साहित्य और साहित्यकारों की छाँव में पली-बढ़ी मैं लेखिका न होती तो क्या होती: इला प्रसाद

साक्षात्कर्ता: दीपक पाण्डेय

इला प्रसाद
अमेरिका के ह्यूस्टन में निवास कर रहीं इला प्रसाद हिंदी कहानी और कविता विधाओं में सृजन कर हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही हैं। इला जी को हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग पारिवारिक वातावरण से मिला। समकालीन कहानी में इला जी समर्थ कथाकार के रूप में सामने आती हैं। ‘इस कहानी का अंत नहीं’, ‘उस स्त्री का नाम’, ‘तुम इतना क्यों रोईं रूपाली’ कहानी संकलनों में संकलित मानवीय संवेदनाओं से भरी आपकी कहानियों में मानव जीवन के दुख-सुख, उतार-चढाव, आशा निराशा के विविध रूप अभिव्यक्त हुए हैं। अधिकतर कहानियाँ अमेरिका के वर्तमान परिवेश में रह रहे भारतीय समाज द्वारा वहाँ की दैनंदिन मुश्किलों से संघर्ष की कथा को कथानक में ढाल कर रोचक अभिव्यक्ति दी है। इला प्रसाद की ‘एक अधूरी प्रेमकथा’, ‘बैसाखियाँ’, ‘उस स्त्री का नाम’, ‘मेज’, ‘हीरो’, ‘मिट्टी का दीया’, ‘साजिश’, ‘कुंठा’ आदि कहानियों से गुजरते हुए हम पाते हैं कि लेखिका सामाजिक और परिवेशगत प्रवृत्तियों के प्रति बेहद सजग और जागरूक है। कहानी को गढ़ना और कहना उन्हें बखूबी आता है। अपने छोटे-छोटे अनुभवों को कलात्मकता से व्यक्त करने वाली एक सशक्त भाषा उनके पास है। निरर्थक विस्तार से अपनी कहानियों को बड़ी सफाई से बचा ले जाने की कला उन्हें आती है और यह कला भी उनके पास है कि पाठक को कहानी के उस मूल बिन्दु पर कैसे ले जाकर छोड़ा जाए, जहाँ उस कहानी का अभीष्ट छिपा होता है। ऐसा लेखक की रचनात्मक कौशल से ही संभव हो पाता है और यह रचनात्मक कौशल इला प्रसाद में है। 

इला प्रसाद जी के पास देशी-विदेशी अनुभवों का एक बहुत बड़ा खजाना है यानी उनका अनुभव-संसार बहुत व्यापक है। यह अनुभव-संसार एक लेखक में जितना व्यापक होगा, उसकी रचनाओं में उतना ही वैविध्य होगा। यह रचनात्मक वैविध्य इला प्रसाद की कहानियों में स्वतः ही दृष्टिगोचर हो जाता है। कुछ कहानियाँ भारतीय पर्व-त्योहार और अमेरिकी समाज के त्योहार को केन्द्र में रखकर भी कहानियाँ लिखी हैं जो अपनत्व भाव एवं अपनी भाषा और संवेदना में पाठक के अंतर्मन को स्पर्श करने में सफल रही हैं।


दीपक पाण्डेय
इला प्रसाद से साहित्य के विविध पक्षों पर दीपक पाण्डेय, सहायक निदेशक, केंदीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली का संवाद पाठकों के लिए प्रस्तुत है। 

दीपक पाण्डेय: आदरणीया इला जी आपका रांची से अमेरिका का सफर किस उद्देश्य से रहा?

इला प्रसाद: मैं विवाहोपरांत अमेरिका आई। यह एक सोचा समझा निर्णय था। जो कुछ जीवन में करना चाहती थी उसके लिए प्रवास एक आवश्यकता थी, अभी भी है। पिताजी मेरी मानसिकता समझते थे। उन्होंने हमेशा मुझ पर भरोसा किया और मुझे अपने निर्णय लेने की छूट दी। बस वे मुझे अविवाहित विदेश भेजने से घबराते थे। यहाँ के जीवन की कठिनाइयों में मेरा संवेदनशील मन टूट न जाए, इससे डरते थे, इसलिए विवाह माध्यम बना। लेकिन यदि विवाह माध्यम न बनता, तो भी अन्तत: यहीं होती। 


दीपक पाण्डेय: आपके जीवन में हिंदी भाषा का क्या योगदान और महत्व है?

इला प्रसाद: हिंदी मेरी मातृभाषा है। जो कुछ भी मैं हूँ, या नहीं हूँ, वह हिंदी की वजह से है। मैं हिंदी में बोलती, सोचती और लिखती हूँ। विश्व का साहित्य मैंने अधिकतर हिंदी में पढ़ा, या फ़िर अंगरेजी में पढ़ा है। मात्र साहित्य ही नहीं, दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, आध्यात्म आदि वह सबकुछ जिसमें मेरी रुचि थी, जिससे मेरा व्यक्तित्व विकसित हुआ, संस्कार मिले, जीवन को दिशा मिली। हिंदी मेरी सांसों में बसी है। 


दीपक पाण्डेय: आज आप हिंदी साहित्य को कविता/कहानी/ के माध्यम से समृद्ध कर रही हैं। आपकी हिंदी लेखन में रुचि कैसे बनी और हिंदी लेखन की प्रेरणा कहाँ से मिली?

