साँस की बस एक ही आस – वृक्ष लगाएँ आस-पास’

अंजली खेर

चलभाष: +91 942 581 0540; पता: सी-206, जीवन विहार अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड भोपाल- 462 003 मध्य प्रदेश

सभी अस्‍पतालों के बाहर चस्‍पा नोटिस –”अस्‍पताल में बेड उपलब्‍ध नहीं, असुविधा के लिए खेद हैं “ पढ़ मायूसी का चोला ओढ़े जीवनदान की अपेक्षा लिए भटकते “कोविड-19’’ के मरीजों की खबरें हृदय को तार-तार कर जाती हैं। “कोरोना’’ पीडि़तों की दर्दनाक कराहें, अपने-अपनों की सॉसों को सहेजने ऑक्‍सीजन के सिलेंडर मुंहमॉगे दामों पर किसी भी हाल उपलब्‍ध कराने की गुहार लगाते परिजन कई-कई घंटे कतार में खडे होते, ईश्‍वर से अपनों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए दुआ मांगते, जिसकी दुआ कुबूल होती, ऑक्‍सीजन पाकर खुद को खुशकिस्‍मत मानते, पर वहीं कुछ  हताश-निराश हो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते। सच ऑक्‍सीजन की आस में दम तोड़ती सॉसों की दास्‍तां से पटा समाचार पत्र और न्‍यूज़ चैनल्‍स के समाचार हृदय को दुखाक्रांत कर जाते हैं। 
त्राहि-त्राहि के दृश्‍य अंकित करते ये चित्र हम सभी के लिए  दिल दहला देने वाले हैं। यह सच है कि आज का भयावह वर्तमान असंख्‍य लोगों के जीवन  में कभी न भर पाने वाले पीड़ादायक घावों को हमेशा-हमेशा के लिए हरा-ताज़ा सा कर गया हैं, पर जिंदगी जीने का नाम हैं, नि:संदेह “समय है, गुज़र ही जायेगा, ’’ बिल्‍कुल उसी तरह जिस तरह काली-भयावह घनी अंधियारी रात के बाद उजली-सुनहरी भोर का आगमन निश्चित हैं, बस इसी सकारात्‍मक आस को मन में संजोये एक कोरोना वॉरियर अपने मरीजों के लिए दवा के पर्चे में अंत में लिखते हैं –”जब आप ठीक हो जाएँ, तो एक पेड़ जरूरी लगाएँ। “ जी हाँ, ये हैं अहमदनगर (महाराष्‍ट) के आयुर्वेदिक डॉक्‍टर डॉ कासार। महामारी के इस दौर में ऑक्‍सीजन की कीमत हम तो सब समझे, साथ ही अपने आज और नई पीढ़ी के सुर‍क्षित कल के लिए संचेतना का अलख जगाती डॉ कासार की उक्‍त पहल इस उम्‍मीद के साथ कि “लोगों की सोच में शायद कुछ बदलाव आये,’’  वाकई प्रशंसनीय हैं। 
इन पंक्तियों पर गौर करें -:
“चिंतित हैं आज सभी बुद्धिजन    कैसे बचाएँ हम अपना पर्यावरण,  कोई कहे, “नए वृक्ष लगाओ     कोई कहे, “जो हैं, उन्‍हें बचाओ,, 
कोरोना वायरस की दूसरी लहर के आगमन के साथ ही आज हम सभी जिंदगी के लिए क्षण-प्रतिक्षण एक जंग सी लड़ने को विवश हो चले हैं। पिछले बरस की यादें आज़ भी हम सबके ही जेहन में तरोताज़ा हैं  जब काल के दुष्‍चक्र के रूप में कोराना ने हमें पहली दस्‍तक दी थी और हम घर की चारदीवारी में एक लंबे समय के लिए कैद हो चले थे। प्रकृति की हरितिमा को आँखों के कैमरे में कैद करना, स्‍वच्‍छंद हवा में विचरण, कल-कल बहती नदिया-दरिया और झरनों का सरगमी रूनझुन नाद तो जैसे हम बिसरा ही बैठे थे। कानों में अमृतरस घोलती कोकिला की “कुहु’’, भंवरों की गुनगुन, और चिडि़यों की चहचहाहट का रसास्‍वादन एक दिवा-स्‍वप्‍न की भांति हो चला था।  