सिने रूपांतरण के आयाम और रजनीगंधा

लक्ष्मी

लक्ष्मी

एम.ए.- जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
पीएच.डी. शोधार्थी -हिंदी अध्ययन केंद्र, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर-382030 (गुजरात)


जब भी किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है, तब यह प्रश्न जरूर खड़ा होता है कि फिल्म ने कृति के साथ न्याय किया या नहीं? साहित्यिक कृति के सिने रूपांतरण पर कई बार कृति के लेखक और फिल्म के निर्देशक के बीच असहमति इतनी बढ़ जाती है कि समाधान के लिए न्यायालय के दरवाज़े खटखटाने पड़ते हैं। निर्देशक को रचनात्मक स्वतंत्रता देने के मामले में काफ़ी उदार मानी जाने वाली लेखिका मन्नू भंडारी ने भी ‘आपका बंटी’ पर बनी फिल्म ‘समय की धारा’ पर मुकदमा दायर कर दिया था।1  यूँ तो साहित्य और सिनेमा का पारस्परिक संबंध मूक फिल्मों के दौर से ही प्रारंभ हो गया था। लेकिन साहित्य और सिनेमा की विधागत भिन्नताओं के कारण इनके बीच एक जटिल संबंध रहा है। साहित्यिक कृति पर बनी फिल्म के साथ एक विशेष समस्या जुडती है। वह यह कि बेशक लेखन शब्द आधारित होता है लेकिन उसमे भी बिम्बात्मकता होती है। रचना पढने के साथ पाठक के मस्तिष्क में एक बिम्ब बन जाता है। अगर फिल्म के दृश्य पहले से बने बिम्ब के साथ असंगत हो तो दर्शक को फिल्म के आस्वादन में बाधा महसूस होती है।  इसलिए यह प्रश्न विचारणीय हो जाता है कि आखिर निर्देशक फिल्म का निर्माण करते समय मूल कृति में परिवर्तन करता ही क्यों हैं?

सिने रूपांतरण के क्रम में, मूल कृति में बदलाव के पीछे कई कारण होते हैं। बदलाव का एक बड़ा कारण यह है की साहित्य और सिनेमा दो अलग माध्यम हैं इसलिए कुछ बदलाव माध्यम की सीमाओं के कारण मजबूरन करने पड़ते हैं। इसके अलावा, फिल्म निर्माण एक टीम-वर्क है और इस कार्य को सुविधाजनक तरीके से संपन्न करने के लिए भी निर्देशक मूल कृति में कुछ ज़रूरी बदलाव करता है। निर्देशक स्वयं एक कलाकार होता है और दूसरे कलाकारों की तरह उसका मन कुछ रचनात्मक छूट चाहता है। अपने रचनात्मक मन को संतुष्ट करने के लिए वह मूल कृति में बदलाव करता है। सिने रूपांतरण के दौरान मूल कृति में किए जाने वाले बदलावों की एक वजह यह भी है कि फिल्म-निर्माण एक उद्योग है जिसमे बड़ी मात्रा में पूंजी लगती है। फिल्म-निर्माण के पीछे एक उद्देश्य किए गए निवेश पर लाभ अर्जित करना होता है जिससे टीम को वेतन आदि और निवेशकों को लाभ दिया जा सके। इसलिए लाभ को अधिकतम करने के लिए निर्देशक देश-काल व समाज-संस्कृति को ध्यान में रखते हुए कुछ बदलाव करता है। इन बदलावों के माध्यम से वह कृति को देश-काल के साझे मूल्यों के साथ समायोजित करने का प्रयास करता है ताकि आम दर्शक फिल्म को अपने से जोड़ सके। विनोद दास ‘भारतीय सिनेमा का अंतःकरण’ पुस्तक में लिखते हैं कि ‘कुछ फिल्मकार अपनी प्राथमिकताओं के मद्देनजर मूल कहानी से छूट लेते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि फिल्मकार साहित्यिक कृति की मूल संवेदनाओं को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहते हैं। किन्तु फिल्म माध्यम की आत्यंतिक ज़रूरतों को पूरा करने की दृष्टि से उन्हें भी कथा में मामूली रद्दोबदल करना पड़ता है।’2  