इला प्रसाद: मात्र कविता/ कहानी/ उपन्यास ही नहीं, मैंने संस्मरण और आलेख भी लिखे हैं। विज्ञान सम्बंधी आलेख भी। उनका एक जगह संकलित किया जाना बाकी है।
मेरे घर का वातावरण पूर्ण साहित्यिक था। पिताजी जी हिंदी के लिये ही जीते थे। हिंदी का अध्यापन और हिंदी में सृजन। कई किताबें हैं उनकी। घर पर ही पुस्तकों का विशाल भंडार था। जो थोड़ी कमी थी वह फ़ादर कामिल बुल्के के पुस्तकालय से पूरी हो जाती थी। पिताजी फ़ादर कामिल बुल्के के निकटतम सहयोगी रहे। घर पर साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता। काव्य- गोष्ठियाँ होतीं। साहित्य और साहित्यकारों की छाँव में पली-बढ़ी मैं लेखिका न होती तो क्या होती! यदि उसके सिवा भी कुछ हूँ तो वह खास बात है।


दीपक पाण्डेय: जब आप पहली बार अमेरिका आईं थी तब और वर्तमान में हिंदी की स्थिति में क्या परिवर्तन पाती हैं और हिंदी के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में आपकी क्या सक्रियता है?

इला प्रसाद वह नाइन इलेवन का दौर था, जब मैं यहाँ अमेरिका आई। अमेरिका के कई विश्विद्यालयों में तब भी हिंदी पढाई जाती थी। स्कूल के स्तर पर ह्यूस्टन के बेलायर हाई स्कूल में, आर्य समाज के प्रयत्नों से कई सालों से हिंदी पढाई जा रही थी। आर्य समाज के डी ए वी स्कूल में बच्चे हिंदी और संस्कृत की शिक्षा पाते थे और वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों से भी परिचित हो रहे थे। विश्व हिंदी न्यास, इंटर नेशनल हिंदी असोसियेशन, विश्व हिंदी समिति सब अपने अपने स्तर पर हिंदी को आगे बढ़ाने के प्रयास में लगे हुए थे। कुछ वर्षों बाद हिंदी यू एस ए संस्था भी आरम्भ हुई। इन लोगों ने भी स्कूली स्तर पर हिंदी-शिक्षण आरम्भ किया। पिछले वर्षों में आर्य समाज हूस्टन की सक्रियता बढ़ी है, यहाँ के डी ए वी स्कूल में हाई स्कूल तक की हिंदी की शिक्षा दी जाती है और वह मान्यताप्राप्त पाठयक्रम है जिसका लाभ छात्रों को विश्वविद्यालय में मिलता है। कुछ संस्थाएँ सक्रिय नहीं रह गई हैं तो कई अन्य संस्थाएँ जैसे इस्कॉन वगैरह मंदिर में हिंदी का गुरुकुल चला रहे हैं। तब भी जहाँ तक मेरी जानकारी है, हाईस्कूल के स्तर पर बहुत कम राज्यों में सरकारी स्कूलों में हिंदी को पाठयक्रम में प्रवेश मिला था। उस स्थिति में अधिक परिवर्तन आज भी नहीं हुआ है।

मैंने हिंदी के प्रचार-प्रसार में परोक्ष भूमिका ही निभाई है। कई लोगों को कम्प्यूटर पर हिंदी में लिखना सिखाया। स्टारटॉक कार्यक्रम के प्रतिभागियों को भी हमने - मैं और मेरे पति नरेन ने - कम्प्यूटर पर हिंदी कैसे लिखें, इसका डेमो दिया हालांकि वहाँ मैं एक प्रशिक्षु की हैसियत से गई थी। यह सब पूर्ण अनौपचारिक रहा। पत्र-पत्रिकाओं में आलेख लिखे, सम्पादन का काम किया है। अभी भी विश्व हिंदी न्यास की पत्रिका “हिंदी जगत” के संपादक मंडल मॆं हूँ। न्यास की एक पत्रिका हुआ करती थी – “विज्ञान प्रकाश”। अब बंद हो गई है। उस पत्रिका के लिये कई विज्ञान संबन्धी आलेख हिंदी में लिखे और अनूदित भी किये।


दीपक पाण्डेय: इला जी आप जानती हैं कि गिरमिटिया देशों में भारतीय मजदूरों ने विपरीत परिस्तिथियों में संघर्ष करते हुए अपनी भाषा और संस्कृति से हिम्मत लेकर तरक्की करते चले गए और इन मजदूरों ने हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। अमेरिका में भारतीयों का आगमन नौकरी और अन्य पेशेवर कारण के संदर्भ में हुआ। यहाँ हिंदी और भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कैसे हुआ।

