अहिंसा और न्याय

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


हमारी बहुत सारी भावनाएँ लच्छेदार विचारों का समुच्चय होती हैं। भावनाएँ कभी-कभी विचार पर भारी पड़ने लगती हैं, तो कभी-कभी विचार ही भावनाओं को प्रभावित करने लगते हैं। मनुष्य का जीवन इनके अभाव में भी अधूरा और निरुद्देश्य लगता है। कहते हैं एक जीवित मनुष्य में भावनाओं और विचारों का होना उसके जीवंत होने का प्रमाण है। लेकिन मनुष्य ने अपने विचार और भावनाओं से क्या किया? इसका सहज उत्तर है- उसने उत्कर्ष किया लेकिन उसके नकारात्मक कृत्य ऐसे रहे जिनकी वजह से उसका जो और उत्कृष्ट स्वरूप हो सकता था वह नहीं मिला है। हम देखेंगे कि सम्पूर्ण सभ्यताएँ विचारों और भावनाओं से अपने विधान को संचालित करती रही हैं चाहे वह मिस्र की सभ्यता हो, मोहनजोदड़ो या मेसोपोटामिया की सभ्यता हो या ईरानी सभ्यता हो या अन्य बहुतेरी सभ्यताएँ। इन सभ्यताओं में विचारों का उत्पादन वहाँ के विधान विनिर्मित किए। विधानों के पीछे सुसंगठित विचार रहा है, और भावनाओं का उनमें कहीं न कहीं सम्मान बना रहे रहे, इसकी कोशिश की गयी। आज भी दुनिया में विचारों और भावनाओं के आधार पर अगर मानव अधिकारों के संरक्षण की बात की जाती है तो वैयक्तिक और सामूहिक भावनाओं के सम्मान पर विशेष बल दिया जाता है जिससे कोई अपमान न महसूस करे और न ही अपने होने का एहसास खोए। मनुष्य के वैचारिक व रचनात्मक सोच ने प्रकृति एवं ब्रह्माण्ड तक की चिंता की और वह ऐसा करके न्याय स्वयं के साथ किया, यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।

न्याय का शासन तो इस बात का संकेत होता है कि कहीं-न-कहीं कोई वर्ग किसी संघर्ष का शिकार है। अगर संघर्ष की स्थिति न हो तो वहाँ की मनुष्य आबादी न्याय की अपेक्षा ही नहीं करती। न्याय की अपेक्षा का अर्थ ही है कि हिंसा की उपस्थिति है। न्याय हिंसा को नियंत्रित करता है। न्याय वंचना और शोषण से बचाता है। डोम हेल्डर कमरा को पढ़ते हुए आप यह पाएंगे। अन्याय हिंसा का एक प्रतिरूप है, ऐसा उनका मानना है। दुनिया में जो भी नियम-कानून-विधान बनाए गए वे न्याय के लिए ही बनाए गए। उन लोगों के बीच हिंसा पर नियंत्रण के लिए जो बर्बर थे या तो किसी न किसी प्रकार से संघर्षरत थे। न्याय का एक अर्थ अहिंसा भी हम कर सकते हैं। न्याय सत्य की स्थापना के लिए होता है और सत्य तो अहिंसा का दूसरा रूप है। न्यायवादी लोग अहिंसक सभ्यता के लिए संकल्पशील रहे हैं। 

