कहानी: आम्र मञ्जरी

- भावना सक्सैना

“तुम्हारी कहानी पढ़ी, अच्छा लिखती हो”। 
“जो अच्छा होता है वह तो लिखा ही नहीं जाता। जज़्ब हो जाता है”। 
“क्यों”? 
“पता नहीं!” 
“डर?” 
“डर तो नहीं, पर हाँ जो अच्छे से चल रहा उसे जोड़े रखने का प्रयास कहा जा सकता है”। 
“क्या खुश हो ऐसा करके?” 
“यदि संतुष्टि को खुशी कह सकें तो हाँ… लेकिन सच कहूँ तो मुक्ति लेखन में ही है। न लिख पाने की छटपटाहट पीड़ादायक होती है”। 
“तो लिखो न! लिखती क्यों नहीं?” 
‘शब्द जब कागज़ पर उतर आते हैं तो अपने ही खिलाफ खड़े हो जाते हैं। हम जो सोचते हैं, हमारा तब तक ही रहता है, जब तक वह लकीरों का आकार न ले ले। कुछ लकीरों में बंधकर वह कहानी बन तो जाती है, पर कही-अनकही को लकीरों में बांध भी दूँ तो उससे किसका भला होने वाला है, यह नहीं समझ पाती हूँ”।  
“महान हो जाओगी। मैं देख रहा हूँ तुम्हें चमकते हुऐ और इतना ऊँचा खड़े हुए कि तुम वहाँ से मुझे भी पहचान नहीं पा रही हो”। 
“क्या यह शुभकामना है? आप समझते हैं मैं कहूँगी, ‘नहीं-नहीं मैं आपको कभी नहीं भूल सकती” 
“इतनी उम्मीद नहीं है तुमसे”। 
“अच्छा है, उम्मीद रखनी भी नही चाहिए किसी से.....”  
“लेकिन आज मुझे पता चल गया कि मैं कहाँ खड़ा हूँ”। 
“आपका तो पता नहीं मैं इस समय बैंक की लाइन में खड़ी हूँ”। 
“पैसे वाले बैंक में ही खड़े होंगे”। 
“बैंक में लेने और देने वाले दोनों ही खड़े होते हैं” 
“काश कि एक बैंक मुहब्बतों का होता” 
“मोहब्बतों के बैंक नहीं सूदखोर होते हैं, इस दुनिया में जो मोहब्बत ले लेता है उसे बड़ा भारी ब्याज चुकाना पड़ता है” 
“मोहब्बतों के ब्याज की धार कांच वाले माँझे से भी पैनी होती है, तन-मन लहूलुहान हो जाता है”। 
उधर से चिर परिचित ठहाका आया और… “बातों में तुम्हारा जवाब नहीं..”। 
“वह पल हँसी में गुज़र गया”।  
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“अरे तुम! कैसी हो?” 
“बेफिक्र!” 
“आप...” 
“कुछ यूँ ही...” 
“मैं सोच रहा था कल फ़ोन करूंगा। नए साल में”। 
“जानती हूँ! कल तो होगी ही बात लेकिन मैंने सोचा कुछ बेमतलब की बातें कर लें जाते हुए साल में”। 
“तुम्हारी कोई बात बेमतलब नही होती, यूँ भी दिल्ली वाले मतलब की ही बाते करते हैं”। 
“और आपके अनुसार मैं उन सब मे एक हूँ”। 
“नहीं तुम में और उन सबमें एक राई भर का फर्क है”। 
“शुक्रिया आपने बताया मैं कहाँ खड़ी हूँ”। 
“इतनी उतावली क्यो हो?” 
“मैंने कहा, तुम में और उन सबमें एक राई भर का फर्क है और मेरे लिए ये राई पर्वत सी बड़ी है”। 
“पर्वतों के पार पहुँचना कितना कठिन है यह जानते हैं आप?” 