इला प्रसाद: व्यक्ति के साथ उसकी भाषा और संस्कृति भी भ्रमण करती है। अमेरिका में भारतीय चाहे जिन कारणॊं से आये, अपनी भाषा और संस्कृति को बचाये रखना उनकी आवश्यकता थी क्यॊंकि वह उनकी पहचान से जुड़ा था। यही कारण है कि मात्र हिंदी ही नहीं, भारत की तमाम भाषाएँ यहाँ फल-फूल रही हैं। हिंदी सहित सब भाषा-भाषियों के पर्व–त्योहार, नृत्य संगीत, खानपान, तौर-तरीके, पत्र-पत्रिकाएँ, मंदिर-ध्यान केंद्र, असोसियेशन, सब हैं यहाँ। अपनी अगली पीढ़ी को अपनी गौरवशाली संस्कृति से जोड़े रखने की चाहना और अपनी विरासत उन्हें हस्तांतरित करने की बेचैनी भी इसका कारण रही है। यहाँ हिंदी और तमाम भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार हुआ और हो रहा है। मंदिर मात्र पूजास्थल नहीं हैं, वरन भारतीय संस्कृति के वाहक हैं। भाषा की शिक्षा के केन्द्र मंदिर हैं, गुरुद्वारे हैं। नाटक-नृत्य-संगीत का प्रशिक्षण, पर्व-त्योहार – सबके केन्द्र मंदिर-गुरुद्वारे बने हुए हैं।


दीपक पाण्डेय: आज अमेरिका में भारतीयों की संख्या बहुत है और स्थानीय लोगों में भी हिंदी के प्रति लगाव पैदा हो रहा है। आज अमेरिका में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की क्या व्यवस्था है। कृपया विस्तार से बताइए?

इला प्रसाद: नाइन इलेवन के बाद, अमेरिका सरकार ने एसी टी एफ़ एल के अंतर्गत स्टारटॉक कार्यक्रम शुरु किया। इसमें हिंदी को एक विदेशी भाषा के रूप में कैसे पढाये, इसका प्रशिक्षण दिया जाता था। यह कार्यक्रम सीमित तौर पर अब भी चल रहा है। इसका उद्देश्य स्कूलों के पाठयक्रम में हिंदी शिक्षण का भी आधिकारिक तौर पर प्रवेश था। किंतु ऐसा हुआ नहीं। चीन की सरकार के प्रयत्नों से अमेरिका के कई स्कूलों में चीनी भाषा की पढाई शुरु हुई। अरेबिक की तुलनात्मक रूप से कम और हिंदी की सबसे कम। अमेरिका में कोई भी पाठयक्रम आरम्भ करने के लिये विशेष अनुदान की आवश्यकता होती है। इसलिये जहाँ सौ के करीब विश्वविद्यालयों में भारतवंशियों के प्रयत्नों और अनुदान से हिंदी के पाठ्यक्रम आरम्भ हुए और चल रहे हैं, स्कूल के स्तर पर ऐसा नहीं है। हिंदी-उर्दू फ़्लैगशिप कार्यक्रम भी अमेरिका सरकार का विशेष कार्यक्रम था जो विश्वविद्यालय स्तर पर चल रहा था किंतु उस विशेष अनुदान को समाप्त कर दिया गया। शायद इसलिये कि अमेरिकी सरकार ने बहुभाषी भारतीय समुदाय की नस पकड़ ली। भारत में हिंदी जाने बिना आपका काम चल सकता है तो अमेरिका में किसलिये? किंतु तब भी, सूचना-तकनीक के प्रसार के साथ रोजगार की सम्भावनायें भी बढ़ीं और हिंदी का पठन-पाठन विश्वविद्यालय स्तर पर बढ़ा ही है। हिंदी में आनर्स की भी पढाई शुरु हुई है।


दीपक पाण्डेय: क्षेत्रवाद और नस्लभेद विश्व के सभी देशों में व्याप्त है। गिरमिटिया देशों में या अन्य देशों में जहाँ भारतीय अपनी कुशलता और कर्मठता से अपना विशेष स्थान बना रहे हैं जिससे उनके दुश्मन भी तैयार होते रहते हैं। कृपया बताइए कि आज अमेरिका में भारतीयों के साथ स्थानीय जनता का रवैया कैसा है।

इला प्रसाद: एक बड़ा प्रतिशत है जो यह मानता है कि भारतीयों ने उनकी नौकरी छीन ली और वे उनकी वजह से बेरोजगार हुए हैं। उनके मन में बहुत कटुता है, ईर्ष्या है और वे इसे दर्शाने से बाज नहीं आते। यह समाज के एक वर्ग का सच है। आम तौर पर अमेरिकी अब भारतीयों को स्वीकारने लगे हैं और उनकी क्षमता से प्रभावित भी हैं। भारतीय समुदाय का अवदान भी प्रशंसनीय है। सामाजिक सांस्कृतिक कारण हैं कि भारतीय समुदाय जहाँ भी जाता है, अपना एक छोटा भारत बना लेता है, तो वही स्थिति अमेरिका में भी है। हमारे पर्व त्योहार अब सार्वजनिक स्थलों पर मनाये जाने लगे हैं और उसमें अमेरिकी भी नजर आने लगे हैं।


