कहानी: माँ की बंडी

- भरत चन्द्र शर्मा


शीतकाल प्रारंभ हुआ ही था। सर्दी अब दस्तक देने लगी। सूर्य भी शीघ्र अस्ताचलगामी हो कर रात्रि के प्रहर विस्तार में सहभागी हो रहे थै। गौतम बाबू दफ्तर से घर लौटे ही थे। वृद्ध माँ के साथ गरम चाय की चुस्की ले रहे थे, बातों का सिलसिला शुरु हुआ तो माँ ने कहा -
 भैय्या। मेरी यह बंडी फट गयी हैं, इस बार मुझे गरम कपड़े की नयी बंडी सिलवानी हैं।
 गौतम बाबू - माँ। यह कपड़े सिलवाने का काम झंझट का हैं।आजकल तो गरम कपड़ों के नेपाली, तिब्बती मार्केट सज गये हैं। एक से बढ़कर एक नयी डिजाइन की बंडिया या जो भी लेना चाहो वहाँ रेडीमेड मिल जाती हैं। पुरानी फैशन के कपड़े सिलने वाले दर्जी भी अब कहाँ कितने बचे होंगे। सिलवाने दे भी दिया तो उनके नखरे, कल आना, परसों आना, इनके टल्ले मारने में ही सर्दी का आधा मौसम निकल जाए।
 माँ - भैय्या। ये नेपाली -तिब्बती ढेर सारे गरम कपड़े हैं पर इनका नाप बूढ़ी काया फर जमता नहीं हैं।
बरसों से तुम्हारी नौकरी भी बाहर ही रही, अब सेवानिवृत्ति का समय नजदीक हैं तो सरकार की मेहरबानी हुई और तुम यहाँ हो। जब से नया मकान बना परकोटे के अंदर का पुराना शहर बाजार तो हम भूल ही गए।
 अब मेरी इच्छा है नयी बंडी तुम हमारे पुराने दर्जी मगनभाई से सिलवाओ इस बहाने उसकी खोज-खबर हो जाएगी और मुझे भी मेरे नाप की सही बंडी मिल जाएगी। दो जेब आगे रखवाना, एक में चश्मा, दूसरे में मंदिर में चढाने की रेजगारी, अंदर वाले जेब में दस- बीस के नोट, चोर जेब में आड़े वक़्त में काम आने वाला रुपये रह जाएंगे। --- ये सब मगनभाई समझ जाएगा।
 माँ की खुशी देखते ही बन रही थी, स्मृतियों के झरोखों से माँ एक बच्चे की तरह अतीत में लौट रही थी, गौतम बाबू के सामने परकोटे के भीतर का सुनहरा संसार रच रही थी।
गौतम बाबू - ठीक है माँ, कल दफ्तर में आधे दिन की छुट्टी हैं, गरम कपड़ा भी खरीद लूंगा, यह पुरानी बंडी भी नाप के लिए ले जाऊंगा, पुराने शहर में पता करता हूँ मगनभाई का।
 गरम कपड़े का समाधान तो पत्नी ने कर दिया
 गरम कपड़ा तो घर में हैं।
 अब तो माँ जैसे गौतम बाबू की अंगुलियों पकड़ कर पुराने बाजार में ले जा रही हो
 देख भैय्या। मगनभाई के आसपास ही उस जमाने के माने हुए घड़ीसाज मोहन भाई, शहर के एकमात्र रेडियो मेकेनिक गफूर चाचा की दुकानें भी थी।
 कहते हैं घर में कोस (खराब) हो गई चीजें नहीं रखनी चाहिए, अपशगुन होता हैं उन्हे मरम्मत कर ठीक करवा देना चाहिए न होतो भंगार में निकाल देना चाहिए।
 तुम्हें समय मिले तो तुम्हारी बंद पडी हाथ घड़ी, बंद पडा रेडियो भी ले जा कर इन हुनरमंद लोगों से ठीक करवा सकते हो पर अब मोबाइल का जमाना आ गया तो घड़ी रेडियो सब भूल गये।
 माँ यह सही है इन सब का काम मोबाइल से हो जाता हैं पर घड़ी को कैसे भूल सकता हूँ, वह घड़ी तो मुझे मेट्रिक प्रथम श्रेणी में पास करने पर पिताजी ने इनाम में दी और वह रेडियो भी पक्का याद हैं जिससे देवकीनंदन पांडे की खनकती आवाज में चीन के युद्ध के समाचार सुनते थे, बडों की डाँट खा कर भी क्रिकेट की कमेन्ट्री सुनते थे।
