शिक्षा का महत्त्व और निराला के उपन्यास

योगेश कुमार मिश्र

(सीनियर रिसर्च फ़ेलो, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)
 
“संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियाँ हैं, शिक्षा सबसे बढ़कर है । शिक्षा में शब्द-विद्या का स्थान और उच्च है । यही विद्या ज्ञान की धात्री कहलाती है । जितने प्रकार के दैन्य हैं, कमजोरियाँ हैं, उन सबका शिक्षा के द्वारा ही नाश हो सकता है ।”  सफलता प्राप्त करने तथा सम्मानजनक जीवन के लिए शिक्षा आवश्यक है । शिक्षा से मनुष्य में आत्मविश्वास विकसित होता है। साथ ही व्यक्तित्व-निर्माण में भी सहायक है । शिक्षा की महत्ता का बहुत सटीक एवं सुंदर विश्लेषण इन पंक्तियों में देखने को मिलता है:
न चोरहार्यं न च राजहार्यं, न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं, विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

शिक्षा की महत्ता सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक है । इसकी पुष्टि सर्वत्र होती है। शिक्षा ही मनुष्य और पशु के बीच अंतर को स्पष्ट करती हैं, क्योंकि पशु अज्ञानी होता है और यदि मनुष्य को भी शिक्षा न मिले तो वह भी आत्म-निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि पशु । शिक्षा के अभाव में जीवन कितना कष्टप्रद हो जाता है,  इसका अनुमान लगाया जा सकता है । क्योंकि सर्वगुण संपन्न होने पर भी शिक्षा के बिना मनुष्य की क्या स्थिति होती है; इसका वर्णन इन पंक्तियों में निहित है:
रूप-यौवन-सम्पन्नाः विशाल-कुल-सम्भवाः ।
विद्याहीनाः न शोभन्ते निर्गन्धाः इव किंशुकाः ॥ 

शिक्षा को सर्वश्रेष्ठ धन कहा गया है । आधुनिक समय में किसी भी प्रकार के धन को प्राप्त करने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता होती है और व्यवसाय के लिए शिक्षा की । अतएव धनोपार्जन शिक्षा से जुड़ा हुआ है । हिंदी के साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने साहित्य, विशेषकर उपन्यासों में शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित किया है । निराला ने अपने उपन्यासों में शिक्षा के अभाव में जीवन की दुरूहता का मार्मिक चित्रण किया है । जमींदार तथा सेठ-साहूकार किसानों तथा मजदूरों का शोषण करने में जिस प्रकार से उनकी निरक्षरता का लाभ उठाते हैं, उसका सूक्ष्म एवं हृदयस्पर्शी चित्रण निराला के उपन्यासों में देखने को मिलता है । निराला ने स्त्री-शिक्षा के प्रश्न को भी बखूबी रेखांकित किया है। वह लिखते हैं कि - “वही बच्चा भविष्य के हिंदी-साहित्य का महाकवि है, जिसे अपनी माता के मुख से साफ-शुद्ध, मार्जित, सरल, श्रुति-मधुर तथा मनोहर खड़ी बोली के सुनने का सौभाग्य प्राप्त होगा ।” 
माता को प्रथम पाठशाला के रूप में जाना जाता है और यदि पहली पाठशाला, जिसमें किसी शिशु की शिक्षा की नीव पड़ती है, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकी, तो उसकी आगामी शिक्षा भी कम प्रभावशाली होगी। महिलाओं को शिक्षा इसलिए भी आवश्यक है, जिससे वे अपनी संतान को उचित शिक्षा दे सकें । कम उम्र के बालक पिता की अपेक्षा माता के पास अधिक वक्त गुजारते हैं, इसलिए माता के शिक्षित होने का असर बालक पर अवश्य पड़ेगा; जिसकी और निराला जी ने संकेत किया है । निराला ने अन्य कई महत्त्वपूर्ण पहलूओं को भी रेखांकित किया है जो स्त्री शिक्षा को आवश्यक बताते हैं । वे लिखते हैं कि - “पुरुष के अभाव में स्त्री हाथ समेंटकर निश्चेस्त बैठी न रहे । उपार्जन से लेकर संतान-पालन, गृह-कार्य आदि वह सँभाल सके, ऐसा रूप, ऐसी शिक्षा उसे मिलनी चाहिए ।”  निराला स्त्री-शिक्षा को धर्म से जोड़ते हुए लिखते हैं कि - “सच्चा धर्म इस समय स्त्रियों के सब प्रकार के बंधन ढीले कर देना, उन्हें शिक्षा की ज्योति से निर्मल कर देना ही है, जिससे देश की तमाम कामनाओं के सिद्धि होगी और स्वतंत्र-सुखी जीवन बाह्य स्वतंत्रता से तृप्त होकर आत्मिक मुक्ति के संधान में मिलेगा ।” 
