अनुवाद: मरहूम की याद में (पतरस बुख़ारी)

पतरस बुख़ारी

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


अहमद शाह पतरस बुख़ारी  
 (1 अक्टूबर 1898- 5 दिसंबर 1958)

असली नाम सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। पतरस बुख़ारी के नाम से प्रसिद्द हैं। जन्म पेशावर में हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी, फ़ारसी और पंजाबी भाषाओं के माहिर थे। प्राइमरी  से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पेशावर में प्राप्त की। लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से बी.ए. (1917) और अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. (1919) किया। इसी दौरान गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर की पत्रिका “रावी” के सम्पादक रहे।
  1925-1926 में इंगलिस्तान में इमानुएल कॉलेज कैम्ब्रिज से अंग्रेज़ी साहित्य में TRIPOS की सनद प्राप्त की। वापस आकर पहले सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज और फिर गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में प्रोफ़ेसर रहे। 1940 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल हुए। 1940 ही में ऑल इंडिया रेडियो में कंट्रोलर जनरल हुए। 1952 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थाई प्रतिनिधि बने। 1954 में संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल चुने गए। दिल का दौरा पड़ने से 1958 में न्यू यार्क में देहांत हुआ।
पतरस ने बहुत कम लिखा। “पतरस के मज़ामीन” के नाम से उनके हास्य निबंधों का संग्रह 1934 में प्रकाशित हुआ जो ग्यारह निबंधों और एक प्रस्तावना पर आधारित है। इस छोटे से संग्रह ने उर्दू पाठकों में हलचल मचा दी और उर्दू हास्य-साहित्य के इतिहास में पतरस का नाम अमर कर दिया। उर्दू के व्यंग्यकार प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दिक़ी लिखते हैं “रावी” में पतरस का निबंध “कुत्ते” पढ़ा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे लिखने वाले ने इस निबंध से जो प्रतिष्ठा प्राप्त करली है वह बहुतों को तमाम उम्र नसीब न होगी। ... हँसा-हँसा के मार डालने का गुर बुख़ारी को ख़ूब आता है। हास्य और हास्य लेखन की यह पराकाष्ठा है... पतरस मज़े की बातें मज़े से कहते हैं और जल्द कह देते हैं। इंतज़ार करने और सोच में पड़ने की ज़हमत में किसी को नहीं डालते। यही वजह है कि वे पढ़ने वाले का विश्वास बहुत जल्द हासिल कर लेते हैं।”  पतरस की विशेषता यह है कि वे चुटकले नहीं सुनाते, हास्यास्पद घटनाओं का निर्माण करते और मामूली से मामूली बात में हास्य के पहलू देख लेते हैं। इस छोटे से संग्रह द्वारा उन्होंने भविष्य के हास्य व व्यंग्य लेखकों के लिए नई राहें खोल दी हैं । उर्दू के महानतम हास्य लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी एक साक्षात्कार में कहते हैं “…पतरस आज भी ऐसा है कि कभी गाड़ी अटक जाती है तो उसका एक पन्ना खोलते हैं तो ज़ेहन की बहुत सी गाँठें खुल जाती हैं और क़लम रवाँ हो जाती है।”
पतरस को हास्य लेखक के रूप में इतनी ख्याति मिली कि बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे एक महान अनुवादक (अंग्रेज़ी से उर्दू), आलोचक, वक्ता और राजनयिक थे। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में नियुक्ति के दौरान उन्होंने अपने इर्द-गिर्द बुद्धिमान, प्रतिभाशाली व रचनाशील युवा छात्रों का एक झुरमुट इकठ्ठा कर लिया था। उनके शिष्यों में उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शामिल थे।


आफ़ताब अहमद

एक दिन मिर्ज़ा साहब और मैं बरामदे में साथ-साथ कुर्सियाँ डाले चुप-चाप बैठे थे। जब दोस्ती बहुत पुरानी हो जाए तो गुफ़्तुगू की बिल्कुल ज़रुरत बाक़ी नहीं रहती और दोस्त एक दूसरे के मौन से भी आनंदित हो सकते हैं। यही हालत हमारी थी। हम दोनों अपने-अपने विचारों में मग्न थे। मिर्ज़ा साहब तो ख़ुदा जाने क्या सोच रहे थे। लेकिन मैं संसार की विषमताओं पर विचार कर रहा था। दूर सड़क पर थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद एक मोटरकार गुज़र जाती थी। मेरा स्वभाव कुछ ऐसा है कि मैं जब कभी किसी मोटरकार को देखूँ मुझे समय की विषमता का विचार ज़रूर सताने लगता है और मैं कोई ऐसा उपाय सोचने लगता हूँ जिससे दुनिया की सारी दौलत सब इंसानों में बराबर-बराबर बाँटी जा सके। अगर मैं सड़क पर पैदल जा रहा हूँ और कोई मोटर इस अदा से गुज़र जाए कि गर्दो-ग़ुबार मेरे फेफड़ों, मेरे दिमाग़, मेरे आमाशय और मेरी तिल्ली तक पहुँच जाए तो उस दिन मैं घर आकर रसायन विज्ञान की वह पुस्तक निकाल लेता हूँ जो मैंने एफ़.ए. में पढ़ी थी और इस प्रयोजन से उसका अध्ययन करने लगता हूँ कि शायद बम बनाने की कोई विधि हाथ आ जाए। 

मैं कुछ देर तक आहें भरता रहा। मिर्ज़ा साहब ने कुछ ध्यान न दिया। अंत में मैंने मौन को तोड़ा और मिर्ज़ा साहब को संबोधित करते हुए बोला, 

"मिर्ज़ा साहब! हम में और जानवरों में क्या अंतर है?" 

मिर्ज़ा साहब बोले: "भई कुछ होगा ही न आख़िर।" 

मैंने कहा, "मैं बताऊँ तुम्हें?" 