“हर पर्वत का पार पाया जाए या उस पर परचम ही लहराया जाए यह ज़रूरी तो नहीं। इस ज़िंदगी में कुछ चीजों को हासिल किए बिना भी तो जिया जा सकता है। इस संबंध का माधुर्य ऐसा ही है, जैसे कोयल की कूक हो, आम की बौर की सुगंध या पुरवाई की सिहरन। ये सब अल्पकालिक होते हैं लेकिन स्मृतियों में बसे रह जाते हैं, जीवन को मधुर कर जाते हैं”। 
“मधुर मुस्कान अधरों पर फैल गई… उसे लगा आम की बौर की सौंधी महक उसे घेरे हुए है। आगे-पीछे कुछ है, उस पल में याद न रहा। उस पल जीवन समाप्त भी हो जाता तो उसे कोई गम न होता। 
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 “तुम पहले क्यों नहीं मिली?” 
“क्योंकि अभी मिलना था”। 
“समय नियत है हर शै का... तभी आती है जब आना होता है”। 
“ये तो ठीक है, लेकिन आजकल अक्सर सोचा करता हूँ कि पहले मिली होती तो?” 
“पहले कब? जब मैंने स्कूल में कदम रखा था और आपने नौकरी शुरू की!” 
“उम्र के फ़ासले पर हँस रही हो?” 
“नहीं यह कह रही हूँ कि आपको मास्टर बनना चाहिए था”। 
“जब आप पढ़ाने आते, मैं पहली या दूसरी कक्षा में होती”। 
“हाँ इतना फासला तो है ही”। 
“या फिर जब कॉलेज में होती तो प्रोफेसर बन आते... वह ज़्यादा रूमानी होता न। मैंने बहुत बार सोचा अपने किसी प्रोफेसर के प्यार में पड़ जाऊँ लेकिन कोई मिला ही नहीं इस लायक। लड़कियों का कॉलेज था और सभी महिला प्रोफेसर थीं...” 
“कॉलेज में भी ऐसी ही थी तुम” 
“ऐसी ही पैदा हुई थी... ढेरों मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट्स के साथ”। 
“तभी कोई रख न पाया तुम्हे” 
“अभी जिसने रखा है बड़े कदर से रखा है मैं खुश हूँ”। 
“मैं खुश हूं कि तुम खुश हो। ईश्वर की कृपा बनी रहे तुम दोनों पर”। 
“ज़्यादा संजीदा हो गए”। 
“नहीं यही सच्चाई है, हर पल तुम्हारी खुशी की दुआ किया करता हूँ”। 
“दुआओं के समंदर में मन हिलोर गया”। 
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“अजीब हो तुम, सैकड़ों मील का सफर कर तुमसे मिलने आया और मिली तो बस मुस्कुराहट। शब्द कहाँ खो गए थे तुम्हारे”।  
“शब्द, शब्दों का ही तो प्रतिफल हुआ करते हैं। मौन का प्रतिफल होता है मौन और मुस्कान का मुस्कान। जो मिला वही लौटा दिया”। 
“फ़ोन पर तो खूब बोलती हो…” 
“बोलती नहीं उत्तर दिया करती हूँ, और फोन पर न बोलूँ तो हज़ारों मील दूर क्या मौन का विश्लेषण कर पाएंगे”? 
“उपस्थिति में मौन बाँचा जा सकता है, फोन पर तो शब्द आवश्यक बन पड़ते हैं”। 
“इसीलिए फ़ोन पर बोलती हूँ, निकटता मुझे अक्सर असहज कर देती है। अक्सर ऐसा हुआ है कि जब भी कोई बहुत करीब आने लगता है मैं भाग जाती हूँ”। 
“डरती हो कोई मन न पढ़ ले!” 
“हम्म, शायद” 
“और जो पहले ही पढ़ चुके हों” 
“ऐसी उनकी समझ है, खुशफहमियाँ पालने में कोई बुराई भी नहीं”।  
“तुम सच मे पहेली सी हो” 
“अबूझ?”  
“हार नहीं मानी अभी मैंने”। 
“बूझकर भी क्या सिला? दो शिखरों पर पुल बना लेने से वे मिला नहीं करते। एक से दूसरे पर जाना सुगम हो जाता है बस। उस पुल पर से हर बार गुज़रने के अपने खौफ और अपने जोखिम होते हैं। मैंने यह जोखिम न उठाने का फैसला किया है, कि कई बार जो दूर है उसे पाने की चाह में जो पास है वह भी छूट जाता है”। 
“कितनी संजीदा हो जाती हो” 
“न जाने हो जाती हूँ या हूँ ही”। 
“इस संजीदगी की कोई खास वजह?” 
