राम तथा अन्य कविताएँ: चंद्रशेखर दुबे

चंद्रशेखर दुबे
राम
 
राम की कथा जो तुमने लिखी 
और हमने सुनी वह अधूरी थी 
वे तो कण कण में रचे बसे हैं
जन जन के मानस में 
मूर्त, अमूर्त, सजीव, निर्जीव में 
हर प्राणी की आती जाती सांसों में, 
आस्था के विराट स्वरूप में
अगम, अगोचर,
न होने में होने के भाव की तरह।

मानव के संघर्ष में 
मनुष्य से देवत्व की राह पर
हर उस प्राणी के प्रणेता की तरह 
जिसकी अच्छाई ही उसकी शक्ति है 
और अटल विश्वास संबल। 
उस निष्ठा की जो समस्त विश्व को 
एक समावेशी समाज में
बदल देने का संकल्प है। 
जहाँ भेद नहीं ऊँच-नीच का।

राम मर्यादा का नाम हैं, निश्चय का नाम है!
राम युगश्रष्टा हैं, युगद्रष्टा हैं 
जिनके करों में काल, ब्रह्मांड 
अटखेलियाँ खेलते हैं 
सृजन और परिवर्तन की।
समुद्र की छाती पर खेलती लहरों की मानिंद!
हर युग का एक राम है 
उसके आदर्शों, अस्मिता और सत्य
के पीछे खड़े एक विशाल चट्टान की तरह। 
जो तोड़ती हैं असत्य, अन्याय 
और हटधर्मिता को।
राम एक सतत धारा है 
जो जोड़ती है युग को युगों से 
सभ्यता को सभ्यताओं से 
मनुष्य को मानस से।
राम कहानी भी है, कविता भी 
और मानव की परकाष्ठता 
की अमिट गाथा भी!
क्या समेट पाएगी इस विराटता को
लेखनी किसी युग की?
अलख, अविरल, अमर ज्योतिपुंज हैं राम
कालातीत जिजीविषा का नाम है राम।
***

एक अहल्या तुम भी तो हो
(यह कविता उन सभी नारियों को समर्पित जो आज भी अपनी अस्मिता के लिए मुक्ति का भाव लिए संघर्षशील है!)

शापित हो, तुम कलुषित हो
नाम कई तेरे, उपनाम कई
देवी हो या नारी तुम?
शोषित हो तुम, शापित तुम
एक अहल्या तो तुम भी हो।
युगों युगों की कठोर साधना में
संचित मुक्ति का भाव लिए
एक अहल्या तुम भी तो हो।
कभी किसी दुशासन ने हरा चीर तुम्हारा
कभी किसी रावण ने छल से हरण किया तुम्हारा।
एक अहल्या तुम भी तो हो।
पायल की खनक, पैरों की थिरकन
साँसों की सरगम, आहत मन के क्रंदन से
झंकृत लोलुप मौन सभा गूंजा तेरी पीड़ा की आहट से
एक अहल्या तुम भी तो हो।
उच्चावासों की अकथ बैचेनी, मौन क्रांति को
सुरों के सरगम में पिरो कर
उद्वेलित किया जन मन को।
तो कभी त्याग की वेदी पर
स्वयं की आहुति दी तुमने ।
एक अहल्या तुम भी तो हो!                               
खामोशी में क्रंदन का स्वर,                     
हँसी में छिपा तेरा आहत मन।
पाषाण देह और मन धारण कर
जग का वरण किया हँसते-हँसते तुमने
एक अहल्या तुम भी तो हो।
युगों युगों की संचित तपन,घनीभूत पीड़ा की जलन
ओस बने तेरे अश्रुकण, क्या कभी मिटा पाएंगे?
एक अहल्या तुम भी तो हो।
भूल जाओ कोई राम आयेंगे तुम्हें 
शापित जीवन से मुक्ति दिलाने।
जागो तुम अपनी पाषाण निद्रा से झंकृत कर
अपने मन की वीणा को क्रांति के स्वर से।
तुम्ही साधना, तुम्हीं शक्ति और जीवन की अविरल गंगा!
जागो तज कर झूठी आशा और दिलासा
कि कोई आयेंगे तुम को मुक्ति की राह दिखाने।
एक अहल्या तुम भी तो हो।
***

बुत

चाहतों की कसक थी
दिल में यादों का गुब्बार था
नजरों में धुंधली आकृति का शुमार था।
देखा जो मैने वह पत्थर का बुत था
कुछ अलासाई निगाहें थी उसकी
कुछ तिरछी मुस्कान।
बेजान जुबान और दिल में तूफान।
छुआ तो थिरकन हुई उंगलियों में
जैसे पत्थर में आई हो जान
अनजानी कसक थी जिसका
नहीं था मुझे कुछ इस से पहले भान।
सुना था पत्थरों में भी जान होती है
प्यार से छू ले कोई उसकी भी अरमान होती है।
फिर किसी चाहत ने मुझे जगाया था।
शायद सोते हुए उसने मुझे फिर जगाया था।
पत्थर की मूरत में संगीत पिरोया था।
कितना मधुर था वह संगीत जिसे
मैंने बहुत दिनों के बाद गुनगुनाया था।
एक मूक संवाद ही तो था वह
जो मेरे दिल के झरने से फूट पड़ा था
बहुत  दिनों के बाद।
आदमी पत्थर बन जाए
यह बात तो थी आम
पर पत्थर में आई हो जान
यह बात सुनी थी बहुत दिनों के बाद।
***