कुछ ऐसी ही बात डॉ विजय कुमार मिश्र, ‘हिंदी साहित्य और सिनेमा : रूपांतरण के आयाम’ पुस्तक में लिखते हैं| वह कहते हैं- ‘किसी भी साहित्यिक कृति के सिनेमाई रूपांतरण के क्रम में एक प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण होता है वह यह कि कृति की आत्मा अथवा उसके संवेदनात्मक उद्देश्य के साथ किस प्रकार ट्रीट किया जाए। साहित्य और सिनेमा के भिन्न कलारूप होने के चलते साहित्य से सिनेमा तक की यात्रा के क्रम में आवश्यक परिवर्तन अवश्यंभावी है। परन्तु यह परिवर्तन कितना, किस प्रकार और किस हद तक हो कि कृतिकार के संवेदनात्मक उद्देश्यों की रक्षा हो सके, उसके पाठकों की रुचि और धारणाओं को चोट न पहुँचे।’3  इसका अर्थ है कि निर्देशक को भी यह अधिकार नहीं कि वह लेखक के साहित्यिक स्टैंड (लिटरेरी स्टैंड) को विरूपित करे। निर्देशक लेखक की इच्छा के खिलाफ़, व्यावसायिक फायदे की चाहत में ऐसा कर बैठते हैं। इसलिए फिल्म में अनावश्यक बदलाओं की पहचान ज़रूरी हो जाती है। मन्नू भंडारी की चर्चित कहानी “यही सच है”(1966) पर 1974 में रजनीगंधा फिल्म बनी। फिल्म के निर्देशक हैं- बासू चटर्जी। यहाँ रजनीगंधा के माध्यम से सिने रूपांतरण के आयामों को समझने का प्रयास किया गया है और साथ में यह भी जानने की कोशिश है कि एक फिल्म के रूप में ‘रजनीगंधा’ मूल कृति ‘यही सच है’ के साथ न्याय करने में कितनी सफल हुई है?

निर्देशक बासु चटर्जी ने फिल्म का नाम कहानी के शीर्षक से अलग रखा है। कहानी का शीर्षक है- ‘यही सच है’ और फिल्म का नाम ‘रजनीगंधा’ है। इस परिवर्तन का कारण यह हो सकता है कि “यही सच है” शीर्षक बेहद अमूर्त प्रकृति का है। कहानी का पाठक वर्ग साक्षर होता है इसलिए शीर्षक मूर्त हो या अमूर्त, उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता बशर्ते कि वह जिज्ञासा उत्पन्न करने में सक्षम हो और कहानी के उद्देश्य से सुसंगत हो। लेकिन फिल्म पूर्ण रूप से अलग माध्यम है। दृश्य माध्यम होने के कारण फिल्म कहानी की तुलना में एक बड़े वर्ग को टारगेट करती है। इस वर्ग में साक्षर-निरक्षर, ग्रामीण-शहरी सभी आ जाते हैं। ऐसे में अमूर्त शीर्षक का स्कोप बहुत कम रह जाता है। मूर्त शीर्षक जन-सामान्य में फिल्म के लिए आकर्षण बढ़ा देता है। कहानी में रजनीगंधा के फूलों का जिक्र बार-बार आया है। यह जिक्र जब भी आया है, प्रेम का प्रतीक बनकर आया है। रजनीगंधा के फूलों के प्रति दीपा का आकर्षण संजय के प्रति उसके प्रेम का और फूलों से तटस्थता निशीथ के प्रति झुकाव का प्रतीक है। “यही सच है” शीर्षक जिस दुविधा या ‘प्रेम में विचलन के सच’ की ओर इशारा है, रजनीगंधा के फूल भी उसी तरफ संकेत कर रहे हैं। इसलिए शीर्षक में फेर-बदल रचना के मूल प्रभाव के साथ कोई समझौता नही होने देता। यह निर्देशक की रचनात्मकता ही है जिससे वह कहानी के मर्म और फिल्म के आर्थिक पक्ष के बीच आसानी से सामंजस्य स्थापित कर लेता है।