 कल तो मगनभाई से मिलता हूँ, आगे घड़ी, रेडियो का नम्बर आयेगा। पर माँ एक बात समझ में नहीं आयी मगनभाई जब हमारे पारीवारिक टेलर थे तो बाद में कभी देखे नहीं।
 माँ - तुम्हें याद नहीं हैं, तुम्हारे जनेऊ का कार्यक्रम था। उस जमाने में परिवार में छोटे-बडे, जनाने-मर्दाने सब के कपड़े एक ही टेलर सिलाई करता था। जिस घर में शादी ब्याह, जनेऊ आदि जो भी मांगलिक प्रसंग आता वह दर्जी महीना, पखवाड़ा पहले ही उस घर में सिलाई मशीन ले कर बैठ जाता, गणेश पूजन के पहले तक सारे कपड़े तैयार हो जाते।
समय कम था, पूरे परिवार के कपड़े सिलाई करने थे, मगनभाई सुबह से शाम तक मशीन चलाया करता था, दोपहर में घंटे भर विश्राम के लिए घर जाता था। एक दिन तुम्हारी टाबर टोली धमाचौकड़ी मचा रही थी, तुम्हारा वह उद्दण्ड बाल सखा, ... क्या नाम था उसका, अरे याद आ गया, ' चंचल' तो मगनभाई जब घर गया था, तो चंचल मशीन पर बैठकर चलाने लग गया, उस छोकरे की अंगुली सुई के नीचे आगई, खून बह रहा था, वह दहाड़ें मार कर रो रहा था।
 टिटनेस फैल गया, उसके पिता ने कितना ही रुपया इलाज में खर्च किया, सात -आठ साल लंबा इलाज चला, ऊपर वाले की खैर मनाई कि वह बच गया।
 इस दुर्घटना से मगनभाई खूब व्यथित हुआ, मन ही मन इसके लिए अपनी लापरवाही को जिम्मेदार मान रहा था, काश वह मशीन पर ढ़क्कन लगाकर गया होता तो ये हादसा नहीं होता। फिर संकोचवश उसका आना-जाना कम हो गया, जमाना भी बदल रहा था, रेडीमेड कपड़े आ गये।
 क्या पता जाने अब किस हाल में हैं?
 माँ, कल पता करता हूँ।
गौतम बाबू ने आश्वस्त किया।
 दूसरे दिन गौतम बाबू दफ्तर की छुट्टी से पुराने शहर की तरफ चले गये।परकोटे के भीतर संकरी गलियों में भीड़-भड़क्के में दुपहिया चलाना भी नट की तरह करतब दिखाने से कम नहीं हैं।
उन गलियों का आलम यह था कि नीचे तल की छोटी दुकाने भाइयों के बँटवारे में ओर छोटी हो गई। गली में आमने-सामने का फासला बहुत कम था। लगता था रेल के डब्बे आसमान की तरफ सर उठा के खड़े हो गये हों, सूरज की किरणें इस गली में शायद ही कभी धरती तक पहुँचती हों। मकान के ऊपरी तल्ले जैसे एक दूसरे से मिलने को आतुर हों।
अतीत के किरदारों से यथार्थ के धरातल का अनुमान लगाते गौतम बाबू ने देखा, वे सात-आठ फुट की छोटी बरामदा नुमा दुकान के बाहर खडे हैं। दोनो कोनों में सिलाई मशीनों पर दो युवक हाथ पाँव चला रहे हैं, फर्श पर दो महिलाएँ जिसमें एक वृद्धा एवं एक प्रौढ़ा हैं, क्रमशः काज बटन, तुरपाई आदि काम कर रही हैं उनकी आँखों पर नम्बरी चश्मे चढ़े हुए हैं।
 भैय्या मगनभाई की दुकान यही हैं क्या?
 गौतम बाबू की तरफ उचटती निगाह से देखते हुए उस अक्खड़ युवा के हाथ मशीन पर ठहर गये, मशीन की रिदम स्थगित हो कर ठहर गई।
 हाँ, यही हैं, बोर्ड नहीं पढ़ा क्या?