दीपक पाण्डेय: इला जी जब आपको किसी कहानी का कथ्य पकड़ में आ जाता है तो उसे, कहानी का स्वरूप देने की क्या प्रक्रिया होती है, कृपया विस्तार से बताइएगा।

इला प्रसाद: यह एक कठिन प्रश्न है क्योंकि इसमें मेरे अचेतन मन की भूमिका प्रमुख है। मेरे अनजाने ही यह प्रक्रिया मेरे मन में चलती रहती है और जब एक दिन कलम उठ जाती है तो मैं सचेतन रूप से अनुभव करती हूँ कि मेरे अंदर क्या पक रहा था। हाँ, कभी-कभी यह भी हुआ है कि मुझे पता होता है कि इस कथा को लिखे बिना मेरी मुक्ति नहीं है। कहानी के पात्रों की कथा, उनका कष्ट मेरा होता है। मैं अपने अंदर उसे झेलती हूँ, वह एक यातनादायक स्थिति होती है। यह स्थिति कभी लम्बे समय तक भी चलती है। कभी यह भी हुआ कि मैंने तुरंत ही किसी घटना पर लिख डाला। पहले यह होता था कि मैं एक कहानी एक बार में लिख जाती थी, पूरी की पूरी। मुझे समय का भान नहीं होता था। अपनी भूख-प्यास कुछ भी समझ नही आती थी। तब यह होता था कि कहानी लिखने के बाद बीमार हो जाती थी। कई दिनों तक अस्वस्थ रहती थी। समय लगता था अपने आप को स्वस्थ करने में, पूर्व मन:स्थिति में लौटने में। फ़िर अपने को नियंत्रित किया, करना सीखा। अब अक्सर कहानी टुकड़ों में लिखी जाती है। वह मेरे अंदर अधिक लम्बे समय तक चलती है, किंतु मैं उस आवेग को झेल सकती हूँ, वह तूफ़ानी नही होता, मैं उसे नियंत्रित करती हूँ, कर सकती हूँ।


दीपक पाण्डेय: माना जाता है - 'अगर सच्चे मन से परिवर्तन लाने की चेष्टा की जाए तो बदलाव जरूर आता है और उसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को अवश्य होता है।' इस भाव की संवेदनाएँ आपकी कहानियों में कैसे स्थान पाती हैं?

इला प्रसाद: लेखन अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है और लेखन सोद्देश्य ही होता है। किसी भी कहानी को लिखने से पहले यह मुझे बखूबी पता होता है कि कहानी के माध्यम से मैं कौन सा संदेश अपने पाठकों तक प्रेषित करना चाहती हूँ, और उसके लिये कौन सा पात्र, परिवेश उपयुक्त होगा किंतु उसके बाद कहानी अपने को खुद लिखवाती है। 


दीपक पाण्डेय: ‘उस स्त्री का नाम’ कहानी का कथ्य आपको कैसे मिला। माँ के त्याग और समर्पण को भुलाकर उसका बेटा वृद्धा माँ को ‘ओल्ड एज’ लोगों के रिटायरमेंट होम में रहने के लिए विवश कर देता है। आपने समाज में संवेदनाओं के अवमूलन को इस कहानी में उद्घाटित किया है।

इला प्रसाद: पहली बार यह स्त्री मुझे मंदिर में मिली थी। यह एक संयोग रहा कि उसी दिन डॉ. अंजना संधीर ने मुझे फ़ोन किया कि उनके एक छात्र ने उनके व्यक्तित्व को आधार बना कर एक फ़िल्म “काली माँ” बनाई है जो फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कृत भी हुई है। मैं वह फ़िल्म यूट्यूब पर देखूँ। मैंने देखी। मस्तिष्क ने दोनों घटनाओं को मिलाकर अपना काकटेल तैयार कर लिया और वह ‘उस स्त्री का नाम” के रूप में कहानी में उतर गया।
बाद में भी वह स्त्री मुझे मिलती रही। कभी ग्रोसरी स्टोर में भी मिल जाती रही। बाद के वर्षों में उनके जैसी कई अन्य स्त्रियों को भी जाना। तो यह मात्र एक स्त्री की कथा नहीं है वरन हमारे समाज का एक कटु सत्य है।


दीपक पाण्डेय: ‘उस स्त्री का नाम’ संग्रह की कहानियाँ अमेरिकी पृष्ठभूमि पर आधारित हैं जो प्रवासी भारतीयों के जीवनचर्या को आधार बनाकर लिखी गई हैं। आप भारतीय और अमरीकी सामाजिक संस्कारों में क्या अंतर पाती हैं।