निराला ने सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए शिक्षा की आवश्यकता महसूस की है । उनका मानना है कि शिक्षा से शोषितों में आत्मविश्वास पैदा होगा, जिससे वे अपने अधिकारों की लड़ाईयाँ लड़ने में कामयाब हो सकेंगे । इस प्रकार से वे सामाजिक समता की स्थापना का लक्ष्य रखते हैं । निराला को इस बात का विश्वास है कि सामाजिक अराजकताओं को दूर करने के लिए, समाज में समता लाने के लिए  ‘शिक्षा’ ही उपयोगी हथियार साबित होगा । वे इस बात को समझ रहे थे कि केवल राजनैतिक आजादी मिल जाने से देश में सब कुछ ठीक नहीं हो सकता, जब तक कि सभी शिक्षित नहीं होंगे, सामाजिक बिषमता बनी रहेगी । इसीलिए वे शिक्षा-क्रांति की बात करते हैं ।  
निराला भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तत्कालीन स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए लिखा है कि- “देहात में शिक्षा की बहुत कमी है, वहाँ लड़कों को ही मदरसा भेजना दुश्वार है । गाँव में कोस-कोस की दूरी पर मदरसे हैं । हर एक तहसील में मुश्किल से दो मिडिल स्कूल हैं । आठ-आठ, दस-दस कोस के लड़के मिडिल स्कूल में के बोर्डिंग हाउस में ठहरकर पढ़ नहीं सकते । अधिकांश लोगों की आर्थिक स्थिति वैसी नहीं है ।”  निराला ने अपने देश में स्कूलों की कमी होने की बात कही है । उनका चिंतन इस ओर भी संकेत करता है कि सबके पास इतनी संपन्नता नहीं है कि वह घर से बाहर किराए के मकान में रहकर पढ़ सकें । साथ ही उन्होंने इस बात की भी चिंता जाहिर की है कि जहाँ लड़कों की शिक्षा का यह हाल है, वहाँ लड़कियों की शिक्षा की बात क्या होगी ? निराला स्थिति पर चिंता प्रकट कर चुप हो जाने वाले साहित्यकार नहीं हैं, वे इसके समाधान को रेखांकित करते हैं । 
गाँव में स्कूलों के अभाव में बालकों को शिक्षित कैसे किया जाए ? इस संदर्भ में सुझाव देते हुए निराला कहते हैं कि हर एक गाँव से जितनी भीख निकलती है, यदि उतना अन्न रोज एकत्र कर लिया जाय, तो उससे गाँव में  एक छोटी-सी पाठशाला खोल दी जा सकती है । निराला के सुझाव में गहराई निहित है । इस पर विचार करें कि भीख से गाँव की शिक्षा को बेहतर बनाने का सुझाव उनकी ग्रामीणों के प्रति गहरी सहानुभूति तथा आत्मीयता को दर्शाता है । निराला गाँव की साक्षरता दर से परिचित थे । उन्होंने तत्कालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था की यथार्थ स्थिति का आकलन कर लिया था। अतएव वह सोचते हैं कि सभी तक शिक्षा की पहुँच कैसे हो ? इस संदर्भ में उन्होंने समाज-सेवियों से अपील की है कि देश सेवा केवल स्वाधीनता-आंदोलनों में भाग लेकर जेल जाने में ही निहित नहीं है, अपितु अपने गाँव तथा आस-पास के निरक्षरों को साक्षर बनाने का प्रयास करके भी समाज सेवा की जा सकती है ।
निराला किसान आंदोलन से जुड़े रहे हैं । उन्होंने गाँव के किसानों का तब तक साथ दिया, जब तक कि स्वयं किसानों ने ही अपना आत्म-विश्वास खोकर आंदोलन बंद न कर दिये । आंदोलन के बंद होने के पीछे निराला ने किसानों में व्याप्त आत्म-विश्वास की कमी को रेखांकित किया । आत्म-विश्वास शिक्षा के द्वारा जगाया जा सकता है । इसीलिए निराला किसानों को साक्षर बनाने की बात करते हैं । स्वामी विवेकानंद के आह्वान पर ‘रामकृष्ण मिशन’ के सन्यासियों ने किसानों को शिक्षित करना प्रारंभ कर दिया था, जिसका उल्लेख करते हुए निराला ने लिखा है कि - “बंगाल में, किसी गाँव में रहकर, इस संघ के कोई संन्यासी महराज- जिन्होंने शिक्षा प्राप्त कर, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास  लेकर पहले अपने को शिक्षित कर लिया है - गाँव तथा पड़ोस के बालकों को प्राप्त धन के अनुसार बाकायदा छोटा या बड़ा भवन-निर्माण करके उसमें या किराये के या कुछ दिनों के लिए मिले हुए मकान में शिक्षा दे रहे हैं; कहीं-कहीं बालिकाओं के लिए भी प्रबंध है ।” 