कहने लगे, "बोलो।" 

मैंने कहा, "कोई अंतर नहीं। सुनते हो मिर्ज़ा। कोई अंतर नहीं। हममें और जानवरों में... कम-से-कम मुझमें और जानवरों में कोई अंतर नहीं। हाँ हाँ, मैं जानता हूँ तुम मीनमेख निकालने में बड़े माहिर हो। कह दोगे जानवर जुगाली करते हैं, तुम नहीं करते। उनके पूँछ होती है, तुम्हारे नहीं है। लेकिन इन बातों से क्या होता है? इनसे तो सिर्फ़ यही साबित होता है कि वो मुझसे श्रेष्ठ हैं। लेकिन एक बात में, मैं और वो बिल्कुल बराबर हैं। वो भी पैदल चलते हैं और मैं भी पैदल चलता हूँ। इसका तुम्हारे पास क्या जवाब है? जवाब नहीं। कुछ है तो कहो। बस चुप हो जाओ। तुम कुछ नहीं कह सकते। जब से मैं पैदा हुआ हूँ उस दिन से पैदल चल रहा हूँ।  

पैदल! तुम पैदल का मतलब नहीं जानते। पैदल के मतलब हैं धरती के सीने पर इस तरह से चलना कि दोनों पाँव में एक ज़रूर ज़मीन पर रहे। यानी सारी उम्र मेरे चलने का ढंग यही रहा है कि एक पाँव ज़मीन पर रखता हूँ और दूसरा उठाता हूँ। दूसरा रखता हूँ पहला उठाता हूँ। एक आगे एक पीछे, एक पीछे एक आगे। ख़ुदा की क़सम इस तरह की ज़िंदगी से दिमाग़ सोचने के क़ाबिल नहीं रहता। चेतना शून्य हो जाती है। कल्पना मर जाती है। आदमी गधे से बदतर हो जाता है।" 

मिर्ज़ा साहब मेरे इस भाषण के दौरान कुछ इस बेपरवाही से सिग्रेट पीते रहे कि मित्रों की बेवफ़ाई पर रोने को दिल चाहता था। मैंने अत्यंत तिरस्कार व घृणा से मुँह उनकी ओर से फेर लिया। ऐसा प्रतीत होता था कि मिर्ज़ा को मेरी बातों पर विश्वास ही नहीं होता। मानो मैं अपने जो कष्ट बयान कर रहा हूँ वो केवल कपोल कल्पना हैं। अर्थात मेरा पैदल चलने के विरुद्ध शिकायत करना ध्यान देने योग्य ही नहीं। अर्थात मैं किसी सवारी का अधिकारी ही नहीं। मैंने दिल में कहा, "अच्छा मिर्ज़ा यूँ ही सही। देखो तो मैं क्या करता हूँ।"

मैंने अपने दाँत पच्ची कर लिए और कुर्सी के बाज़ू पर से झुककर मिर्ज़ा के नज़दीक पहुँच गया। मिर्ज़ा ने भी सिर मेरी ओर मोड़ा। मैं मुस्कुरा दिया। लेकिन मेरी मुस्कान में ज़हर मिला हुआ था। जब मिर्ज़ा सुनने के लिए बिल्कुल तैयार हो गया तो मैंने चबा-चबाकर कहा:   

"मिर्ज़ा! मैं एक मोटरकार ख़रीदने लगा हूँ।" 

यह कहकर मैं बड़ी लापरवाही से दूसरी ओर देखने लगा। 

मिर्ज़ा बोले, "क्या कहा तुमने? क्या ख़रीदने लगे हो?"  

मैंने कहा, "सुना नहीं तुमने? एक मोटरकार ख़रीदने लगा हूँ। मोटरकार एक ऐसी गाड़ी है जिसको कुछ लोग मोटर कहते हैं, कुछ लोग कार कहते हैं। लेकिन चूँकि तुम थोड़ा मंदबुद्धि हो, इसलिए मैंने दोनों शब्द इस्तेमाल कर दिए ताकि तुम्हें समझने में कोई दिक़्क़त पेश न आए।" 

मिर्ज़ा बोले, "हूँ।" 

अब के मिर्ज़ा नहीं मैं बेपरवाही से सिग्रेट पीने लगा। भौहें मैंने ऊपर को चढ़ा लीं। सिग्रेट वाला हाथ मुँह तक इस अंदाज़ से लाता और ले जाता था कि बड़े-बड़े ऐक्टरों को ईर्ष्या होने लगे। 

थोड़ी देर के बाद मिर्ज़ा बोले, "हूँ।" 

मैंने सोचा असर हो रहा है। मिर्ज़ा साहब पर रौब पड़ रहा है। मैं चाहता था, मिर्ज़ा कुछ बोले ताकि मुझे मालूम हो कहाँ तक रौब में आया है। लेकिन मिर्ज़ा ने फिर कहा,"हूँ।" 

मैंने कहा, "मिर्ज़ा जहाँ तक मुझे मालूम है तुमने स्कूल और कॉलेज और घर पर दो-तीन भाषाएँ सीखी हैं और इसके अतिरिक्त तुम्हें कई ऐसे शब्द भी आते हैं जो किसी स्कूल या कॉलेज या सभ्य परिवार में नहीं बोले जाते। फिर भी इस समय तुम्हारा संवाद "हूँ" से आगे नहीं बढ़ता। तुम जलते हो। मिर्ज़ा, इस समय तुम्हारी जो मानसिक दशा है, इसको अरबी भाषा में “हसद” कहते हैं।"  

मिर्ज़ा साहब कहने लगे, "नहीं यह बात तो नहीं, मैं तो सिर्फ़ ख़रीदने के शब्द पर विचार कर रहा था। तुमने कहा ‘मैं एक मोटरकार ख़रीदने लगा हूँ,’ तो मियाँ साहबज़ादे! ख़रीदना तो एक ऐसा कार्य है कि इसके लिए रूपये वग़ैरह की ज़रूरत होती है। वग़ैरह का बंदोबस्त तो बख़ूबी हो जाएगा। लेकिन रूपये का बंदोबस्त कैसे करोगे?" 

यह नुक्ता मुझे भी न सूझा था। लेकिन मैंने हिम्मत न हारी। मैंने कहा, "मैं अपनी कई क़ीमती चीज़ें बेच सकता हूँ।"  

मिर्ज़ा बोले, "कौन-कौन सी मसलन?" 