 भैय्या यह बोर्ड इस अलगनी के पीछे आ गया जहाँ अंगरखियाँ, पट्टे वाली चड्डियाँ टंग रही हैं।
 हाँ बोलो क्या काम है?
 गौतम बाबू - दरअसल मुझे माँ के लिए गरम बंडी सिलवानी हैं, किसी जमाने में मगनभाई हमारे फेमिली टेलर रहे हैं।
 युवक ने दीवार पर टंग रही एक तसवीर की तरफ इशारा किया, जो पुरानी एवं धूल से सनी थी जिस पर बरसों पुरानी कोई प्लास्टिक की माला चढ़ी थी।
 गौतम बाबू समझ गये मगनभाई को स्वर्गीय हुए काफी समय हो गया हैं।
 दो मिनट का सन्नाटा उनके बीच पसर गया।
 थोड़ा संयत हो कर गौतम बाबू ने अपना एवं माँ का परिचय दिया।
 सामने बैठी मगनभाई की पत्नी पहचान गई।
 रुआँसी हो गई वह महिला, आँख के आँसू पोछते हुए बोली -
 रनछोड़। बाबूजी को बैठने के लिए स्टूल दे।
 रनछोड़ जिसकी आँखों में आक्रोश का एक स्थायी भाव था, उसने एक स्टूल आगे सरकाया तो अपने आप को सिकोड़ते हुए गौतम बाबू उस पर बैठ गये।
 पुराने परिचित को देख कर मगनभाई की विधवा पत्नी के दुःख की गागर छलक गयी।
 - बाबूजी क्या बात करें, रोजी-रोजगार कम होने लगा तो चिन्ता में उनको खोटी बीमारी (टीबी) हो गयी। लड़की की शादी आ गयी, घर गिरवी रखा, दवा-दारू भी खूब करायी पर नहीं बचे।
 ये दो बेटे मनसुख और रनछोड़, इधर ये माँ, ... सबको छोड़कर चले गये।
बाबूजी, आपकी माँ कैसी हैं?
 हाँ ठीक हैं, उन्हीं के लिए गरम बंडी सिलवानी हैं, वे कह रही थीं, मगनभाई एकदम मेरे हिसाब से बनायेगा।
 ----- पर अब --------
 रनछोड़ असहज हो गया।
 - अंकल पिता जी चले गये पर उनका हुनर साथ लेकर नहीं गये हैं।
आपको भरोसा होतो मैं बना दूंगा।
 रनछोड़ की माँ ने उसको बरजा
 - बाबूजी के परिवार से हमारे पुराने ताल्लुक हैं, ऐसे बात नहीं करते।
 रनछोड़ तो ज्यादा उखड़ गया।
 - चलो अंकल को माँ की बंडी के लिए ही सही मगनभाई की याद तो आयी।
 गौतम बाबू अभी उसका मुँह ही देख रहे थे कि एक ग्राहक और आ गया वह सिलाई के बिल को कम करने के लिए कह रहा था।
 रनछोड़ उसको कह रहा था -
 ये मोलभाव आप यहीं करते हो, मॉल में जब खरीदारी करते हो चुपचाप बिल दे देते हों, गार्ड सेल्यूट ठोकता है, उसको टिप अलग से देते हो।
 फिर माँ को कहने लगा अंकल से पुराना घरेलू रिश्ता हैं, इसलिये उनको अपना दुःख दर्द बता रहा हूँ।
 रनछोड़ ने ऊपर लटक रही चड्डियों, अंगरखियों की तरफ इशारा किया, अंकल अंदर की बात यह है कि देहाती लोग भी हमारी खरीदारी बंद कर दें तो हमारे छोरे-छाबड़े भूखों मर जायें, फाकामस्ती की नौबत आ जाए।
 गौतम बाबू जो आरंभ में थोडे असहज हुए थे,आहत भी हुए थे, रनछोड़ के कटु सत्य उनकी देह पर नहीं आत्मा पर सटाक कर पड़े थे, उन्हें लगा गलत नहीं हैं रनछोड़।
 उन्होंने रनछोड़ की पीठ पर हाथ रखा, चलो आज से नई शुरुआत करते हैं।
सहज होने लगा रनछोड़।
 गौतम बाबू ने विषयान्तर किया।
 अरे भाई रनछोड़। यहाँ कहीं मोहन भाई घड़ीसाज़ की दुकान थी, दरअसल मुझे मेरी कलाई घड़ी भी ठीक करवानी हैं।
 रनछोड़ एक फीकी हंसी हँसा -
 अंकल यह जमाना यूज एंड थ्रो का हैं, फिर चाहे वे रिश्ते हों या घड़ी।
