डॉ. दिनेश पाठक शशि का ब्रजभाषा को योगदान

सत्येंद्र सिंह


 डॉ. दिनेश पाठक शशि मूलतः विद्युत इंजीनियर होने के बावजूद हिंदी के लब्धप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। उनके हिंदी प्रेम ने उन्हें हिंदी में एम।ए। और पी।एचडी भी करा दिया। वे हिंदी में हर विधा मे करीब 24-25 पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें कथा, लघुकथा, बालकथा व लेख, उपन्यास, व्यंग्य आदि। उनका बाल साहित्य पाठ्यक्रम में शामिल हो चुका है। उनकी कुछ बाल कहानियों का अंग्रेजी, बंगला, मराठी आदि 9 भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। उन्होंने तमाम पुस्तकों और पत्रिकाओं का संपादन किया है। उनकी साहित्य सेवाओं के लिए उन्हें भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके लेखों का प्रकाशन और आकाशवाणी से प्रसारण इतना हो चुका है कि संख्या बताना मुश्किल है। आगरा विश्वविद्यालय में "कथाशिल्पी डॉक्टर दिनेश पाठक शशि का हिंदी साहित्य को प्रदेय" विषय पर शोध भी किया जा चुका है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
डॉ. पाठक ने ब्रजभाषा में भी कहानियाँ लिखी हैं और उनके तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानियों पर बात करने से पहने थोड़ी चर्चा ब्रजभाषा के बारे में करना उचिता ही होगा। डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने 1933 में हिंदी भाषा का इतिहास लिखा और 1954 में ब्रजभाषा का व्याकरण लिखा। हिंदी भाषा के इतिहास में वे लिखते हैं कि "प्राचीन हिंदी साहित्य की दृष्टि से ब्रज की बोली की गिनती साहित्यिक भाषाओं में होने लगी। इसलिए आदरार्थ यह ब्रजभाषा कहकर पुकारी जाने लगी। विशुद्ध रूप से यह उपभाषा जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मथुरा आगरा, अलीगढ़ आदि तथा मध्य प्रदेश के ग्वालियर और राजस्थान में भरतपुर से लेकर जयपुर तक बोली, समझी जाती है।", हिंदी के पाणिनि माने जाने वाले आचार्य किशोरीदास बाजपेई जी ब्रजभाषा का व्याकरण में हिंदी और ब्रजभाषा की उत्पत्ति बताते हुए लिखते हैः- "अब से पहले, सृष्टि के आदि काल में मनुष्य की एक भाषा थी, अपनी प्रारंभिक अवस्था में जब मानव समाज में ज्ञान की वृद्धि हुई, तब उस आदि भाषा में साहित्य की भी सृष्टि होने लगी। ऋषि जन वेद मंत्रों की रचना करने लगे। साधारण बोलचाल की भाषा की अपेक्षा साहित्य की भाषा कुछ विशिष्ट हो जाती है, क्योंकि उसमें कुछ बनाव-सिंगार भी आ जाता है। कुछ सावधानी भी इसके प्रयोंग में रखी जाती है। साधारण जनता बोलचाल में ऐसी बारीकी पर नहीं जाती, अपना काम निकालती है। भाषा के ये दो रूप आप चाहें जहाँ देख सकते हैं। हिंदी, अंग्रेजी, मराठी आदि सभी भाषाओं का प्रकृत तथा साहित्यिक रूप अलग-अलग दिखाई देगा। भाषा का यह प्रकृत रूप एक कुदरती जंगल के समान है और साहित्यिक रूप बनाई-संवारी सुंदर वाटिका के समान। इसी तरह कोई प्रकृत या जनभाषा साहित्य में आकर एक नया तथा आकर्षक रूप धारण कर लेती है। फलतः उस आदि भाषा के दो रूप हो गए। जो प्रकृत रूप था, जिसे सब लोग बोलते थे, उसे प्राकृत कहने लगे। और, जो भाषा पढ़े लिखे लोगों की थी, जिसमें वेदादि की रचना होती थी, उसे संस्कृत नाम मिला, क्योंकि उसका संस्कार हो चुका था, वह सुसंस्कृत विद्वानों की साहित्यिक भाषा थी। उस प्राकृत भाषा का विकास होता गया। उससे दूसरे नंबर की प्राकृत हुई। इस दूसरी प्राकृत से अपभ्रंश भाषाएं बनीं और अपभ्रंशों से ब्रजभाषा, हिंदी, बंगला, गुजराती, मराठी आदि भाषाएं बनीं। वे अपभ्रंश भाषाएं हिंदी आदि के रूप में बदल गईं। इस तरह संस्कृत से नहीं बल्कि प्राकृत से हिंदी की उत्पत्ति हुई। हिंदी की बोलियों में केवल तीन को विशेष रूप से साहित्यिक रूप मिला और उनके नाम हैं ब्रजभाषा, अवधी तथा मेरठी जो राष्ट्रभाषा रूप से गृहीत है। मेरठी ही खड़ीबोली है।