मैंने कहा, "एक तो मैं सिग्रेट-केस बेच डालूँगा।" 

मिर्ज़ा कहने लगे, "चलो दस आने तो ये हो गए। बाक़ी ढाई तीन हज़ार का बंदोबस्त भी इसी तरह हो जाए तो सब काम ठीक हो जाएगा।"  

इसके बाद ज़रूरी यही लगा कि गुफ़्तुगू का सिलसिला कुछ देर के लिए रोक दिया जाए। इसलिए मैं मिर्ज़ा से विमुख होकर ख़ामोश हो रहा। यह बात समझ में न आई कि लोग रूपये कहाँ से लाते हैं। बहुत सोचा। आख़िर इस नतीजे पर पहुँचा कि लोग चोरी करते हैं। इससे कुछ-कुछ संतुष्टि हुई। 

मिर्ज़ा बोले, "में तुम्हें एक तरीक़ा बताऊँ, एक बाइसिकल ले लो।" 

मैंने कहा, “वह रूपये की समस्या तो फिर भी ज्यों-की-त्यों रही।" 

कहने लगे, "मुफ़्त।" 

मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा, "मुफ़्त वह कैसे?"  

कहने लगे, "मुफ़्त ही समझो। आख़िर दोस्त से दाम लेना भी कहाँ की शराफ़त है। अलबत्ता तुम ही एहसान क़ुबूल करना गवारा न करो तो और बात है।"  

ऐसे अवसर पर जो हँसी मैं हँसता हूँ उसमें मासूम बच्चे की किलकारी, जवानी की ख़ुशदिली, उबलते हुए फ़व्वारों का संगीत और बुलबुलों का गीत सब एक दूसरे के साथ मिले होते हैं। अतः मैं यह हँसी हँसा और इस तरह हँसा कि खिली हुई बाछें फिर घंटो तक अपने मूल स्थान पर वापस न आईं। जब मुझे विश्वास हो गया कि अचानक कोई ख़ुशख़बरी सुनने से दिल की धड़कन बंद हो जाने का जो ख़तरा होता है इससे सुरक्षित हूँ तो मैंने पूछा, "है किस की?" 

मिर्ज़ा बोले, "मेरे पास एक बाइसिकल पड़ी है तुम ले लो।" 

मैंने कहा, "फिर कहना! फिर कहना!" 

कहने लगे, “भई! एक बाइसिकल मेरे पास है। जब मेरी है तो तुम्हारी है। तुम ले लो।" 

यक़ीन मानिए मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। शर्म के मारे मैं पसीना-पसीना हो गया। बीसवीं सदी में ऐसी निस्वार्थता औरऐसा त्याग भला कहाँ देखने में आता है। मैंने कुर्सी सरकाकर मिर्ज़ा के पास कर ली। समझ में न आया कि अपनी लज्जा और कृतज्ञता किन शब्दों में व्यक्त करूँ। 

मैंने कहा, "मिर्ज़ा सबसे पहले तो मैं उस गुस्ताख़ी और अशिष्टता और बेअदबी के लिए माफ़ी माँगता हूँ जो अभी मैंने तुम्हारे साथ बातचीत में दिखाई। दूसरे मैं आज तुम्हारे सामने एक गुनाह क़ुबूल करना चाहता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि तुम मेरी साफ़गोई को सराहोगे और मुझे अपनी करुणाशीलता के चलते माफ़ कर दोगे। मैं हमेशा तुमको बेहद कमीना, कंजूस, स्वार्थी और मक्कार इंसान समझता रहा हूँ। देखो नाराज़ मत हो। इंसान से ग़लती हो ही जाती है। लेकिन आज तुमने अपनी सज्जनता और मित्रता का सबूत दिया है और मुझ पर साबित कर दिया है कि मैं कितना घृणा-योग्य, संकुचित मानसिकता का और तुच्छ व्यक्ति हूँ। मुझे माफ़ कर दो।" 

मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैं मिर्ज़ा के हाथ को चूमने और अपने आँसुओं को छुपाने के लिए उसकी गोद में सिर रखने वाला ही था कि मिर्ज़ा साहब कहने लगे, 

"वाह इसमें मेरी उदारता क्या हुई, मेरे पास एक बाइसिकल है, जैसे मैं सवार हुआ वैसे तुम सवार हुए।" 

मैंने कहा, " मिर्ज़ा मुफ़्त में न लूँगा। यह हर्गिज़ नहीं हो सकता।" 

मिर्ज़ा कहने लगे, "बस मैं इसी बात से डरता था। तुम संवेदनशील इतने हो कि किसी का अहसान लेना गवारा नहीं करते। हालाँकि ख़ुदा गवाह है, अहसान इसमें कोई नहीं।" 

मैंने कहा, "ख़ैर, कुछ भी सही, तुम सचमुच मुझे इसकी क़ीमत बता दो।" 

मिर्ज़ा बोले, "क़ीमत का ज़िक्र करके तुम जैसे मुझे काँटों में घसीटते हो और जिस क़ीमत पर मैंने ख़रीदी थी वह तो बहुत ज़्यादा थी और अब तो वह इतने की रही भी नहीं।" 

मैंने पूछा, " तुमने कितने की ख़रीदी थी?" 

कहने लगे, "मैंने पौने दो सौ रूपये में ली थी। लेकिन उस ज़माने में बाइसिकलों का रिवाज ज़रा कम था, इसलिए क़ीमतें ज़रा ज़्यादा थीं।" 

मैंने कहा, "क्या बहुत पुरानी है?" 

बोले, "नहीं ऐसी पुरानी भी नहीं। मेरा लड़का उस पर कॉलेज आया जाया करता था और उसे कॉलेज छोड़े अभी दो साल भी नहीं हुए। लेकिन इतना ज़रूर है कि आजकल की बाइसिकलों से थोड़ा अलग है। आजकल तो बाइसिकलें टीन की बनती है, जिन्हें कॉलेज के सरफिरे लौंडे सस्ती समझकर ख़रीद लेते हैं। पुरानी बाइसिकलों के ढाँचे मज़बूत हुआ करते थे।"   

"मगर मिर्ज़ा पौने दो सौ रूपये तो मैं हर्गिज़ नहीं दे सकता। इतने रूपये मेरे पास कहाँ से आयें? मैं तो इससे आधी क़ीमत भी नहीं दे सकता।" 

मिर्ज़ा कहने लगे, "तो मैं तुमसे पूरी क़ीमत थोड़ी माँगता हूँ। अव्वल तो क़ीमत लेना नहीं चाहता लेकिन... ...." 

