कहानी: सपना

प्रीति गोविन्दराज
‘त्रिवेंद्रम जंक्शन’ काले मोटे अक्षरों में रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर झाँकती हुई नंदिनी ने पढ़ा। गंतव्य तो यही तय था, किंतु फिर भी अजीब भाव उठ रहे थे, पेट से तितलियाँ-सी उड़ने लगीं। दिनेश के पीछे-पीछे गाड़ी से उतरकर चुपचाप अपरिचित स्टेशन की चहल-पहल और आवाजाही देखने लगी। आठ-नौ घंटे का रेल सफर उसके शरीर को थका गया था। जहाँ यात्रा शुरू की थी वह ‘पालक्काड जंक्शन’ भी कहाँ उसका जाना-पहचाना था? छोटे से गाँव की लड़की, कुल तीन ही बार तो रेलवे स्टेशन पर आई थी। एक बार ‘अम्मामन’ यानी अपने मामा जी को मद्रास की ट्रेन में छोड़ने और एक बार स्कूल से आयोजित कोची के शैक्षिक भ्रमण के लिए। और तीसरी बार यानी इस बार, दिनेश के साथ विवाह के बाद! नंदू को चारों ओर चलते दृश्यों को निहारना अच्छा लगता था, बस लोहे और कोयले की मिश्रित गंध से परेशानी थी। “बहन जी, कुली चाहिए?” “कहाँ जाना है?” चारों ओर से लाल-वर्दी में कुली वर्ग गिद्धों की भांति मंडराने लगे। दिनेश उन्हें मना करते हुए हमारे दो बक्से उठाकर चलने लगे। वह भी अपने कंधे पर बड़े बैग और हाथ में छोटे हरे-बैग को थामे, उनके पीछे-पीछे हो ली। बाहर पहुँचते ही “टैक्सी या रिक्शा” की आवाज़ें गूंजने लगी। ऐसा लग रहा था एक चक्रव्यूह से निकलो तो दूसरा हाज़िर!

किसी तरह एक घंटे बाद, जब घर पहुँचे तो नंदिनी ने इत्मीनान की सांस ली। नंदू बेहद थक गई थी, यात्रा की थकान, नया वातावरण और ऊपर से दिनेश के साथ भी नया-नया रिश्ता! दिनेश उसे नहा-धोने के लिए कह, बाहर कुछ सामान लेने चले गए। जैसे ही नंदू ने दरवाज़े पर चटखनी लगाई, बिस्तर पर बैठ गयी। अनायास उसकी आँखें भर आयी। ‘अम्मा-अच्चन’ यानी माँ -पिताजी और ‘संध्या’ यानी उसकी छोटी बहन बहुत याद आने लगे। अगर उनसे बात हो जाती तो दिल कुछ हल्का हो जाता, पर घर पर फोन नहीं था। सख्ती से अपने आप को समझाकर आँसू पोंछते हुए, वो उठी। नहाकर बाहर निकली ही थी कि दिनेश रात का खाना, दूध, ब्रेड और कुछ सब्ज़ियाँ लेकर आ गये। वे जब उसे ‘नंदू’ कहते तो आत्मीयता का एहसास होता, बिल्कुल अपने घरवालों की तरह! सचमुच, उनके स्वर में अपनत्व की स्नेह भरी थपकी थी।

दूसरे दिन उठने में नववधू को देर हो गई, आज तो खरीदारी पर जाना था! यात्रा की थकान, ऊपर से नये दायित्वों का डर, ठीक तरह से नींद भी नहीं आयी। अम्मा होती तो सिर हिलाकर कहती, बस आलस है सब! मैं कहती रहती हूँ कि लड़कियों को सुबह उठकर काम करने की आदत होनी चाहिए, पर लाड़ली बेटियों से कौन भिड़े! इस घर में कभी मेरी सुनी है किसी ने? जब ये बातें सुनती रही तो हंस कर अम्मा से लिपट जाती और वे भी मुस्कुरा देती! अब तक नंदू की पाक-कला, अम्मा के रसोई में व्यंजनों की तैयारी तक ही सीमित थी। नारियल कुतरने या सब्ज़ियाँ बारीकी से काटने तक, इससे अधिक की अब तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी। विवाह के बाद सात-आठ दिन मायके या ससुराल दोनों ही में पारंपरिक औपचारिकता में बीते। सप्ताह भर में सामान बांध कर आनन-फानन रेलगाड़ी में बैठना पड़ा। फरवरी दस, १९६१, इसी दिन तो वैवाहिक जीवन की शुरुआत थी, जब अपने पूरे परिवार को छोड़कर नये शहर आई थी नंदू! अपने पति दिनेश को अच्छी तरह नहीं जानती थी पर अब तक सब कुछ अच्छा ही प्रतीत हुआ था।

