कहानी: आशा (छात्र लेखक)

शर्ली माथुर

ड्यूक विश्वविद्यालय (सांख्यिकी की छात्रा)


10 सितम्बर, 2002 - प्रिया का कॉलेज

बहुत लंबा दिन था और प्रिया को अच्छा लग रहा था कि वह आखिर घर जा रही थी। आसमान में सूरज की रौशनी चमक रही थी और हलकी सी हवा चल रही थी उस सितम्बर के दिन। हवा के झौंके से थोड़ी सी पत्तियां भी चक्कर लगाते हुए झड़ रही थीं। इस अच्छे मौसम के कारण प्रिया का मूड काफी अच्छा था। जब प्रिया एक चौराहे पर रुकी, तो उसने सोचा कि शायद वह वहाँ पर बने हुए स्टारबक्स से कुछ पीने के लिए खरीदे। आखिर में उसने कुछ नहीं लिया और वह घर की ओर चलती रही क्योंकि उसके पास बहुत सारा स्कूल का काम था उस रात करने के लिए, तो वह कॉफी की दुकान की कतार में नहीं रुक सकती थी।
अभी प्रिया कॉलेज के दूसरे साल में थी, और उसे अब अहसास होने लगा था कि वह अपने कॉलेज के सालों में क्या पढ़ना चाहती है। उसका पहला साल कॉलेज में बहुत खराब था क्योंकि वह किसी तरह अपने आप को जीव-विज्ञान और रसायन विज्ञान खुशी से पढ़ने के लिए ज़ोर लगा रही थी। वह काफी होशियार थी तो उसके अच्छे मार्क आते थे, पर उसका दिल अपनी पढ़ाई में नहीं था। लेकिन, उस साल उसने बस ऐसे ही एक कोर्स लिया था कविताओं के बारे में। उसे वह कोर्स बहुत पसंद आया। उसके पहले उसको ये अहसास नहीं हुआ था कैसे एक कविता इतनी अच्छी तरह से मनुष्यों की भावनाओं को दिखा सकती है। उस कोर्स में उसका मन लगता था, तो उसने फिर निर्णय लिया कि वह कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ेगी। यह उसने जो पहले सोचा उससे काफी अलग था। पहले तो वह सोच रही थी कि वह जीव-विज्ञान या रसायन विज्ञान पढ़ेगी और फिर डॉक्टर बन जाएगी, ठीक उसकी बड़ी बहन की तरह। 
बहन, आलिया के बारे में सोचने से उसे याद आया कि उसकी बहन तो अभी गर्भवती थी। उसको याद आया कि उसकी बहन कितनी खुश थी जब उसने प्रिया को कुछ महीने पहले खुशखबरी दी थी कि वह माँ बनने वाली है। प्रिया भी बहुत खुश हुई थी कि वह मौसी बनने वाली है। वह दिन अब शीघ्र ही आ रहा था क्योंकि आलिया को करीब नौ महीने हो गए थे गर्भवती हुए। ये सब सोचते हुए प्रिया का मन हुआ आलिया से बात करने का। जैसे ही वह अपना फोन निकाल रही थी आलिया को फोन लगाने के लिए, अचानक एक गाड़ी, जो काफी तेज़ी से आ रही थी, सड़क से भटक गई और सीधे प्रिया से टकरा गई। प्रिया को इतना भी समय नहीं मिला सोचने के लिए कि क्या हो रहा था। वह चिल्लाई और धड़ाम से सड़क पर गिर गई और उसका फोन हवा में उछल गया और उससे कुछ मीटर दूर जमीन पर गिर गया। उसके टुकड़े हो गए। वह वहाँ जमीन पर लेटी रह गई, प्रिया का आखरी खयाल सिर्फ यह था कि उसके पास आलिया के होनेवाले बच्चे से मिलने का मौका कभी नहीं आएगा।
10 सितम्बर, 2002 – आलिया का घर