मैंने कहा, " न मिर्ज़ा! क़ीमत तो तुम्हें लेनी पड़ेगी। अच्छा तुम यूँ करो, मैं तुम्हारी जेब में कुछ रूपये डाल देता हूँ। तुम घर जाके गिन लेना। अगर तुम्हें स्वीकार हुए तो कल बाइसिकल भेज देना। वरना रूपये वापस कर देना। अब यहाँ बैठकर मैं तुमसे सौदा चुकाऊँ, यह तो कुछ दुकानदारों की सी बात मालूम होती है।" 

मिर्ज़ा बोले, "भई जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। मैं तो अब भी यही कहता हूँ कि क़ीमत-वीमत जाने दो। लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम न मानोगे।"  

मैं उठकर अंदर कमरे में आया। मैंने सोचा इस्तेमाल-शुदा चीज़ की लोग आम तौर पर आधी क़ीमत देते हैं। लेकिन जब मैंने मिर्ज़ा से कहा था कि मिर्ज़ा मैं तो आधी क़ीमत भी नहीं दे सकता तो मिर्ज़ा ने इसपर आपत्ति नहीं जताई। वह बेचारा तो बल्कि यही कहता था कि तुम मुफ़्त ही ले लो। लेकिन मुफ़्त मैं कैसे ले लूँ?  आख़िर बाइसिकल है। एक सवारी है। फ़िटनों और घोड़ों, मोटरों और तांगों की श्रेणी में शुमार होती है। बक्स खोला तो मालूम हुआ कि जोड़-तोड़कर कुल छियालीस रूपये हैं। छियालीस रूपये तो कुछ ठीक रक़म नहीं। पैंतालीस या पच्चास हों जब भी बात है। पच्चास तो हो नहीं सकते और अगर पैंतीलीस ही देने हैं तो चालीस क्यों न दिए जायें। जिन रक़मों के अंत में शून्य आता है वो रक़में कुछ ज़्यादा मुनासिब मालूम होती हैं। बस ठीक है चालीस रूपये दे दूँगा। ख़ुदा करे मिर्ज़ा स्वीकार कर ले। 

बाहर आया। चालीस रूपये मुट्ठी में बंद करके मैंने मिर्ज़ा की जेब में डाल दिए और कहा, " मिर्ज़ा इसको क़ीमत न समझना। लेकिन अगर एक ग़रीब मित्र की तुच्छ सी रक़म स्वीकार करना तुम्हें अपना अपमान मालूम न हो तो कल बाइसिकल भेजवा देना।"  

मिर्ज़ा चलने लगे तो मैंने फिर कहा कि मिर्ज़ा कल ज़रूर सुबह-ही-सुबह भेजवा देना। विदा होने से पहले मैंने फिर एक बार कहा, "कल सुबह आठ नौ बजे तक पहुँच जाए। देर न कर देना... ख़ुदा-हाफ़िज़... और देखो मिर्ज़ा, मेरे थोड़े से रूपयों को भी ज़्यादा समझना... ख़ुदा-हाफ़िज़... और तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया। मैं तुम्हारा बहुत कृतज्ञ हूँ और मेरी गुस्ताख़ी को माफ़ कर देना। देखो न कभी-कभी यूँ ही बेतकल्लुफ़ी में... ...कल सुबह आठ नौ बजे तक...ज़रूर... ख़ुदा-हाफ़िज़..." 

मिर्ज़ा कहने लगे, "ज़रा उसको झाड़-पोंछ लेना और तेल वग़ैरह डलवा लेना। मेरे नौकर को फ़ुर्सत हुई तो ख़ुद ही डलवा दूँगा, वरना तुम ख़ुद ही डलवा लेना।" 

मैंने कहा, "हाँ हाँ, वह सब कुछ हो जाएगा। तुम कल भेज ज़रूर देना, और देखना आठ बजे तक या साढे़ सात बजे तक पहुँच जाए। अच्छा... ख़ुदा-हाफ़िज़!" 

रात को बिस्तर पर लेटा तो बाइसिकल पर सैर करने के तरह-तरह के प्रोग्राम सोचता रहा। यह इरादा तो पक्का कर लिया कि दो तीन दिन के अंदर-अंदर इर्द-गिर्द की सारी मशहूर ऐतिहासिक इमारतें और खंडहरों को नए सिरे से देख डालूँगा। इसके बाद अगले गर्मी के मौसम में हो सका तो बाइसिकल पर कश्मीर वग़ैरह की सैर करूँगा। सुबह-सुबह की हवाख़ोरी के लिए हर रोज़ नहर तक जाया करूँगा। शाम को ठंडी सड़क पर जहाँ और लोग सैर को निकलेंगे मैं भी सड़क की साफ़-पारदर्शी सतह पर हल्के-हल्के ख़ामोशी के साथ हाथी दाँत की एक गेंद की भांति गुज़र जाऊँगा। डूबते हुए सूरज की रौशनी बाइसिकल के चमकीले हिस्सों पर पड़ेगी तो बाइसिकल जगमगा उठेगी और ऐसा मालूम होगा जैसे एक राजहंस धरती के साथ-साथ उड़ रहा है। वह मुस्कान जिसका मैं ऊपर ज़िक्र कर चुका हूँ, अभी तक मेरे होंठों पर खेल रही थी। कई बार दिल चाहा कि अभी भागकर जाऊँ और इसी वक़्त मिर्ज़ा को गले लगा लूँ। 

रात को सपने में दुआएँ माँगता रहा कि ऐ ख़ुदा मिर्ज़ा बाइसिकल देने पर राज़ी हो जाए। सुबह उठा तो उठने के साथ ही नौकर ने यह ख़ुशख़बरी सुनाई कि हुज़ूर वह बाइसिकल आ गई है। मैंने कहा, " इतनी सवेरे? " 