जब रिश्ता आया था तो इतना ही पता था कि उनका परिवार पालक्काड शहर में रहता है। वे शहर में पले बढ़े और एम कॉम के बाद, बैंक अफसर की नौकरी करने लगे। फोटो पाकर संध्या ने टिप्पणी की थी, “ चेची इनकी तो मूँछें हैं, क्या पता गुस्सैल हों?” मलयालम में चेची का अर्थ “दीदी होता है। “तू कब-से चेहरा पढ़ने में एक्सपर्ट हो गयी?” “बस अभी-अभी!” “मूँछों वाले तो अच्चन भी हैं, पर वह मेरी हर बात मानते हैं न?” चहकते हुए नंदू मुस्कुराई थी। ‘अच्चन”, अर्थात मलयालम भाषा में, ’पिता’। खैर अब तक उन्हें तो कभी क्रोधित होते हुए तो देखा नहीं, वे तो बातें भी कम ही करते हैं। दिनेश की इकलौती बहन, अंबिका ‘चेची’ दुबई में अपने पति और दो साल की बेटी के साथ रहती हैं। जब तक नंदू के साथ रहीं, वे बहुत स्नेह से नंदू से बात करती। मानो एक ऐसी दीदी जो उस की झिझक पूर्णतः समझती हो। सास-ससुर और अंबिका चेची बड़े मिलनसार लोग थे। उनसे अभी बस थोड़ी पहचान ही हुई थी, क्योंकि नंदू केवल चार दिन ही उनके साथ रह पाई थी। उसमें भी तीन दिन रिश्तेदारों के यहाँ दावत में बीती। इसलिए अब तक स्वयं रसोई संभालने की नौबत नहीं आई थी!

दिनेश से धीरे-धीरे पहचान हो रही थी, पसंद-नापसंद और आदतें मानो परत-दर-परत उतर रही थी। इस परिचय में दो बातें खुल चुकी थी, वे शांत किस्म के पुरुष हैं और उनकी आँखों से सच्चाई झलकती है। उनकी निश्छल मुस्कान तो दिल को पहले ही दिन भा गई थी। नंदू को आभास था, जिस व्यक्ति को जीवन का आधार मानकर चौखट से बाहर पैर रखे थे, वह अच्छा मनुष्य हो, ये ज़रूरी नहीं! दिनेश का सामीप्य नंदू को भा रहा था, उनकी दोस्ती प्रेम तक पहुँचकर, आशिकी की ओर बढ़ने लगी थी लेकिन धीरे-धीरे।

