटिया मजदूरों की दशा दासों से भी अधिक शोचनीय थी। अधिकाँश मजदूर अशिक्षित थे और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी नहीं थे। जब महात्मा गांधी का इस देश में आगमन हुआ उस समय यहाँ के भारतीय अत्यंत दयनीय जीवन जी रहे थे। गांधी जी ने उसी समय मन ही मन भारतीयों की दशा सुधारने का दृढ संकल्प कर लिया। महात्मा गांधी की मॉरिशस यात्रा के सन्दर्भ में यह बताना उल्लेखनीय है कि यह यात्रा कतई पूर्व नियोजित नहीं थी। डरबन से मुंबई जाते समय 29 अक्टूबर सन 1901 में उनका जहाज नौशेरा कुछ समय के लिए मॉरिशस रुकता है और लगभग तीन सप्ताह तक गांधी जी इस देश में प्रवास करते हैं। ( आगमन /प्रस्थान की तिथियों तथा प्रवास समय की अवधि के विषय में इतिहासकारों में मत वैभिन्य हो सकता है ) जब गांधीजी मॉरिशस पहुँचते हैं, तो प्राप्त आंकड़ों के आधार पर उस समय द्वीप की जनसंख्या लगभग तीन लाख पचहत्तर हज़ार थी, जिसमें से ढाई लाख के करीब भारतीय मूल के लोग थे। जब गांधी जी मॉरिशस उतरे उस समय उनकी आयु मात्र 32 वर्ष की थी और उस समय गांधी जी विश्व इतिहास में अपनी पहचान बनाने की प्रक्रिया में थे, ऐसा कहा जा सकता है। हाँ, भारतीय मीडिया में वे सर्वाधिक पसंदीदा व्यक्तित्व बनते जा रहे थे। ऐसे महान व्यक्तित्व का मॉरिशस में आगमन अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना थी, विशेषकर वहाँ रह रहे भारतीय मजदूरों के लिए। इसका प्रमुख कारण यह था कि मॉरिशस वासी महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रिका में किये गए असाधारण संघर्ष के बारे में काफी कुछ परिचित हो चुके थे और कहीं न कहीं उनके मन में भी यह भावना पनपने लगी थी कि गांधी जी के माध्यम से उनके उद्धार की संभावना है। गांधी जी ने अपने मॉरिशस प्रवास में विभिन्न स्थलों का यथासंभव भ्रमण किया, वहाँ के प्रतिष्ठित लोगों से मुलाकातें कीं और इस दौरान कुछ सभाओं को संबोधित भी किया। यथासंभव शब्द का उल्लेख इसलिए किया गया है कि जब गांधी जी मॉरिशस पहुंचे, उससे कुछ समय पूर्व ही द्वीप में ला पेस्त नामक महामारी फ़ैली थी और काफी बड़ी संख्या में लोग इस मृत्यु का शिकार होकर काल के ग्रास में बन गए थे, जिस कारण गांधी जी को देश भ्रमण का अधिक अवसर नहीं मिल सका था। गांधी जी के सम्मान में पोर्ट लुई स्थित ताहेर बाग़ में एक सभा आयोजित की गई, जिसमें मॉरीशस देश के प्रमुख भारतीय प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था और देश की राजनैतिक संस्थाओं में भारतीयों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व क्षमता पर चिंता दिखाई, उस पर महात्मा गांधी ने कहा कि “जनतंत्र का फल उनको ही मिलेगा जो उसकी कीमत चुकाएंगे और इसका अर्थ है अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए उन्हें कठिन संघर्ष करना है।” (4) इस सभा में मॉरिशस के भारतीयों को संबोधित करते हुए गांधी जी ने कहा था कि “आप अपने बच्चों को शिक्षित करें, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए देश की राजनीति में सक्रिय रहे और भारत में होने वाली गतिविधियों से स्वयं को जोड़े रखें।” गांधी जी के ये तीन मूल मंत्र थे, जिन्होंने निराशा के अंधकार में डूबे हुए भारतवंशियों को शिक्षा के प्रकाश द्वारा उज्ज्वल भविष्य की राह दिखाई। गांधी जी के इस संदेश में निहित उनके जीवन दर्शन को उसकी समग्रता में देखा जा सकता है क्योंकि शिक्षा के संबंध में प्रारंभ से ही यह कहते आ रहे थे कि “शिक्षा में वह समस्त शिक्षण –प्रशिक्षण समाहित है, जो मानव जाति की सेवा के लिए उपयोगी है और विमुक्ति का अर्थ है वर्तमान जीवन की समस्त पराधीनताओं से मुक्ति।” (5) वहीँ राजनीति के संबंध में उनके विचार थे कि “जनता के लिए राजनीति एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा वह जीवन के प्रत्येक भाग में अपनी दशा सुधार सके। राजनैतिक शक्ति का अर्थ राष्ट्रीय प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रीय जीवन विनियमित करने की क्षमता से है।” (6)