हिंदी की जितनी भी बोलियाँ हैं, सबसे बढ़कर ब्रजभाषा का साहित्य है और सबसे ज्यादा। हिंदी की अन्यान्य बोलियों को छोड़कर क्यों ब्रजभाषा ही उस युग में साहित्य की भाषा बनाई गई, इसके कारण हैं। हमारे पुराने साहित्य के प्रायः सभी महारथी वैष्णव थे, जिनकी श्रद्धा ब्रज पर और ब्रजभाषा पर सबसे ज्यादा थी। परंतु इससे भी बढ़ कर इस भाषा की मधुरता और स्पष्टता थी, जिसने साहित्यिकों का मन चुरा लिया। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी बहुत सी रचना इस मीठी भाषा में की। थोड़े में बहुत कह देने की अनुपम शक्ति जो इस ब्रजभाषा में है, वह संस्कृत को छोड़कर और किसी भी भाषा में नहीं है। यह इसकी स्वाभाविक शक्ति है। दूसरी बात यह है कि ब्रजभाषा स्वभावतः इतनी मधुर है, जितनी संसार की कोई भी दूसरी भाषा नहीं, संस्कृत भी नहीं। ब्रजभाषा के इन गुणों पर मुग्ध होकर जनता ने इसे अपनाया, साहित्य की भाषा बनाया। ब्रजभाषा में जैसी साहित्य की सृष्टि हुई है, वैसी अभी तक संस्कृत को छोड़कर अन्य किसी भारतीय भाषा में उपलब्ध नहीं है।"

 ब्रजभाषा व्याकरण में ब्रजभाषा के लक्षण तथा निकटवर्ती भाषाओं से तुलना करते हुए डॉ. धीरेंद्र वर्मा लिखते हैं – "हिंदी भाषा के अंतर्गत बिहारी तथा राजस्थानी बोलियों के अतिरिक्त आठ बोलियाँ मुख्य हैं। तीन पूर्वी बोलियों के दो समूह हैं – अवधी, वघेली और छत्तीसगढी तथा पांच पश्चिमी बोलियों के भी दो समूह हैं – खड़ीबोली, बांगरू और ब्रजभाषा, कनौजी, बुंदेली।" डॉ. वर्मा आगे ब्रजभाषा की उत्पत्ति में बताते हैं- "उत्पत्ति की दृष्टि से पश्चिमी हिंदी की अन्य बोलियों खड़ीबोली, बांगरू, कनौजी तथा बुंदेली के साथ ब्रजभाषा का संबंध भी शौरसेनी अपभ्रंश तथा प्राकृत से जोड़ा जाता है। शूरसेन ब्रज प्रदेश का ही प्राचीन नाम था। ब्रजभाषा के समान उस समय शौरसेनी प्राकृत भी लगभग समस्त उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा रही है।" विद्वानों के अनुसार तो कदाचित् पाली तथा संस्कृत भी ब्रज या शूरसेन देश की बोली के और भी अधिक प्राचीन रूप के आधार पर बनी हुई साहित्यिक भाषाएं थीं। 

 हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य का विकास बताते हुए लिखते हैं – ",अब तक साहित्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही है, इसे सूचित करने की आवश्यकता नहीं। अतः गद्य की पुरानी रचना जो थोड़ी सी मिलती है, वह ब्रजभाषा ही है। हिंदी का पहला गद्य चौरासी वैष्णवों की वार्ता को माना जाता है जिसकी रचना स्वामी वल्लभाचार्य के पौत्र और गोसाई विट्ठलनाथ जी के पुत्र गोसाई गोकुलनाथ जी द्वारा किया जाना बताया जाता है। लेकिन श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र गोसाई विट्ठलनाथ जी ने ब्रजभाषा में श्रृंगार रस मंडन नामक ग्रंथ ब्रजभाषा में लिखा था। नाभादास जी ने संवत् 1660 के आसपास अष्टयाम, बैकुंठमणि शुक्ल ने संवत् 1680 के लगभग अगहन माहात्म्य तथा वैशाख माहात्म्य, सुरति मिश्र ने संवत् 1767 में संस्कृत से कथा लेकर बैताल पच्चीसी, (जिसे आगे चलकर लल्लूलाल ने खड़ीबोली में लिखा), संवत् 1852 में लाला हीरालाल ने आईने अकबरी आदि ग्रंथों की रचना ब्रजभाषा गद्य में की। " इसके पश्चात् ब्रजभाषा गद्य का विकास दिखाई नहीं देता। इस प्रकार विक्रम की 13 वीं सदी अर्थात् ईसा पूर्व 500-600 से ब्रजभाषा में गद्य लेखन हुआ पाया जाता है और 1000 ईसा पूर्व के बाद जैसे जैसे खड़ी बोली में गद्य लिखा जाने लगा तो ब्रजभाषा गद्य लेखन बंद सा ही हो गया। 

 अस्तु, डॉ. दिनेश पाठक शशि जी को ब्रजभाषा और उसमें गद्य विधा की वापसी करने बाला ब्रजभाषा मनीषी माना जाना चाहिए। ब्रजभाषा में उनके तीन कहानी संगह प्रकाशित हो चुके हैं – बेड़ियाँ, फूलो और परिकम्मा। फूलो कहानी संग्रह पर मैं समीक्षात्मक टिप्पणी करने का साहस करने जा रहा हूँ और इस समीक्षा के बहाने यह बताने का प्रयास भी कर रहा हूँ कि ब्रजभाषा आज भी सभी मनोभावों को अभिव्यक्त करने में सक्षम है। डॉ. दिनेश पाठक शशि विरचित ब्रजभाषा कहानी संग्रह का प्रकाशन श्री गोविंद पचौरी जी के जवाहर पुस्तकालय, सदर बाजार, मथुरा द्वारा 2016 में किया गया। इस संग्रह में 20 कहानियाँ हैं। पहली कहानी है – बिबाई । इस कहानी में रामहरि काका के बुढ़ापे का दर्द है और आज के शिक्षित समाज पर व्यंग्य। भाषा सहज और प्रवाहमय है। बानगी देखिए – संध्या वंदन करिबे के बाद मैं मंदिर तें निकसि कें अपने घर की लंग कूं जाय ही रह्यौ हतो कै अचानचक रामहरि काका पै नजरि परि गई। बु दूधिया रोसनी में जगमगाय रहे अपने घर के बरामदे में हरे सुंदर सोफासैट पै बैठे भये हे।  रामा-किसना के बाद मैं अपने कूं रोकि नांय सकौ औरु रामहरि काका तें पूछि बैठौ – चौं काका कहा बात है, ऐसें कसें बैठे हौ चुप्पचाप से, काहू बात की कोऊ तकलीफ है का।-- और इस प्रकार कहानी का सिलसिला प्रारंभ होता है। पढ़ा लिखा बेटा शहर में बस जाने और रामहरि काका के बुढ़ापे में अकेलेपन की यह कहानी आज के समय की प्रतिनिधि रचना है। लेखक ने बहुत बाराकी से अपनी संतान को पढ़ाने लिखाने के कष्ट, नौकरी के कारण गाँव से पलायन और उसके बाद अकेलेपन का खालीपन, बहुत अच्छी तरह बयान किया है। 