           मन्नू भंडारी की कहानी जिन दो स्थानों पर घट रही है, वे कानपुर और कलकत्ता हैं। डायरी शैली में लिखे होने के कारण इन दो स्थानों के नाम से एंट्री मिलती हैं परन्तु फिल्म में ये स्थान बदलकर क्रमशः दिल्ली और मुंबई कर दिए गए हैं। इसके अलावा पात्रों के नाम में भी फेर-बदल दिखता है। कहानी के निशीथ के नाम में परिवर्तन कर नवीन (दिनेश ठाकुर) कर दिया गया है। जहाँ तक पात्र के नाम में परिवर्तन का सवाल है, यह जटिलता के चलते किया गया लगता है। निशीथ की तुलना में नवीन उच्चारण की दृष्टि से सरल है साथ ही बेहद आम नाम है। आम दर्शक सहज ही इस नाम से अपने को जोड़ लेता है। संजय (अमोल पालेकर) और दीपा (विद्या सिन्हा) पहले से ही सरल नाम हैं इसलिए इनमें किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन करने की संभावना ही नहीं थी। जहाँ तक स्थानों के नाम में बदलाव का सवाल है, इसका भी निश्चित कारण नज़र आता है। हम जानते हैं कि कहानी एकल विधा है। लेखक अपने विचारों को एक पेपर और पेन की सहायता से कहानी के रूप में उतार सकता है। अन्य कारक इसमें न के बराबर भूमिका निभाते हैं जबकि फिल्म निर्माण एक टीम वर्क होता है। निर्देशक, कैमरामैन, मेक-अप आर्टिस्ट्स, अभिनेता, अभिनेत्री आदि की एक पूरी टीम एक साथ मिलकर कार्य करती है। आज तो तकनीक ने इतना विकास कर लिया है कि एक छोटे से कैमरे से भी थोड़ी-बहुत शूटिंग हो ही जाती है। परन्तु सत्तर के दशक में शूटिंग के लिए भारी-भरकम कैमरा सेटअप की आवश्यकता होती थी। ऐसे में शूटिंग के लिए स्थान का चुनाव टीम की सहूलियत और सुविधाओं की उपलब्धता को ध्यान में रखकर किया जाता होगा। दिल्ली और मुंबई महानगर हैं जिनमें सभी सुविधाएँ आसानी से मिल जाती हैं। साथ ही मुंबई शहर फिल्म उद्योग का केंद्र भी है। इसलिए निर्देशक ने स्थानो में बदलाव किया होगा। एक कारण यह भी हो सकता है कि इन दोनों शहरों से हर भारतीय परिचित है। सुदूर दक्षिण का व्यक्ति कानपुर से अनभिज्ञ हो सकता है परन्तु दिल्ली, मुंबई से नही। इन शहरों में कई स्थान इतने प्रसिद्ध हैं कि उन्हें पृष्ठभूमि में दिखाने भर से दर्शक जान लेता है कि कौन-से शहर की बात हो रही है। विशेष सूचना देने की आवश्यकता ही नहीं रहती। जैसे दिल्ली के लिए इंडिया गेट और मुंबई के लिए गेटवे-ऑफ़-इंडिया को दिखा देना पर्याप्त होता है। इसके अलावा कलकत्ता की तुलना में मुंबई की जीवन-शैली भी आकर्षक है। मायानगरी का आकर्षण दर्शकों को खींचता रहा है। संभवतः निर्देशक ने इस पक्ष को भी ध्यान में रखकर उपरोक्त बदलाव किया होगा।