 अपनी इसी विचारधारा से अनुसंचरित होकर गांधी जी ने शिक्षा और राजनीति के विषय में मॉरिशसवासियों को जो सुझाव दिए उसने निराशा में डूबे लोगों के लिए संजीवनी का कार्य किया। यह गांधी जी की प्रेरणा और मॉरिशसवासियों के ईमानदार प्रयत्नों का ही परिणाम है कि गांधी जी द्वारा इस मिट्टी में वपित बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बनकर पुष्पित और पल्लवित हो रहा है। मॉरिशस वासी गांधी जी के इन प्रेरक वचनों के लिए अवसर मिलने पर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना अपना सौभाग्य समझते हैं। अभी हाल ही में मॉरिशस के प्रख्यात साहित्यकार रामदेव धुरंधर ने फेसबुक के माध्यम गांधी जी की 151 वीं जयंती पर उनके प्रति अपने श्रद्धासुमन इस शब्दों में व्यक्त किए हैं – “गांधी जी ने तब मॉरिशस को देखने पर तीन मन्त्रों को मानो एक धागे में गूंथकर माला के रूप में हमें थमाया था। गांधी जी आज मुझे आज बहुत याद आ रहे हैं। याद का यह मेरा सिला बना रहे, विशेषकर लेखन में, गायक तो मैं इसी का हूँ और मैं स्वयं अपने लेखन की तकदीर का निर्धारण करता हूँ यह छोड़ मेरी न कहीं जमीं है और न आसमां।” (7) मॉरिशस के विभिन्न साहित्यकारों ने अपनी कविताओं, कहानियों, लेखों, संस्मरणों आदि में गांधी जी के प्रभाव, उनके प्रति अपनी एकात्मकता और आत्मिक संबंधों को व्यक्त किया है। जयनारायण राय जी गांधी जी के आगमन की घटना को कुछ इस तरह लिखते हैं – “युवक गांधी के मारीशस आने पर तो हम इसलिए अनुप्राणित हुए थे कि अफ्रिका में अपने अद्वितीय संघर्ष से जो नाम उन्होंने कमाया था उसने हमें सोने से जगा दिया और दूसरे, अफ्रीका में उन्होंने अप्रवसी भारतीयों की समस्या को उठाया था।” (8) इसी प्रकार देवलाल ठाकुर भी “गांधी जी के इन सूत्रों को अमृत की बूँद सदृश मानते हैं, जिन्होंने मृत प्राय मॉरिशस वासियों को नया जीवन प्रदान किया। ” (9)

 यह गांधी जी का भारतीय मजदूरों के प्रति प्रेम और उनकी चिंता ही कही जा सकती है कि वे मॉरिशस से भारत पहुंचकर भी इस विषय पर चिंतित रहे और उन्होंने भारतीय नेताओं से इस बारे में पर्याप्त चर्चा भी की और पार्लियामेंट में भी कई बार यह प्रश्न उठाया। दस्तावेज़ बताते हैं कि महात्मा गांधी ने सन 1896 से लेकर 1914 तक के अपने प्रकाशित लेखों में अनेकों बार बार मॉरिशस का उल्लेख किया था। मॉरिशस से वापिस लौटने के एक महीने पश्चात ही गांधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्रहवें अधिवेशन में दिए गए अपने भाषण में फिजी तथा दक्षिण अफ्रिका के साथ साथ मॉरिशस का भी उल्लेख करते हुए भारतीय मजदूरों के इन देशों में दिए जा रहे श्रम योगदान की चर्चा की थी। सन 1947 में भारत में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों से दुखी होकर गांधी जी ने मॉरिशस की इस बात के लिए प्रशंसा की थी कि वहाँ हिन्दू-मुस्लिम आपस में भाई चारा बनाकर सौहार्द से रहते हैं। जिसके लिए प्रोफ़ेसर वासुदेव विष्णुदयाल ने गांधी जी का आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि गांधी जी ने भारतीयों से मॉरिशस जैसे छोटे से द्वीप से शिक्षा लेने की बात कही।