निराला ने समाज-सेवियों के समक्ष इस प्रकार का विकल्प रखा है कि उन्हें भी ऐसे कार्यों में संलग्न होकर देशवासियों की शिक्षा को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए । उनके ‘अलका’ उपन्यास के विजय का कार्य ‘रामकृष्ण मिशन’ के इन्हीं संन्यासी-समाजसेवियों की भांति है । वह गाँव के किसानों के बालकों की शिक्षा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है । वह आस-पास के गाँवों में भी जहाँ मदरसे नहीं थे, बालकों को पढ़ने की सुविधा थी, उसी तर्ज पर मदरसों की स्थापना करता है । ये सभी  शिक्षक केवल गाँव से प्राप्त हुई भीख जो ग्रामीणों द्वारा इकट्ठा करके दी जाती थी, उसी से अपना जीवन-निर्वाह करते हैं । अन्य किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लेते हैं। बंगाल में शिक्षा के लिए ‘रामकृष्ण मिशन’ के इस अभियान की से निराला प्रभावित हैं । उसकी सफलता से आशान्वित भी हैं । यही कारण है कि उनके उपन्यासों के पात्र भी इस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न दिखते हैं । निराला ने इस ओर भी संकेत किया है कि किसान तथा मजदूर वर्ग दिन में अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, यदि नैश (रात्रि) पाठशालाओं का प्रबंध किया जाय तो उन पाठशालाओं में इन कामकाजी मजदूरों तथा स्त्रियों को भी शिक्षा दी जा सकती है ।
निराला के ‘अलका’ उपन्यास में विजय द्वारा कुलियों कि स्त्रियों को साक्षर बनाने के लिए नैश-पाठशाला खोलने का उल्लेख है, जिसमें पढ़ाने के लिए वह अलका से अनुरोध करता है । समय है रात्रि 7:00- 9:00 बजे । इस प्रकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की शिक्षा दृष्टि उभरकर सामने आती है । निराला शिक्षा को इतना महत्त्व देते हैं, क्योंकि उनके मन:मस्तिष्क में यह बात गुंजती रही होगी कि:- 
येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
सुभाषित का यह श्लोक शिक्षा के अभाव में जीवन की दुरूहता को व्याख्यायित करता है । शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशुवत जीवन जीने के लिए बाध्य होता है । यही कारण है कि निराला अपने उपन्यासों में शिक्षा के प्रश्न पर बार-बार चिंतन करते हैं ।
निराला ने उपन्यास लेखन का कार्य 20वीं सदी के चौथे दशक में आरंभ किया । तत्कालीन समय में देश तमाम समस्याओं से जूझ रहा था । स्वाधीनता आंदोलन से देश में अस्थिरता-सी आ गई थी । उस समय अनेक सामाजिक आंदोलन प्रभावी रहे हैं । शिक्षा के लिए भी आंदोलन चलाए जा रहे थे । शिक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था । निराला के उपन्यासों में चित्रित प्रमुख पात्र मध्यम तथा निम्न वर्ग से संबंध रखते हैं । उन्हें अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है । निराला ने पात्रों की शिक्षा का उल्लेख पूरे मन से किया है । पात्रों द्वारा शिक्षा के लिए किए गए संघर्षों का भी उल्लेख मिलता है । निराला को जैसे ही अवसर मिलता है, वह पात्रों के पुस्तक प्रेम को दर्शाने के लिए उत्सुक रहते हैं । निराला उन्हें अँग्रेजी की पुस्तक या पत्रिका पढ़ता हुआ दिखाना नहीं भूलते । इन पात्रों के यहाँ कोई आता है तो वह उसे अपनी संग्रहित पुस्तकों का दर्शन अवश्य कराता है । 
‘अप्सरा’ उपन्यास में नायिका कनक की शिक्षा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है । उसके लिए अँग्रेजी तथा हिंदी के अलग-अलग अध्यापक नियुक्त किए गए हैं । कनक की माता सर्वेश्वरी शिक्षित तथा समझदार थी । ‘नृत्य-संगीत में वह भारत प्रसिद्ध हो चुकी थी ।’ उसने अपनी इकलौती पुत्री की शिक्षा का प्रबंध घर पर कर रखा है । “एक अंग्रेज महिला श्रीमती कैथरीन तीन घंटे उसे पढ़ा जाया करती थी । दो घंटे के लिए एक अध्यापक आया करते थे। .... हिंदी के अध्यापक उसे पढ़ाते हुए अर्थ प्राप्ति की कलुषित कामना कर पश्चात्ताप करते, कुशाग्र बुद्धि शिष्या के भविष्य का पंकिल चित्र खींचते हुए मन-ही-मन सोचते - इसकी पढ़ाई उसर वर्षा है । .... उसकी अँग्रेजी की प्राचार्या उसे बाइबिल पढ़ाती हुई एकाग्रता से देखती, और मन-ही-मन निश्चय करती थी कि किसी दिन उसे प्रभु ईसा की शरण में लाकर कृतार्थ कर देगी ।”  कनक वेश्या पुत्री थी । अतः उसे पढ़ाने वाले हिंदी के अध्यापक का यह सोचना कि इसकी इसकी पढ़ाई उसर वर्षा है - इस ओर संकेत करता है कि वह आश्वस्त हैं कि इस ज्ञान से उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला । अध्यापक महोदय केवल इतना ही सोच पाते हैं कि वह भी आगे चलकर अपनी जातीय-व्यवसाय में संलग्न होगी । इससे अलग वे उसके भविष्य की कल्पना नहीं कर पाते । अँग्रेजी की अध्यापिका कैथरिन उसे ईसाई धर्म में दीक्षित करवाने की इच्छा रखती हैं । इन विषयों से अलग वे उसकी कुशाग्रता की ओर ध्यान नहीं देते हैं । निराला कनक की कुशाग्रता को दर्शाते हुए लिखते हैं कि - “कनक भी अँग्रेजी में जैसी तेज थी, उसे अपनी सफलता पर जरा भी द्विधा न थी ।”  