नौकर ने कहा, "वह तो रात ही को आ गयी थी। आप सो गए थे, मैंने जगाना मुनासिब न समझा और साथ ही मिर्ज़ा साहब का आदमी यह ढिबरियाँ कसने का एक औज़ार भी दे गया है।" 

मैं हैरान तो हुआ कि मिर्ज़ा साहब ने बाइसिकल भेजवा देने में इतनी शीघ्रता से क्यों काम लिया। लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आदमी बेहद सज्जन और ईमानदार हैं। रूपये ले लिए थे तो बाइसिकल क्यों रोक लेते। 

नौकर से कहा, "देखो यह औज़ार यहीं छोड़ जाओ। और देखो, बाइसिकल को किसी कपड़े से ख़ूब अच्छी तरह झाड़ो। और यह मोड़ पर जो बाइसिकलों वाला बैठता है उससे जाकर बाइसिकल में डालने का तेल ले आओ। और देखो, अबे भागा कहाँ जा रहा है!  हम ज़रूरी बात तुम से कह रहे है। बाइसिकल वाले से तेल की एक कुप्पी भी ले आना और जहाँ-जहाँ तेल देने की जगह है वहाँ तेल दे देना और बाइसिकल वाले से कहना कि कोई घटिया सा तेल न दे दे, जिससे तमाम पुर्जे़ ही ख़राब हो जाएँ। बाइसिकल के पुर्जे़ बड़े नाज़ुक होते हैं। और बाइसिकल बाहर निकाल रखो। हम अभी कपड़े पहनकर आते हैं। हम ज़रा सैर को जा रहे हैं और देखो साफ़ कर देना। और बहुत ज़ोर-ज़ोर से कपड़ा भी मत रगड़ना, बाइसिकल की पॉलिश घिस जाती है।"  

जल्दी-जल्दी चाय पी। ग़ुसलख़ाने में बड़े जोशो-ख़रोश के साथ "चल-चल चमेली बाग़ में" गाता रहा। इसके बाद कपड़े बदले, औज़ार को जेब में डाला और कमरे से बाहर निकला।   

बरामदे में आया तो बरामदे के साथ ही एक अजीबो-ग़रीब मशीन पर नज़र पड़ी। ठीक तरह से पहचान न सका कि क्या चीज़ है? नौकर से पूछा, "क्यों बे यह क्या चीज़ है?" 

नौकर बोला, "हुज़ूर यह बाइसिकल है।" 

मैंने कहा, "बाइसिकल? किस की बाइसिकल?" 

कहने लगा, "मिर्ज़ा साहब ने भिजवाई है आपके लिए।" 

मैंने कहा, "और जो बाइसिकल रात को उन्होंने भेजी थी वह कहाँ गई?" 

कहने लगा, "यही तो है।"  

मैंने कहा, "क्या बकता है जो बाइसिकल मिर्ज़ा साहब ने कल रात को भेजी थी वह बाइसिकल यही है?" 

कहने लगा, "जी हाँ।" 

मैंने कहा, "अच्छा," और फिर उसे देखने लगा। “इसको साफ़ क्यों नहीं किया?" 

"इसको दो-तीन दफ़ा साफ़ किया है?" 

"तो यह मैली क्यों है?" 

नौकर ने इसका जवाब देना शायद मुनासिब न समझा। 

"और तेल लाया?" 

"हाँ हुज़ूर, लाया हूँ।" 

"दिया?" 

"हुज़ूर, वह तेल देने के छेद होते हैं, वह नहीं मिलते।"  

"क्या वजह?" 

"हुज़ूर धुरों पर मैल और ज़ंग जमा है। वह छेद कहीं बीच ही में दब-दबा गए हैं।" 

धीरे-धीरे मैं उस वस्तु के निकट आया जिसको मेरा नौकर बाइसिकल बता रहा था। उसके अलग-अलग पुर्ज़ों को ध्यान से देखा तो इतना तो साबित हो गया कि बाइसिकल है। लेकिन रूप-आकार से यह स्पष्ट था कि हल और रहट और चर्ख़ा और इसी तरह के आविष्कारों से पहले की बनी हुई है। पहिए को घुमा-घुमाकर वह छेद तलाश किया जहाँ किसी ज़माने में तेल दिया जाता था। लेकिन अब उस छेद में से आवागमन का सिलसिला बंद था। अतः नौकर बोला, " हुज़ूर, वह तेल तो सब इधर-उधर बह जाता है। बीच में तो जाता ही नहीं।" 

मैंने कहा, "अच्छा ऊपर-ऊपर ही डाल दो। यह भी मुफ़ीद होता है।" 