 भारत पहुँचने के कुछ वर्षों बाद ही गांधी जी ने अपने मित्र मणिलाल डॉक्टर जो गुजराती थे और व्यवसाय से वकील थे, मॉरिशस के भारतीय मजदूरों की सहायता करने के लिए मॉरिशस भेजा। मॉरिशस जाकर मणिलाल डॉक्टर ने मॉरिशस के मजदूरों के पक्ष में मुक़दमे लड़ने शुरू किये और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। गांधी जी का मानना था कि कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाया जा सकता और इसीलिये महात्मा गांधी की प्रेरणास्वरूप ही मणिलाल डॉक्टर ने हिन्दुस्तानी नामक मॉरिशस के प्रथम पत्र का प्रकाशन सन 1909 में प्रारंभ किया। यह पत्र हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में छपता था, लेकिन बाद में यह सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी में ही प्रकाशित होने लगा था। पत्र का ध्येय वाक्य था-व्यक्ति स्वातंत्र्य, मानव बंधुत्व तथा प्रजातिगत समानता। इन तीन मंत्रों को लेकर यह पत्र इस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ा था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने का अधिकार है, बशर्ते उससे किसी की आज़ादी बाधित न हो। इस पत्र के माध्यम से द्वीप को नई वाणी मिली और अन्याय के विरुद्ध अभिव्यक्ति का नवीन मार्ग प्रशस्त हुआ। पत्र मॉरिशस वासियों में सामाजिक, राजनैतिक और भाषिक चेतना जागृत करके उन्हें अपनी संस्कृति, आत्मसम्मान, स्वाभिमान और अस्मिता बोध के प्रति जागरूक करने में सहायक बना। मॉरिशस के प्रसिद्ध कवि पूजानंद नेमा मानते हैं कि “भाषा, समाज, धर्म और संस्कृति पर प्रकाश डालकर इस पत्र ने कुलियों को आत्मगौरव प्रदान किया।”(10)

 गांधी जी मानते थे कि मनुष्य को गुलाम बनाने वाली कई चीजों में से एक है भाषा और संस्कृति की गुलामी, जो दूसरी सभी गुलामियों से खतरनाक होती है। इसीलिए उन्होंने भारत में राजनैतिक लड़ाई से पहले भाषाई स्वतंत्रता के लिए संघर्ष प्रारभ किया, जिस कारण हिंदी ने स्थानीयता से आगे बढ़कर देश की संपर्क भाषा का रूप ले लिया और इसी भावना के प्रतिबिंब स्वरूप उन्होंने मॉरिशस में भी गुजराती भाषी और अंग्रेजी में धाराप्रवाह दक्षता होने के बावजूद खड़ी बोली हिंदी के माध्यम से अपनी सभाओं को संबोधित किया। जब यहाँ के लोगों ने गांधी जी को हिंदी में वार्तालाप करते देखा तो उनके ह्रदय में भी अपनी हिंदी के प्रति गौरव और सम्मान का भाव जागृत हुआ। देखा जाये तो यहीं से मॉरिशस में हिन्दी भाषा के विकास का आरंभ माना जा सकता है। भोजपुरी और कैथी लिपि की जगह हिंदी और देवनागरी का प्रयोग एवं प्रचार- प्रसार में तीव्रता गांधी के आगमन के पश्चात ही देखने को मिलती है। गांधी जी के प्रयासों से ही भारत की विभिन्न संस्थाओं के प्रचारकों, धर्म गुरुओं, विद्वानों और साहित्यकारों का समय-समय पर मॉरिशस आना-जाना प्रारंभ हुआ, जिससे दोनों देशों के मध्य विचार विनिमय को तीव्रता मिलने लगी। इसके अलावा भारत की स्वतंत्रता आन्दोलन की लड़ाई के समय गांधी जी से संबंधित लेख मॉरिशस मित्र, मॉरिशस आर्य पत्रिका और आर्यवीर आदि पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे। मॉरिशस के बहुत से लोगों ने गांधी जी के अनुकरण पर गांधी टोपी और खादी का प्रयोग करना आरंभ कर दिया। गांधी जी के प्रयत्नों और प्रेरणास्वरूप ही पंडित वासुदेव विष्णुदयाल ने मॉरिशस के भारतीयों को मत देने का अधिकार दिलाने के लिए उन्हें शिक्षित करने का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने सन 1943 में पोर्ट लुई में विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उस स्थान का नाम गांधी मैदान रखा गया। इस महायज्ञ में लगभग साठ हज़ार लोगों ने भाग लिया था। इस यज्ञ में पंडित विष्णुदयाल ने गांधी के दर्शन पर आधारित सत्य, अहिंसा और प्रेम का संदेश दिया तथा शिक्षा पर भी जोर दिया। गांधी जी के सिद्धांतों को अपना मूलमंत्र बनाते हुए उन्होंने देशवासियों में जाग्रति उत्पन्न की और इस कारण से उन्हें चार बार जेल भी जाना पड़ा, लेकिन वे गांधी-पथ का अनुसरण करने में दिग्भ्रमित नहीं हुए। उनके अनथक प्रयत्नों और उनके द्वारा चलाये गए सिग्नेचर कैम्पेन के फलस्वरूप भारतीय मतदाताओं की संख्या ग्यारह हज़ार से बढ़कर सत्तर हज़ार हो गई और कुल उन्नीस में से ग्यारह सीटों पर भारतीयों का प्रतिनिधित्व हो गया। पंडित विष्णुदयाल के समान ही मॉरिशस के अनेक नेताओं ने गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर मॉरिशस की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न आरंभ कर दिए और उनके सिद्धांतों का अनुकरण कर देश को स्वतंत्रता दिलाई। मॉरिशस के स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय नेताओं पर गांधी जी का चरम प्रभाव इस बात में देखा जा सकता है जब अंग्रेजों ने उनसे मॉरिशस की स्वतंत्रता का दिन चुनने को कहा तो मॉरिशस के नेताओं ने दांडी मार्च का दिन अर्थात 12 मार्च अपनी स्वतंत्रता के लिए चुना।