दुनिया के विभिन्न धर्मों और पंथों में जिन शास्त्रों को पुनीत माना गया उसका आधार कहीं न कहीं न्याय रहा है। भारत में न्यायसार और षड्दर्शन में न्याय-सिद्धांत न्याय की बात करते हैं। जैन और बौद्ध धर्म में अस्तेय और अपरिग्रह जैसे मूल्य भी न्याय के लिए सूत्ररूप में हमें मिलते हैं। इस्लाम में कुरान मजीद में न्याय को अदल कहते हैं। इस्लाम में कहा गया है कि अल्लाह आदिल है वह न्याय यानी अदल पर विश्वास करता है। इसीलिए इंसानों के बीच अदल की वकालत करता है और वह हुक्म देता है कि इंसानियत के लिए अदल होना चाहिए। सूरा में नबी का एक महत्वपूर्ण काम अदल कायम करना बताया गया है। विश्व के तमाम देशों में सामाजिक न्याय के सिद्धांत प्रचलित रहे हैं। यूनान के एपिक्युरियनवाद भी न्याय के सिद्धांत पर मुखर रहे। क्न्फ्युशियस ने न्याय के उन परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत किया जो कुलीन और निर्धन के बीच के न्याय की विसंगति को दूर करता है। न्याय के सिद्धांत कांट, लॉक, रूसो और राल्स के सैद्धांतिकी में हमें मिलते हैं। मार्क्स ने इसे वर्ग संघर्ष के अध्ययन में देखा। रस्किन अन टू दिस लास्ट में न्याय की चर्चा करता है तो वह कार्य की गरिमा को रेखांकित करके सबको समान माना। गाँधी ने उसे सर्वोदय के रूप में समझने की कोशिश की क्योंकि अगर सबका उदय होता है तो न्याय वहाँ होता ही है। थोरो ने कहा था कि न्याय किसी भी सत्ता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार न्याय के बारे में पूरब और पश्चिम में पर्याप्त चिंतन होता रहा है और यह कोशिश भी होती रही की न्याय हिंसा और बर्बरता को अधिकतम समाप्त करके सबसे कमजोर के लिए भी गरिमा का कारण बने।

मनुष्य तो प्रज्ञाशील प्राणी है। उसके भीतर न्याय का बोध ही उसे अलग करता है क्योंकि पशुओं में तो धर्म या आचार-व्यव्हार या न्याय का बोध तो होता नहीं। इसलिए मनुष्य सृष्टि का श्रेष्ठ प्रज्ञावान कृति के रूप में जाना जाता है। मनुष्य से सम्यक अचारण की अपेक्षा की जाती है इसका अर्थ होता है मन, कर्म, वचन से न्यायसंगत होना। यह न्यायसंगत होने की संहिता तो बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग में भी उद्धृत है जिसका प्रतिपादन ही अहिंसक है। पश्चिम के विचारक न्यायप्रिय व्यवस्था के हिमायती थे। बौद्ध परम्परा न्यायिक आचार का आग्रह करती थी। यदि इनके समेकित स्वरूप को आप समझें तो यह लगेगा कि पूर्व व पश्चिम में एक ऐसी न्यायप्रिय अनुभूति को मनुष्यों के भीतर उतारने की कोशिश थी जिसकी भावभूमि अहिंसक सभ्यता पर आधारित हो। दुनिया के किताबों और पुस्तकों की पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है पर क्या आपको पता है विश्व के जितने भी राज्य है वहाँ के चार्टर, संविधान और राजाज्ञाएँ सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक न्याय का अनुमोदन करते हैं और उसी पर आधारित व्यवस्थाएँ संचालित हो रही हैं और जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ पर अस्थिरता, संघर्ष और असमंजस की जिंदगी लोग जीने को मजबूर हैं। वहाँ पर घोर अन्याय की वजह से हिंसा की भयावहता पीड़ाप्रद हैं। वहाँ बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ और निःशक्त लोग अपने गरिमा के साथ नहीं जी रहे हैं। लोकतान्त्रिक स्थितियां भी न्याय का पैमाना हैं लेकिन सशस्त्र सेनाओं और युद्ध-उन्माद की स्थितियां हिंसा व अस्थिरता की सूचक हैं। संयुक्त राष्ट्र जो कि सतत शांति का पैरोकार है उसकी तरफ से की जा रही तमाम कोशिशें भी पृथ्वी के बहुत से भूभाग में हिंसा रोकने में पूर्णतया सक्षम नहीं है, यानी वहाँ के लोग अन्याय व हिंसा के शिकार हैं। दुनिया में इसे समझने के अनेकों प्रयास हुए हैं। अब देशों की न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय कार्य कर रहे हैं। बहुत पहले ऐसी व्यवस्थाएँ नहीं थीं लेकिन आज जब बड़े संस्थान अपना स्वरूप पा चुके हैं तब भी न्याय से पृथ्वी की एक बड़ी आबादी वंचित है।