इला प्रसाद: अमरीकी सामाजिक संस्कार बहुत ही अलग हैं क्योंकि सामाजिक संरचना ही बहुत भिन्न और जटिल है। जीवन-मूल्य अलग हैं और अमेरिका के कानून भी बहुत ही अलग हैं। यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था और भोगवादी संस्कृति ने इन्हें कल की चिंता किये बिना वर्तमान और सिर्फ़ वर्तमान में जीना सिखाया है जो जीवन को असंतुलित करता है। भारतीय संस्कृति का आधार आध्यात्म रहा है जो हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच संतुलन की कला देता है, व्यक्ति के व्यक्तित्व के किसी भी पहलू की उपेक्षा किये बिना। यहाँ आकर कितने भी भोगवादी हो जायें भारतीय, वे अमेरिकी मानसिकता को शायद ही अपना पाते हैं। इसलिये इतनी कहानियाँ हो जाती हैं हमारे पास।


दीपक पाण्डेय: 'इस कहानी का अंत नहीं' संग्रह की कहानियों के बारे में आपने लिखा है- "इस संग्रह की एक-एक कहानी के पीछे बरसों की भोगी हुई पीड़ा, घुटन और विवश क्रोध है जो लगातार मुझे अन्दर-ही-अन्दर गलाते रहे हैं और उस सबको हर बार मेरे अनजाने ही मेरे मन-मस्तिष्क पर अंकित करता, मिटा देता, फिए नए रूप में लिखता मेरा अवचेतन मन है।" इस संदर्भ में मैं जानना चाहता हूँ कि साहित्य सृजन में निजता का क्या योगदान होता है?

इला प्रसाद: साहित्य सृजन में निजता तो सौ प्रतिशत होती है। किसी भी कहानी के पात्रों को अपने अंदर जिये बिना आप उसकी कथा कैसे लिख सकते हैं! वह सब आपके ही साथ घटित होता रहता है तब तक, जब तक आप उसे लिखकर मुक्त नहीं हो जाते।

यह एक आंतरिक स्तर पर घटित होने वाली प्रक्रिया है जिसका नियंत्रण आपके हाथ में नहीं होता। आप अपने लेखन को नियमित या अनियमित कर सकते हैं, लेकिन लेखन की यातना या आनंद को नहीं।


दीपक पाण्डेय: आपने बताया कि बचपन से ही प्रेरक-शक्ति-स्वरूप पिता और इनके साहित्यकार मित्रों के सान्निध्य के कारण साहित्यिक रुचि विरासत में मिली। कृपया विवाह-पूर्व की पारिवारिक पृष्ठभूमि और परिवेश के बार में बताइए।

इला प्रसाद: मेरा जन्म एक सुशिक्षित उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। मैं अपने माता-पिता की चौथी संतान हूँ। मेरी तीन बहनें और एक भाई है। पिताजी उच्च शिक्षा के आग्रही थे और उनके लिये बेटी और बेटे में कोई भेद नहीं था। उन्होंने हम पाँचो भाई-बहनों को उच्च शिक्षा दिलाई, स्वावलम्बी बनाया और तब उनका विवाह किया। माँ और पिताजी के सम्मिलित अनुशासन का असर था कि एक ओर हमें आगे बढ़ने के अवसर मिले तो दूसरी ओर उच्च नैतिक दायित्व बोध भी मिला।

साहित्य का संस्कार हम सब भाई बहनों को विरासत में मिला। लेखन की क्षमता भी। यह और बात है कि मैंने और मेरी छोटी बहन नीला ने ही लेखन को गम्भीरता से लिया और उस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। पिता जी राँची विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे और विभागाध्यक्ष के रूप में रिटायर हुए। उनकी उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा थी और उनका सामाजिक दायरा विशाल था। वे अपनी विद्वत्ता और सबों की सहायता करने के लिये सब ओर जाने जाते थे। हमारे घर पर हमेशा ही लोगों का जमावड़ा रहता और साहित्य, विज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान आदि सभी विषयों की चर्चा से लेकर, जीवन के तमाम पहलुओं की चर्चा होती। समाज के सभी क्षेत्रों से आने वाले लोगों का समभाव से स्वागत होता। इस परिवेश में रहकर एक ओर मैंने जहाँ मानव मात्र का सम्मान करना सीखा वहीं अपनी सीमाओं और प्रतिबद्धताओं को भी पहचाना।


दीपक पाण्डेय: आपके पिताजी शिक्षक और लेखक दोनों ही रूप में पथ-प्रदर्शक रहे, कृपया पिताजी के सृजनात्मक साहित्य का परिचय दीजिए।