यहाँ निराला ने शिक्षा से अर्जित आत्मविश्वास को दर्शाया है । कनक अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त है । निराला ने कनक के पढ़ने के समय का भी उल्लेख किया है - “संध्या-समय रात सात बजे के बाद से दस तक और दिन में भी इसी तरह सात से दस तक पढ़ती थी ।”  
पात्रों के अध्ययन-अध्यापन का बारीक विश्लेषण यह दर्शाता है कि निराला तत्कालीन समय में शिक्षा को कितना आवश्यक समझ रहे थे । कनक के पढ़ने वाले कमरे का चित्र निराला के ही शब्दों में देखें - “यह कनक का अध्ययन-कक्ष था । सजी हुई पुस्तकों पर नजर गई । रॉबिन्सन उन्हें खोल कर देखने के लिए उत्सुक हो उठे । नौकर ने आलमारियाँ खोल दी । साहब ने कई पुस्तकें निकाली, उलट-पुलटकर देखते रहे ।”  रॉबिन्सन पेशे से मजिस्ट्रेट है जो दौरे पर आया हुआ है । उसका पुस्तकों को देखने के लिए उत्सुक होना, दिखाकर निराला ने अपने ही पुस्तक प्रेम को दर्शाया है । वेश्या के घर में इतनी पुस्तकों का होना उसकी विद्वता को दर्शाता है । निराला वेश्या पुत्री कनक को सीधे समाज में स्थापित नहीं करते हैं । उन्होंने उसके विकास क्रम में शिक्षा के द्वारा उसमें आभिजात्य संस्कारों को स्थापित किया है । कनक के व्यक्तित्व-निर्माण में सर्वाधिक कारगर हथियार ‘शिक्षा’ का प्रयोग किया गया है । 
‘अप्सरा’ उपन्यास का राजकुमार धीर और शिक्षित युवक है । वह कोलकाता सिटी कॉलेज में हिंदी का प्रोफेसर है । साहित्य तथा देश सेवा के लिए समर्पित है । वह जब कनक के घर जाता है तो उसका वर्णन करते हुए निराला लिखते हैं कि - “राजकुमार को कनक की शिक्षा के बारे में अधिक ज्ञान न था । वह उसे साधारण पढ़ी-लिखी स्त्री में शुमार कर रहा था । कनक जब लिख रही थी, तब लिपि देखकर उसे मालूम हो गया कि कनक अँग्रेजी जानती है।”  निराला शिक्षा को लेकर जितना जागरूक हैं, उतना अन्य कोई उपन्यासकार नहीं । यहाँ उन्होंने कनक की लिखावट से उसकी योग्यता का संकेत कर दिया है । राजकुमार जब कनक के पढ़ने वाले कमरे में जाता है तब निराला अपने को रोक नहीं पाते हैं, जबकि वे कनक के अध्ययन-कक्ष का उल्लेख वे पहले कर चुके हैं; लेकिन फिर से लिखते हैं कि - “नौकर ने आलमारियाँ खोल दी । राजकुमार किताब निकालकर देखने लगा । अँग्रेजी साहित्य के बड़े-बड़े कवि-नाटककार और उपन्यासकारों की कृतियाँ थी । दूसरे देशों के बड़े-बड़े साहित्यिकों के अँग्रेजी अनुवाद रखे थे । राजकुमार आग्रहपूर्वक किताबों के नाम को देखता रहा ।”  कनक की आलमारी में रखी जिन पुस्तकों का उल्लेख किया गया है, वह यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि कनक उच्च कोटि की जानकार है । यह निराला की अपनी दृष्टि है जो राजकुमार के समक्ष कनक की योग्यता को प्रदर्शित करती है । 
‘अप्सरा’ उपन्यास में कनक और राजकुमार के विवाह का आधार उनकी शैक्षिक समता ही है । अन्य समानताएँ उनमें नहीं हैं । राजकुमार उच्च-कुल से संबंधित है, जबकि कनक वेश्या पुत्री है; लेकिन निराला ने उसे शैक्षिक रूप से इतना संपन्न दिखाया है कि उनके संबंध को पाठक सहजता से स्वीकार कर लेता है । निराला ने सामाजिक परिवर्तन के केंद्र में शिक्षा को दर्शाया है । शिक्षा ही कनक को सामान्य जीवन के लिए प्रेरित करती है और वह राजकुमार को पति के रूप में स्वीकारती है । निराला अपने पात्रों को यथावसर शिक्षित या पुनर्शीक्षित करने के अवसर निकाल ही लेते हैं । ‘अप्सरा’ उपन्यास में तारा नामक स्त्री पात्र ऐसे गाँव से है, जहाँ लड़कियों की शिक्षा को अपराध समझा जाता है । निराला उसे विवाहोपरांत शहर में आने पर शिक्षित करना नहीं भूलते हैं । अपने परिवार से तारा अलग इसलिए है, क्योंकि शहर में उसने पढ़ना-लिखना सीख लिया है; शिक्षा से प्राप्त आत्मविश्वास उसे औरों से अलग करता है । इस प्रकार हम देखें कि निराला अपने उपन्यासों में शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। उन्होंने ‘अप्सरा’ उपन्यास में स्त्रियों की शिक्षा का संदर्भ रखा है । 