               बासु चटर्जी की इरा मन्नू भंडारी की इरा की तुलना में आधुनिक और बहिर्मुखी व्यक्तित्व की है। पूरी कहानी में इरा का चरित्र ही ऐसा है जहाँ निर्देशक जितनी चाहे उतनी रचनात्मक छूट ले सकता है। क्योंकि कहानी की दृष्टि से यह उतना महतवपूर्ण चरित्र नहीं है। अतः निर्देशक ने रचनात्मक छूट लेते हुए इरा के चरित्र को ग्लैमर नगरी मुंबई की जीवन-शैली के अनुरूप परिवर्तित कर दिया है। कहानी की इरा जहाँ एक घरेलू स्त्री है और एक बच्चे की माँ भी है वहीं फिल्म की इरा मुंबई की एक कामकाजी, आजाद-ख्याल महिला है, जो बच्चे के ख़याल से भी कोसों दूर है। इसी चरित्र के माध्यम से मुंबई की पार्टी-संस्कृति को भी निर्देशक फिल्म में दिखा सका है। मुंबई की जीवन-शैली के प्रति आकर्षण आम दर्शकों में हमेशा से रहा है, जिसे साधने की कोशिश यहाँ दिखाई देती है। मुंबई के वातावरण के अनुरूप ही ‘नवीन’ को विज्ञापन निर्देशक के रूप में दिखाया है। कहानी में नवीन का व्यवसाय क्या है, इसका उल्लेख कहीं भी नहीं है जबकि फिल्म में उसे विज्ञापन कंपनी से जुड़ा दिखाया गया है। रचनात्मक छूट लेते हुए ही निर्देशक ने इरा और निशीथ की पहले से ही जान-पहचान दिखाई है और इरा को दीपा और निशीथ की दोबारा मुलाकात में बिचौलिए के तौर पर भी इस्तेमाल कर लिया है। कहानी में दीपा और निशीथ का मुंबई के एक कॉफीहाउस में मिलना इत्तेफाकन हुआ है परन्तु फिल्म में इरा और निशीथ की पहले से जान-पहचान दिखायी गई है। इरा ही दोनों की दोबारा मुलाकात कराती है। रचनात्मक छूट का दूसरा सबसे बढ़िया उदहारण है- रंगनाथन के माध्यम से ऑफिस पॉलिटिक्स और दफ्तरों में भाई-भतीजावाद की संस्कृति का चित्रण। यह प्रसंग मूल कहानी में कहीं भी नहीं है लेकिन फिर भी कहानी में बहुत अच्छे से फिट हो गया है। एक प्रेम कहानी के भीतर भी निर्देशक ने सामाजिक सरोकारों के लिए गुंजाइश पैदा कर ली है। कहानी पर फिल्म बनाते समय यूं भी कई प्रसंगों को जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। 
  
जहाँ लेखक का अस्त्र कलम होता है वहीं निर्देशक का अस्त्र होता है- उसका कैमरा। कहानी में शब्द ही एकमात्र साधन होता है जबकि फिल्म चित्र, ध्वनि-संगीत, शब्द, अभिनय जैसे अनेक साधनों का एक संयोजन है। फ़िल्म एक दृश्य माध्यम है, जिसमें मुख्यतः दृश्यों के प्रवाह के माध्यम से गति होती है। बहुत शब्दों में लिखकर समझाई जाने वाली बात कैमरा कुछ दृश्यों को दिखाकर आसानी से समझा देता है। यह इस माध्यम की एक खूबी है। दोनों माध्यम में इस अंतर के चलते कुछ बदलाव स्वाभाविक तौर पर करने पड़ते हैं। कहानी की कलकत्ता एंट्री में टैक्सी में दीपा के मन में उठे तूफ़ान को दर्शाने के लिए एक भी शब्द की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि कैमरा इस काम को बखूबी कर सकता था लेकिन निर्देशक ने एक गीत का प्रयोग करके इस सीन को फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा बना दिया है। यह दृश्य और शब्द के बेहतरीन तालमेल का उदाहरण है। हालाँकि फिल्म में जो एक बात कहीं कहीं खटकती है वह यह कि कुछ हिस्सों में दृश्य को फ्रीज करके पार्श्व से संवाद बुलवाए गए हैं। लेकिन इस एक गीत और टैक्सी के दृश्य का कॉम्बिनेशन इस बात का प्रमाण है कि गीत जोकि हिंदी सिनेमा का एक ज़रूरी अंग बन चुका है, उसका उपयोग निर्देशक कितने रचनात्मक तरीके से फिल्म में किसी मोड़ पर कथ्य को स्पष्ट करने के लिए कर सकता है। यह ऐसा सीन बन पड़ा है कि कई दिनों तक ज़हन से निकलता ही नही। गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं- कई बार यूँ भी देखा है, / ये जो मन की सीमा रेखा है, /मन तोड़ने लगता है।