कभी घड़ी भर की जिनको नवराई (फुरसत) नहीं मिलती थी, वे मोहन अंकल ठाले बैठे रहते थे, रोजगार मंदा होने लगा, सदमे में दिमाग की कोई नस सटक गई, घर पर खाट में पडे हैं। एक आँख एकदम खुलकर बडी हो जाती हैं जैसे घड़ी के पुरजे देख रहे हों।
 उनके बेटे ने धंधा बदल लिया हैं, वह जो आगे डिस्पोजेबल वाली दुकान दिख रही हैं, उसी की हैं।
 अंकल। मोहन जी की क्या बात करें हो सकती हैं, आपके पास जो घड़ी हैं, वह कम्पनी भी बंद हो गई हो।
 गौतम बाबू को एक धक्का सा लगा, सही कह रहा हैं रनछोड़, अभी कुछ समय पहले ही तो एच. एम. टी. का कारखाना बंद होने की खबर कहीं पढ़ी थी।
 कुछ पल का सन्नाटा टूटा, रनछोड़ ने सामने वाली गुमटी पर आवाज़ लगाकर कट बादशाही चाय का आर्डर दे दिया।
 गौतम बाबू ने मना किया तो रनछोड़ उसका भाई मनसुख, माँ, दादी माँ सब समवेत स्वर में कहने लगे -
 चाय तो पीनी ही पडेगी, बहुत बरसों बाद मिले हैं।
इस आत्मीय आग्रह के बाद एक बार फिर बैठ गये गौतम बाबू।
 उनकी जिज्ञासा थी, गफूर भाई रेडियो मैकेनिक की दुकान किधर गई? गौतम बाबू ने पूछा - किसी जमाने के एकमात्र रेडियो मेकेनिक गफूर चाचा जो रेडियो के मामले में किसी न्यूरो सर्जन से कम नहीं थे, कहाँ हैं?
 अरे रनछोड़। इस गली से निकलने वाले को विविध भारती, बिनाका गीतमाला कुछ न कुछ कान में पड ही जाता था, क्योंकि एकदम मरे हुए रेडियो पर भी चाचा हाथ रख देते तो उसकी धडकन लौट आती थी।
 अंकल गफूर चाचा का तो इंतकाल हो गया। उनका लड़का अब्दुल हैं, उसने दुपहिया की एसेसरीज की दुकान खोल ली हैं।
 गौतम बाबू ने जब उस दुकान की तरफ दृष्टि डाली तो देखा ऊपर की टांड पर इक्का - दुक्का मरफी, नेशनल इको, बुश के पुराने मॉडल मानो अतीत की सुनहरी दास्ताँ कह रहे हों।
गौतम बाबू ने जब घर लौटकर मगनभाई के बारे में बताया तो माँ ने एक दीर्घ निश्वास लिया।
 कुछ देर पश्चात माँ ने परकोटे के भीतर के सभी दुकानदारों के बारे में पूछा तो उनकी झुर्रियों के भीतर से आत्मीयता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दी फिर उनके बारे में जानकर माँ का चेहरा भावशून्य और सपाट होने लगा।
 माँ स्मृतियों का अंतराल पार कर उनके बचपन की चौखट पर खड़ी हो गयी।
 भैय्या। मेरी दादी बताती थी, उनके जमाने में सुकड़ी प्रथा थी, गांव का कोई भी हुनरमंद आदमी भूखो नहीं मरता था। काम के बदले सुकडी में अनाज मिलता था।
 एक आह भरकर मां वर्तमान में लौटी
 अब भी एसा तो कर ही सकते हैं, पुराने बाजार से भी कुछ न कुछ तो खरीद ही सकते हैं।
 गौतम बाबू बाजारवाद से लघु उद्यम को बचाने के संकेत को समझने का प्रयास कर रहे थे।
 उस दिन तो माँ की खुशी का पारावार नहीं रहा, जब निर्धारित समय से एक दिन पूर्व ही रनछोड़ स्वंय बंडी देने घर आ गया।
 माँ ने बंडी देखकर ढेरो आशीर्वाद दिये। जुग - जुग जी
 तेने तो एकदम मगनभाई की तरह अच्छे से बंडी सी हैं। मेरी सारी जरुरतों का खयाल रखा हैं।
 माँ एक छोटी बच्ची की तरह बंडी में सुंघनी रखने की डिब्बी, बिल्लोरी कांच वाला चश्मा, रेजगारी, चोर जेब में मुडे हुए नोट रख रही थी।