प्रकृति के ये आलौकिक उपहार सदियों से हमें स्‍व-स्‍फुर्त कर, स्‍वास्‍थ्‍य, समृद्धि और सकारात्‍मकता की अनमोल सौगात देते आये हैं। टोटल लॉकडाउन पीरियड में कई परिवारों ने इन सभी नज़ारों को अपने घर में कैद करने के लिए भित्ति कला (ग्रेफिटी आर्ट) का सहारा लिया। प्रकृति आधारित पेंटिंग्‍स को घरों की सादी दीवारों पर अंकित कर इस आर्ट के मद्देनज़र हम प्रकृति की मनपसंद थीम का आनंद अपने ड्राइंग रूम, लिविंग रूम या बेड रूम में भी ले सकते हैं। भित्ति कलाकार प्रियंका बताती हैं कि कोरोना काल में इसकी मांग 5-6 गुना बढ़ गई हैं क्‍यों‍कि मन-मस्तिष्‍क में फैली नकारात्‍मकता को दूर करने का सबसे बेहतर साधन प्रकृति का सान्निध्‍य ही हैं। 
हरियाली, स्‍वच्‍छ जीवनवर्धक प्राण वायु के अतिरिक्‍त इन हरे-भरे पेड़-पौधों की महत्‍ता को इस तथ्‍य से भी समझा जा सकता हैं कि एप्‍को (एनवायरमेंट प्‍लानिंग को-ऑर्डिनेशन आर्गेनाइजेशन) ने पौधों का ऑडिट किया तो कई नए तथ्‍य सामने आये मसलन –”सड़क पर लगे पौधे हरियाली बढ़ाने के साथ एक्‍सीडेंट से भी बचा रहे हैं।” 
गौरतलब है कि पेड़-पौधे, प्रकृति, वन हमारी संस्‍कृति का महत्‍वपूर्ण अंग हैं। लोकसंस्‍कृति / लोक कथाएँ वनों से जुड़ी हैं। शास्‍त्रो में उल्‍लेख हैं –”एक वृक्ष सौ पुत्रों के समान है।” हरितिमा विहीनता हमें जीवन विहीन बना देगा। एक सर्वे के अनुसार हरियाणा–पंजाब जैसे हरितक्रांति के राज्‍य वन विहीन है। उत्‍तरप्रदेश 4;5 प्रतिशत, बिहार 7;10 और पश्चिम बंगाल में 14 फीसदी वन की कमतरता हैं। 
हमारे जीवन की सारी जरूरतें पूर्ण करने वाले वन अंधाधुंध तरीके से नष्‍ट हो रहे हैं। दुनिया की इस बढ़ती आबादी के लिए एक हजार अरब वृक्ष चाहिए जो करीब 810 अरब टन कार्बनडायऑक्‍साइड अवशोषित कर सके पर विडंबना का विषय हैं कि वन संसाधन आंकलन की रिपोर्ट (1990-2015) के अनुसार दुनिया में वन 31;6 फीसदी से घटकर 30 फीसदी पर पहुँच गये हैं, जो अत्‍यंत चिंताजनक आंकड़ा है। 
हम जानते हैं कि जीवनदायिनी ऑक्‍सीजन प्रदान करने वाले वृक्ष पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के साथ ही वर्षा का भी महती कारण है। वृक्षों की कमी के चलते पर्यावरण चक्र प्रभावित हो रहा है, कीट जो कि दुनियाभर के खाने-पीने की चीजों के लिए जरूरी परागण में मदद करते हैं, खाद्य श्रृंखला में अहम भूमिका निभाते हैं, कूड़े के निपटारे में मदद करते हैं, उनकी संख्‍या में बेतहाशा कमी हो गई हैं, क्‍योंकि पेड़-पौधों के अभाव में उनको रहने के लिए सुरक्षित वातावरण प्राप्‍त नहीं हो रहा हैं। 