जैसे दिन बीतते जा रहे थे, आलिया ज्यादा चिंतित हो रही थी। उसका बच्चा अब किसी भी दिन आ सकता था, पर उसे मालूम नहीं था कि कौन से दिन वह आयेगा, इसलिए वह काफी परेशान थी। आलिया अपने बिस्तर पर लेटी थी और आराम कर रही थी ताकी उसकी फिक्र कम हो जाए। उसका बिस्तर कमरे की दीवार के बीच में था, और बिस्तर के दाहिने दीवार पर दो बड़ी खिड़कियाँ थीं जिनसे दोपहर की तेज़ रोशनी कमरे के अंदर आ रही थी। इस गरमी में लेटने से आलिया को बहुत आराम मिल रह था और उसकी आंखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं। जैसे ही उसको नींद आनेवाली थी, अचानक उसको जोर से दर्द होने लगा – उसकी प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी।
इन दिनों, आलिया का पति, मार्क, घर से काम कर रह था क्योंकि उसको पता था कि उसके बच्चे का जन्म किसी भी दिन हो सकता है। इसलिए, जब उसको आवाज़ आई कि आलिया उसको बुला रही थी, उसको एकदम पता चल गया कि बच्चा होने वाला है, और वह तुरंत उसके और आलिया के कमरे के तरफ दौड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने आलिया की मदद की गाड़ी तक पहुँचने में, और फिर वे दोनों अस्पताल की ओर चले। 
अस्पताल पहुँचने के करीब बारह घंटे बाद, एक चीखता हुआ बच्चा निकला आलिया के गर्भ से। आलिया की पीड़ा से आँसू उस वक्त खुशी के आँसू बन गये जब वह आखिर में अपनी बेटी को अपने गोद में ले रही थी। उसके चहरे पर थकान दिख रही थी, पर उसके साथ भी वह मुस्कुरा रही थी क्योंकि इतने महीनों बाद, वह अपनी छोटी सी बच्ची को पकड़ सकती थी और देख सकती थी। जब थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने उससे बच्ची के नाम के लिए पूछा, उसने खुशी से वह नाम दिया जो प्रिया ने बताया था कुछ महीने पहले और उसे और मार्क को पसंद आया था – “आशा”।

इस पल की खुशी बहुत देर तक नहीं रही क्योंकि थोड़े दिन बाद आलिया को उसकी जिंदगी का सबसे खराब समाचार मिला – उसकी प्यारी छोटी बहन प्रिया मर गयी थी एक लापरवाह इंसान की वजह से।