‘अलका’ उपन्यास निराला की शिक्षा दृष्टि को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण कृति है । गाँव की साक्षर लड़की शोभा स्नेहशंकर के संपर्क में आकर शिक्षा ग्रहण करती है और अलका बन जाती है । इस परिवर्तन के पीछे उसके धर्मपिता स्नेहशंकर का हाथ है । उनका परिचय निराला के शब्दों में देखें - “पंडित स्नेहशंकर सात-आठ गाँव के मामूली जमींदार हैं । ऊँचे दर्जे के शिक्षित । विदेशों का भ्रमण कर चुके हैं । ऊँची शिक्षा प्राप्त करने पर भी ऊँचे पदों की प्राप्ति स्वेच्छा से नहीं की । सरस्वती की सेवा में दत्तचित्त रहते हैं ।”  प्रायः उपन्यासों में जमींदारों के नकारात्मक चित्र ही दर्शाए गए हैं, लेकिन स्नेहशंकर को उच्च शिक्षित दर्शाने का कारण उनकी सकारात्मक छवि को दर्शाना है। निराला ने लिखा है कि - “स्नेहशंकर जी गाँव के जमींदारों की तरह नहीं, रियाया की तरह रहते हैं । जमींदारी का प्रबंध वहीं के किसानों की एक कमेंटी करती है । अपनी पुस्तकों की आमदनी से वह कभी-कभी किसानों के शिक्षा विभाग की मदद करते हैं ।”  निराला ने स्नेहशंकर द्वारा किसानों की शिक्षा के लिए मदद दर्शाया, क्योंकि जमींदार और रियाया के बीच तनावपूर्ण  संबंध ही होता है, लेकिन शिक्षा का प्रभाव है कि स्नेहशंकर ने अपनी पुस्तकों की आमदनी से किसानों की शिक्षा का प्रबंध कर रखा है । उनके व्यवहार के परिवर्तन का मूल कारण उनका शिक्षित होना है, वरना जमींदार तो सदैव शोषक के रूप में ही सामने आते हैं ।
गाँवों के ज्यादातर जमींदार अल्प-शिक्षित होते है । अतः वे शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते हैं । ऐसे में उनके द्वारा ग्रामीणों की शिक्षा का प्रबंध क्या होगा? इसलिए निराला ने जमींदार स्नेहशंकर को ऊँचे दर्जे का शिक्षित बताया है । स्नेहशंकर अपने पुत्र अंबिकादत्त को किसान-बालकों को पढ़ाने के लिए नियुक्त कर रखा है । इसका उल्लेख करते हुए निराला ने लिखा है कि “अंबिकादत्त किसान-लड़कों को पढ़ाने अपनी ही तैयार कराई पास की पाठशाला, गए थे ... कभी-कभी पंडित स्नेहशंकर भी देखते हैं ।”  निराला को जहाँ थोड़ा सा अवसर मिलता है वह शिक्षा की बात करने से नहीं चूकते, यदि गौर करें तो यहाँ कथानक कुछ और चल रहा था; लेकिन निराला की दृष्टि शिक्षा को उल्लिखित करने से अपने को नहीं रोक पाती, कारण यह कि निराला को सामाजिक परिवर्तन के लिए, पिछड़ों के विकास के लिए, शिक्षा से बढ़कर और कोई उपकरण नहीं दिखाई देता । उन्हें शिक्षा की शक्ति पर पूरा भरोसा है । अतः वह जगह-जगह अपने पात्रों की शिक्षा तथा उनके द्वारा किए गए शिक्षा-दान का उल्लेख करना नहीं भूलते । वास्तव में शिक्षा का सही मायने में यही महत्त्व है कि उसे अधिक से अधिक व्यय किया जाय; क्योंकि व्यय करने से उसमें और वृद्धि होती है । जैसा कि कहा भी गया है: 
व्यये कृते वर्धते एव नित्यम्, विद्याधनम् सर्व धनं प्रधानम् ।
इस प्रकार जिसकी व्यय करने से वृद्धि हो, उसके दान में संकोच कैसा? निराला इस बात को लेकर तत्पर हैं और यह तत्कालीन समय की मांग भी थी । इन उपन्यासों को पढ़ता हुआ पाठक यदि उपन्यास के पात्रों की शिक्षा-दान की कला से प्रेरित होगा तो स्वाभाविक है कि वह भी अपने आस-पास के लोगों की शिक्षा के बारे में विचार करेगा । ऐसे में निराला की शिक्षा दृष्टि स्वतः महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो जाती है । 
‘अलका’ उपन्यास का प्रमुख पात्र विजय किसानों की शिक्षा के लिए अथक प्रयास करता है । वह किसानों की शिक्षा के लिए अभियान चलाता है । इसका उल्लेख निराला ने किया है । गाँव में पधारे डिप्टी साहब के द्वारा पूछे जाने पर कि यहाँ आप क्यों हैं? विजय कहता है कि “किसान लड़कों को पढ़ाना मेंरा लक्ष्य है, मैं और कुछ नहीं करता । जो भीख गाँव से बाहर मुफ्त जाया करती है, उसकी दुअन्नी से भी कम में मेंरे जैसे तीन शिक्षकों की गुजर हो सकती है, केवल भोजन कर गरीबों को शिक्षा देना, मैंने अपना लक्ष्य कर लिया है ।” 