 “एक रोज़ जहाँ थी, वहाँ नहीं होना था, दूर एक दूसरी दुनिया आकृष्ट किया करती थी, फिर वहाँ पहुँची तो पाया वहाँ वह तो है ही नहीं जिसकी तलाश यहाँ खींच लाई थी। एक लंबे अरसे तक यह भी पता न चला कि चाहिए क्या था... यह तो शायद आज भी नहीं मालूम कि ठीक-ठीक क्या चाहिए। कभी किसी से मिलकर यूँ लगता है कि ये दुनिया पूरी हो गयी तो उसे विस्तारित नहीं करना और कभी भटकता है मन ख्वाहिशों के बियाबान में”।  
“एक दुनिया मे बन्द होकर कैसे जान पाओगी कि वह मन की है?” 
“मन तो मन को जानता है न!” 
“क्या सच में?” 
“बड़ा कठिन है इसका उत्तर, मन जान जाए खुद को, ये आदर्श तो है, लेकिन ज़रूरी नहीं। एक दोस्त थी मेरी, हमेशा कहा करती "जो दुनिया मिले, वो मन की न हो तो मन की दुनिया कहीं और बसा लेना”। उसने वही किया भी, लेकिन वहाँ जो सुकून मिला वो भी पूरा न था। सुकून दरअसल मन का ही खेल है। हमारे भ्रम हमें उलझाए रखते हैं, जो पास है उसका मोल नहीं जानते। ठीक वैसे ही दूर दिखाई देते सुनहरे बादल तक पहुंचने को चिड़िया अपनी जान लगा देती है। वह किसी भी हाल में उस तक पहुंच कर उस पर बस जाना चाहती है लेकिन जब पहुँचती है तो पाती है कि वहाँ बसने जैसा कुछ है ही नहीं”। 
“कहीं लक्षणा में मुझे चिड़िया तो नहीं बनाया जा रहा?” 
दिल खोलकर हँस दी थी वह, “आप खूब जानते हैं भारी होते माहौल को हल्का कर देना” 
“वजनी चीजें अकसर डूब जाया करती हैं”।  
“तभी मन डूबा करता है अकसर। हजार कही-अनकही, पूरी-अधूरी ख्वाहिशों का बोझ है उसमें। 
अहा! आज तो अंतिम वाक्य आप ही कह छोड़ेंगी। 
हल्की खनकदार हँसी के साथ डूबता सा दिल तिर गया था... 
 ***** 

“ कैसी हो” 
“पता नहीं” 
“यह क्या बात हुई?” 
“समझ न आए ऐसी भी बात नहीं कही”। 
“खुद का पता नहीं ये भी तो कोई बात नहीं” 
“ये तो अक्सर होता है...हम कैसे हैं हम कहाँ जान पाते हैं। कभी कोई कह जाता है कि तुम बहुत अच्छे हो तो कभी कोई एहसास करा जाता है कि अच्छाई सापेक्षता में होती है। कोई न तो हमेशा अच्छा रह सकता है और न हमेशा बुरा”।  
“तुम ठीक तो हो!” 
“शायद नहीं”  
“क्या हुआ?” 
“फिलहाल तो यह सोच कर आँख भरी हुई है कि जिस आवाज़ को शिद्दत से सुनना चाह रही थी उस तक मेरी वाइब्रेशन्स कैसे पहुँची। इस समय आपने फोन कैसे किया, समय तो नहीं है यह आपके फोन करने का?” 
