काव्य: यामिनी नयन गुप्ता

यामिनी नयन गुप्ता
एक नयी शुरुआत

स्निग्ध सी मुस्कान
धूप से भी अधिक खिली हुई
आकाश से भी गहरी
नदी से भी अधिक तरल
केवल हम दोनों के बीच में
जिसमें कहीं अस्वीकार नहीं है
प्रतिवाद नहीं, प्रतिरोध नहीं
एकजुटता है...
अटल ध्रुवता...
जैसे अंतहीन आकाश में बसा हुआ आलोक
ज्यूँ खोल ली गई हों घर की खिड़कियाँ
खींच दिए गए हों परदे
नया आरंभ है यह
सामने है एक खुला आकाश
पा गई मैं खोए हुए सारे अर्थ
संवेगों की बाढ़ नहीं
काल का प्रभाव भी नहीं
केवल एक पुल है शब्दों का
जो जोड़ता है मुझे तुमसे
पहुँचाता है मुझे तुम तक
दिल की गहरी खोह में
अनुभूतियों का रंगीन मोज़ाइक,
चमचमा रहे हैं हरे, लाल पीले रंग
लौट आई हूँ मैं अपने-आप में
अपनी सी और...
जानी-पहचानी होकर
हाँ तुम संग --- मैं ही तो।
***


समर शेष है

और...
प्रेम के लिए किया गया स्त्री का समर्पण
ना जाने कब बदल गया समझौते में
उपेक्षा, तिरस्कार से कुम्हला गए
पत्ते प्रेम के
सहनशक्ति की झीनी चादर तले
दब गए इंद्रधनुषी रंग नेह के,
दो व्यक्ति के मध्य किया जाने वाला प्रेम
शनै-शनै बदल गया एकालाप में,
वह अब बात तो करते हैं
मगर खुद से...

एकतरफा इन संवादों से
मौन हो गया है मुखर,
खिलखिलाहटें खो गई है
मुँह छुपाए बैठी है मुस्कुराहटें
हरसिंगार के फूल खिलकर गिर जाते हैं
कि ढल गए हैं दिन गजरे के,
बारिश की बूँदें बरसते ही गुम हो जाती हैं
विरह की तपिश में...
गरम तवे पर पड़ी पानी की बूँदों सदृश,
सावन के झूले पड़े हैं रीते
कि यदा-कदा छोटी चिड़िया आ बैठती हैं उन पर
लेना चाहती हैं पींगे पर
पुरवाई से हिल कर ही रह जाता है झूला।

प्रेम से पहले...
स्त्री चाहती है मान सम्मान के दो बोल ;
तिरस्कार, उपेक्षा में लिपटे प्रेम के शब्द भी
लगते हैं चासनी में लिपटे करेले सरीखे,
क्या-क्या नहीं क्या तुम्हारे लिए मैंने __
भौतिक सुविधाओं की लंबी फेहरिस्त
पर छीन ली गई आजादी,
हाथ बराबरी का, स्वीकरोक्ति एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की
स्त्री का समर अभी शेष है
ऐ पुरूष! कब लोगे तुम
आहत आत्मसम्मान की सुधि
काश के दो बोल प्रेम के बोलना भी
तुमको रहता याद।
***


विवाहिता प्रेमिकाएँ

विवाहिता प्रेमिकाएँ
हाँ, बिडम्बनापूर्ण जरूर है
इन दो शब्दों का साथ होना
पर नया नहीं है
सदियों से ढँका छुपा रहा है स्त्री का ये रूप
विवाहिता भी और प्रेमिका भी,
विपरीत ध्रुवों की इन स्त्रियों को प्रकटतया
कभी नहीं रखा गया एक साथ
एक ही फ्रेम में;
एक स्त्री हर काल, हर उमर में चाहती है
बने रहना प्रेयसी ही
पर गृहस्थी की उलझनें
पौरुष दम्भ से जूझते पति की लालसाएँ।

घर की बंदिशों की सीलन से भरी दीवारें
उपेक्षा और तिरस्कार से त्रस्त स्त्रियाँ
अंततः पा ही जाती हैं अपना वितान
देह से परे अपने सपनों का पुरुष
मनचाहे साथी का साथ
हाथ थाम अंतहीन सफर पर,
अब वह नहीं हैं बंद संदूक में पड़ी एक डायरी सी
जिसके पृष्ठ भी हो चले थे बदरंग
समय, वक्त की धूल को हटा
उस स्त्री ने चाहा बस इतना
____ चाहे जाना टूटकर
कि बची रहे जीने की ख्वाहिशों की जगह
यांत्रिक जीवन से परे
बनी रहे नींदों में ख्वाबों की जगह।

पर-पुरुष चाहता है उसे
गर्मियों में छाँव की तरह
जाडो़ं में धूप की तरह
बदलते मौसम के साथ बदलते जाने का
ये तरीका कभी रास नहीं आया स्त्री को,
रेगिस्तान में भटकती
नदियों तक दौड़कर जातीं
ये विवाहिता प्रेमिकाएँ...
घरेलू उलझनों से जूझती,
रोटियाँ बनाकर पसीने से लथपथ
तपती गर्मी में चिड़ियों के लिए पानी रखने के बहाने
जा बैठती हैं यादों की मुंडेर पर,
लिखे-अनलिखे खतों को बाँचती
हवाओं के साथ प्रेम गीत गुनगुनाती।

ये प्रेमिकाएँ
कभी बूढ़ी न हुईं
साल दर साल बीतते
वर्षों बाद भी रहीं प्रेमी के दिल में
स्मृति में
कमसिन, कमनीय
उस उम्र की तस्वीर बन
महकती रहेगी वे स्त्रियाँ
किताबों में रखे सुर्ख गुलाब की तरह।
***


जूठन

एक सर्द सांझ के धुंधलके में
वो कामवाली...
लौट रही है अपने घर,
मटमैले रंग की ऊबी शॉल ओढ़े
टूटी चप्पल घिसटते
हाथों में मालकिन के घर से लाई
तेरह पूरियाँ और चने ;
आज मेरे बच्चे कुछ अच्छा खा लेंगे
तेज कदमों से चलने पर घर आ गया है करीब
दहलीज पर मर्द की आवाजें देती है सुनाई
नासपीटा!
क्या जूठन लाई है आज थैली में
वह ललचाया
जूठन!
आज जूठन बनते-बनते ही तो बची है वो
जब मालिक ने स्टोर के अंधेरे में
पकड़ ली थी उसकी बांह
वह मर्दानी गंध
वो लिजलिजा स्पर्श।

माँ के आने की आहट सुनकर
बिटिया ने उठा ली है हाथों में किताब
लड़के ने कम कर दी है टीवी की आवाज,
लड़का मचला अम्मा
भूख!
उसके सीने में कुछ दर्द सा उठा
अभी घर आते वखत मोड़ पर
एक साइकिल सवार ने चलते-चलते
हाथ से भींच दी थी उसकी छाती।

रोशनी से भरी एक कोठी में
मालिक ने कहा मालकिन से
इस काम वाली की नीयत ठीक नहीं है
कल से इसे मना करना कर देना।

शराबी पति,
बेटा-बेटी खा रहे हैं पूरी-चने,
वो कामवाली थाप रही है कुछ रोटियाँ
आज सुबह से उसने कुछ खाया नहीं।

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