स्त्री शोषण का सार्वभौम समाजशास्त्र

उर्मिला शर्मा

सहायक प्राध्यापक, अन्नदा महाविद्यालय, हजारीबाग, झारखंड- 825301

आज 21वीं सदी में पदार्पण के बावजूद विश्व के अनेक कोनों से स्त्रियों को लेकर पाली जा रहीं कुप्रथाओं से संबंधित अजीबोगरीब व हृदय विदारक खबरें सुनने को मिलती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्री हिंसा एवं उत्पीड़न का विश्व में सार्वभौम सिद्धांत है। आश्चर्य होता है कि इन सारी कुप्रथाओं को जारी रखने के लिए जो तर्क दिए जाते हैं वह स्त्रियों के सुरक्षा या हित में होना बताया जाता है। जबकि हकीकत इससे परे है। ये सारी साजिशें पुरूषों ने अपने आनंद और भोग के पक्ष में निर्मित किया है जिसे स्त्रियाँ अपनी अज्ञानता व अशिक्षा के कारण इन कुप्रथाओं का पालन कर रहीं हैं। स्त्री-शोषण के समाजशास्त्र का संबंध पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष वर्चस्व के साथ जुड़ा हुआ है। पितृसत्ता के मुख्य तत्व हैं- हिंसा, आतंक व पाशविकता।

 संपूर्ण संसार में समाज और स्त्रियों के मध्य शोषण व उत्पीड़न की एक लौह श्रृंखला सी है। भले ही शोषण के कारण तथा स्वरूप में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है परन्तु यह सत्य है कि सभी जगह स्त्रियाँ बदहाली में हैं। सन् 1995 में बीजिंग में आयोजित चौथे विश्व सम्मेलन में भिन्न-भिन्न देशों से हजारों महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया था जिनमें बेनजीर भुट्टों, अमेरिका से हिलेरी क्लिंटन, नार्वे की प्रधानमंत्री ग्रोहरलीन, बांग्लादेश से खालिदा जिया, युगांडा की उपराष्ट्रपति और सम्मेलन की महासचिव अर्जेंटीना की मांगेला भी उपस्थित थीं।

 न केवल एशियाई देश बल्कि यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों की भी महिलाएँ पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर प्रताड़ित एवं हिंसा की शिकार हैं। वहाँ प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियाँ पारिवारिक हिंसा का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त होतीं हैं।

 मुस्लिम देशों के ऑकडे तो और भी चिंताजनक हैं। उन्हें वहाँ न तो संवैधानिक रूप से और न ही सामाजिक रूप से स्वतंत्रता एवं समानता का अधिकार प्राप्त है। बीजिंग के इस विश्व सम्मेलन में बेनज़ीर भुट्टों ने कहा था कि स्त्रियों पर बलात्कार हिंसा का क्रूरतम रूप है, जिसे हथियार की तरह प्रयोग में लाया जाता है। बोसनिया के दर्दनाक हादसे में जहाँ स्त्रियाँ अमानुषिक हिंसा का शिकार हुई थीं, सारी मानवता को एक बार तो झकझोर ही दिया था। सीरिया में स्त्रियों को ऐसी ही दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ा।

 "पाँच अफ्रीकी देशों -वोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, स्वाजीलैंड, जिंबावे में हुए सन् 1993 के एक सर्वेक्षण के अनुसार 42 प्रतिशत स्त्रियाँ नियमित रूप से घरों में पतियों द्वारा पीटी जाती हैं। दक्षिण अफ्रीका में हर डेढ़ मिनट में एक स्त्री पर बलात्कार होता है। 60 प्रतिशत औरतों पर घरों में यौन-दुराचार होता है। डब्ल्यू ० आई०एल०डी०ए०एफ० के अध्ययन पर आधारित पुस्तक 'प्राइवेट इज पब्लिक' में सन् 1983 से 1993 तक के दस वर्ष के रिकॉर्ड बताते हैं कि अधिकतर लड़कियों की हत्या उनके पिता करते हैं। मौत के 263 केसेज में से 249 औरतें होती हैं जो पारिवारिक हिंसा में मरती हैं।" 1