“क्या कभी तुम्हारे साथ ऐसा हुआ है कि बस यूँ ही लगे कि तुम्हें किसी ने पुकारा है। सुबह का अखबार पढ़ते-पढ़ते आँख लग गई थी कि अचानक लगा तुमने पुकारा है।तो बस फ़ोन मिला लिया”। 
“मुझे इस पल शायद आपसे ही बात करनी थी” 
“सच हतप्रभ हूँ कि वास्तव में तुम्हें बात करनी थी, उससे ज्यादा हतप्रभ इसलिए हूँ कि तुम यह मान रही हो कि तुम्हें मुझसे बात करनी थी। शायद पहली बार हुआ ये। इसमें शायद न जोड़ती तो भी चलता”। 
“एक झरोखा ज़रा रहना चाहिये न हवा जाने के लिए”। 
“बताना चाहोगी क्यों परेशान हो”। 
“समझ नहीं पा रही क्या कहूँ। इंसानी फितरत से आज़िज हूँ शायद फिर भी समझने का प्रयास कर रही हूँ कि होने और बने रहने की लालसा अक्सर न होने के सुकून पर हावी हो जाती है...इंसान समझ ही नहीं पाता कि इस अंधी दौड़ में वह पहुँचेगा कहाँ”। 
“लगता है आज किसी को चोट लगी है”। 
“चोट नहीं सबक! जीवन का सबक मिला है” 
“अच्छा, तो कुछ नया सीख गई तुम” 
“ह्म्म्म” 
“सारा कुछ तुम सीख लोगों तो दुनिया के बाकी लोग क्या करेंगे। पहले से इतनी सर्वगुण सम्पन्न हो, अब सीखना बन्द करो”। 
कोई और रोज़ होता तो वह खिलखिला उठती इस बात पर, सर्वगुण संपन्न होने का खिताब पाकर फूली न समाती। लेकिन आज उसकी मुस्कान होठों से उतर आवाज़ तक भी न पहुँची। गले में कुछ अटक गया था, वह कुछ कह न पाई। क्या सच में उसमें कोई गुण है... क्यों वह दूसरों सी नहीं है। अपनी वेदना को भीतर के कोटर में थोड़ा और धकेलकर वह क्यों मुस्कुरा देती है। 
“सुनो तुम्हें थोड़ा और रोना है तो रो लो” 
“क्या!” वह चौंक कर बोली थी। 
“मैं होल्ड पर हूँ, तुम जी भर कर रो लो, और जब आस्तीन से आँख और नाक पोंछ लो तो बताना कि बेहतर लग रहा क्या, मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ” 
अबकी बार वह हँसी रोक न सकी थी। 
“अरे बधाई हो तुम ज़िंदा हो” 
“यह एहसास दिलाने के लिए शुक्रिया कहूँ” 
“नहीं, मेरी खुशी के लिए मुझे ही शुक्रिया कहोगी तो अच्छा नही लगेगा”। 
“क्या बात है”, वह मुस्कुराते हुए बोली थी। 
“यकीन मानो आज एक बार लगा की तुम खो गई हो”।  
“कैसे?”
“अपनी फितरत से अलग बर्ताव करना भी खो जाना ही तो है”। 
“कभी फितरत से अलग होना सीखना भी तो होता है।जब हम कुछ नया सीखते हैं तो पुराना छोड़ना तो पड़ता है”। 
“हम्म्म!  ये जरूरी नहीं कि जो सीखा हो वह हमेशा अच्छा ही हो। अपने गम का सबब साझा करना चाहोगी”। 
“साझा करने को बस एक वही तो नहीं... हम हँसी के साझेदार रहें, वही काफी है। गम की साझेदारी फिसलन भरी होती है, जिसपर संभलना मुश्किल हो जाता है। कभी कभी सोचती हूँ कि कौन सी नियति हमें यूँ जोड़ गई है”। 
“तुम न, सोचती बहुत ज्यादा हो, मन को आराम दिया करो कभी”। 
“वही तो एक शय है जिस पर ज़ोर नहीं। और ज़ोर नहीं तभी आपसे घंटों बतियाती हूँ”। 
“फिर तो जैसी हो वैसी ही रहना”। 
“वह भी कहाँ मेरे हाथ है? एक वक्त था, मैं कहा करती थी मैं ऐसी ही हूँ, आपको पसंद तो ठीक, न तो, न सही। लेकिन वो बहुत बरस पहले था अब मैं बदल गई हूं। जीने की प्रक्रिया में कितना कुछ सीखते चले जाते हैं न हम। मैंने सीखा कि इंसान जड़ नहीं, जो बदल न सके। चेतन है वह, सुग्राही है, समय के साथ बदलना और आगे बढ़ना इसके लिए ज़रूरी है”। 