गौरतलब है कि मानवजनित कृत्‍यों या फिर प्राकृतिक वनों के आग की चपेट में आने से हरे-भरे जीवनदायिनी वन द्रुत गति से नष्‍ट होते चले जा रहे हैं। वनों में लगने वाली आग के कारणों और पेड़ बचाने की महती आवश्यकता पर मंथन करना अत्‍यावश्‍यक है। 
भारतीय वन सर्वेक्षण संस्‍थान के एक शोध के अनुसार अग्नि संवेदनशील क्षेत्र के रूप में जानेजाने वाले मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़, महाराष्‍ट्र, ओडिशा, बिहार और उत्‍तरप्रदेश इलाकों में पिछले कुछ बरसों से कम बारिश के चलते जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों को सूखा बनाने के साथ ही जंगलों में आग लगने की आशंका कई गुना बढ़ गई हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण संस्‍था की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 15 प्रतिशत जंगली भाग आग से प्रभावित हैं। ये प्रभावित जंगल देश के 348 जिलों में फैले हैं। 70 प्रतिशत आग मध्‍य भारत के पहाड़ी इलाकों एवं दक्‍कन पठार में लगती है। 12;5 प्रतिशत क्षेत्र पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में हैं जहॉ जंगलों में आग लगने की घटनाएँ होती हैं। 
वैसे भारतीय वन अधिनियम के तहत् आरक्षित वनों में आग लगाना या किसी वस्‍तु को जलता छोड़ना जिससे वन को खतरा हो, दंडनीय अपराध हैं जिसके लिए छह महीने तक की जेल, एक हजार रूपए जुर्माना, जंगल को हुए नुकसान की भरपाई की वसूली के साथ उस व्‍यक्ति के चारागाह या वन उपज के अधिकारों को स्‍थगित करने का प्रावधान हैं। साथ ही एक पेड़ 50 साल में हमें क्‍या क्‍या देता हैं, इसी का आधार मानकर भी जुर्माना तय करना निश्चित किया गया हैं।  बेशक प्राकृतिक कारणों पर तो किसी का बस नहीं, कभी वातावरण के तापमान में इज़ाफ़े के कारण तो कभी बिजली के गिरने से जंगलों में लगी आग को बरसों बरस बुझाना मुश्किल हो जाता है। प्राकृतिक गर्मी से पेड़ो के पत्‍तों के आपस में घर्षण मात्र से आग लग जाती है। 
हालांकि कई बार प्राकृतिक तौर पर लगी जंगली आग पुरानी वन‍स्‍पति को साफ कर मिट्टी को पोषक तत्‍व लौटाती हैं साथ ही जैव विविधता संरक्षण, घास के मैदानों और झाड़ीनुमा पर्यावासों को पुनर्जीवित करने में ये आग मदद करती हैं। पर ये वनों की आग भीषण समस्‍या में तब तब्‍दील हो जाती हैं जब मानव जनित होती हैं। हाल ही के समय में दुनियाभर के जंगलों में लगने वाली आग की 75 फीसदी घटनाएँ मानव जनित होती हैं। वहीं भारत में ऐसे मामले 95 फीसदी हैं। इसमें मानव की लापरवाही प्रमुख वजह हैं जैसे जंगलों में महुआ या तेंदुपत्‍ता बीनने गये और जाने-अनजाने अधजली बीड़ी-सिगरेट / ज्‍वलनशील पदार्थ वहाँ फेंक दिये। कभी कभी जंगलों को साफ करने, शिकार करने या चारागाह को बढ़ाने के लिए भी स्‍थानीय निवासियों द्वारा जानबूझकर गैरकानूनी ढंग से जंगलों में आग जलाई जाती हैं। 