विजय गरीबों की शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित है । वह शिक्षा के महत्त्व को समझता है; कारण यह कि उसने अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष किया था; जिसका उल्लेख किया गया है कि - “सेठजी जिसके प्रसाद से वह किसी तरह मुंबई में रखकर ही एक साल की पढ़ाई पूरी कर लेना चाहता है । नाराज हैं अब सहायता देने से उन्होंने इनकार कर दिया है । .... सेठ जी से प्रार्थना करने के लिए फिर गया, पर ड्योढ़ी से भीतर पैठ नहीं । दरबान ने कहा, ड्योढ़ी बंद है ।”  विजय सेठजी की सहायता बंद हो जाने पर भी हार नहीं मानता । वह अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए “दो लड़कों को  पढ़ाने लगा था, अभी महीना पूरा हुआ । उनके अभिभावकों के पास गया । दोनों जगह एक ही-से उत्तर, “बगैर महीना पूरा हुए आपको कैसे रुपए दे दिए जाएँ – ऐसी उतावली हो, तो आप अगले महीने से मत पढ़ाइए, हम दूसरा इंतजाम कर लेंगे ।”  इस प्रकार  संघर्ष करने के बावजूद भी वह अपनी शिक्षा को मुंबई में रहकर आगे न बढ़ा सका; लेकिन शिक्षा के लिए किए गए संघर्ष का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि वह गरीब-किसानों के बच्चों को केवल भोजन के बदले पढ़ाने के लिए संकल्पित हुआ । वह अपने मित्र अजीत से कहता है कि - “सोचा था, एम.ए. कर लूँगा, पर भाग्य में ऐसा नहीं लिखा, और डिग्री करूँगा भी क्या लेकर? - नौकरी करनी नहीं, किताब पढ़कर समझने लायक लियाकत हो ही गई है । ईश्वर ने रास्ता भी साफ कर दिया है ।”  निराला के पात्रों में एक विशेषता और देखने को मिलती है कि वे नौकरी करने में रुचि नहीं रखते । उनका लक्ष्य समाज की सेवा करना होता है । इस दृष्टि से ‘अप्सरा’ के राजकुमार और चन्दन,‘अलका’ के विजय, अजित तथा स्नेहशंकर को देखा जा सकता हैं । 
‘अलका’ उपन्यास में चित्रित स्त्रियाँ भी बालिकाओं की शिक्षा को आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं । सावित्री और अलका इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं । निराला ने इस संदर्भ में लिखा है कि - “सावित्री पहले दो-तीन महीने तक रही, फिर बालिकाओं की शिक्षा क्रम में बाधा पड़ रही होगी, सोचकर गाँव चली गई । पिता और अलका को तकलीफ होने के विचार से एक चतुर दासी  देख-रेख के लिए और एक ब्राह्मण भेज दिया । अलका पढ़ रही थी, दैनिक गृह-कार्य उससे कराना उसने अनुचित समझा ।”  यहाँ निराला के चित्रण की बारीकियों को रेखांकित करने की जरूरत है जो उनकी शिक्षा दृष्टि को समझने में सहायक हैं । सावित्री शहर से गाँव यह सोचकर जल्दी वापस लौटती है कि बालिकाओं की शिक्षा बाधित हो रही होगी । इससे यह साबित होता है कि उसने गाँव में बालिकाओं के लिए पाठशाला खोल रखा है । गाँव जाते वक्त उसने नौकर रखना इसलिए उचित समझा; क्योंकि अलका यदि गृह-कार्यों में संलग्न होगी तो उसकी शिक्षा बाधित होगी । यहाँ निराला ने इस ओर संकेत किया है कि लड़कियों को पढ़ने के साथ घर के कार्यों को भी करना पड़ता है । इसलिए उनकी शिक्षा बाधित होती है और वे लड़कों की अपेक्षा पीछे रह जाती हैं; क्योंकि लड़कों को घर के कार्यों इत्यादि से छूट रहती है । लड़कियों को भी शिक्षा का अवसर उसी प्रकार से मिलना चाहिए जिस प्रकार से लड़कों को मिलता है, जिससे वे भी उच्च शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ सकें । इसलिए निराला ने अलका को गृह कार्यो से मुक्ति दिलाई है । स्नेहशंकर उसे वे सभी अवसर मुहैया कराते हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक हो सकते हैं । निराला स्त्री एवं पुरुष पात्रों को शिक्षा का समान अवसर उपलब्ध कराते हैं । उन्हें स्त्री तथा पुरुष में शिक्षा के लिए किसी भी प्रकार का भेद-भाव स्वीकार नहीं है ।