 विश्व महिला सम्मेलन भिन्न-भिन्न आंदोलनों और मंचों से महिलाओं पर सार्वभौम उत्पीड़न, हिंसा व मानवाधिकारों को लेकर विश्व महिला सम्मेलन में गंभीरता से विचार किया गया। स्त्रियाँ हर वक्त शोषण की शिकार होती हैं। शांति की स्थिति में घरों में तथा युद्ध के समय आक्रांताओं द्वारा दी गई यातना को झेलती हैं। ऐसी विकट स्थिति में भी वर्ष 1995-2005 के दशक को मानवाधिकार दशक घोषित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमाओं पर युद्ध नीति में महिलाओं के बलात्कार के खिलाफ कोई ठोस कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में सांप्रदायिक दंगों में, युद्धों में परिवारों और निजी वैमनस्यता के बदले में स्त्रियों पर बलात्कार को अचूक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता है। सीरिया और न्युनतम पापुआ गुयाना की दुरावस्था विश्व में छुपा हुआ नहीं है। इसी क्रम में हम विश्व भर में महिलाओं को लेकर अब भी पोषित हो रही कुछ कुप्रथाओं का अनुसंधान करते हैं जो प्रगतिशील समाज के नाम पर कलंक हैं।

 यह सर्वविदित है कि चीन, ताइवान तथा जापान में सुंदरता के नाम पर स्त्रियों के पैरों के पंजे कभी विकसित नहीं हो पाते थे। एक सदी पहले ही इसे कई देशों में प्रतिबंधित किया जा चुका है। फुट बाइंडिंग की यह प्रथा चीन में तकरीबन 1,000 वर्षों से भी अधिक अस्तित्व में रही। 'लोटस फीट' के नाम से जानी जाने वाली यह अनोखी परंपरा काफी दर्दनाक होती थी। इससे पंजे इतने अविकसित तथा विकृत हो जाते थे कि महिलाएँ अपने शरीर का वजन तक ढोने में असमर्थ होती थीं। 'इस बेहूदा प्रथा में बचपन से ही लड़कियों के पैर सख्त पट्टी से बांधे जाते थे ताकि पैर कमल के आकार के और आकर्षक हो। इसके लिए लड़की के पैरों को गर्म पानी और जडी-बूटियों के द्वारा मोड़ा जाता था और निकली हड्डियों को पत्थर से कुचला जाता था। अंगूठे को छोड़ सारी उंगलियां पंजे की तरफ मोड़कर पट्टियों को बहुत कसकर बांधा जाता था।"2 लड़कियों का विवाह उनके छोटे पैर देखकर ही किए जाते थे। इस कुप्रथा को स्थापित रखने के पीछे उनका उद्देश्य केवल 'सेक्सुअल अट्रेक्शन' रहा है। 1950 के एक रिपोर्ट से पता चला है कि चालीस वर्ष की उम्र तक 57 प्रतिशत महिलाएँ तेज गति से चल नहीं सकती थीं और पचास वर्ष की उम्र तक 73 प्रतिशत स्त्रियाँ व्हीलचेयर के सहारे काम चलाती थीं।

 विश्व के कुछ विकासशील व अविकसित देशों, विशेषकर अफ्रीका में पहले से ही चली आ रही कुप्रथा 'ब्रेस्ट आयरनिंग' की परंपरा ब्रिटेन में भी पनपने लगी है। इस प्रथा में छोटी बच्चियों के ब्रेस्ट को गर्म पत्थर से दबाया जाता है, जिससे ब्रेस्ट के विकास को रोका जा सके। इसके एवज में यह हवाला दिया जाता है कि उन्हें पुरूषों की गंदी निगाहों, यौन शोषण तथा दुष्कर्म जैसी घटनाओं से बचाने के लिए यह किया जाता है।

 गार्जियन पत्रिका की रिपोर्ट के आधार पर लंदन, एसेक्स, यॉर्कशायर और पश्चिमी मिडलैंड्स के सामुदायिक कार्यकर्ताओं ने ऐसे कई मामलों के विषय में बताया, जिसमें लड़कियों को छोटी उम्र में ही बेहद दर्दनाक, अपमानजनक और निरर्थक प्रथा को झेलने पड़ता है।

