जीवन और जगत के अंतिम सत्य का अन्वेक्षण करता समरेश बसु का उपन्यास 'कहाँ पाऊँ उसे'

समीक्षक: अंजू शर्मा

प्रवक्ता हिंदी विभाग, श्री सनातन धर्म प्रकाश चंद कन्या महाविद्यालय, रुड़की उत्तराखंड

कहाँ पाऊँ उसे
समरेश बसु
भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-110003 
प्रथम संस्करण – 1982

नयनाभिराम मुखपृष्ठ और उत्सुकता उत्पन्न करने वाला शीर्षक 'कहाँ पाऊँ उसे' बंगला के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार समरेश बसु के प्रसिद्ध उपन्यास 'कोथाय पावो तारे' का हिन्दी रूपान्तरण है। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास 'शम्बा' के लिये उन्हें सन् 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। बंगला साहित्य में 'कालकूट नाम से विख्यात समरेश जी उन रचनाकारों में से एक है जो अपनी अनोखी साहित्यिक शैली के कारण पाठको के ह्रदय में अमिट छाप छोड़ते हैं।" 'कहाँ पाऊँ उसे' उनका ऐसा उपन्यास है जिसे हाथ में लेते ही पाठक पन्ने पर पन्ने पड़ता चला जाता है और उसे पता ही नहीं चलता कि किस प्रकार एक दृश्य से अनेक दूसरे दृश्य तक वह कहानी के जीवंत वातावरण और पात्रों के रोमांचक मनोजगत में अपनी चेतना को विसर्जित करता चला गया है तथा नायक खोज में है जीवन और जगत के उस अंतिम सत्य की उस चरम उपलब्धि की जो पग पग पर अपनी छाया तो छोड़ दी चलती है किंतु पकड़ में नहीं आती यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती प्रेम रोमांच और राग विराग में कितने अद्भुत पड़ाव साथ-साथ बहती नदी के तट पर आते हैं कि लगता है यहाँ बसे इन पात्रों के बंधन से नायक मुक्त नहीं हो सकेगा।"

छातीमतला के मेले में जन-अरण्य से गुजरते हुए नायक मन ही मन हँसने लगता है जब उसे याद आता है कि वह संकल्प से विचलित हो चुका है वह कहता है, "यह संकल्प मैं कैसे भूल गया कि मुझे केवल अमृत पान करना है। मेरे इर्द-गिर्द केवल अमृत है और तिक्त रस के सारे स्रोत मेरी छाया से दूर बहते हैं। अपने को भूलकर, मैं उस अलख की ओर अपना खाली पात्र उठा देता हूँ। अमृत मिले या ना मिले। यदि कोई ज्वाला धड़कती है तो धधका करे। जो दीवा-निशि जलते हैं, वही प्रकाश देख पाते हैं। पथ चलते हुए मानापमान की बात नहीं सोचूंगा… यह संसार मेरे मन के अनुरूप भावनाओं से नहीं बुना गया। जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। इसीलिए इस संसार के स्वभाव में वही नि:शब्द विराज रहा है जो असंभव है संभवतः वही जगत में संभव है। उस असंभाव्य को ही मैं अपने अंत:समर्पण द्वारा ही जानने का प्रयास करता आ रहा हूँ।" (पृष्ठ-409)

"यात्रा के आरंभ से ही साथ है एक दरवेश, एक मुर्शिद पूर्वांचल की प्राकृतिक सुषमा का अंग है, वहाँ के निवासियों का सहचर मित्र है, उनकी श्रद्धा का भाजन है, बाउल गीतों के सूफी दर्शन का गायक है- वह न रुकता है, न रुकने देता है।" (आवरण पृष्ठ से)

प्रस्तुत उपन्यास में कई ऐसे तत्वों को समाविष्ट किया गया है जो अन्यत्र दुर्लभ है। उपन्यास के पात्र गाजी के माध्यम से उपन्यासकार ने बहुत गूढ़ रहस्यों को बड़े ही सरल शब्दों में गीतों के माध्यम से रखा है। उपन्यास में आए गीत का एक उदाहरण दृष्टव्य है-

"इस दुनिया में आकर भी
मन मुरशेद को न जान सका
कहा जाऊ में, कोई तो नहीं बताता
मेरा कोई नही
मैं कह पड़ा था,
मुझे यह किसने बुलाया?" (पृष्ठ-06)
***********************

तेरे दर्शन की आस में, मैं बोल रहा हूँ देस-विदेस
कहाँ-कहाँ मारा-मारा फिरा, कितनों से मिला
पर हो ना सकी मुलाकात रे मितुआ!
कह नहीं सकता किसकी खातिर नाच रहा तन मन जीवन…..
किसे सुनाऊँ पीड़ा मन की ऐसा नहीं कोई जीवन-धन
कहाँ पाऊंगा मैं अपना मन मितुआ!"
(पृष्ठ-29)

उधर समर्पण की चाह लिये अलका उर्फ झीनी और किसी गहराई में डूबे हुए फिर भी पूरी तरह से उन्मुक्त अचिन दा एवं गोपीदास का भी साथ भी नायक की अनुभूति में नए आयाम जोड़ता है। सभी की अपनी-अपनी प्रकृति जीवन जीने की अपनी-अपनी कला एक के बाद एक नए अनुभव, जिन्हें नायक सफलता से सहेजता हुआ निर्लिप्त-सा आगे बढ़ता चला जाता है। आखिर उसके अंतर की लालसा जो उकसाती रहती है -कहाँ पाऊँ उसे! कहाँ पाऊँ उसे!!"6 (आवरण पृष्ठ से)

1 comment :

  1. 'कहाँ पाऊँ उसे' से मेरा प्रथम साक्षात्कार शायद 80 के दशक में हुआ था, तबसे अब तक न जाने कितनी बार बीच- बीच में इसके सुख- सागर में डूब उतरा चुकी हूँ।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।