आज “कोरोना महामारी’’ के विकट दौर में जीवनदायिनी ऑक्‍सीजन की महत्‍ता को हम बखूबी जान गये हैं। नि:संदेह ये ‘कोरोना संकट’ हमारे लिए अग्निपरीक्षा की घडि़यां लेकर आया है, पर जिस बात पर अपना वश नहीं, उसे लेकर चिंतित होने के बजाय समय रहते चेतकर इससे निज़ात पाने, भविष्‍य के लिए पर्यावरण सहेज डिब्‍बाबंद प्राणवायु के लिए जद्दोजहद करने के बजाय स्‍वच्‍छंद वायु की शीतलता का उन्‍मुक्‍त आनंद लें स्‍वयं को स्‍वास्‍थ्‍य संपत्‍ति से लबरेज करने के साथ ही आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित – स्‍वस्‍थ वातावरण प्रदान करने की हम सबकी जिम्‍मेदारी पर मंथन करने के साथ ही कुछ क्रियात्‍मकता की आवश्‍यकता अब महती हो चली हैं। 
बम्‍हौरी वन परिक्षेत्र अधिकारी महेंद्र कुमार पलेचा ने बताया कि डायरेक्‍टर जनरल इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्‍ट ट्री रिसर्च एँड एजुकेशन के अनुसार एक पेड की उम्र 50 साल होती हैं  और 50 साल के अपने इस जीवनकाल में एक पेड हमें 52 लाख 400 रूपए की सुविधा प्रदान करता हैं। तो आइये जानें और ऐसे क्‍या तथ्‍य हैं जिससे कि पेड़ बचाना हमारे लिए बेहद जरूरी हैं - ** पचास साल में एक पेड़ से 11 लाख 97 हजार 500 रूपए की ऑक्‍सीजन मिलती है। 
** एक पेड़ अपने जीवनकाल में वातावरण से एक टन कार्बन डायऑक्‍साइड कम करता है।  ** अपने जीवनकाल में एक पेड 23 लाख 68 हजार 400 रूपए का वायु प्रदूषण नियंत्रित करता हैं। 
** इसी अवधि में 19 लाख 97 हजार 500 रू मूल्‍य की भूक्षरण नियंत्रण व उर्वरता बढ़ाने में सहयोग करता है। 
** एक साल में एक एकड़ में लगे पेड़ इतनी कार्बन डायऑक्‍साइड सोंख लेते हैं जितनी कि एक कार को 8700 मील चलाने के बाद निकलती है।  ** सड़कों से उठने वाली धूल को पेड़ 60 फीसदी तक कम करते हैं।  ** एक पेड़ 50 साल में 5,31,500 भूस्‍खलन रोकता है।  ** एक एकड़ में लगे पेड़ एक साल में 2;6 टन कार्बन डायऑक्‍साइड़ हटाते हैं।  विगत कुछ दशकों से वृक्षों की संख्‍या में अप्रत्‍याशित रूप से आई कमी ने हमारे जीवन की गति को बाधित किया हैं। हालांकि इस बाबत् चेतना की लहर बह चली हैं। पर्यावरण संरक्षण हेतु आई आर एस मेहरा जी ने “मियावाकी तकनीक’’ के माध्‍यम से एक मुहिम का आगाज़ किया हैं। भारतीय संस्‍कृति की जुड़ी पुस्‍तकों का अध्‍ययन कर वृक्ष-आयुर्वेद की अहमियत जानी फिर उन्‍हे अर्बन जंगल तैयार करने की तरकीब सूझी जिसमें शहरी इलाकों में कम होती पेड़ो की संख्‍या बढ़ाई जा सके। तीन साल के प्रयासों में उन्‍होंने देशभर में 80 माइक्रो फॉरेस्‍ट तैयार करा डाले। लुधियाना में ही 25-25 ऐसे शहरी जंगल बन गए हैं। 