फिल्म में दीपा और उसके परिवार के संबंधों में भी बदलाव किया गया है। जहाँ कहानी में उनके बीच तनाव के संकेत हैं वहीं फिल्म में उनके संबंध बहुत मधुर दिखाए गए हैं। हालाँकि फिल्म में भी दीपा के भाई-भाभी के दृश्य कम ही हैं और बस शुरुआती भाग में हैं। प्रश्न उठता है कि पारिवारिक संबंधों में बदलाव करके निर्देशक ने किस प्रकार के हित को साधने का प्रयास किया है? संभवतः सत्तर के दशक में एक ऐसी लडकी के साथ दर्शकों की सहानुभूति जोड़ना मुश्किल रहा होगा जो परिवार से अलग अकेली रहकर पढाई कर रही है और दो पुरुषों से प्रेम को लेकर दुविधा में है। फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर अपने लेख ‘फ़िल्म रिव्यु : रजनीगंधा - अ वूमन्स नैरेटिव ऑर पॉलिटिक्स ऑफ़ अपीज़मेंट?’ में अपर्णा संजय लिखती हैं- ‘A feminist criticism of Rajnigandha shows that it indulges in an effort to make Deepa’s character more socially acceptable by subtly removing the important socio-cultural underpinnings which were present in Bhandari’s story.’4  परिवार से व्यक्ति के संबंध कैसे हैं, इसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है। परिवार के साथ संबंध तनावपूर्ण होने से व्यक्ति में असुरक्षा की भावना बढ़ती है। एक पुरुष की अपेक्षा स्त्री के व्यक्तित्व पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इस परिवर्तन से मन्नू भंडारी की दीपा में जो असुरक्षाबोध घर-परिवार से दूर रहने के कारण पैदा हुआ था, उसका स्वाभाविक आधार खतरे में पड़ गया है। लेकिन निर्देशक ने पारिवारिक संबंधो में बदलाव से हुई क्षति की भरपाई दीपा के स्वप्न के दृश्य को जोड़कर की है। 

  फिल्म के ओपनिंग सीन में दीपा के स्वप्न के दृश्य को लिया है। इस स्वप्न में दिखाया गया है कि दीपा सपना देख रही है कि एक सरपट भागती रेलगाड़ी में वह अकेली है। घबराकर वह एक स्टेशन पर उतर जाती है लेकिन पीछे मुड़कर देखती है तो रेलगाड़ी में बहुत सारे लोग बैठे दिखते हैं और रेलगाड़ी चलने को तैयार है। दीपा भागकर उसमे चढ़ने की कोशिश करती है लेकिन कोशिश करने पर भी चढ़ नहीं पाती और गिर पड़ती है। रेलगाड़ी में बैठे लोग उस पर हँस पड़ते है। इसी के साथ उसकी नींद टूट जाती है। यह सपना दीपा के असुरक्षाबोध का प्रतीक है। वह जीवन की रेलगाड़ी में अकेली सफ़र करने से डरती है।   मन्नू भंडारी की दीपा अकेली रहती है इसलिए उसमे असुरक्षाबोध का अंदाजा पाठक सहज ही लगा सकता है। लेकिन रजनीगंधा की दीपा परिवार के साथ रहती है, उसमें भी भावी जीवन के प्रति असुरक्षाबोध है और इसे दिखाने के लिए फिल्मकार ने स्वप्न वाले सीन को जोड़ा। यही असुरक्षाबोध दीपा का मूल व्यक्तित्व है जिसके कारण निशीथ की और भावनात्मक झुकाव होने के बावजूद वह संजय के प्रेम में प्राप्त सुरक्षा को नकार नहीं पाती।