आख़िरकार बाइसिकल पर सवार हुआ। पहला ही पाँव चलाया, तो ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई मुर्दा अपनी हड्डियाँ चटका-चटकाकर अपनी इच्छा के विरुद्ध जीवित हो रहा है। घर से निकलते ही कुछ थोड़ी सी उतराई थी। उसपर बाइसिकल ख़ुद-बख़ुद चलने लगी। लेकिन इस रफ़्तार से जैसे तारकोल ज़मीन पर बहता   है। और साथ ही अलग-अलग हिस्सों से तरह-तरह की ध्वनियाँ  आनी शुरू हुईं। इन ध्वनियों की अलग-अलग श्रेणियाँ थीं। चीं, चाँ, चूँ प्रकार की ध्वनियाँ अधिकतर गद्दी के नीचे और पिछले पहिए से निकलती थीं। खट, खड़-खड़, खड़ड़, की तरह की ध्वनियाँ मडगार्डों से आती थीं। चर-चर्रख़, चर-चर्रख़ प्रकार के सुर ज़ंजीर और पैडल से निकलते थे। ज़ंजीर ढीली-ढीली थी। मैं जब कभी पैडल पर बल डालता था ज़ंजीर में एक अंगड़ाई सी पैदा होती थी, जिससे वह तन जाती थी और चटर-चटर बोलने लगती थी। और फिर ढीली हो जाती थी। पिछला पहिया घूमने के अलावा झूमता भी था। यानी एक तो आगे को चलता था और इसके अलावा दाहिने से बाएँ और बाएँ से दाहिने को भी चलता था। इसलिए सड़क पर जो निशान पड़ जाता था उसको देखकर  ऐसा लगता था जैसे कोई मदहोश साँप लहराकर निकल गया है। मडगार्ड थे तो सही लेकिन पहियों के ठीक ऊपर न थे। इनका उपयोग केवल यह मालूम होता था कि मनुष्य उत्तर की दिशा में सैर करने को निकले और सूर्य पश्चिम में अस्त हो रहा हो, तो मडगार्डों की कृपा से टायर धूप से बचे रहेंगे। अगले पहिए के टायर में एक बड़ा सा पैवंद लगा था जिसके कारण पहिया हर चक्कर में एक दफ़ा पल भर को ज़ोर से ऊपर उठ जाता था और मेरा सिर पीछे को यूँ झटके खा रहा था जैसे कोई लगातार ठोड़ी के नीचे मुक्के मारे जा रहा हो। पिछले और अगले पहिए को मिलाकर चूँ चूँ फट, चूँ चूँ फट... ...की ध्वनि निकल रही थी। जब उतार पर बाइसिकल थोड़ी तेज़ हुई तो वातावरण में एक भूँचाल सा आ गया। और बाइसिकल के कई और पुर्जे़ जो अब तक सो रहे थे, जागकर बोलने लगे। इधर-उधर के लोग चौंके। माताओं ने अपने बच्चों को सीने से लगा लिया। खड़ड़-खड़ड़ के बीच में पहियों की ध्वनि अलग सुनाई दे रही थी। लेकिन चूँकि बाइसिकल अब पहले से तेज़ थी इसलिए चूँ चूँ फट, चूँ चूँ फट की ध्वनि ने अब चुचूँ फट, चुचूँ फट, का रूप धारण कर लिया था। पूरी बाइसिकल किसी दुरूह अफ़्रीक़ी भाषा में पाठ रट रही थी।  

इतनी तेज़ रफ़्तार बाइसिकल के नाज़ुक मिज़ाज पर भारी सिद्ध हुई। अतः इसमें अचानक दो परिवर्तन हुए। एक तो हैंडल एक ओर को मुड़ गया जिसका परिणाम यह हुआ कि मैं जा तो सामने को रहा था लेकिन मेरा पूरा शरीर दाईं ओर को मुड़ा हुआ था। इसके अतिरिक्त बाइसिकल की गद्दी अचानक छह इंच के क़रीब नीचे बैठ गई। अतः जब पैडल चलाने के लिए मैं टांगें ऊपर नीचे कर रहा था तो मेरे घुटने मेरी ठोड़ी तक पहुँच जाते थे। कमर दोहरी होकर बाहर को निकली हुई थी। और साथ ही अगले पहिए की अठखेलियों के सबब सिर बराबर झटके खा रहा था।  

गद्दी का नीचा हो जाना अत्यंत कष्टकर सिद्ध हुआ। इसलिए मैंने उचित यही समझा कि इसको ठीक कर लूँ। इसलिए मैंने बाइसिकल को ठहरा लिया और नीचे उतरा। बाइसिकल के ठहर जाने से एकाएक जैसे दुनिया में एक ख़ामोशी सी छा गई। ऐसा मालूम हुआ जैसे मैं किसी रेल के स्टेशन से निकलकर बाहर आ गया हूँ। जेब से मैंने औज़ार निकाला। गद्दी को ऊँचा किया। कुछ हैंडल को ठीक किया। और दोबारा सवार हो गया। 

दस क़दम भी चलने न पाया था कि अबके हैंडल अचानक नीचा हो गया। इतना कि गद्दी अब हैंडल से कोई फ़ुट भर ऊँची थी। मेरा पूरा शरीर आगे को झुका हुआ था। सारा बोझ दोनों हाथों पर था जो हैंडल पर रखे थे और बराबर झटके खा रहे थे। आप मेरी हालत की कल्पना करें तो आपको मालूम होगा कि मैं दूर से ऐसा मालूम हो रहा था जैसे कोई औरत आटा गूँध रही हो। मुझे इस समरूपता का अहसास बहुत शिद्दत से था जिसके कारण मेरे माथे पर पसीना आ गया। मैं दाएँ-बाएँ  लोगों को कनखियों से देखता जाता था। यूँ तो हर आदमी मील भर पहले ही से मुड़-मुड़कर देखने लगता था। लेकिन इनमें कोई भी ऐसा न था जिसके लिए मेरी मुसीबत मनोरंजन का कारण न हो। 

हैंडल तो नीचा हो ही गया था। थोड़ी देर के बाद गद्दी भी फिर नीची हो गई और मैं सशरीर धरती के निकट पहुँच गया। एक लड़के ने कहा, "देखो यह आदमी क्या कर रहा है!" जैसे उस बदतमीज़ के नज़दीक मैं कोई करतब दिखा रहा था। मैंने उतरकर फिर हैंडल और गद्दी को ऊँचा किया। लेकिन थोड़ी देर के बाद इनमें से एक न एक फिर नीचा हो जाता। वो क्षण जिनके दौरान में मेरा हाथ और मेरा शरीर दोनों बराबर एक ही ऊँचाई पर हों बहुत ही कम थे और उनमें भी मैं यही सोचता रहता था कि अबकी गद्दी पहले बैठेगी या हैंडल? इसलिए निडर होकर न बैठता। बल्कि शरीर को गद्दी से थोड़ा ऊपर ही रखता। लेकिन इससे हैंडल पर इतना बोझ पड़ जाता कि वह नीचा हो जाता। 

जब दो मील गुज़र गए और बाइसिकल की उठक-बैठक ने एक नियमितता प्राप्त करली, तो निर्णय किया कि किसी मिस्त्री से पेच कसवा लेने चाहिये। अतः बाइसिकल को एक दुकान पर ले गया। 

बाइसिकल की खड़-खड़ से दुकान में जितने लोग काम कर रहे थे सब-के-सब सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखने लगे। लेकिन मैंने जी कड़ा करके कहा:  

"ज़रा इसकी मरम्मत कर दीजिये।" 

एक मिस्त्री आगे बढ़ा। लोहे की एक छड़ उसके हाथ में थी, जिससे उसने अलग-अलग हिस्सों को बड़ी बेदर्दी के साथ ठोक-बजाकर देखा। मालूम होता था उसने बड़ी तेज़ी के साथ सब हालात का अंदाज़ा लगा लिया है। लेकिन फिर भी मुझसे पूछने लगा, "किस-किस पुर्जे़ की मरम्मत कराइएगा?"  