 दूसरी कहानी – दूध कौ दूध, पानी कौ... में ठाकुर महीपाल सिंह के तीन बेटे उन्हें बुढ़ापे में संभाल नहीं पाते, बेटों बहुओं की गृह कलह और व्यवहार देखकर हारकर गिर्राज महाराज की शरण में चले जाते हैं।- करौ का, तीनों छोरानु नें मैया-बापु कूं आपस में बॉंटि लियौ। एक माह बापू बड़े के पास तौ मैया मझले के घर। दूसरे माह बापू मझले के पास तौ मैया छोटे के घर, याही तरिया समै बीति रहौ हो, छुटका के घर एक बार मैया बीमार परि गई। बापू नें सुनीं तौ मझले कूं कही कैं भैया मोय छुटका के घर पहुंचा आ। ठाकुर साहब के पुत्रों की संतान उनके साथ वैसा ही व्यवहार करती है जो उन्होंने अपने माता पिता के साथ किया था तो उनकी आंख खुलती हैं और अपनी गलती का अहसास होता है। आजकल घर घर में यह समस्या विद्यमान है। माता पिता और युवा संतान के बीच मनमुटाव, सहानुभूति का अभाव और जीवन के अंतिम दिनों में पीड़ा का सहन करना, बड़ा दुखदायी हो गया है। लेखक ग्रामीण और शहरी जीवन और घरेलू समस्या के प्रति बहुत जागरूक है। यह कहानी सभी के लिए बहुत शिक्षाप्रद है। ऐसे ही तीसरी कहानी –करमु फलै तौ सबु फलै- में सुखना का बेटा शिक्षित होकर अधिक और जल्दी पैसा कमाने के चक्कर में कर्ज देने वाली फरेबी कंपनी के चक्कर में फंस जाता है। साथ ही गाँव के और लड़कों के भी मुसीबत में डाल देता है – जि तौ भौतु नेकी कौ कामु करौ विनीत नें। बेरोजगारी के जमाने में काहू कूं सहारौ दैबौ तौ पुन्य कौ कामु है... नेकी कौ तौ है काका परि जमानों तौ नेकी कौ नांय है न। कोऊ द्वै लाख रुपैया चारों छोरानु के जमा है गये परि आजु कल्लि, आजु कल्लि करत भये 10-15 दिना गुजर गये, कंपनी बारे नें बिनकूं नौकरी है नांय बुलायौ। अब कहा बताऊं काका, व्हाँ जायकें देखौ तौ हम दोऊ सकते में आय गये, कल्लि तलक ह्याँ ढेर सारे कंपनी के बोर्ड लगि रहे हते औरु आजु ... दूरि-दूरि तकऊ कंपनी कौ कोऊ नामु-निसानु हूँ नजरि नांय आय रह्यौ। इस कहानी के माध्यम से आज धोखाधड़ी करके युवकों को फंसाए जाने की प्रवृत्ति पर कुठाराघात किया गया है। चौथी कहानी है – जैसी करनी – मुखिया धनपाल स्वार्थवश चालीस साल पहले सात व्यापारियों को लूटकर उनके शव अपने खेत में गाढ़ देते हैं। मुखिया के सात पुत्र होते हैं और सातों के सातों उसी खेत में बड़े नाटकीय ढंग से प्राण गवां देते हैं। मुखिया संन्यास ले लेते हैं और अपनी करनी पर जीवन भर रोते हैं। पांचवी कहानी है – भाग कौ लेखौ- इस कहानी में गाँव की चिकित्सा व्यवस्था, लोगों की मानसिकता और शिक्षित युवकों की विदेश भागने की धुन पर व्यंग्य कसा गया है कि विदेश जाकर बस जाने पर उसकी पत्नी व बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है। 