 "संयुक्त राष्ट्र ने भी वर्णित किया है ये परंपरा दुनिया के उन पाँच बड़े अपराधों में शामिल है, जो अंडररेटेड क्राइम के तहत आते हैं और लिंग आधारित हिंसा पर आधारित होते हैं। ...मेडिकल विशेषज्ञ और पीड़ित इस परंपरा को 'चाइल्ड एब्यूज' कहते हैं। जो मानसिक और शारीरिक निशान की छाप छोड़ देता है। इससे इन्फेक्शन के अलावा स्तनपान कराने में असमर्थता, स्तनों में विकृति और कैंसर का भी खतरा बड़े जाता है।"3

 हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति कई अन्तर्विरोधों से भरी हुई है। समस्त विश्व में कुछ दशकों से स्त्रीवादी दृष्टिकोण से स्त्री मुक्ति चेतना को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है। इसी संबंध में प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखिका बोउवा ने ठीक ही कहा है- ' साहित्य, इतिहास व परंपराएँ पुरूषों ने बनाएँ हैं, और पुरूषों ने अपने बनाए इस विधान में स्त्रियों को सर्वत्र दोयम दर्जा दिया है।'

 स्त्रियों में मासिक धर्म एक सहज नैसर्गिक शारीरिक प्रक्रिया है जिसका संबंध समाज में सर्जनात्मक शक्ति से है। विश्व में मासिक धर्म से संबंधित कोई सम्मानजनक स्थिति व शब्द नहीं हैं। भारत के कई हिस्सों में माहवारी के दौरान ' अछूत' जैसा व्यवहार किया जाता है। न केवल भारत में बल्कि विश्व के अनेक भागों में किसी न किसी रूप में यह समस्या व्याप्त है जो लैंगिक हीनता को उजागर करती है। नेपाल में एक शब्द प्रचलित है- 'छौपदी'। इस कुप्रथा में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान घर से बाहर 5 से 7 दिनों तक किसी सुनसान झोपड़ी में या कहीं मवेशियों के तबेले में रहना पड़ता है। इतना ही नहीं इस दौरान उन्हें भोजन, पानी व अन्य कई निषेधों का पालन करना पड़ता है। यह प्रथा 2005 से ही नेपाल में कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है। फिर भी इसका पालन हो रहा है। यह कुप्रथा न केवल नेपाल बल्कि भारत के कई हिस्सों में व्याप्त है। इस कुप्रथा के कारण स्त्रियों को कई तरफ के मानसिक व शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है और कभी-कभी तो यह संक्रामक या जानलेवा भी साबित होता है। फरवरी 2019 में दक्षिण भारत की एक किशोरी तूफान आने के कारण उसी झोपड़ी में दब कर मर गई जिसमें उसे मासिक धर्म के दौरान रखा गया था।

 "भारत की 70 प्रतिशत प्रजनन प्रणाली संक्रमण से पीड़ित है। जिसका अहम् कारण भारत में लगभग तीन-चौथाई से अधिक महिलाओं को इसके प्रति जागरूकता से वंचित रहना है। जिस कारण वे उपयोगी सेनेट्री पैड्स के स्थान पर फटे- पुराने पोछेनुमा कपड़े, भूसा, लकड़ी का बुरादे, सड़े-गले कागज, अखबार, गत्ते, राख आदि का प्रयोग करतीं हैं।"4 आज विश्व भर में इस कुप्रथाओं के प्रति जागरूक करने का मुहिम चल पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र विमेन वर्ल्ड बैंक जैसी अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा इस विषय को मुख्यधारा के कार्यक्रमों में सम्मिलित कर लिया गया है। 28 मई को 140 देशों द्वारा 'अंतरराष्ट्रीय मासिक धर्म दिवस' स्वीकार किया गया है।