मैंने कहा, "बड़े बेहूदे हो। तुम देखते नहीं कि केवल हैंडल और गद्दी को थोड़ा ऊँचा करवाके कसवाना है। बस और क्या? इनको मेहरबानी करके तुरंत ठीक कर दो और बताओ कितने पैसे हुए?”  

मिस्त्री कहने लगा, "मडगार्ड भी ठीक न करदूँ?" 

मैंने कहा, "हाँ, वह भी ठीक कर दो।" 

कहने लगा, "अगर आप बाक़ी चीज़ें भी ठीक करा लें तो अच्छा हो।" 

मैंने कहा, "अच्छा कर दो।"। 

बोला, "यूँ थोड़ी हो सकता है। दस-पंद्रह दिन का काम है। आप इसे हमारे पास छोड़ जाइए।" 

"और पैसे कितने लोगे?"  

कहने लगा, "बस चालीस रूपये लगेंगे।" 

हमने कहा, " बस जी, जो काम तुमसे कहा है करदो और बाक़ी हमारे मामलात में टांग मत अड़ाओ।" 

थोड़ी देर में हैंडल और गद्दी फिर ऊँची करके कस दी गई। मैं चलने लगा तो मिस्त्री ने कहा, “मैंने कस तो दिया है, लेकिन पेच सब घिसे हुए हैं। अभी थोड़ी देर में फिर ढीले हो जाएँगे।" 

मैंने कहा, "हैं बदतमीज़ कहीं का! तो दो आने पैसे मुफ़्त में ले लिए? " 

बोला, "जनाब, आपको बाइसिकल भी तो मुफ़्त में मिली होगी। यह आप के मित्र मिर्ज़ा साहब की है न? लल्लू, यह वही बाइसिकल है जो पिछले साल मिर्ज़ा साहब यहाँ बेचने को लाए थे। पहचानी तुमने? भई सदियाँ गुज़र गईं लेकिन इस बाइसिकल की ख़ता माफ़ होने में नहीं आती।" 

मैंने कहा, "वाह मिर्ज़ा साहब के लड़के इस पर कॉलेज आया जाया करते थे। और उनको अभी कॉलेज छोड़े दो साल भी नहीं हुए।" 

मिस्त्री ने कहा, “हाँ वह तो ठीक है। लेकिन मिर्ज़ा साहब ख़ुद जब कॉलेज में पढ़ते थे तो उनके पास भी तो यही बाइसिकल थी।"  

मेरी तबीयत यह सुनकर कुछ मुरझा सी गई। मैं बाइसिकल को साथ लिए धीरे-धीरे पैदल चल पड़ा। लेकिन पैदल चलना भी मुश्किल था। इस बाइसिकल के चलाने में ऐसी-ऐसी मांसपेशियों पर ज़ोर पड़ता था जो साधारण बाइसिकलों के चलाने में इस्तेमाल नहीं होतीं। इसलिए टांगों और कंधों और कमर और बाज़ुओं में जगह-जगह दर्द हो रहा था। मिर्ज़ा का ख़याल रह-रहकर आता था। लेकिन मैं हर बार कोशिश करके उसे दिल से हटा देता था। वरना मैं पागल हो जाता। और जुनून की हालत में पहली हरकत मुझसे यह होती कि मिर्ज़ा के मकान के सामने बाज़ार में एक सभा आयोजित करता जिसमें मिर्ज़ा की मक्कारी, बेईमानी और दग़ाबाज़ी पर एक लम्बा भाषण देता। सारी मानव जाति और आइन्दा आने वाली नस्लों को उनके गंदे स्वभाव से आगाह कर देता और उसके बाद एक चिता जलाकर उसमें ज़िंदा जलकर मर जाता।  

मैंने बेहतर यही समझा कि जिस तरह हो सके अब इस बाइसिकल को औने-पौने दामों में बेचकर जो वसूल हो उसी पर ख़ुद को धन्य समझूँ। बला से दस पंद्रह रूपये का घाटा सही। चालीस-के-चालीस रूपये तो बरबाद न होंगे। रास्ते में बाइसिकलों की एक और दुकान आई। वहाँ ठहर गया। 

दुकानदार बढ़कर मेरे पास आया। लेकिन मेरी ज़ुबान को जैसे ताला लग गया था। उम्र भर किसी चीज़ के बेचने की नौबत न आई थी। मुझे यह भी मालूम नहीं कि ऐसे मौक़े पर क्या कहते हैं। आख़िर बड़े सोच- विचार और बड़े संकोच के बाद मुँह से केवल इतना निकला कि “यह बाइसिकल है ।”

दुकानदार ने कहा, "फिर?" 

मैंने कहा, "लोगे?" 

कहने लगा, "क्या मतलब?" 

मैंने कहा, "बेचते हैं हम।" 

दुकानदार ने मुझे ऐसी दृष्टि से देखा कि मुझे यह महसूस हुआ कि मुझ पर चोरी का शक कर रहा है। फिर बाइसिकल को देखा। फिर मुझे देखा। फिर बाइसिकल को देखा। ऐसा मालूम होता था कि निर्णय नहीं कर सकता कि आदमी कौन सा है और बाइसिकल कौन सी है? आख़िरकार बोला, 

"क्या करेंगे आप इसको बेचकर?” 

ऐसे सवालों का ख़ुदा जाने क्या जवाब होता है। मैंने कहा, "क्या तुम यह पूछना चाहते हो कि जो रूपये मुझे वसूल होंगे उनका इस्तेमाल क्या होगा?" 

कहने लगा, "वह तो ठीक है, मगर कोई इसको लेकर करेगा क्या? " 

मैंने कहा, "इस पर चढ़ेगा और क्या करेगा।" 

कहने लगा, "अच्छा चढ़ गया, फिर?" 

मैंने कहा, "फिर क्या? फिर चलाएगा और क्या?" 