 महात्मा गांधी जी की हृदयविदारक ह्त्या निश्चित ही एक विश्व व्यापी घटना थी, जिसने समस्त विश्व को द्रवित और शोकाकुल कर दिया था। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी की मृत्यु ने समस्त मॉरिशस को हिलाकर रख दिया। मॉरिशस के लोग गांधी जी से खुद को इतना जुड़ा हुआ और उनको इतना अपना समझते थे वे सहज ही इस बात पर विश्वास नहीं कर पाए कि कोई व्यक्ति गांधी जी जैसे सहज, सरल, क्षीणकाय दुर्बल शरीर, लेकिन दृढ आत्मा पुरुष की हत्या की कल्पना भी कर सकता है। उनकी मृत्यु के शोक में देश की सारी दुकानें और शक्कर की फैक्टरियाँ बंद कर दी गईं। मंदिर और मस्जिद में शोक संभाएँआयोजित की जाने लगीं। मॉरिशस ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन पर शोक संदेश और गांधी जी के प्रिय भजन प्रसारित किये जाने लगे। देश के विभिन्न नेताओं द्वारा अपनी-अपनी भावनानुसार बिरला हाउस और प्रधानमंत्री निवास पर कुछ अपने शोक संदेश भेजे। ख्यातिलब्ध कवि जयनारायण राय ने इस दुखद समाचार को सुनने के बाद अपने ह्रदय के उदगार व्यक्त करते हुए कहा था कि “ हर शताब्दी में गांधी पैदा नहीं होता। गांधी मर गए किन्तु गांधीवाद निश्चय ही एक बड़ी विश्व शक्ति बनेगा।” देश के महान नेता सर शिवसागर राम गुलाम गांधी जी की ह्त्या से इतने द्रवित हो गए कि अपने दुःख रोक न सके और अपने भावों को उन्होंने इस तरह शब्द दिए-“यदि हमें उन आदर्शों को पाना है, जिनके लिए गांधी जी जिए, मरे और कष्ट उठाये, तो हम याद रखें कि अहिंसा और सत्य का यह देवदूत हमारे कष्ट के समय हमारा सहारा बना है। ईसा, लेनिन और अब.......गांधी अंधकार के समय वे हमें रास्ता दिखने वाली मोमबत्ती की तरह थे।”

 गांधी जी की मृत्यु से क्षुब्ध और द्रवित होकर मॉरिशस के साहित्यकारों ने आलेख और कविताओं का सृजन किया। इन कवियों में पंडित वासुदेव विष्णु दयाल, श्रीमती कमला रामा और हजारी सिंह आदि कवि प्रमुख हैं। गांधी जी की मृत्यु के पश्चात् कवयित्री कमला रामा ने स्मृति में नमन कविता लिखी जो आर्यवीर और जाग्रति में छपी थी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ यहाँ द्रष्टव्य हैं -

पूरा करने को प्रकृति के लक्ष्य को पृथ्वी पर,
वर्ष अठारह सौ उनहत्तर जन्म देता है
पोरबंदर में एक छोटा एकाकी स्थान
जब लाखों रुदन करते हैं गहन वेदना में
उसकी मृत्यु धकेल देती है
विश्व को गहन अन्धकार में,
तभी उभरती है एक मृदुल चिंगारी,
बुद्धिमत्ता का यह प्रकाश शीघ्र ही फ़ैल जाएगा
और वर्षों मानवता को राह दीखाता रहेगा। (12)

 इसके अतिरिक्त फ्रैंक विल्सन ने, जो उस समय मॉरिशस में परामर्शदाता के रूप में नियुक्त थे होप एंड डेस्पर नामक कविता संग्रह निकाला जिसमें गांधी नामक एक कविता भी थी, जिसकी कुछ पंक्तियों का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है:

मैं रोता नहीं,
तुम्हारा तेज मेरे उभरते हुए आँसुओं को सुखा देता है
और जब भी सामना होता है निराशा का,
उर शरीर की दुर्बलता को चखता हूँ,
तो मैं मानव आत्मा की गहरी गुफा में झाँकता हूँ।
मैं तुम्हें देखता हूँ। (13)