 समाज में हिंदू और मुस्लिम धर्मों में माहवारी को लेकर गहरा अंधविश्वास है। समाज सेवी डॉ अर्चना सचदेव का कहना है- ' माज में पीरियड को लेकर 21 वीं सदी में भी जागरूकता नहीं बन पाई है। पीरियड के दौरान पौधों को पानी देने से मना करना, खाना बनाने से रोकना, दूसरों का खाना या पानी छूने से मना करना, तीन-चार दिन तक जमीन पर सोने के लिए बोलना, बिस्तर और बर्तन अलग कर देना, हफ्ते भर तक पूजा-पाठ करने और मंदिर जाने से रोकना जैसे अंधविश्वास आज भी व्याप्त है।'

 दुनियाभर में स्त्रियों की यौन-शुचिता को लेकर एक ग्रंथि है। यह इस बात को सिद्ध करता है कि स्त्री सामंती समाज में तथा आज भी एक वस्तु के रूप में देखी जाती है जिसका उपयोग उसका मालिक ही कर सकता है। उसपर अपने स्वामी के लिए 'पवित्र ' बने रहने का दबाव रहता है तथा उसे इसे साबित करने के लिए अलग-अलग तरीकों से अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है। यूरोपीय सामंतों में, जो प्रायः युवा स्त्री के बूढ़े पति या स्वामी होते थे, 'चेस्टिटी बेल्ट' का प्रयोग करते थे। वे स्त्री को मेटल का अंतःवस्त्र पहनाकर उसकी चाबी अपने साथ ले जाते थे। यही बात खाड़ी देशों में भी देखी जाती है। यह बात तो जगजाहिर है कि लेडी डायना को प्रिंस चार्ल्स से विवाह पूर्व 'वर्जिनिटी टेस्ट 'करवाना पड़ा था।

 आज भी दुनिया के अलग-अलग भागों में यौन-शुचिता को लेकर महिलाओं का जो दमन होता है वह दुखद और चौंकाने वाला है। "मिस्र के कुछ गाँवों में सुहागरात को दूल्हा और दुल्हन के कुछ रिश्तेदार विवाहित जोड़े के कमरे के बाहर बैठते हैं ताकि सुबह देखकर प्रमाणित करें कि चादर पर रक्त का निशान है अतः दुल्हन वर्जिन थी, यदि चादर पर रक्त न मिला, जिसका अर्थ यह मान लिया जाता है कि लड़की कुमारी नहीं है, तो लड़की का कत्ल लड़की के रिश्तेदारों द्वारा ही किया जा सकता है, 'ऑनर किलिंग' के नाम देकर।"5

 यौन-शुचिता के साथ ही यौन दासता की समस्या उत्पन्न हुई। परिवार एवं समाज में एक स्त्री के वजूद, अस्तित्व से बढकर उसका कौमार्य है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप पितृसत्ता बात-बात में अपने शत्रुओं व विरोधियों की बहु-बेटियों के साथ यौनाकर्षण अत्याचार को ही युद्ध और झगडे का निर्णायक दाव मानने लगा। उदाहरण स्वरूप न केवल युद्ध में बलात्कार, जबरन विवाह आदि के रूप में दिखता है बल्कि पितृसत्ता का क्रोध व्यक्त करने का समस्त वाक्य विन्यास इसी को लेकर है। पूरे दक्षिण एशिया में प्रचलित 'ऑनर किलिंग' इसी पितृसत्तात्मक निर्लज्ज मानसिकता का परिचायक है।

 भारत में महाराष्ट्र प्रांत के कंजरभाट समुदाय में आज भी दुल्हनों की कौमार्य जाँच करने की शर्मसार करने वाली कुप्रथा है। शादी की रात सुबह परिवार की महिलाएँ बिस्तर पर बिछा सफेद कपड़े पर खून की जाँच करती हैं। दुल्हन को कमरे में जाने से पूर्व सारे आभूषण तथा हर प्रकार की नुकीली चीजें उतार देनी होती है जिससे शरीर के किसी अन्य स्थान में नुकीली चीज चुभोकर खून न लगाई जा सके। चादर पर खून न पाए जाने की स्थिति में पंचायत के कानून अंतर्गत दुल्हन को प्रताड़ित व मारा-पीटा जाता है। हाल ही में इस समुदाय के तीन युवाओं ने 'स्टाप द रिचुअल' नाम से एक कैंपेन इस कुप्रथा के विरोध में चलाया है।