मेहरा जी बताते हैं कि अगर पौधे एक साथ लगाएँ तो जल्‍दी विकसित होने के साथ एक दूसरे को बचाते भी हैं। अर्बन फॉरेस्‍ट तकनीक में डेढ़ से दो फीट की दूरी पर पौधे लगाये जाते हैं। लुधियाना में लोग फॉर्म हाउस के अतिरिक्‍त धार्मिक स्‍थलों और फेक्‍ट्री के आसपास जंगल तैयार कर रहे हैं।  ’’नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल’’ ने मेहरा जी से संपर्क कर उनके साथ जुड़ने का प्रस्‍ताव रखा हैं। अब तक वहाँ 13 माइक्रो फॉरेस्‍ट तैयार हो चुके हैं। कुल 300 जंगल बनाने का लक्ष्‍य हैं। 
भारत ही नहीं, विदेशों में भी “पर्यावरण संरक्षण्‍’’ हेतु अनुकरणीय पहल देखने को मिलती हैं। गौरतलब हो कि इंग्‍लैंड के जंगलों में दुनिया का एक ऐसा पहला ओपन थियेटर बन रहा हैं जिसकी दर्शक क्षमता 350 होगी। यहाँ दिन में पेड़ो की छांव में और चॉंदनी रात में भी कार्यकम हो सकेंगे। इसे खासतौर पर पर्यावरण प्रेमियों के लिए बनाया जा रहा हैं यहाँ थिेयेटर आर्टिस्‍ट अपनी अदाकारी दिखाएँगे साथ ही समय-समय पर पर्यावरण के लिए पेड़ों के महत्‍व को भी समझाएँगे। इसे बनाने वाले चार्लोट बॉन्‍ड ने बताया कि थियेटर का नाम “द थोरिंगटन थियेटर’’ रखा हैं। चार्लोट बताते हैं कि इस थियेटर को बनाने के लिए उन्‍होंने किसी भी पेड को नुकसान नहीं पहुँचाया। 
“ये जिंदगी न मिलेगी दोबारा’’,, कई जन्‍मों के बाद मिले खूबसूरत  व बेशकीमती मानव जीवन को बेतहाशा या कभी परिपूरित न होने वाली आकांक्षाओं की लंबी फेहरिस्‍त के आगे दोयम न करते हुए स्‍वास्‍थ्‍य, प्रसन्‍नता और खुशियों से लबरेज़ करने के लिए छोटी-छोटी कवायदें जैसे कि प्रकृति को सहेजना और वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए हरसंभव प्रयास करना हमारा प्राथमिक कर्तव्‍य हैं।  
तो आइएँ इस हेतु पहल हम अपनी चार-दीवारी से ही करें। आज शहरों में अपेक्षाकृत छोटे फ्लेट्स का चलन जोरों पर हैं जिनमें क्रास वेंटिलेशन का प्रावधान नहीं होता, आस-पास पेड़-पौधों के न होने से रहवासियों को साफ-स्‍वच्‍छ वायु नहीं मिल पाती। घर के कई सामानों में केमिकल्‍स मिले होते हैं जो घर की हवा में विषैले तत्‍व और जहरीली गैसें धीरे-धीरे छोड़ते रहते हैं जैसे कि प्‍लास्टिक, फाइबर और रबर से बने कुछ सामान, मच्‍छर-काक्रोच मारने वाले स्‍प्रे, वार्निश, सफाई करने वाले केमिकल्‍स, बिजली के कुछ यंत्र, कार्पेट, केमिकल प्‍लांट्स और एयर फ्रेशनर आदि वस्‍तुएँ जो हमारी जिंदगी के आवश्‍यक अंग बन पड़े है, इनसे कार्बन मोनोऑक्‍साइड, फॉर्मेल्डिहाइड, कार्बन डायऑक्‍साइड, नाइट्रोजन, बेंजीन, जायलीन, अमोनिया, ट्राइक्‍लोरो इथलीन आदि केमिकल्‍स व नुकसानदायक गैसें उत्‍सर्जित करती हैं जो हमारी सेहत के लिए अत्‍यंत हानिकारक होती हैं। 