दुकानदार बोला, "अच्छा? हूँ। ख़ुदाबख़्श ज़रा यहाँ आना। यह बाइसिकल बिकने आई है।" 

जिन सज्जन का शुभ नाम ख़ुदाबख़्श था, उन्होंने बाइसिकल को दूर ही से यूँ देखा जैसे गंध सूंघ रहे हों। 

उसके बाद दोनों ने आपस में मश्वरा किया। अंत में वह जिनका नाम ख़ुदाबख़्श नहीं था, मेरे पास आए और कहने लगे, "तो आप सचमुच बेच रहे हैं?" 

मैंने कहा "तो और क्या, केवल आप से वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए मैं घर से यह बहाना गढ़कर लाया था?" 

कहने लगा, "तो क्या लेंगे आप?" 

मैंने कहा, "तुम ही बताओ।" 

कहने लगा, "सचमुच बताऊँ?" 

मैंने कहा, "अब बताओगे भी या यूँ ही तरसाते रहोगे?" 

कहने लगा, "तीन रूपये दूँगा इसके।" 

मेरा ख़ून खौल उठा और मेरे हाथ पाँव और होंठ ग़ुस्से के मारे काँपने लगे। मैंने कहा: 

"हे उद्योग-धंधे व छल-कपट से पेट पालने वाले निम्न वर्ग के इंसान! मुझे अपने अपमान की परवाह नहीं। लेकिन तूने अपनी बेहूदा-गुफ़्तगू से इस बेज़बान चीज़ को जो सदमा पहुँचाया है इसके लिए मैं तुझे क़यामत तक माफ़ नहीं कर सकता," यह कहकर मैं बाइसिकल पर सवार हो गया और अंधा-धुंध पाँव चलाने लगा। 

मुश्किल से बीस क़दम गया हूँगा कि मुझे ऐसा लगा कि जैसे धरती एकाएक उछलकर मुझसे आ लगी है। आसमान मेरे सिर पर से हटकर मेरी टांगों के बीच में से गुज़र गया। और इधर-उधर की इमारतों ने एक दूसरे के साथ अपनी-अपनी जगह बदल ली है। हवास वापस हुए तो मालूम हुआ कि मैं धरती पर इस बेतकल्लुफ़ी से बैठा हूँ मानो बड़ी मुद्दत से मुझे इस बात का शौक़ था जो आज पूरा हुआ। इर्द-गिर्द कुछ लोग जमा थे जिनमें अक्सर हँस रहे थे। सामने वह दुकान थी जहाँ अभी-अभी मैंने अपने असफल संवाद का सिलसिला समाप्त किया था। मैंने अपने इर्द-गिर्द की स्थिति पर ध्यान दिया तो मालूम हुआ कि मेरी बाइसिकल का अगला पहिया बिल्कुल अलग होकर लुढ़कता हुआ सड़क के उस पार जा पहुँचा है और शेष बाइसिकल मेरे पास पड़ी है। मैंने तुरंत अपने आप को संभाला। जो पहिया अलग हो गया था उसको एक हाथ में उठाया। दूसरे हाथ में बाक़ी बची बाइसिकल को थामा। और चल खड़ा हुआ। यह केवल एक स्वतः-स्फूर्त हरकत थी वरना वह बाइसिकल मुझे हरगिज़-हरगिज़ इतनी प्रिय न थी कि मैं उसको इस हालत में साथ-साथ लिए फिरता।   

जब मैं यह सब कुछ उठाकर चल दिया तो मैंने अपने आपसे पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो? तुम्हारा इरादा क्या है? ये दो पहिए काहे को ले जा रहे हो?  

सब सवालों का जवाब यही मिला कि देखा जाएगा। फ़िलहाल तुम यहाँ से चल दो। सब लोग तुम्हें देख रहे हैं। सिर ऊँचा रखो और चलते जाओ। जो हँस रहे हैं उन्हें हँसने दो। इस तरह के बेहूदा लोग हर देश और हर सम्प्रदाय में पाए जाते हैं। आख़िर हुआ क्या? सिर्फ़ एक हादसा। बस दाएँ-बाएँ मत देखो। चलते जाओ। 

लोगों के अशोभनीय शब्द भी सुनाई दे रहे थे। एक आवाज़ आई, "बस हज़रत ग़ुस्सा थूक डालिए!" एक दूसरे साहब बोले, "बेहया बाइसिकल! घर पहुँचके तुझे मज़ा चखाऊँगा।” एक पिता अपने जिगर के टुकड़े की उंगली पकड़े जा रहे थे। मेरी ओर इशारा करके कहने लगे, "देखो बेटा, यह सर्कस की बाइसिकल है। इसके दोनों पहिए अलग-अलग होते हैं।" 

लेकिन मैं चलता गया। थोड़ी देर के बाद मैं आबादी से दूर निकल गया। अब मेरी रफ़्तार में एक दृढ़ संकल्प पाया जाता था। मेरा दिल जो कई घंटों से असमंजस में तिलमिला रहा था अब बहुत शांत हो गया था। मैं चलता गया। चलता गया। यहाँ तक कि नदी पर जा पहुँचा। पुल के ऊपर खड़े होकर मैंने दोनों पहियों को एक-एक करके इस बेपरवाही के साथ नदी में फेंक दिया जैसे कोई लेटर-बॉक्स में चिट्ठी डालता है। और वापस शहर को रवाना हो गया।  

सबसे पहले मिर्ज़ा के घर गया। दरवाज़ा खटखटाया। मिर्ज़ा बोले, "अंदर आ जाओ।" 

मैंने कहा, “आप कृपा करके बाहर पधारें। मैं आप जैसी पुण्यात्मा के घर में पवित्र स्नान किए बिना कैसे प्रवेश कर सकता हूँ।"

बाहर पधारे तो मैंने वह औज़ार उनकी सेवा में पेश किया जो उन्होंने बाइसिकल के साथ मुफ़्त ही मुझको प्रदान किया था और कहा: 

"मिर्ज़ा साहब आप ही इस औज़ार से शौक़ फ़रमाया कीजिए। मैं अब इससे मुक्ति प्राप्त कर चुका हूँ।" 

घर पहुँचकर मैंने फिर रसायन-विज्ञान की उस पुस्तक का अध्ययन शुरू किया जो मैंने एफ़.ए.में पढ़ी थी।

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