इला प्रसाद: पिताजी प्रो. दिनेश्वर प्रसाद का लेखन बहुआयामी था। उन्होंने एक दर्जन से अधिक आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं और कई पुस्तकों का सम्पादन किया। वे अनुवाद के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वाल्ट व्हिट्मैन के काव्य संग्रह का हिंदी अनुवाद “मैं इस पृथ्वी को कभी नहीं भूलूंगा” उनकी आखिरी पुस्तक है जो 2012 में उनके निधन के कुछ ही समय पूर्व प्रकाशित हुई।

रांची विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान और संत साहित्य पढ़ानेवाले पिताजी के प्रिय कवि जयशंकर प्रसाद थे और कामायनी उनका प्रिय काव्य। उन्होंने प्रसाद-साहित्य पर डी लिट की उपाधि ली थी और उन पर कई आलोचनात्मक किताबें लिखीं, जिनमें “प्रसाद की विचार् धारा, प्रसाद की साहित्य दृष्टि, “मानस, कामायनी और उर्वशी” ‘आज के लोकप्रिय हिंदी कवि- जयशंकर प्रसाद” आदि पुस्तकें प्रमुख हैं।

लोकसाहित्य में उनकी गहरी पैठ थी। “लोक साहित्य और संस्कृति” उनकी मानक किताब है। इसी तरह “मिथक, प्रतीक और कविता” है। भाषाओं का अन्वेषण उनका प्रिय क्षेत्र था। “हाफ़मैन ऑन मुण्डारी पोयट्री”, “मुन्डारी शब्दावली” उनकी किताबें हैं। उन्होंने जनजातीय भाषाओं पर कई शोध भी कराये।

पिताजी स्वयं एक अच्छे कवि थे। ‘सूरज के पार” उनकी कविताओं का इकलौता संकलन, बहुत पहले प्रकाशित हुआ था। पारिवारिक दायित्वों के बोझ तले उनका सम्वेदनशील मन सक्रिय तो रहा लेकिन इतना नहीं कि वे कवि के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर लेते। तब भी जितना और जो कुछ उन्होंने लिखा, वह मुझे लेखन का साहस और धीरज दोनों ही देता है।

पिताजी की एक पहचान फ़ादर कामिल बुल्के के निकटतम सहयोगी के रूप में है। फ़ादर कामिल बुल्के का परिचय पिताजी से साठ के दशक में हुआ था। तब वे अंगरेजी हिंदी कोश पर काम कर रहे थे और अनुवाद सम्बन्धी कठिनाइयों का निदान न कर पाने की वजह से प्रयागराज, अपने मित्रों के पास, लौट जाने का मन बना रहे थे। पिताजी से परिचय के बाद उन्होंने यह विचार त्याग दिया और रांची ही उनकी कर्मभूमि हो कर रह गई। पिताजी ने नियमित रूप से उनकी शंकाओं का समाधान किया और इसके लिये फ़ादर उनके बहुत कृतज्ञ रहे। उन्होंने अपने कोश की भूमिका में इसका उल्लेख भी किया है। अंगरेजी हिंदी कोश का परिवर्धन/ संशोधन फ़ादर की मृत्यु के बाद पिताजी ने ही किया। बाइबिल के अनुवाद में भी पिताजी का सहयोग उन्हें मिला और ओल्ट टेस्टामेंट के कुछ हिस्सों के स्वतंत्र अनुवाद का दायित्व भी पिताजी ने निभाया। पिताजी और फ़ादर कामिल बुल्के के सह सम्पादन में भी कुछ किताबें हैं। कामिल बुल्के पर भी कुछ किताबें लिखने/ सम्पादित करने का दायित्व पिताजी को मिला जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

इनके अतिरिक्त उनके विविध निबंधों के संकलन का काम अभी चल रहा है और कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।


दीपक पाण्डेय: विज्ञान के अध्ययन-अध्यापन ने आपकी साहित्यिक अभिरुचि को कितना प्रभावित किया?

इला प्रसाद: विज्ञान से जब थकान अनुभव हुई, साहित्य की गोद में चली गई। शोध करने के दौरान भी मैं साहित्य खूब पढती थी। मुझे इससे विज्ञान के क्षेत्र में टिके रहने की ऊर्जा मिलती रही। बनारस में अपने शोध के दिनों में मैं निरंतर कविताएँ लिखती रही। विज्ञान के अध्ययन/ अध्यापन के बाद साहित्य वह दूसरा छोर है जहाँ मैं अपने को निरंतर अभिव्यक्त कर तनाव मुक्त होती रही हूँ। विज्ञान ने मेरी विश्लेषण क्षमता बढ़ाई और उसका असर भी मेरे लेखन पर पड़ा है। वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बना कर भी कहानियाँ लिखी गईं। विज्ञान और साहित्य को मैं एक दूसरे का पूरक मानती हूँ।


दीपक पाण्डेय: आपने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय परिवेश में जीवन जिया है। आप इन दोनों परिवेश में नारी-जीवन की स्थितियों में क्या अंतर पाती हैं और इस अंतर को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने में आप कहाँ तक सफल हुई हैं?