 अब आवश्यकता इस बात की है जब पुरुष अपनी शारीरिक शुचिता को साबित करने हेतु बाध्य नहीं है तो फिर सारी नैतिकता का दायित्व स्त्री के कंधे पर क्यों? स्वयं स्त्री को भी अपनी पारंपरिक सोच लागू कर देह से ऊपर उठकर सोचना होगा। साथ ही यौन संबंधों को व्यापक अर्थों में लेना होगा।

 विश्व का कोई समाज हो, वह स्त्रियों के साथ सदा पक्षपाती रहा है। प्रत्येक क्षेत्र में उससे यही उम्मीद की जाती है कि वह पुरूषों के अधीन रहकर काम करे। ऐसे में स्त्री को यौनेच्छा प्रकट करने या यौन आनंद लेने की बात सोचना पाप के समान है। इसी मानसिकता के परिणामतः पुरुष स्त्रियों के खिलाफ तरफ- तरफ के षडयंत्र करते रहते हैं। स्त्री खतना (फीमेल जेनिटलम्यूटेशन ) ऐसी अमानवीय कुप्रथा है, जिसका उद्देश्य स्त्री यौन स्वतंत्रता पर नियंत्रण रखना प्रतीत होता है।

 इस्लामी देशों में स्त्रियों की योनि भंग करने की कुप्रथा आज भी बदस्तूर जारी है। "औरतों की सुन्नत पर मिस्र देश की नवल अल सादवी की पुस्तक ' द हीडेन पेस ऑफ ईव' वीमन इन द अरब और क्रूर रूप दुनिया के सामने उद्घाटित हुआ। सुन्नत के बाद 30 प्रतिशत लड़कियाॅ जान से हाथ धो बैठती हैं। 43 प्रतिशत संक्रमण से पीड़ित होती है और अधिकतर लड़कियाॅ उस बर्बर अनुभव से गुजरने के बाद मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाती हैं।"6

 स्त्री सुन्नत ( एफ०जी०एम०) के इतिहास के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसकी परंपरा कम से कम 2000 वर्ष पुरानी हो सकती है। यह प्रथा प्राचीन इजिप्ट में आभिजात्य वर्ग की प्रतिष्ठा का सूचक था।

 यूनिसेफ ( UNICEF) ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2016 तक लगभग 200 मिलियन औरतें जो विभिन्न 30 देशों से हैं, इस प्रथा की भेंट चढ़ चुकी हैं। बिना किसी चिकित्सीय आवश्यकता के आंशिक या पूर्ण रूप से स्त्री भगनासा या जननांग के साथ अन्य प्रकार का छेड़छाड़ खतना कहलाता है। (WHO,UNICEF and UNFPA,1997).

 इस प्रक्रिया के अंतर्गत 1- 14 वर्ष की बच्चियों की भगनासा काट दी जाती है। दरअसल यह अंग ही स्त्री की मासिक धर्म और प्रसव पीड़ा को कम करता है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप बच्ची महीनों दर्द से तड़पती है तथा कभी-कभी उसकी मौत तक हो जाती है।

 स्त्री सुन्नत के नाम पर अफ्रीकी देशों में महिलाओं के साथ हो रहे इस पाशविक कृत्य का नग्न सच हमारे साहित्यकारों को भी सकते में डाल रहा है। सुप्रसिद्ध हिन्दी कथाकार जय श्री राय ने स्त्रियों के खिलाफ होने वाले इस अत्याचार की भीषण यातना को उसी अंतरंग आत्मीयता और मारक प्रभावोत्पादक के संग उपन्यास 'दर्दजा' में पुनर्सृजन किया है।इसी विषय पर एक और पुस्तक फहमीना दुर्रानी की 'कुफ्र' भी लिखी गई है।