न्यायपूर्ण समाज की रचना ही तो अहिंसक समाज की रचना है लेकिन साम्राज्यवादी सोच ने इस अहिंसक समाज को गढ़ने में रोड़ा पैदा किया है। जॉन राल्स इसी साम्राज्य को तोडना चाहता था। उसकी पुस्तक थिअरी ऑफ़ जस्टिस नैतिकता और न्याय की व्याख्या है। उसने कहा था कि सभी व्यक्तियों के कुछ अधिकार हैं जिसपर अतिक्रमण न्याय के खिलाफ है। वह एक तरीके की हिंसा है। वह न्याय के सनातन न्याय सिद्धांत-इंटरजेनरेशनल जस्टिस का हिमायती था।

आज संरचनात्मक हिंसा की जड़ें गहरी हो गयी हैं। यह हिंसा कभी गरीबी-भुखमरी-अन्य गैर-बराबरी में देखने को मिलती है। संयुक्त राष्ट्र ने एसडीजी-2030 की योजना के साथ सामाजिक न्याय को पुनः प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है शून्य गरीबी, शून्य भुखमरी और दूसरे सामान वितरण के लिए किये जा रहे कैम्पेन के पीछे यही उद्देश्य है कि लोग अहिंसक वातावरण के भागीदार बन सकें और अधिकतम की उन्हें प्राप्ति हो। यह अहिंसक वातावरण दरअसल सनातन न्याय के माध्यम से आ सकते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि भारत ही नहीं दुनिया के अनेकों देशों में यह कैम्पेन एक नारे के रूप में ही दिख रहा है। इस कैम्पेन के साथ ही न्याय नहीं हो प् रहा है क्योंकि वे लोग जो दुनिया को अपने-अपने अनुसार जीतकर विजित कहलाने का शौक पाल रखे हैं, वे ऐसा होने ही नहीं देंगे जो मनुष्यता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे न्याय या अहिंसक व्यवस्था के लिए जो हमारा स्वप्न है वह एक दिवा-स्वप्न ही लगता है। जब हथियारों की बाढ़ रहेगी, युद्ध होंगे, वायरस से अतिक्रमण होंगे और भूख और गरीबी के नष्ट करने के लिए जो संसाधन हैं वे केवल प्रतिरक्षा हेतु केन्द्रित हो जायेंगे तो कभी भी सनातन न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती है।

न्याय का दायरा अगर और विस्तृत किया जाय तो मनुष्य की ऊर्जा नकारात्मकता की ओर ज्यादा केन्द्रित हो गयी है इससे तो प्रकृति के साथ भी मनुष्य न्याय नहीं कर रहा है। यदि प्रकृति से भी खेलने की कोशिश होती रही तो यह शुभ संकेत कदापि नहीं है। नेचुरल जस्टिस तो फिर प्रकृति अपने अनुसार करती है। इसलिए न्याय के सभी आग्रही कैसे हो सकते हैं इस पर विचार करना आवश्यक है। यह विचार करना आवश्यक है कि हमारे साधन और साध्य की समझ कहीं हमारे लिए विनाशकारी तो नहीं बनने जा रही है। शायद हमारी प्रज्ञा न्याय का अहिंसा का और सत्य का वरण कर ले। अगर ऐसा होता है तो हमारे भीतर की सर्वे भवंतु सुखिनः की भावना का सही प्रतिफल दिखेगा और न्याय के वास्तविक स्वरूप हमें मिलेंगे।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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