रिश्ते

जज्बात वही, ख्वाब वही
इंसान बदल क्यों जाते है?
अरमानों की डोली सजा कर
छुप-छुप कर रोने वाले किस फितरत
के मारे होते है?
आवाज वही, अंदाज वही फिर
मुस्कान बदल क्यों जाते हैं?
रिश्ते अपने हो कर भी बेगानों की
महफिल में क्यों सज जाते हैं?
न दर्द ठहरता है, न खुशी ठहरती है
फिर भी रिश्तों का क्यों बाजार सजा?
बेचने को बहुत कुछ था फिर तुमने
रिश्तों को ही क्यों बेच दिया?
अपने को अपनों से चुराकर भला हम
कब तक जी सकते हैं?
पेडों के बिना जंगल की भला पहचान कहाँ?
अपनों से कट कर जीना जीवन का यह
कैसा अभिशाप?
रिश्तों को मार कर जीना, ऐसा विधान कहाँ?

रिश्तों में ढलना सीखो, रिश्तों को जीना सीखो
तभी जगत का मर्म और रस जीवन का पाओगे।
***

सवाल?

हर बार एक सवाल पूछती है वह
और छोड़ जाती है अनगिनत सवाल मेरे लिए
उलझनें परत दर परत मायूस कर जाती है मुझे।
मैं पूछता हूँ अपने आप से
हर सवाल का ज़बाब और डूब जाता हूँ
ख्यालों के समंदर में किसी शाम की उदास
चादर में लिपटी ख्यालों की बदहवासी में।
मुझे तोड़ती हैं उसके सवालों की लकीरें
चुभन जगा देती हैं अनगिनत टीस
जिन्हें मैंने सहेज रखा है अपने बंद आस्तीन में
अबूझ और पुराने किसी पहाड़ की तरह
उस जंगली नदी की तरह जिसने मानो
जंगल की खुशबू, दरिया के संगीत और 
जानवरों की चीख को 
दबा लिया है आपने अंदर
और बह रही है अपनी ही धुन में
निर्भीक, निरुत्तर, निरंतर जैसे वह अनिभिज्ञ हों
जंगल के कटने से, पहाड़ों के गिरने से
अनुत्तरित अनेक सवालों से
मेरी तरह।
***

अहसास
      
वो दिन भी क्या थे?
दर्द था पर अहसास नहीं
शब्द मूक और सवाल गहरे थे
पतझर के मौसम में भी बहारों का
आलम था।     
शब्द खामोशी के घेरों में खो जाते थे
झनकते सितारों की महफिल में
चांदनी में नहायी किसी रात की तरह।
रास्ते की तलाश में होते थे
अपने अपने आकाश की तलाश में
तैरते किसी बैचेन परिंदे की तरह।
रास्ते थे पर मंजिल नहीं फिर भी
कहीं नहीं पहुँच कर भी पहुँचने का सुख था!
वो दिन भी क्या थे?
जब तुम नहीं बस तेरी यादें थी
किसी जंगल की अल्हड़ हवा की तरह
जो चुभती भी थी और सुकूने जिगर भी देती 
अब यह आलम है कि ना वो दिन हैं
ना वो यादें बस मेरे साथ है
अहसास का वो सफर जो 
अधूरा हो कर भी पूरा है।
***
      
मौन
(यह कविता फ्रांट्ज फैनन की पुस्तक "ब्लैक स्किन एंड व्हाइट मास्क" और  "रेचेड ऑफ द अर्थ" से प्रेरित है।)

मैं खड़ा हिमालय सा मौन
डूबा हूँ अपने ही आँसू में।
अपने होने का अहसास
अजनबी की तरह ढूंढ रहा हूँ
अपनी भाषा, संस्कृति और देश में
क्या-क्या न सहा, क्या-क्या न किया?
फिर भी मैं अकेला हूँ।
टूटा हूँ मैं कई बार पर बिखरा नहीं
झुका नहीं पर खड़ा हूँ लेकर भार
अपने कंधों पर।
पीड़ा की ज्वाला में
स्वयं जल कर दी जग को शीतलता।
संतप्त हूँ किंतु किंचित नही भयभीत मैं।
शोषण की पीड़ा में अविचलित
लिए युगों का भार खड़ा हूँ!
न्याय चाहता जिसका मैं अधिकारी हूँ।
अपनी कहानी अपनी जुबानी कह कर
बस सोते को जगाना चाहता हूँ!
धर्म, धैर्य है तो सुनो मेरी कहानी
भेद, भाव, उत्पीड़न के विष को पीया मैं ने ।
जाति, वर्ग के दंश को हँस हँस कर जीया मैं ने।
मेरा मौन मेरा अतीत था ।
अब मुखर मैं, मैं वाचाल हूँ।
पढ़ना, लिखना सब जनता हूँ।
तुमको तुम्हारी ही भाषा में     
समझाना जानता हूँ।  
पहचान दिया जो जग ने मिटा उसे  
इतिहास नया गढ़ना चाहता हूँ।    
अब मैं अपनी भाषा में अपनी   
कहानी लिखना जानता हूँ   
मैं कौन हूँ?  
अब मैं यह जानता हूँ।
***

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