‘निरुपमा’ उपन्यास उच्च-शिक्षा की दृष्टि से निराला की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति है । इसकी शुरुआत ही लंदन से डी. लिट्. उपाधि लेकर लौटे हुए  कुमार के संघर्ष से की गई है । कुमार लंदन से डी.लिट्. की उपाधि हासिल तो कर लेता है, लेकिन यहाँ तक पहुँचने में उसका सर्वस्व न्योछावर हो चुका  है । मकान भी गिरवी रखना पड़ा है । अतएव वह जल्द-से-जल्द नौकरी प्राप्त करना चाहता है; लेकिन भारतीय विश्वविद्यालयों के चयन के प्रतिमान कुछ अलग ही माँग करतें हैं । उनके चयन का आधार जाति, धर्म तथा रिश्वत है । निराला लिखते हैं कि- “कुमार जगह की तलाश में क्रिश्चियन  कॉलेज  गया, पर वहाँ भी वर्णाश्रम धर्मवाला सवाल था । देखकर विद्या ने आँखें झुका ली और हमेंशा के लिए ऐसे स्थलों का परित्याग कर देने की सलाह दी । यूरोप से लौटे हुए कुमार की दृष्टि में ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का ही महत्त्व है, इसलिए मन में हार  की प्रतिक्रिया न हुई ।”  
यहाँ एक बात स्पष्ट रूप में सामने आती है कि आगे चलकर निराला पर भी गाँधीवाद का  प्रभाव पड़ा । कुमार को योग्य होते हुए भी नियुक्ति नहीं मिलती, लेकिन वह विद्रोह नहीं करता । ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ को शिरोधार्य कर बूट पॉलिश करना शुरू करता है । लंदन की डी. लिट्. उपाधि होने के बाद भी वह बूट पॉलिश करता है; जबकि अन्य कार्य भी उसे मिल रहे थे । यह कार्य किया तो विरोधस्वरूप ही जा रहा है, लेकिन निराला ने कुमार के इस कृत्य पर लोगों से कहलवाया है कि- “यूरोप की चारित्रिक शिक्षा यही है जो इसमें देखने को मिली की गर्व का नाम नहीं, अपने काम से काम: हृदय से  इस काम को छोटा नहीं समझता ।”  विदेशी शिक्षा के संदर्भ में प्रचलित मत कि - “यों यूरोप विद्यार्थी जाते  ही रहते हैं; या तो बिगड़ जाते हैं या मेंम लेकर, नहीं तो पदवी के साथ काले रंग के गोरे होकर आते हैं - अपनी संस्कृति के पक्के दुश्मन बनकर ।”  इसके मत के विपरीत निराला ने कुमार की छवि को अंकित किया है जिससे कि लोगों की धारणाएँ  खंडित हो सकें । निराला शिक्षा के पक्षधर हैं, चाहे वह देशी शिक्षा हो, या विदेशी । वे अँग्रेजी भाषा के ज्ञान के भी पक्षधर रहे हैं । उनके पात्रों को अँग्रेजी का ज्ञान है । ‘अप्सरा’ उपन्यास में कनक के लिए अँग्रेजी की अध्यापिका को नियुक्त करना नहीं भूलते हैं । राजकुमार उसकी  अँग्रेजी की लिखावट देखकर उसके उच्च शिक्षित होने का अनुमान लगा लेता है । गिरफ्तार किए गए चंदन की आलमारियों में रखी पुस्तकों का उल्लेख करते हुए निराला ने लिखा है कि- “दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवी, छठी, कुल आलमारियों की राजकुमार ने अच्छी तरह तलाशी ली । जमीन पर करीब-करीब डेढ़-दो सौ किताबों का ढेर लग गया । फ्रांस, रूस, चीन, अमेंरिका, भारत, इंग्लैंड सब देशों की, सजीव स्वर में बोलती हुई, स्वतंत्रता के अभिषेक से दृप्त-मुख, मनुष्य को मनुष्यता की शिक्षा देने वाली किताबें थी ।”  ज्ञान कहीं से और किसी भी भाषा में प्राप्त किया जा सकता है; लेकिन वह ‘मनुष्य को मनुष्यता की शिक्षा देने’ वाला हो- इसकी ओर निराला ने आलमारियों में रखी किताबों के माध्यम से संकेत कर दिया है ।
निराला की शिक्षा दृष्टि बहुत ही उदारवादी है । वह ज्ञानार्जन के लिए सब प्रकार की छूट देती है, जिससे ज्ञान का विस्तार हो सके । अलका के धर्मपिता स्नेहशंकर उसे सिनेमाघर तथा दर्शनीय स्थल सभी जगह घुमाने ले जाते हैं, जिससे उसकी दृष्टि में व्यापक हो सके । इस दृष्टि से निराला यह बताना नहीं भूलते हैं कि - “पुस्तकें लिखना और अलका को एक बार ज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित करके देखना - ये ही दो सम्मिलित तो स्नेहशंकर के उद्देश्य हैं ... स्नेहशंकर अँग्रेजी भी सामयिक प्रधान भाषा जानकर पढ़ाते थे ।”  तारा नामक स्त्री जो की शादी के बाद पढ़ना सीखी है, उसे भी अँग्रेजी का ज्ञान है । इसका उल्लेख ‘अप्सरा’ उपन्यास में किया गया है - “बातचीत से कनक को मालूम हो गया कि तारा पढ़ी लिखी है, और मामूली अँग्रेजी भी अच्छी  जानती है ।”  निराला अँग्रेजी भाषा के ज्ञान के पक्षधर रहे हैं । इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि उन्होंने ‘निरूपमा’ उपन्यास में कुमार को अँग्रेजी में डी.लिट्. उपाधि धारक के रूप में दर्शाया है । विदेशी शिक्षा के महत्त्व तथा उसकी प्रासंगिकता को समझते हुए निराला उसका समर्थन करते हैं । उन्होंने कनक को विदेश भेजने की बात कही थी । स्नेहशंकर को उच्च-शिक्षित दर्शाते हुए यह बताते हैं कि वे विदेश यात्राएँ भी कर चुके हैं । कुमार ने तो डी. लिट्. उपाधि ही लंदन से हासिल की है । ये सभी घटनाएँ यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि निराला दृष्टि के विस्तार हेतु अँग्रेजी भाषा तथा विदेशी शिक्षा के पक्षधर रहे हैं ।