इसी प्रकार विद्याधर महाजन ने रामचरित मानस के अनुकरण पर गांधी चरितमानस की रचना की, जिसमें गांधी जी के महान व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए उनकी स्तुति स्वरूप कवितायें की गई हैं ।(14)

 महात्मा गांधी की स्मृति को नमन करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए यूनेस्को द्वारा उनकी जन्म शताब्दी वर्ष 1968-69 को द ईयर ऑफ़ ह्यूमनिज्म घोषित किया गया था, जिसके अंतर्गत समस्त विश्व ने अपनी –अपनी तरह से गांधी जी का स्मरण किया और उन्हें अपनी भावांजलियाँ अर्पित की थीं। मॉरिशस में भी वर्ष भर महात्मा गांधी से संबंधित विविध कार्यक्रम आयोजित किये गए। देश की विभिन्न महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में उनके जीवन दर्शन और सिद्धांतों से सम्बंधित लेख प्रकाशित किये गए। विभिन्न अवसरों पर मॉरिशस सरकार द्वारा अनेक डाक टिकट निकाले गए हैं। 

इस अवसर पर स्वामी वेंकटेशांनद द्वारा संकलित लेखों की सीरीज- ‘The Voice of Truth’, डॉ. सोमना की पुस्तक- ‘Mahatma Gandhi and other dedicated souls’, देवलाल ठाकुर की- ‘Mahatma Gandhi।n Mauritius’ और हिन्दी लेखक संघ द्वारा गांधी स्मृति पुस्तक प्रकाशित की गई। आर.के.बुधन द्वारा लिखी गई महात्मा गांधी जी की जीवनी ‘The Spiritual Triumph of Gandhi Maharaj ’ विशेष रूप से उल्लेखनीय कही जा सकती हैं। आर.के.बुधन जो एक बैरिस्टर थे, उनकी कई अवसरों पर विभिन्न देशों में गांधी जी से भेंट हुई थी और वे गांधी जी के व्यक्तित्व और विचारधारा से बहुत प्रभावित थे। गांधी जी की ह्त्या से दुखी होकर उन्होंने The Greatest Historical Tragedy of Modern Times नामक भावपूर्ण लेख लिखा जो लेब्र दैनिक में प्रकाशित हुआ था, जिसमें अत्यंत भावविह्वल होकर वे लिखते हैं – “गांधी जी की ह्त्या एक विश्व व्यापी विपत्ति रही क्योंकि वे विश्व संपदा थे, ऐसी संपदा जिसकी जरूरत एक कलह और द्वेष से भरी और खून की प्यासी दुनिया को आज भी है, क्योंकि इसे मनुष्य की आत्मा को ऊपर उठाना है और जीवन को महान बनाना है। वही हिंसा के द्वारा गांधी जी का चला जाना आधुनिक संसार की सबसे बड़ी त्रासदी है क्योंकि आत्मपरक और विषयपरक, दोनों ही दृष्टिकोणों से गांधी एक अद्वितीय और विराट व्यक्ति थे जिनमें अनुपम आ ध्यात्मिक गुण थे जो न केवल अपने देश के लिए अलग ही भूमिका अदा करने के लिए जन्मे थे बल्कि पृथ्वी पर अलौकिक कार्य करने के लिए भी अवतरित हुए थे।” (15)

सन 1975 में पंडित बासुदेव विष्णुदयाल द्वारा लिखित –“Mahatma Gandhi: a new Approach ”, सन 1980 में के.हजारी सिंह द्वारा लिखित-“Les Pensées de Gandhi ” और 1988 मैं उत्तम विष्णुदयाल द्वारा लिखित- “Mahatma Gandhi and other Essays” अन्य उल्लेखनीय पुस्तकें है। सन 1995 मे मॉरिशस के प्रसिद्ध इतिहासकार एवं साहित्यकार प्रहलाद रामशरण ने गांधी जी के मॉरिशस आगमन के संबंध में शोधपरक विविध तथ्यों को उद्धृत करते हुए -“Mahatma Gandhi and His।mpact on Mauritius ” नामक पुस्तक लिखी है, जिसका फ्रेंच और हिंदी भाषा में अनुवाद बहुत लोकप्रिय हुआ है। इस शोध-आलेख में कई उद्धरण और तथ्य प्रहलाद रामशरण जी की इसी पुस्तक से साभार लिए गए हैं ।