ऐसी स्थिति में हमारे सौमित्र बने कुछ घरेलू पौधे (इनडोर प्‍लांट्स) न केवल हमारे घर की खूबसूरती में चार-चांद लगा जाते हैं वरन् बहुत ही कम देखभाल में हमें घर पर स्‍वच्‍छ-स्‍वस्‍थ वातावरण प्रदान कर खुशनुमा प्रसन्‍नचितत्‍त माहौल भी देते हैं, जी हाँ स्‍पाइडर प्‍लांट, ईवी, पीज लिली, डेविल्‍स ईवी, रबर प्‍लांट, स्‍नेक प्‍लांट, इंग्लिश आइवी, तुलसी, एलोविरा, ऐरेका पाम, पाइन प्‍लांट, और मनीप्‍लांट जैसे पौधे ड्राइंगरूम, बेडरूम, लिविंग रूम के साथ ही गैलरी में सजाए जा सकते हैं। न केवल ये हमारे आवासीय स्‍थल को शुद्ध व स्‍वास्‍थ्‍य से भरपूर बनाते है, वरन् ये घर में सकारात्‍मक और आनंदी वातावरण भी निर्मित करते हैं।  बेशक भाईचारे व मैत्रीपूर्ण संबंधों के चलते अब विदेशों से सॉसे सिलेंडरों में कैद हो भारत में आ पहुँची हैं, आखिरकार हम सबको मिल-जुल ही इस आपदा को हराना होगा। काश कि अब सांसों के थमने के सिलसिले पर अब पूर्णविराम लग जाएँ। नि:संदेह इस अग्निपरीक्षा की घड़ी से हम जल्‍द ही उबर जाएँगे, पर जिस तरह हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज प्रकृति का अनमोल उपहार हमें सौंपा था, आइए हम सब मिलजुल प्रण करें कि वृक्षों को बचाकर, नए वृक्ष लगाकर हरियाली, स्‍वास्‍थ्‍य से भरपूर ठीक वैसा ही हरितिम उपहार हम अपने आगे आने वाली पीढ़ी को सौप अपने दायित्‍वों का सफल निर्वहन करेंगे। 
प्रकृति बेहद उदार हैं, हमारे जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं की प्रतिपूर्ति करने के एवज् में हमसे कुछ नहीं मांगती। हमें चाहिए कि बस हम स्‍वार्थपूर्ण मानसिकता से वशीभूत हो, उस बेकसूर वृक्षों की बली न चढ़ा अपने दुर्भाग्‍य को आमंत्रित न करें, हालांकि जानते तो हम यह सब पहले भी थे, अब जरूरत हैं मानने और ठानने की, क्‍योंकि अब बहुत हुआ, हमें हमारी साँसें बंद सिलेंडरों में नहीं, खुली हवा में ही चाहिए,  

“सबक तो हमने लिया है अब सीख 
वृक्ष तो होते हैं हमारे सौमित्र...
पेड़ों को काटने- नष्‍ट होने से बचाना होगा
उजाड़ धरती को फिर हरा-भरा बनाना होगा,
जीवनदायिनी साँस तभी ले पाएँगे 
जब हम सब धरा पर वृक्ष बचाएँगे...” 

3 comments :

  1. कोरोना की विभीषिका में आँखे खोलने वाला ज्ञानवर्धक व सामयिक प्रस्तुति।
    उच्चतम शेणी का लेख जिसमे आंकड़ो ले साथ ही प्रकृति से जुड़ने को असीम प्रेरणा दी गई है।अनंत साधुवाद।

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