जब विवाह के बाद दूसरे दिन वापस घर आई तो अम्मा से बात करते हुए यह बात छिड़ी थी। “सब कुछ ठीक-ठाक हो गया न?” प्रत्यक्ष रूप से प्रणय-क्रीड़ा के बारे में इससे पूर्व कोई बातचीत नहीं हुई थी। किंतु विवाह के बाद, उन्होंने पूछ ही लिया। उस प्रश्न में चिंता थी, पर संकोच बिल्कुल नहीं। कुछ देर नंदू चुप रही, फिल्मों में दिखाई जाने वाली ‘सुहागरात’ के अनुरूप तो कुछ भी नहीं हुआ था। उस दिन तो दिनेश ने केवल हाथ पकड़ कर कुछ बातें की थी, मैत्रीपूर्ण जिज्ञासा भाव के साथ। नंदू के उबासी पर उबासी को देखकर दिनेश ने उसे सोने के लिए कह दिया। कुछ अजीब ज़रूर लगा था, पर थकी-हारी नंदू जल्द ही आराम से सो गई। कभी-कभी हाथ पैर आपस में छू भी जाते तो कुछ और आगे बात नहीं बढ़ती। इस अनजान दुनिया की जो जानकारी नंदू के पास थी, वह या तो नोवल में पढ़ा, या फिल्मों में देखा। स्कूल में यह पाठ, पढ़ाया नहीं जाता! कितनी अजीब बात है, किशोर अवस्था से यौवन तक किसी पुरुष से संबंध न पनपने का उपदेश दिया जाता है, और विवाह के तुरंत बाद सब कुछ ठीक होने का आश्वासन आवश्यक हो जाता है। अम्मा का चिंतित चेहरा देखकर नंदू मुस्कुरायी, “ नहीं अम्मा, अभी तो कुछ हुआ नहीं” “क्यों?” अम्मा के माथे पर बल पड़ गए। “क्या पता?” नंदू बेफिक्री से अपने बिस्तर पर पसर कर अखबार पढ़ने लगी। “ क्या मतलब, क्या पता?” अम्मा बिस्तर पर आकर उसके चेहरे से अखबार का पर्दा हटाती हुई बोली, “ तुमने कुछ कह दिया क्या?” “नहीं तो, मैंने तो कुछ नहीं कहा” “तुझे छूआ या नहीं?” “ छूआ था माँ, पर उससे ज़्यादा बात नहीं बढ़ी” “कुछ अजीब नहीं लगा तुझे?” “ नहीं अम्मा, सब ठीक है” नंदू मुस्कुरा कर बोली। उसे यह धीरे-धीरे बढ़ता संबंध अच्छा लग रहा था, पर अम्मा चिंता से दोहरी हुई जा रही थी। “कहने-सुनने में तो बिल्कुल ठीक ही लगता है दिनेश, भगवान करे सब ठीक हो” “अम्मा वे सचमुच अच्छे हैं, उनके घर वाले भी सब बहुत अच्छे हैं। सब ने मुझे बहुत स्नेह दिया, चिंता की कोई बात होगी तो आपको ज़रूर बताऊंगी” अम्मा उस समय तो नंदू को छोड़ कर चली गई, लेकिन मेरे वैवाहिक जीवन को लेकर एक उलझन उनके मन में घर बना चुकी थी। मुझसे वचन लिया कि पत्र में किसी संकेत से मैं उन्हें यह बता दूँ कि सब कुछ ठीक ठाक हो गया है। नंदू जानती थी कि उसके पति का रवैया, आम पुरुषों की तरह नहीं था जो पहली रात को ही अपना पुरुषत्व का अधिकार जमाना चाहते हैं। उन्हें अपने जीवन साथी से पहले मैत्री करनी थी। दस-बारह दिनों तक भी अपनी इच्छा वहीं तक बढ़ाते जहाँ तक नंदू चाहती, उसके एक इशारे पर वो रुक जाते। जब नंदू धीरे-धीरे दिनेश से अपनी सारी बातें कहने में सहज हो गई तब दिनेश उसे आनंद और रोमांच की चरम सीमा तक ले गया। उस समय तक उसके मन में संकोच था। नंदू के गालों पर नन्हें-नन्हें चुंबनों की हल्की वर्षा के बीच वही तो प्रश्न पूछता रहा वह बार-बार, “तुम ठीक हो ना?” नंदू ज़ोर से सिर ‘नहीं’ में हिलाने लगी और रात में उसके झुमके बज उठे। उसे अपने आलिंगन में बांधकर, दिनेश नंदू को देखता रहा, जैसे उसके हाथों में कोई मोम की गुड़िया हो। उसके घुंघराले बालों में अपनी उंगलियों से खेलता रहा, “तुम्हें पता है मैं कितना भाग्यशाली हूँ?” नंदू मुस्कुरा कर बोली, “नहीं, भाग्यशाली तो मैं हूँ!” मन ही मन सोचा, क्या यह संयोग की बात थी या दिनेश उसके मन की बात पढ़ने लगा है? उसे कैसे पता कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक हो जाए तो यही वाक्य उसने माँ को चिट्ठी में लिखने की बात की थी?