मॉरिशस के साहित्य पर गांधी जी का प्रभाव :
 गांधी जी अपने विचारों को विभिन्न भाषणों और सभाओं में व्यक्त करने के साथ ही उन्हें अपनी विभिन्न पुस्तकों और लेखों में भी उतारते थे। अपनी सोच और विचारों का एक सिरा जहाँ वे एक ओर सामान्य जन के हाथ में पकडाते थे वहीँ दूसरा सिरा वे देश के राजनैतिक प्रहरियों सा सँभालने की अपेक्षा रखते थे, जिसका परिणाम यह होता था कि व्यक्ति और सत्ता परस्पर अभिन्न होकर राष्ट्रहित में संलग्न हों। उनकी इस सकारात्मक सोच का प्रभाव जहाँ मॉरिशस की राजनीति पर देखा गया, वहीं बुद्धिजीवी साहित्यकारों की कलम और रचनाशीलता भी इससे अछूती न रह सकी। मॉरिशस के जन-जन में गांधी जी एक आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित हो चुके थे, जिसका अनुकरण व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामजिक उत्थान के लिए नवजागरण का बिगुल बजाने की भी क्षमता रखता था। मॉरिशसीय साहित्यकारों ने स्वतंत्रता के लिए गांधी जी द्वारा किए जा रहे आंदोलन से प्रेरणा लेकर अपनी सृजनात्मकता के माध्यम से लोगों में संघर्ष के प्रति जागृति और चेतना का स्वर प्रस्फुटित किया और समग्र राष्ट्र को एकीकृत किया। गांधी जी के प्रभाव के कारण ही तत्कालीन साहित्यकारों की रचनाओं में भारतीय राष्ट्रीयता का स्वर अत्यंत मुखर दिखाई पड़ता है। इसी भावना के प्रतिफलन में युगीन साहित्य में विभिन्न साहित्यकारों की रचनाओं में महात्मा गांधी किसी न किसी रूप में प्रतिबिंबित होते रहे हैं। पंडित ठाकुर दत्त पाण्डेय की बापू के तीन बन्दर कविता (कविता संग्रह आलोक में संगृहीत ) की निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिये जिनमें वे गांधी जी के बंदरों के माध्यम से समाज की प्रवृत्तियों पर तीक्ष्ण व्यंग्य करते हैं:
बापू तेरे तीन बन्दर
कल समय के
 प्रभाव पाकर
हर देश में मौजूद हैं
अपने रंग बदलकर
हर देश में जाकर
अमर पद पा गए हैं

मॉरिशस के प्रसिद्ध साहित्यकार अभिमन्यु अनत प्रवासी साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. गोयनका को दिए गए एक साक्षात्कार में गांधी जी के प्रति अपनी सम्मान भावना को प्रदर्शित करते हुए कहते हैं –“महात्मा गांधी जी ने अपनी मॉरिशस यात्रा के दौरान मॉरिशस की जनता को एक नई चेतना दी। एक अभय दान दिया, शक्ति दी और उन्होंने उस समय यह भी आह्वान किया कि मॉरिशस की भारतीय जनता अपने को राजनीति में सक्रिय करे और अपने देश की प्रतिष्ठा के लिए वह कर दिखाए जिससे उनके पूर्वजों का देश भारत उन पर गर्व कर सके।” (16) मॉरिशसीय साहित्यकारों का तो यह भी मानना है कि गांधी जी का यदि यह आह्वान नहीं होता तो गाँव की कोठी में दयनीय जीवन जीने वाले मजदूर का बेटा आगे चलकर मॉरिशस का प्रथम प्रधानमंत्री (डॉ.शिवसागर रामगुलाम ) नहीं होता।

अनत जी ने गांधी जी से प्रभावित अपनी उपन्यास त्रयी (लाल पसीना, गांधी जी बोले थे, और पसीना बहता रहा) का दूसरा खंड गांधी जी बोले थे को महात्मा गांधी को समर्पित करके अपनी रचना धर्मिता को जीवंतता दी। यह उपन्यास गांधी जी के स्व धर्म, स्व संस्कृति, स्वभाषा और स्वदेशी के सिद्धांत को मुखरता देता है। इस उपन्यास के अतिरिक्त अभिमन्यु अनत की अनेक कविताएँ गांधीवाद से प्रभावित हैं। ‘एक डायरी बयान’ नामक कविता संग्रह में वे 2-अक्टूबर को लिखते हैं -:
चौराहे पर की उस गांधी की मूर्ति का
उद्घाटन जो नेता कर गया था कल
गांधी महात्मा की उस श्वेत मूर्ति को
किसी ने तीन गोलियाँ मार दीं
खामोशी ऊपर उड़कर गई,
बादलों को खंजर मार दिया
जमीन पर लाल बूंदें टपकने लगीं
गांधी जी की मूर्ति जीवित न हो सकी
वह भी गा रही है गांधी जी की तरह
रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम।।