 छठवीं कहानी – यक्ष प्रश्न - में लेखक ने दहेजप्रथा पर जमकर प्रहार किया है। रम्मू की पत्नी का घर के पिछवाड़े से रम्मू की घरवाली की निरीह कराह के बारे में पूछने पर उत्तर मिलता है कि – तू नांय मानि रहौ तौ सुनि, रम्मू की घरवारी के मैया-बाप गरींब हैं याही तें ब्याह में अधिक दान-दहेज नांय दै पाये है। अब रामू की मैया, रम्मू की घरवारी कूं खूब खरी खोटी सुनाऔ करै है। परि बु कहा करैं, दैबें कूं कछू होतौ तौ इत्ती मलूक छोरी कूं जा कौआ से कलूटा रमुआ तें ही ब्याह करते का। कोऊ अच्छौ सौ छोरा न देखते। दान-दहेज के बगैर रम्मू की घरबारी के सारे गुन फीके परि गये हतैं, रम्मू की मैया के आगे। लेखक कहानी के सूत्रधार के माध्यम से इस पर क्रोध जताता है और सूत्रधार अगली बेरि जब गाम कूं आयौ तौ पतौ परौ कें रम्मू की घरबारी कूं मरे भये तीन महिना हू नांय बाते हुंगे कें दूसरौ ब्याह करिबे बारेनु की लाइन लगा परी है तो रमुआ के कसाई जैसे मां-बाप को सबक सिखाने उनके पास जाने को उद्यत होता है तो उसकी माँ रोक लेती है और वह क्रोध में गाँव से शहर नौकरी पर चला जाता है। कुछ दिन बाद गाँव आता है तो उसकी माँ ताना मारते हुए बताती है – देखि, तू भौतु जोस में आय रहौ हौ बा समै। तू तौ मैंने रोकि दियो हो, परि इंदर की मैया नांय रोकि पाई ही इंदर कूं। इंदर नें द्वै-चारि औरनु कूं संग लौकें छोरी बारेनु कूं भौतेरौ समझायौ, परि... रम्मू की माँ ने बाकी सात पीढी तक कूं खूब गारी दईं और बोलचाल बंद है गई सो अलग।- सूत्रधार पूछता है औरु रम्मू के ब्याह कौ का भयौ। ब्याहु, ब्याहु हू है गयौ, खूब धडल्ले से। लेखक और सूत्रधार के बहुत सारे यक्ष प्रश्न उनके मन में उथल-पुथल मचाते हैं। मेरा विश्वास है कि पाठकों के मन भी शांति नहीं रहेंगे। 

 अगली सातवीं कहानी –चीर हरन- में एक कवयित्री रजनी की बहुत पीडादायक कहानी है, जिसके पति की मृत्यु बहू के टोने टोटके हो जाने की शंका उसके दिल में रहती है। उसके दोनों सगे बेटे जमीन जायदाद अपने नाम कराने के लिए अपनी माँ पर मुकदमा ठोक देते हैं और बहुएं कवि सम्मेलनें को लेकर उसके चरित्र पर प्रश्न उठाती हैं । रजनी इस शर्त पर जमीन जायदाद बेटों के नाम कर देती है कि जब तक वह जीवित है तब तक वे उसका भरण पोषण करेंगे परंतु बेटे और अधिक स्वच्छंद हो जाते हैं। शेष कहानी पढ़ने पर पता चलेगा। आठवी कहानी – बीच कौ मारग – ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपनी पूरी क्षमता से अपने पुत्रों को पढाता-लिखाता है। पुत्रगण शहर में नौकरी पा जाते हैं। विवाह हो जाता है, बच्चे भी हो जाते हैं। परंतु वह व्यक्ति बुढापे में अपने नाती पोतों की किलकारी सुनने को तरस जाता है। पुत्रों के यह कहने पर कि तुम तो रिटायर हो गए हो इसलिए अकेले रहने की आदत डालो। और वह बुढापे में समय काटने के लिए नौकरी करने पर विवश हो जाता है। वास्तव में यह आज के वातावरण की आम कहानी है और बढ़ते हुए जनरेशन गैप की भयावह समस्या को दर्शाती है। नौवीं कहानी –समै को चक्र – एक ऐसे सेवानिवृत्त अधिकारी की कहानी है, सेवानिवृत्ति के बाद उसके बेटे ही उसे संभाल नहीं पाते और बहुत दुखी व एकाकी जीवन व्यतीत करने को बाध्य होते हैं। दसवी कहानी – सोलह आना सच – एक ऐसे किरादार की कहानी है जो गाँव के सभी पुराने लोगों की खबर रखता है। सबके सुख दुख का बखान भी करता है। उसके इस ज्ञान में दहेज जैसी कुप्रथा से लेकर राजनीति तक शामिल हैं। यह कहानी अन्य कहानियों से हटकर है। उनकी सभी कहानियाँ मानवीय कमजोरियों और सामाजिक विद्रूपताओं का उद्घाटन करती हैं। चाहे वह समै की बलिहारी, होरी कौ बैर, छुटकारौ, समाज कौ कोढ़, जहाज कौ पंछी, विधिना कौ लेखो, अब पछताएं होत का, चिंता, आब नहीं आदर नहीं या फूलो हो, सभी में ग्रमीण जीवन में और शहरी जीवन में भी नई व्यवस्थाओं व तथाकथित प्रगति के परिणामस्वरूप उत्पन्न सामाजिक, पारवारिक तथा सोच के बदवलावों का बहुत ही सटीक व मनोविश्लेषणात्मक वर्णन है। फूलो उनकी इस संग्रह की प्रातिनिधिक कहानी है। फूलो कहानी एक स्त्री की कहानी है जो बड़े यत्न से पुत्र प्राप्त करती है और बड़े अरमानों से बहू भी प्राप्त करती है परंतु मोहल्ले की बातों से अपनी पढ़ी-लिखी बहू के प्रति आशंकित हो जाती है फूलो एक गाँव की, अनपढ़ महिला है परंतु आज उच्च शिक्षित और शहरी महिलाएँ भी इस मानसिकता से ग्रस्त हैं। 