इला प्रसाद: अमेरिका में श्वेत और अश्वेत मानसिकता में बहुत अंतर है। उनके संघर्ष अलग रहे हैं। इसी तरह स्पैनिश समुदाय की मानसिकता इन दोनों से भिन्न है। किंतु जहाँ तक सामजिक स्वतंत्रता का प्रश्न है, भारत में स्त्री जिस सामाजिक स्वतंत्रता के लिये आज भी संघर्ष कर रही है, वह अमेरिका के उन्मुक्त समाज में अब कोई मुद्दा नहीं है। मैंने अपनी कहानी ‘दर्द” में एक अश्वेत लड़की की मानसिकता दर्शाई है। ‘खिड़की” शुद्ध भारतीय परिवेश की स्त्री कथा है। स्पैनिश समाज को मैंने बहुत देखा, “निर्वासन” लिखी है। श्वेत समाज की स्त्री-मानसिकता का प्रतिनिधित्व करने वाली कहानी भी लिखी जा चुकी है, छपी नहीं है अभी। पाठक इन कहानियों से स्वत: उस अंतर का परिचय पा सकते हैं।


दीपक पाण्डेय: इला जी दिन-प्रतिदिन मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं में ह्रास होता जा रहा है। इन परिस्थितियों में साहित्य, समाज के उत्थान में क्या भूमिका निभा सकता है?

इला प्रसाद: साहित्यकार को समाज से सीखना पडेगा तभी वह समाज के उत्थान में कोई सार्थक भूमिका निभा सकता है। जमीन से जुड़ा लेखन ही पाठक के मन में जगह बनाता है। आज जो कुछ लिखा जा रहा है उसका एक बड़ा प्रतिशत येन-केन-प्रकारेण चर्चित होने के लिये है। पाठक उसे पढ़ते ही भुला देता है या फ़िर पढ़ता ही नहीं। जो सार्थक, पठनीय लेखन है, वह प्रभावित भी करेगा और परिवर्तित भी। लेकिन ऐसा लेखन हो रहा है। मात्र हिंदी में ही नहीं, अन्य भाषाओं में भी।


दीपक पाण्डेय: 'उस स्त्री का नाम' कहानी संग्रह की कहानियों में आपने अमरीकी संस्कृति में भारतीय स्त्री की छटपटाहट, विवशताओं, उनकी तकलीफों और संवेदनाओं का चित्रण है, इन कहानियों के कथ्य यथार्थ से कितने नजदीक हैं?

इला प्रसाद: आप मेरे किसी भी कहानी संकलन को ले लें। कहानियों का मूल कथ्य सच पर ही आधारित है। अपनी प्रत्येक कहानी के पात्र/ पात्रों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ। अपने परिवेश से जो कुछ मैंने लिया, वही दिया है। कल्पना की चाशनी भी है, घटनाओं का उलट-फ़ेर भी। मेरे विचार से ये इसलिये कहानियाँ हैं, अखबार की नीरस खबर नहीं।


दीपक पाण्डेय: आपकी कहानियों के संबंध में डॉ. दयानंद पाण्डेय जी का कथन है कि इला जी की कहानियों में पुरुष चरित्र सहयोगी/मददगार और पॉजिटिव रूप में उपस्थित हैं जो अन्य कहानीकारों से आपको विशिष्ट बनाते हैं। इस विषय में आपकी क्या प्रतिक्रिया है? 

इला प्रसाद: यह अनायास ही हुआ। इसके पीछे शायद उन पुरुषों का योगदान है जिनसे मैं अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में सम्पर्क में आती रही हूँ। यह भी सच है कि हॉस्टल के जीवन ने पुरुष को लेकर मेरी मानसिकता में सुधार किया। मैंने कई ऐसी लड़कियों को देखा-जाना जिन्होंने अपने लाभ के लिये पुरुषों का उपयोग किया, उनका शोषण किया। मैंने उन पुरुषों की सोच, व्यथा भी जानी। अमेरिकी समाज में भी स्त्रियाँ पुरुषों का शोषण करती हैं। भारत की तुलना में अधिक ही, कम नहीं। मेरे इन्हीं अनुभवों की वजह से स्त्री और पुरुष दोनों को ही मैं मानवीय दृष्टिकोण से देखती हूँ और मनोविज्ञान की भी थोडी समझ रखने के कारण सिर्फ़ स्त्री के पक्ष में झंडा लेकर खड़ी नहीं दीखती।


दीपक पाण्डेय: आपकी कविता 'बाकी कुछ' की पंक्तियाँ हैं- "अगर मैं अपनी सोच को सार्थक कर सकूँ / लेकिन मेरी सोच का सार्थक होना अभी बाकी है।" आपके अनुसार कविता क्या है और वह किस मुकाम को तलाश करती है?