कुछ दिनों बाद इस मकान को अपना घर मान कर, नंदू अपनी नयी दुनिया बसाने की कोशिश करने लगी। अपने हृदय में कुशल गृहिणी की भूमिका में उतरने की पूरी कोशिश कर रही थी। अपनी इच्छा से घर की सजावट करना सबसे आसान और पसंदीदा काम था। अम्मा की तरह साफ सफाई, रखरखाव, व्यंजन पकाना सब कुछ निपुणता से सीखने की चेष्टा कर रही थी। सब्ज़ियों को सही आकार से काटना, ताबड़तोड़ तीन-चार व्यंजन परोस पाना और दिनेश की हर आवश्यकता-पूर्ति का पूर्वानुमान। देखते-देखते दिनेश की चाकरी, उसकी देखभाल जैसे उसकी प्रबल इच्छा बन गई। दिनेश जब उसके साथ कुछ सुकून के पल गुज़ारना चाहता तो कभी कुक्कुर की सीटी तो कभी तेल जलने का हवाला देकर, नंदू रसोई में दौड़ती-भागती रहती।

अभी शाम की चाय बनाकर ही हटी ही थी कि दिनेश ने उसे जबरदस्ती खाने की मेज़ पर बिठाया और कुछ देर चुपचाप उसकी आँखों में झांकता रहा। नंदू कुछ घबरा कर झेंपने लगी, ठीक वही भावना दिल में मचलने लगी जो स्कूल के गणित सर को देखकर होती थी। दिनेश कुछ देर बाद मुस्कुराने लगे, और वही मुस्कान आँखों से किसी बच्चे की तरह झांकने लगी। “कभी बैठ भी जाया करो, इस घर में मैं कभी अकेला भी रहता था और अपना खाना भी पका लेता था। मेरा स्वास्थ्य बिल्कुल दुरुस्त था, एक व्यंजन और तीन व्यंजनों में विशेष पौष्टिक अंतर नहीं होता। हाँ, मानता हूँ कि तुम्हारे हाथ का ज़ायका बढ़िया है” नंदू के हाथ को प्यार से अपने हाथों में लेते हुए दिनेश अपने हल्की मुस्कान को स्पष्ट और खुली मुस्कान में परिवर्तित करता हुआ बोला। नंदू की आंखें खुशी से चमक उठीं! “नंदू, मेरा एक सपना है” वह उसे प्रश्न सूचक आँखों से चुपचाप देखने लगी, मन में संदेह जगने लगा। अब पूरा प्रयास तो कर रही थी गृहस्थी संभालने में..... त्रिवेंद्रम में समुद्री मछली की उपलब्धता और दिनेश के चटोरे ज़बान को जानकर ही तो पड़ोस की मार्था चेरियन से नई विधि से मछली पकायी थी परसों। जाने और क्या ‘सपना’ दिनेश के मन में अंगड़ाई ले रहा था? अचानक उसके कर्तव्य बोध ने उसे सचेत किया, “एक मिनट“ नंदू दौड़कर चाय का कप ले आई तो दिनेश ने अपनी आँखों से धन्यवाद करते हुए कहा, “ वाह इसी की ज़रूरत थी, पर अब यहाँ से बीस मिनट हिलने की सोचना भी मत।“ “जी” नंदू ने सिर हिलाया। दिनेश को गर्म चाय की आदत थी, सो वह उसे एक मिनट में गटक गया। “नंदू, तुम पढ़ी-लिखी लड़की हो और मुझे तुमसे एक अपेक्षा है कि तुम पहले अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ। तुम आगे क्या पढोगी, यह तुम्हारी इच्छा है! बी ए में जैसे फर्स्ट डिविज़न लेकर आई थी, उसी समझ-बूझ से अपना भविष्य देखो और चुनो। बी एड करना चाहो या एम ए या फिर कुछ और... विषय-चयन तुम्हारी सोच पर निर्भर है, समझी?” नंदू ने सिर हिलाया। दिनेश की आदत थी कि किसी गंभीर बात को समझाते हुए ‘समझी’ ज़रूर कहते। “मेरे बैंक के पास ही कॉलेज है, वहाँ मैं कल तुम्हें छोड़ दूँगा, तुम ऑफिस में जाकर पता लगा लेना।” “हाँ, ठीक है लेकिन इतनी सुबह-सुबह, मुझे भी आना होगा? वापस कैसे आऊँगी, और दोपहर का खाना?” पढ़ने जाऊँगी तो खाना कौन पकायेगा?” “हम किसी को खाना पकाने के लिए रख लेंगे या आपस में जल्दी से कुछ पका लेंगे, लेकिन सारी उम्र तुम केवल रसोई में पड़ी रहो, ये नहीं हो सकता, समझी।“ अंत में फिर ‘समझी’ शब्द सुनकर नंदू भांप गयी कि दिनेश ने इस संबंध में दृढ़ निश्चय बना लिया था। कुछ देर ठहर कर कोमलता स्वर में लाते हुए बोले, “अपने कॉलेज से कैसे वापस आती थी, मेरी नंदू? क्या अच्चन रोज़ तुम्हें कॉलेज छोड़ कर आते थे?” “नहीं” नंदू मुस्कुराने लगी। “मेरे पीछे अपनी सारा अस्तित्व खो देने का इरादा मत करना, समझी?“ दिनेश उठकर नंदू के गाल खींचने लगा, तो वह झूठी खीज दिखाती हुई पलटी। वह जानती थी कि दिनेश उसे अपनी ज़िंदगी फिर से अपने लिये जीने की प्रेरणा दे रहा है।