 डॉ. दिनेश पाठक शशि के इस ब्रजभाषा कहानी संग्रह की समीक्षा करते समय मैं बडे पशोपेश में हूँ। कहानी को हिंदी गद्य की एक सशक्त विधा बताया गया है पर ब्रजभाषा की कहानियों का न तो इतिहास है और न ही उनका कहीं जिक्र। अंग्रेजी से बंगला के रास्ते भारत के साहित्य इतीहास में पदार्पण करने वाली कहानी विधा को गल्प के बाद और संस्कृत के बाद भारतीय भाषाओं विशेषकर ब्रजभाषा में लिखी कहानियों के इतिहास में डॉ. पाठक की कहानियों को प्रारंभिक ब्रजभाषा कहानी का श्रेय मिलना चाहिए। आगे विद्वानों के ऊपर छोड़ता हूँ। उनका दूसरा ब्रजभाषा कहानी संग्रह है परिकम्मा, जिसकी समीक्षा बाद में प्रस्तुत की जाएगी।


परिचय: सत्येंद्र सिंह

जन्म: 1 जून 1949, मथुरा, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा - एमए (हिंदी), साहित्य सुधाकर, पत्रकारिता उपाधि। 1969 से लेखन प्रारंभ। हिंदी कविता, कहानी, आलेख, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, समीक्षा लेखन। 

हिंदी प्रयोग प्रसार हेतु भारत सरकार की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन में सक्रिय और करीब 40 वर्ष सामाजिक, भारतीय रेल व आयकर विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य संपन्न।

विभिन्न विभागीय पत्रकाओं का संपादन व प्रकाशन।

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता कहानी, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, समीक्षा प्रकाशन और कई आकाशवाणी केन्द्रों से प्रसारण। 

दो कविता संग्रह "एक मुट्ठी आसमान" और "फ़र्क पड़ता है" प्रकाशित। एक कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।

महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति पुणे का सदस्य।

हिंदी और ब्रजभाषा में भी लेखन तथा शोधपरक अध्ययन।

भाषा परिचय: संस्कृत, ब्रजभाषा, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी ।

संप्रति: सेवानिवृत्त वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी, मध्य रेल, पुणे। 

आवास: "रामेश्वरी-सदन", सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगाँव खुर्द, पुणे 411046, महाराष्ट्र, भारत।

मोबाइल 91+ 992 299 3647

ईमेल: singhsatyendra.380@gmail.com


3 comments :

  1. मार्मिकता से ब्रजभाषा का विश्लेषण किया है। अध्ययन के लिए गहराई से मार्गदर्शन। समीक्षा के लिए बधाई!💐💐

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  2. समीक्षा प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। इससे ब्रजभाषा को बढ़ावा मिलेगा। डॉ दिनेश पाठक शशि जी बहुत मेहनत से और बहुत अच्छा लिखते हैं।

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  3. Very nice 👌

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