10 सितम्बर, 2007 – आलिया का घर

“आशा! जल्दी से इधर आओ बिटिया, तुम्हारे दोस्त आ गये हैं।” 
ये सुन कर, आशा दौड़कर दरवाजे की ओर चली। आज उसके सारे दोस्त उसके घर आए थे उसका पाँचवा जन्मदीन मनाने। आशा बहुत खुश थी क्योंकि उसके पास अब पूरा दिन था अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए, और उसको ढेर सारे तोहफे मिलने वाले थे। जैसे ही आशा दरवाजे के पास आ जाती है, उसकी सबसे पक्की दोस्त, अदिती, मुस्कुराते हुए उसके पास आती है एक बड़ा सा नीले पेपर में बंधा हुआ तोहफा देने। वह खुशी से आशा से कहती है, 
“जन्मदिन मुबारक हो, आशा।” 
आशा भी मुस्कुराने लगती है जब वह कहती है, “शुक्रिया, अदिती। चलो, अब हम घर के पीछे चलें, बाहर खेलने।” 
यह कहकर, दोनों बच्चियाँ खुशी से घर के पीछे की ओर भागती हैं जहाँ मार्क खड़ा था, और फिर वह दोनों बच्चियाँ को भोजन कक्ष में ले जाता है, जहाँ दरवाजा है जिससे बाहर के आँगन पे जा सकते है। फिर, वह बच्चियों को धीरे से तीन कदम की सीढ़ी से नीचे लाता है तो अब वे तीनों पीछे के आंगन में है। 
“ठीक है, तुम दोनों अब यहाँ खेलना शुरू कर सकती हो, पर ध्यान से खेलो, क्योंकि अफसोस की बात होगी अगर किसी को चोट लग जाये आशा के जन्मदिन पर”।
दोनों बच्चियां मार्क से वादा करती हैं कि वे ध्यान से खेलेंगी, और फिर उनका खेल आरम्भ होता है। थोड़ी देर बाद, और भी आशा के दोस्त आते हैं पीछे के आंगन में, और मार्क खुशी से देखता है अपनी बेटी को। 
जब खाने का वक्त आ जाता है, मार्क सारे बच्चों का मन किसी तरह मना लेता है ताकी सारे बच्चे घर के अंदर आ जाये। जब सारे बच्चे अंदर आ जाते हैं भोजन कक्ष में, मार्क जोर से कहता है, 
“चलो बच्चों, अब सब लोग मेरे साथ आओ रसोई में ताकी तुम सब अपने हाथ धोकर खाना खा सको।”
 सारे बच्चे मार्क का कहना जल्दी से मान लेते हैं क्योंकि उन सब को अब महसूस होने लगता है कि वे कितने भूखे हैं इतना सब खेल-कूद करने के बाद। हाथ धोकर सारे बच्चे टेबल पर बैठ जाते हैं, और मार्क उनको पिज़्ज़ा देना शुरू करता है। सारे बच्चे खुशी से खाना शुरू करते हैं, और आशा जल्दी से अपना खाना खत्म कर लेती है। जब उसे खाना खत्म करने के बाद अपनी थाली से ऊपर देखने कि फुरसत मिलती है, उसे महसूस होता है कि उसकी मम्मी कहीं नहीं हैं। यह देखकर, आशा अपनी कुर्सी से उठ जाती है यह जानने कि उसकी माँ कहाँ हैं। 
वह पहले अपने पिता के पास जाती है और उनसे पूछती है, 
“मम्मी कहाँ हैं? क्या वह ठीक हैं?” 
जैसे ही आशा ये प्रश्न पूछती है, उसके पिता के चहरे की रोशनी थोड़ी कम हो जाती है। उस पल में, आशा को आभास होता है कि कुछ गलत हो गया है उसकी माँ के साथ। पर जितनी ही जल्दी उसके पिता का मुँह छोटा हो गया था, उतनी ही जल्दी वह फिरसे ठीक हो गया और आशा से कहा, 
“तुम्हारी मम्मी एकदम ठीक हैं, वह अभी आती ही होंगी वापिस पार्टी में।” 
यह सुनकर आशा को संतोष हो जाता है, और वह फिरसे अपने दोस्तों के साथ बैठ जाती है।
जैसे ही सब बच्चों का खाना खत्म होता है, आलिया वापिस आ जाती है। 
“ठीक है बच्चों, अब वह पल आ गया है जिसका तुम सब कर रहे थे इंतज़ार – केक काटने का टाइम!” 