उस रात नंदू दिनेश को आलिंगन में बांधती हुई बोली, “ तुम सचमुच बहुत अच्छे हो, आज तुम्हारे कारण मेरे सोये सपने जाग गये हैं। तुम्हें पता है मैंने सदा चाहा था कि मैं टीचर या लेक्चरर बनूँ?” “अच्छा, तो क्या पढ़ाना चाहती हो?” “मैं अंग्रेजी साहित्य पढ़ाना चाहती हूँ” “अच्छा?” “आप यह बताओ कि मैं एम ए करूँ या बी एड ?” “पढ़ना तुम्हें है, मैं क्या बताऊँ?” “सलाह ही तो माँग रही हूँ” “ बस यह याद रखना, चाहे मैं या कोई और... औरों से सिर्फ सलाह ही लेना, निर्णय अपना लेना, समझी?” नंदू की आँखों से चुपचाप आंसू बहने लगे। “आज अम्मा की चिट्ठी आई थी” “कोई खास बात?” नंदू एक पल को रुकी, दिनेश अंधेरे में भी जैसे उस लघु विलम्ब को भांप गया। ”पूछा होगा, कि गुड न्यूज़ कब सुना रही हो?” रात में हाँ में सिर हिलाते हुए नंदू की झुमकीयाँ फिर बजने लगी, तो दिनेश ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “सुनो उनको चिट्ठी में लिखना कि मैं अभी पढ़ाई करना चाहती हूँ, कुछ सपने जीना चाहती हूँ। फिर सवाल पूछा जायेगा दिनेश का क्या कहना है? तुम कहना कि यह तो उन्हीं का दिया हुआ सपना है। उनका सपना था कि बच्चे आने से पहले मैं आत्मनिर्भर बनूँ और ये सपना मुझसे पूरा करवा कर ही छोड़ेंगे। मुझे क्या पढ़ना है, बस यही निर्णय मुझे लेना है!” “हाँ, तुम्हारी पत्नी समझदार है, माँ को ये किस तरह से समझाना है, उस पर छोड़ दीजिये समझे?” दिनेश के ही लहजे में नंदू बोली तो दिनेश ज़ोर से हँसने लगा। दोनों की आँखों में एक ही सपना लहलहाने लगा।

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। वे व्यवसाय से मैं कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

1 comment :

  1. भावना सक्सैनाJuly 16, 2021 at 5:38 AM

    नवविवाहिता के मन को उकेरती सुंदर कहानी।

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