 पहन कर देखा -
वाह। रनछोड़ एकदम फ़िट, तू तो मगनभाई से एक कदम आगे हैं।
 रनछोड़ तो चला गया, माँ ने कहा
 भैय्या। पुराना बाजार सिर्फ़ बाजार नहीं था, उसमें व्यवहार भी था।
 समय के पक्षी को तो पंख लगे हैं, जाते कब देर लगी हैं। सर्दी का मौसम भी निकल गया।
 अब तो यह दूसरा शीतकाल आ गया। गौतम बाबू ने गरम कपड़ों का पोटला खोला तो माँ की बंडी छिटक कर दूर जा गिरी। गौतम बाबू ने देखा
 माँ की बंडी में उनकी सुंघनी की डिब्बी, नम्बरी चश्मा, रेजगारी, आड़े वक़्त में काम आने वाली नकदी सब कुछ यथावत हैं, केवल माँ अब इस नश्वर संसार में नहीं हैं, फिर भी न जाने क्या सोचकर गौतम बाबू इस जाडे में नयी बंडी सिलवाने पुराने बाजार में चले गये।
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साहित्यिक परिचय: भरत चन्द्र शर्मा

जन्म-6/10/1950 ( बांँसवाड़ा -राजस्थान)
पितृ स्थान -डूंगरपुर (राजस्थान)
शिक्षा
---–--- बी. एससी., MA (अर्थशास्त्र), MA ( हिंदी), CAIIB
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प्रकाशित कृतियाँ ---- सात, (3 कहानी संग्रह,1 काव्य संग्रह, 1उपन्यास, 1बाल-कथा संग्रह, 1व्यंग्य संग्रह)
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सुनो पार्थ - काव्य कृति
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अपना अपना आकाश, कामाख्या और अन्य कहानियाँ, टापरा व अन्य कहानियाँ
तीनों कहानी संग्रह
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पीर परबत-सी.(उपन्यास), फुलवारी(बाल कहानियाँ), तूणीर के तीर (व्यंग्य संग्रह)
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प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का सतत प्रकाशन यथा -
 हंस, साप्ताहिक हिंन्दुस्तान, मधुमती, राजस्थान पत्रिका, भास्कर, अहा। जिंदगी, समावर्तन, नवनीत, नया आलोचक, नया ज्ञानोदय, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, सरिता, व्यंग्य यात्रा, कलकत्ता लोक, साहित्य समर्था, साहित्य निबंध, तथा अन्य।
 सम्मान एवं पुरस्कार
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साप्ताहिक हिंदुस्तान काव्य पुरस्कार - 1984 दिल्ली
साहित्य गुंजन सम्मान -इंदौर
 साहित्य समर्था श्रेष्ठ कथा के अन्तर्गत सम्मान -जयपुर
 शब्द निष्ठा लघुकथा अजमेर
धनपती देवी, समवेत कथा सम्मान - सुल्तान पुर U.P
 राजस्थान पत्रिका सृजन सम्मान.
साहित्य कला एवं संस्कृति रत्नाकर सम्मान हल्दीघाटी
सलिला साहित्य रत्न सम्मान सलूम्बर
विधुजा सृजन सम्मान बाँसवाड़ा
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 संपादन - शेष यात्राएँ (काव्य कृति)

 प्रसारण - दूरदर्शन जयपुर, आकाशवाणी -उदयपुर एवं बाँसवाड़ा. से समय समय पर
संप्रति - पूर्व बैंक अधिकारी SBBJ .BANK, वर्तमान में स्वतंत्र लेखन
संपर्क - 1-A-39 हाउसिंग बोर्ड़ कालोनी
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