यह सुनकर सारे बच्चे खुश हो जाते हैं और वह अपनी कुरसियों में मचलने लगते हैं। मार्क उन सब को शांत कर देता है तब तक आलिया केक के साथ टेबल तक आ जाती है। वह केक में लगी हुई मोमबत्त्ती, जो “पांच” के रूप में है। उसको जला देती है। फिर, लोग “जन्मदिन मुबारक हो” का गाना शुरु करते हैं, और बाकी बच्चे और मार्क उसके साथ गाने लगते हैं। आशा अपने चारों ओर खुशी से देखती रहती है कि उसके सारे दोस्त उसके लिए गा रहे हैं। जब गाना खत्म हो जाता है, आशा आँख बंद करके एक इच्छा सोचती है, फिर वह मोमबत्त्ती को एक जोर की फूंक से बुझा देती है। उसके माँ-पिता फिर एक छोटा सा चम्मच केक का लेते हैं और आशा को खिलाते है। वह खुशी से खाती है, और फिर वह भी जल्दी से एक चम्मच केक का लेती है अपनी दोस्त अदिती को खिलाने के लिए। फिर, आलिया बाकी केक काट देती है और सारे बच्चों को एक पीस दे देती है।
केक खाने के थोड़ी देर बाद, सारे बच्चों के माँ-बाप आने लगे अपने बच्चों को साथ ले जाने लगे जैसे ही आखरी बच्चा चला गया, आलिया के चहरे की खुशी एकदम से चली गई और फिर सिर्फ थकान दिख रही थी उसके चहरे पे। वह फिर घर के एक कोने में छोटे से कमरे में जाती है। कमरे में पहुँचकर वह खड़ी हो जाती है बहुत सारी भगवान के मूर्तियों के सामने। जब वह छोटी थी, तभी से जब भी वह उदास होती थी, वह घर के छोटे से मंदिर में चली जाती थी। आज उसे पता है कि कायदे से उसे उदास नहीं होना चाहिए क्योंकि आज उसकी बेटी का जन्मदिन है। लेकिन आज वह भी दिन है जब उसकी प्यारी छोटी बहन मर गयी थी। वह थोड़ी देर और वहाँ खड़ी रहती है, और फिर कमरे से बाहर जाने लगती है तब अचानक छोटे से हाथ उसके पैर को पकड़ लेते हैं। वह नीचे देखते हुए हँसके पूछती है 
“आशा? तुम यहाँ क्या कर रही हो?” 
उसकी बेटी उसके सवाल का उत्तर नहीं देती, बजाय वह खु्द एक सवाल करती है, 
“आप दुखी क्यों हो?” 
यह सुनकर आलिया को आश्चर्य होता है, और वह जल्दी से अपना मुँह छूकर देखती है कि कहीं वह रोने तो नहीं लगी? पर उसका मुँह तो बिलकुल सूखा है, तो वह जल्दी से कहती है 
“आशा बिटिया, मैं दुखी नहीं हूँ।” 
यह सुनकर आशा घुड़कती है और कहती है, 
“मुझसे झूठ मत कहो, मुझे पता है आप इस कमरे में जाती हैं जब आप दुखी होती हैं, और आपका चेहरा भी ऐसे ही दिखता है जब आप दुखी हैं।” 
आलिया को आश्चर्य होता है क्योंकि उसने यही शब्द आखिर बार अपनी छोटी बहन से सुने थे जब उनकी दादी मरी थी और प्रिया ने उसे ऐसी ही स्थिति में देखा था। 
“आपका चेहरा ऐसे ही दिख रहा था जब आपकी दादी मर गई थी।” 
यह सुनकर आलिया स्थिर हो जाती है क्योंकि आशा को यह सब, उसकी आदतों और दादी के बारे में, नहीं मालूम होना चाहिए था, लेकिन किसी तरह उसे यह सब मालूम है। आलिया को यकीन ही नहीं हो रह है कि उसकी बेटी को यह सब पता है, पर फिर वह सोचती है कि एक कारण हो सकता है आशा की इस जानकारी के लिए। इसलिए आलिया धीरे से पूछती हैं 
“अगर हमारे पास कुत्ता होता, तो उसका नाम क्या होता?” 
एक मासूम आवाज में आशा कहती है, 
“आपने तो मुझे हर बार मना किया है जब मैंने कुत्ता मांगा है, पर अगर हम एक कुत्ता पालते तो मैं उसका नाम जॉकी रखती।” 
यह सुनकर आलिया के मन में कोई सन्देह नहीं रह गया, और वह जोर से रोने लगती है जैसे वह नीचे गिरती है उपनी बेटी को गले लगाने। आशा को पता नहीं था क्यों उसकी माँ रो रही थी, पर उसके दिल में उसे आभास होता है कि उसकी माँ खुशी से रो रही हैं। और वाकई आलिया खुशी से रो रही थी। पांच साल पहले उसे लगा था कि उसने हमेशा के लिए अपनी बहन को खो दिया था, पर अब उसे यकीन हो गया है कि उसने अपनी बहन को नहीं खोया है, क्योंकि वह यही है, उसकी बाहों में।


शर्ली माथुर: जॉर्जिया, अमेरिका में जन्म, माँ-बाप भारतवंशी। ड्यूक में तीसरे वर्ष सांख्यिकी की छात्रा। हिंदी के पहले साल की छात्रा। हिंदी सीखने में रुचि। पियानो बजाने का भी शौक।

shirley.mathur@duke.edu

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