उनकी पहली कविता पसीना किसी का फसल किसी की भी पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों के शोषण प्रवृत्ति की ओर ही स्पष्ट दिग्दर्शन है, जिसके विरुद्ध गांधी जी ने जीवन भर खिलाफत की थी ।
जयनारायण राय मॉरिशस के प्रतिष्ठित कवि हैं। वे भारत से शिक्षा प्राप्त करके मॉरिशस आये थे। मॉरिशस आकर उन्होंने समाज को चैतन्य करने के लिए अपनी साहित्यिक प्रतिभा का उपयोग किया और अपनी कविताओं के माध्यम से जनता को गांधी जी के सिद्धांतों पर चलकर स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। अपनी बहुचर्चित अहिंसा पथ नामक कविता जो मॉरिशस आर्य पत्रिका में सन 1937 में प्रकाशित हुई थी। इसमें जयनारायण जी लोगों को उद्बोधित करते हुए कहते हैं -
निशस्त्र लेंगे हक्क अपने
जग तू देख ये खेल
रहेंगे सूर सिपाही यूँ अपने
शस्त्र में लिए तेल
परम धरम पंथ पर चलकर
अहिंसा से ही लेंगे
इस बूढ़े गांधी की राह पर
हम ही डटे रहेंगे।

मॉरिशस के एक अन्य कवि मुनीश्वरलाल चिंतामणि गांधी जी से अत्यंत प्रभावित रहे हैं। यहाँ तक कि उनके कविता लिखने का उद्देश्य भी महात्मा गांधी के दर्शन से पूर्णतया प्रभावित है, जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने डॉ. कमल किशोर गोयनका को दिए गए साक्षात्कार में इन शब्दों में की है- “महात्मा गांधी के इस कथन से मैं सहमत हूँ कि वह काव्य जो मानव जीवन को ऊँचा न उठाये और उसमें नई आशाएँऔर संभावनाएँन भरे, काव्य नहीं कहा जा सकता। मेरी यह स्थापना है कि कविता के पठन और श्रवण से पाठक में बदलाव आ सकता है, वह अपनी मानवीय पहचान की टोह लगा लेता है, जिससे उसे अमानवीयता, अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने की प्रेरणा मिलती है।”(17)

कविता रंगभेद की रचना भी उन्होंने गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर लिखी है:
रंगभेद का कोढ़ अपने शरीर से लपेटे,
तुम सभ्य होने का
कब तक दावा करते रहोगे ?(18)

मॉरिशस के राष्ट्रीय कवि ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’ ने भी कई कवितायें लिखी जो महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य के संदेश को प्रतिष्ठापित करती हैं। अपने ‘रसरंग’ कविता संग्रह में ‘घुरहू मौसा के सनेस’ नामक तेरह भोजपुरी कविताओं के संग्रह में वे अपने समाज को एक संग में बंध गेले का आह्वान करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति, समाज और देश का कल्याण महत्मा गांधी के मार्ग का अनुसरण करके ही संभव है –
“गांधी जी के मंतर से ही, तोहार बाटे हो कल्यान”

इसके अतिरिक्त सन 2001 में प्रकाशित “मिलेन्यम पुरुष महात्मा गांधी का पैगाम” नामक पुस्तक गांधी जी के मॉरिशस आगमन पर लिखी है। कवि ने उन्हें अवतारी पुरुष की संज्ञा से विभूषित किया है और उनको मॉरिशस का प्राण, मुक्तिदाता, कुलियों के जीवन धन प्राण, जागृति की मशाल और मानवता का सच्चा दूत कहकर संबोधित किया है। सत्याग्रह के महत्त्व को विश्व व्यापी बनाने और जन-जन तक उसकी महत्ता को सिद्ध करने के लिए गांधी जी ने इक्कीस दिन का व्रत किया। विश्व भर के उनके अनुनायियों और प्रशंसकों ने उनके स्वास्थ्य के प्रति चिंता जताते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से प्रार्थनाएँकीं । पंडित लक्ष्मी नारायण चौबे, जो भारत से आकर मॉरिशस में निवास कर रहे थे उन्होंने गांधी जी के स्वस्थ होने के पश्चात ‘गांधी जी की महानता’ नामक कविता लिखी जो जागृति नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पंडित लक्ष्मी नारायण चौबे ने इस कविता में गांधी जी के प्रति अपनी भावनाओं को इस तरह व्यक्त किया है –

ये व्रत था इक्कीस दिन का,
बूढ़े आदमी की भीष्म प्रतिज्ञा,
भूख में केवल पानी की बूंदों की अनुमति,
तूने सत्याग्रह का मान रख लिया,
तुझे धन्यवाद हे भगवान।