 भारत में 2018 में मासूमा नामक एक महिला ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नाम एक खुला खत लिखा जिसमें उसने एफ०एम०जी० के बारे में बताया। उन्होंने आगे लिखा कि "बिहार समुदाय में सालों से 'खतना प्रथा ' या 'खफ्ज प्रथा ' का प्रचलन है। इससे महिलाएँ न केवल मानसिक संतुलन खो बैठती हैं बल्कि शरीर को भी नुकसान होता है। जो बच जाती है, इस कुप्रथा से जुड़ी दर्दनाक यादें ताउम्र उनके साथ रहती है।' 2015 में बिहार समुदाय की कुछ स्त्रियों ने एकजुट होकर 'We Speak out FGM' नामक कैंपेन शुरू किया।

 इस अमानवीय प्रथा की समाप्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य हो रहा है। 1994 में काहिरा में संपन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया है कि महिला सुन्नत मानवाधिकार का उल्लंघन है। इससे महिला स्वास्थ्य और जीवन को खतरा है।

 यूएन ने साल 2030 तक इसे खत्म करने का लक्ष्य रखा है। दुनिया में हर साल करीब 20 करोड़ बच्चियों का खतना किया जाता है इसमें से आधे से ज्यादा सिर्फ़ तीन देशों- मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया में होता है।

 विश्व में मुस्लिम समुदाय में एक विकृत कुप्रथा है- 'हलाला'। यह मुख्यतः सुन्नी मुसलमानों के कुछ संप्रदायों द्वारा किया जाता है। इसके अंतर्गत जब कोई तलाकशुदा औरत अपने पति से दुबारा शादी करना चाहती है तो उसे एक अजनबी के साथ शादी करके कम से कम एक रात उसके साथ बितानी पडती है। इसमें हमबिस्तर होना जरूरी है।

 निकाह हलाला की विवादित प्रकिया का फायदा उठाकर अधिकतर मौलवी मुस्लिम महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उनके साथ एक रात गुजारते हैं। इस काम के लिए बकायदा इन्होंने 'रेट' तय कर रखा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में अंडर कवर रिपोर्ट्स ने सिखेड़ा गाँव में मदरसा चलाने वाला जाहिदा से मुलाकात की जिसने 'निकाह हलाला ' के लिए अपनी 'सर्विस रेट' एक से दे लाख के बीच बताई।

 "उत्तर प्रदेश के बरेली में तीन तलाक़ और हलाला का मामला आया। एक शख्स ने अपनी पत्नी को तलाक देकर घर से बेघर कर दिया। इसके बाद दुबारा तलाकशुदा पत्नी को रखने के लिए अपने ही पिता के साथ निकाह हलाला करा दिया। बहु के साथ ससुर का निकाह कराने का यह सिलसिला यहीं नहीं रूका। दुबारा तलाक देने के बाद शौहर अब भाई से हलाला करने पर अड़ा हुआ है।" 7

 यह अधिकांश मुस्लिम महिलाओं का दंश है जिसने औरत की इज्जत, मान-सम्मान और अस्मिता पर ऐसा धब्बा लगाया है कि कई औरतें उस दाग से उबर नहीं पा रहीं हैं।

 निष्कर्ष: इन सारी कुप्रथाओं को मद्देनजर रखते हुए गहराई से विचारना होगा कि इन कुप्रथाओं का पालन स्त्री हित में न होकर स्त्री दमन का ही एक तरीका है जिससे पितृसत्तात्मक समाज अपनी मनमानी कायम रख सके क्योंकि किसी भी क्षेत्र में स्वतंत्र होती नारी का अस्तित्व उन्हें डराता है। समाज कोई भी हो स्त्री के प्रति हमेशा पक्षपाती रहा है।

संदर्भ सूची:
1. हिन्दी अनुशीलन, जून 2004, पृ०- 36
2. www.twnews.in, इस जगह बेटियों के पैर ...अमीर स्माॅल लेग्स, 06 मार्च, 2018
3. www.amarujala.com, पुरूषों से बचाने के लिए ...अफ्रीका के बाद अब ब्रिटेन में भी
4. hindi.pratilipi.com
5. m-hindi.webdunia.com, इज्जत का अर्थ यौन शुचिता ही क्यों?
6. हिन्दी अनुशीलन, जून 2004, पृ०-36
7. aajtak.intoday.in, हलाला: पति के साथ रहने के लिए ससुर ...देवर से शादी का दबाव, नई दिल्ली/बरेली, 9 जुलाई, 2018.

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