“बहुत बढ़िया। सीखते और आगे बढ़ते रहना ही तो ज़िन्दगी है”। 
“ज़िन्दगी!!! वह हँस पड़ी। जिंदगी वही न, जो गणित और साहित्य के बीच से गुज़र इतिहास बन जाती है, और हम मनोविज्ञान में फँसे उसका भूगोल नापते रह जाते हैं”। 
व्योम से टकराता जबरदस्त सन्नाटा रूह में उतर गया था उसकी......... इस लड़की से वह जितना बात करता था उतना जुड़ता जाता था और जितना दूर रहना चाहता था उतना खिंचता चला जाता था। देश, काल, परिस्थिति कुछ भी तो एक नहीं थी। दोनों अपने-अपने दायरों में थे, दोनों  अपने समुच्चय थे। फिर भी एक वेन आरेख की भाँति बहुत कुछ था जो ओवरलैप करता था। सिर्फ फोन पर हुई बातों का ही रिश्ता था उन दोनों के बीच... क्या सच में! नहीं! कहीं कुछ और था। दो मन थे जो अपने में संतुष्ट थे, पूर्ण थे किंतु जब बात करते थे तो ऐसे चमक उठते थे जैसे प्रातःकालीन रश्मियों के पड़ने से जल का दर्पण चमक उठता है। ऐसी ही बातों में एक दिन उसने कहा था – “क्या हर संबंध की परिणति आवश्यक है? हर राह की मंजिल हो क्या यह आवश्यक है?
हर राह कहीं पहुंचती तो है, मगर राह के संग तुम भी पहुंचो यह ज़रूरी तो नहीं। कुछ देर राह पर चलकर राहों से दोस्ती कर उनसे बतिया लेने में क्या हर्ज है? आखिर जीवन भी तो राह ही है...परिणति तो मृत्यु है”।  
वह उसकी बात से सहमत था, सच ही तो है, कि जीवन आम्रमंजरी से आम बनने और चुक जाने का सफर है, हर पल एक नई सुगंध के साथ, खटास से मधु होने और अति मधुर होते हुए विगलित हो जाने तक। बसंत कितनी देर ठहर कर आम्र मंजरी की सुगंध से सराबोर करे इस पर किसका जोर है!
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शीशे के बाहर पानी की फुहारें दिखाई दीं तो अचानक उसे ख्याल आया कि बात करते-करते वह दसवीं मंजिल से पहली मंजिल पर आ गई है, दोपहर में कार्यालय परिसर के बीच लगे फव्वारे के चलने पर चारों ओर से घिरे छोटे से लॉन में लगे फव्वारे की फुहारें आसपास शीतलता तो बिखेरती ही थीं पहली मंजिल के शीशों तक आकर टकराती थीं। काँच के इस पार से वह अकसर उन्हें देखा करती थी। फुहारें शीशे पर इकट्ठी हो, धाराओं में बह रही थीं... समानान्तर बहती धारों को देख वह सोच रही थी कि  बह कर जब ये धाराएँ खिड़की के एलुमिनियम फ्रेम पर पहुँचेंगी तो एकाकार हो जाएँगी। लेकिन जब तक वह फुहार के रूप में फैल रही हैं, हर कण एक अलग अस्तित्व ग्रहण कर उठता है। बूँद जब तक बूँद रहती है तभी तक उसके मोती बनने की संभावना होती है। ज्यों ही अपना अस्तित्व छोड़ती है अनंत में विलीन हो जाती है। बूँद का अस्तित्व कितनी देर ठहरेगा यह बूँद के भी वश में कहा हैं! हर बूँद अपनी गति, अपनी नियति को पाती है। हर बूँद मोती नहीं बनती ठीक वैसे ही जैसे हर आम्रमंजरी की नियति सुगन्धित आम बनना नहीं होती, किन्तु जितनी देर रहती है सुगन्ध फैलाये रहती है।

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