गांधी जी की 151 वीं जयंती पर मॉरिशस के ख्याति लब्ध कवि और व्यंग्यकार राज हीरामन वर्तमान सामजिक, राजनैतिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं -
बापू, चौथे बन्दर को लाना होगा,
जो अंधे को चश्मा दे,
बहरे को कान दे,
गूंगे को वाणी दे,
फिर उनके हाथ में लाठी,
क्योंकि कुत्ते! अब मुँह चाटने लगे हैं। (19)

 कहा जा सकता है कि साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक विचारधारा के साथ ही देश का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं रहा जो महात्मा गांधी के अतुलनीय व्यक्तित्व की प्रभा से प्रभासित न हो सका हो। “मॉरिशस जैसे मिश्रित संस्कृति वाले देश में यह देखना अत्यंत सुखद है कि गांधी जी का प्रभाव यहाँ रहने वाले भारतवंशियों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि अन्य धर्म और जाति के लोग भी उनकी विचारधारा से समान रूप से प्रभावित होते देखे गए।” (20) गांधी जी और मॉरिशस के संबंध की एक और महत्वपूर्ण कड़ी, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता और वह है गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस जैसा अतुलनीय ग्रन्थ। मॉरिशस रामायण देश कहा जाता है, मॉरिशस का प्रत्येक हिंदू मानस को अमूल्य थाती समझता है और उसके सिद्धांतों का यथसंभव अपने जीवन में अनुकरण करने का प्रयत्न भी करता है। गांधी जी के जीवन पर भी रामायण का अमिट प्रभाव रहा था और मानस के जीवन मूल्यों और दर्शन को गांधी जी भी अपने जीवन में उतारते रहे। मॉरिशसवासी प्रत्येक वर्ष महात्मा गांधी की जयंती को हर्षोल्लास के साथ मनाकर उनको अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं और देश के लिए दिए गए उनके योगदान को कृतज्ञता पूर्वक स्मरण भी करते हैं। भारतीय संस्कृति, परम्परा और शिक्षा के संवर्धन और सार्वभौम इंसान बनाने के महात्मा गांधी के स्वप्न को साकार करने के लिए सन 1970 में मॉरिशस सरकार द्वारा महात्मा गांधी संस्थान स्थापित किया गया, जो देश में उच्चतम अकादमिक संस्था है, जिसे गांधी जी के सिद्धांतों के प्रति देश की प्रतिबद्धता प्रदर्शन के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है।

संदर्भ:
(1) I have presented no new principles, but have to restate old principles. Selections from Gandhi; Nirmal Bose, First Edition 1948, page.IX
(2) गांधी और गांधीवाद, डॉ.वी.पट्टाभि सीता रमैया, प्रथम भाग, पृष्ठ-281
(3) गांधी साहित्य, भाग-5: धर्म नीति, पृष्ठ 117
(4) मॉरिशस में भारतीयों का इतिहास - के हजारी सिंह, पृष्ठ-3
(5) Gandhiji’s words came out of his heart and fell as nectar on the famished ears of his audience .He advised them to give more attention to the education of their children, to consider themselves as citizens of their adopted land and encouraged them to take an active part।n the government of the country, Mahatma Gandhi।n Mauritius, .Deolaall Thacoor, (Port Louis, Mauritius:The Royal printing, 1970, p-126)
(6) हरिजन, 1947
(7) यंग इण्डिया,
(8) मॉरिशस में हिन्दी भाषा का संक्षित इतिहास-जय नारायण राय, पृ.-112
(9) रामदेव धुरंधर, 02/10/20 फेसबुक से साभार
(10) पूजानंद नेमा (द्वितीय विश्व हिंदी सम्मलेन स्मारिका में प्रकाशित लेख, पृष्ठ- 78 )
(11) The culmination was reached when।n October 1947, Mauritans celebrated with éclat the Gandhi week।n Laventure and Saint Pierre. Gandhism became a living force.Mahtma Gandhi: A new approach -Basdeo Bissoondayal, (Bombay: Bhartiiya Vidya Bhavan, 1975)p, 103
(12) प्रहलाद रामशरण- महात्मा गांधी और मॉरिशस पर उनका प्रभाव 2011 का हिंदी अनुवाद, पृष्ठ 138
(13) वही
(14)  वही
(15) Gandhi Charita Manas-Vidyadhar Mahajan, Kamal Mudranalaya, Allahabad 1954
(16) हिंदी का प्रवासी साहित्य, अभिमन्यु अनत:एक संवाद-कमल किशोर गोयनका, पृष्ठ 398
(17) वही पृष्ठ 388
(18) मॉरिशस मित्र, 27-1-1931
(19) राज हीरामन, 02/10/20 फेसबुक से साभार
(20) If Gandhi had met Christ the latter would have loved him
France Boyer, La Vie Catholique - A Christian Weekly।n Mauritius (10.11.1968).


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