इला प्रसाद: हालांकि मेरी पहचान कथा लेखिका के रूप में है लेकिन कविता मुझे अपने “स्व” के अधिक करीब लगती है। कहानियाँ मैंने औरों की लिखी है। कविता में खुद को अभिव्यक्त किया है। कविता गागर में सागर भरने की कला है, जब आप अपने कैनवस को अपने लिये रंगते हैं और उसका विस्तार सर्वव्यापी हो जाता है, मात्र सर्वव्यापी ही नहीं, सुंदर और अर्थपूर्ण भी, तब आपको सर्वाधिक संतुष्टि मिलती है। वही कविता की पूर्णता भी है, वही लक्ष्य। कविता लिखकर मुझे हमेशा खुशी मिली है।


दीपक पाण्डेय: हिंदी का प्रचार-प्रसार वैश्विक स्तर पर हो रहा है, नवीनतम सूचना-प्रोद्योगिकी तकनीक का हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में क्या योगदान है?

इला प्रसाद: बहुत योगदान है। आज जिस तरह हिंदी का विपुल साहित्य विभिन्न वेबसाइटों, यूट्यूब, वेबजीन और आडियो बुक के माध्यम से दुनिया भर में उपलब्ध है, वह नब्बे के दशक तक कल्पनातीत था। इससे हिंदी और हिंदी साहित्य का वैश्विक स्वरूप विकसित हुआ है और वह संसार के कोने-कोने तक फ़ैल गई है।

आदरणीय इला जी आपने संवाद के लिए अपना अमूल्य समय दिया इसके लिए मैं आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ। 
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परिचय: इला प्रसाद
जन्म: 1960 में झारखण्ड की राजधानी रांची में। 
शिक्षा: रांची विश्विद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर के पश्चात उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी में पीएचडी की। उन्होंने मुंबई आईआईटी में भी कुछ वर्षों तक शोधकार्य किया और उनके शोधपत्र अमेरिका के विशिष्ट जर्नलों में प्रकाशित हुए। उन्होंने भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं / सम्मेलनों में भी भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण किया है। 
प्रकाशित कृतियाँ:
कविता संकलन: धूप का टुकड़ा
कहानी संकलन: इस कहानी का अंत नहीं, उस स्त्री का नाम, तुम इतना क्यों रोईं रुपाली
उपन्यास: रौशनी आधी-अधूरी सी। 
सम्पादन: कहानियाँ अमेरिका से
एक काव्य संकलन एवं दो कहानी संकलन प्रकाशनाधीन। 
लेखन की शुरुआत छात्र जीवन में हुई। पिछले डेढ़ दशक से वे लेखन की प्रमुख विधाओं में एक साथ सक्रिय है। अब तक देश- विदेश की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं - हंस, वागर्थ, वर्त्तमान साहित्य, कादम्बिनी, समकालीन भारतीय साहित्य, रचना समय, परिकथा, पाखी, युद्धरत आमआदमी, कथाबिम्ब, आधारशिला, पुनर्नवा, निकट, विश्वा, स्पाइल, पुरवाई तथा वेब पत्रिकाओं अभिव्यक्ति - अनुभूति, हिंदीनेस्ट, हिंदीसमय, गद्यकोष, कविताकोष, अम्स्टेल गंगा आदि में उनकी रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं। कई संकलनों, “प्रवासिनी के बोल”, “प्रवासी आवाज”, “देशान्तर”, "हाशिये उलांघती स्त्री" अभिनव इमरोज आदि में रचनायें संकलित हैं। रचनाओं का मराठी, तेलुगु, ओड़िया, नेपाली, एवं अंगरेजी में अनुवाद भी हुआ है। लेखन के आरंभिक दौर में कुछ रचनायें इला नरेन नाम से भी प्रकाशित हुई है। 
न्यास की पत्रिका "विज्ञान प्रकाश” के लिए उन्होंने हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन किया ‘शोधदिशा’ पत्रिका के प्रवासी रचनाकार अंक के दो खंडों का सम्पादन और कनाडा की पत्रिका हिंदी चेतना के कामिल बुल्के विशेषांक का सह सम्पादन किया। वर्त्तमान में अमेरिका से प्रकाशित, विश्व हिंदी न्यास की ‘हिंदी जगत’ पत्रिका की सहायक सम्पादिका हैं। 
साहित्य प्रवाह, बड़ोदरा की टेक्सास शाखा की कार्याध्यक्ष। अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों का आयोजन एवं कई अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों / सम्मेलनों में भागीदारी। द संडे इंडियन द्वारा हिंदी के 111 सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में उल्लिखित। 
देश विदेश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा हिंदी साहित्य सेवा के लिए सम्मानित। 
व्यवसाय:अध्यापन (भौतिकी), लोन स्टार कालेज सिस्टम से सम्बद्ध। 
सम्पर्क: ईमेल - ila_prasad1@yahoo.com
  पता - PO Box 924642, Houston, TX 77292-4642
चलभाष- +1-281-777-1339


सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, भारत 
ईमेल –dkp410@gmail.com
चलभाष +91 89 29 40 89 99 
सेतु, अप्रैल 2021

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