इस प्रकार हम देखें  कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ अपने औपन्यासिक पात्रों को सभी प्रकार की शिक्षा से संपन्न में रखते हैं । शिक्षा के लिए उन्हें देश से बाहर भी भेजते हैं । इन पात्रों को अँग्रेजी शिक्षा का भी पर्याप्त ज्ञान है। उनकी नौकरी में विशेष रूचि नहीं होती है; किन्तु वे  समाज-सेवा में संलग्न रहते हैं । उनके द्वारा शिक्षा-दान में किसी प्रकार की कंजूसी नहीं की गई है । मुझे यहाँ पर स्वामी विवेकानंद की उस टिप्पणी का ख्याल आ रहा है जिसमें वे कहते हैं कि “जब तक लाखों लोग भूख तथा अज्ञान से ग्रस्त हैं । मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही कहूँगा जो उसके खर्च पर शिक्षा पाकर भी उन पर कोई ध्यान नहीं देता ।”  इस कथन के अनुसार निराला अपने पात्रों को देशद्रोही कहलाने से बचा लेते हैं । उनके पात्र किसान, दलित तथा स्त्रियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में तत्पर दिखते हैं । उनके द्वारा किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाता; बल्कि नि:शुल्क,  प्रेम-भाव से स्वार्थ रहित होकर वे लोगों को शिक्षित करने का कार्य करते हैं ।

संदर्भ:
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.130
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.113
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.129
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.131
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.130
  नवल,नंदकिशोर.(सं.).(2014). निराला रचनावली-6.नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन.पृ.458
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.14
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.14
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.15
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.45
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.58
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.65
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ. 26
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.27
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.27
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.70
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.29-30
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.30
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.42
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली:राजकमल पेपरबैक्स.पृ.73-74
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2016).निरुपमा.नई दिल्ली:राजमलक पेपरबैक्स.पृ.10
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2016).निरुपमा.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.27
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2016).निरुपमा.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ27
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.73
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2015).अलका.नई दिल्ली : राजकमल पेपरबैक्स.पृ.74
  निराला,सूर्यकांत त्रिपाठी.(2018).अप्सरा.नई दिल्ली:राजमलक पेपरबैक्स.पृ.128
  चंद्र,विपिन.(2008).आधुनिक भारत का इतिहास.हैदराबाद : ओरियंटब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड.पृ.219


# पता: 45, गोरख पाण्डेय छात्रावास, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र- 442001
संपर्क: 6394667552
ईमेल:  yogeshmishra154@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।