 मन्नू भंडारी की कहानी की नायिका दीपा शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री है और अपने करियर को लेकर बहुत जागरूक है। कहानी की शुरुआत में ही इस ओर एक छोटा सा संकेत है। संजय हमेशा की तरह उस समय पर नहीं पहुँच पाया है जो उसने दीपा को मिलने के लिए दिया था। इससे नाराज़ दीपा सोचती है- ‘हमेशा संजय अपने बताए हुए समय से घंटे-दो घंटे देरी करके आता है, और मैं हूँ कि उसी क्षण से प्रतीक्षा करने लगती हूँ। उसके बाद लाख कोशिश करके भी तो किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाती। वह क्यों नहीं समझता कि मेरा समय बहुत अमूल्य है; थीसिस पूरी करने के लिए अब मुझे अपना सारा समय पढ़ाई में ही लगाना चाहिए। पर यह बात उसे कैसे समझाऊँ!’5 यहाँ तक तो कहानी और फिल्म कदम से कदम मिलाकर चलती हैं लेकिन फिल्म के अंतिम हिस्से में हमें जो दीपा दिखती है वह कहानी की दीपा से कुछ अलग है। फिल्म के अंतिम दृश्य में संजय के प्रमोशन की खबर और दीपा का मुंबई नहीं जाने का निर्णय कहानी में कहीं नहीं है। कहानी की दीपा के पास निशीथ को चुनने का विकल्प नहीं है इसलिए वह संजय को चुनती है परन्तु फिल्म की दीपा एक कदम आगे जाकर अपने करियर पर संजय को वरीयता देती है। मन्नू भंडारी की कहानी के अंत में हम देखते हैं कि दीपा मुंबई न जाने को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करती परन्तु निर्देशक ने फिल्म की दीपा से बुलवाया है कि उसे मुंबई नहीं जाना। यह परिवर्तन इतना छोटा सा है कि सामान्यतः दर्शक का इस ओर ध्यान ही नहीं जाता। फ़िल्मकार द्वारा किया गया यह बदलाव दरअसल भारतीय मूल्यों की उपज है जहाँ एक स्त्री की प्राथमिकता पति और घर हैं। करियर में हाथ आया एक महत्वपूर्ण अवसर  एक स्त्री के लिए यहाँ ज्यादा महत्त्व नही रखता। शायद, सत्तर के दशक का दर्शक एक अकेली महिला और उसके विवाहपूर्व संबंधों को स्वीकारने को तैयार नहीं था। इसलिए बासु चटर्जी ने आखिरी सीन में दीपा को एक आदर्श पारंपरिक भारतीय स्त्री की प्रतिकृति दिखाया है। लेकिन हमें यह भी नही भूलना चाहिए कि एक ऐसे दौर में जब सिनेमा में जब लीड रोल में पुरुष ही होता था, बासु चटर्जी ने एक ऐसी महिला को केंद्र में लेकर लिखी गई कहानी पर फिल्म बनाने का साहस किया जो दो पुरुषों के प्रति अपने प्रेम को लेकर दुविधाग्रस्त है। 

निष्कर्ष  

कहानी के सिने रूपांतरण की प्रक्रिया में जो बदलाव किये हैं वे अलग-अलग कारणों से किये गए प्रतीत होते हैं। दीपा का परिवार के साथ रहना, आखिरी सीन में मुंबई जाने से इंकार करना आदि दर्शक की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण किए गए लगते हैं। शहरों के नाम में परिवर्तन, पड़ौसी के बच्चे का चयन, निशीथ के नाम में परिवर्तन यह सब सुविधा और जटिलता से बचने के लिए किया गया लगता है। दीपा और नवीन के ब्रेक-अप की कहानी, दीपा को सी-ऑफ़ के लिए संजय का स्टेशन पर प्रकट होना, रंगनाथन और ऑफिस-पॉलिटिक्स का जिक्र, ओपनिंग सीन में दीपा के सपने का दृश्य, इरा और नवीन की पहले से जान-पहचान और नवीन की पेशेगत जानकारी यह सब निर्देशक के रचनात्मक बदलावों के अंतर्गत आते हैं। फिल्म एक दृश्य-श्रव्य विधा है जबकि कहानी पाठ्य-विधा है इसलिए फिल्म का आकर्षण सामान्यतः अधिक होता है। परन्तु साहित्यिक कृति पर बने सिनेमा के प्रभाव को हमेशा मूल कृति के सन्दर्भ में ही देखा जा सकता है। फिल्म के लिए मूल कृति एक मानक बन जाती है। इसलिए मूल कृति से फिल्म की तुलना बार-बार होती है। रजनीगंधा एक प्रभावशाली फिल्म है, जो मूल कृति की संवेदना को लगभग उसी रूप में दर्शक तक पहुँचाने में सफल रही है। कहानी व्यावसायिक हितों से परिचलित होकर नहीं लिखी जाती इसलिए उसे टिकट खरीदकर फिल्म देखने वाले दर्शक की रुचि और सांस्कृतिक रुझान के अनुसार चलने की बाध्यता नहीं होती। वह बिना दबाव के अपनी बात पाठको तक रखती है जबकि फ़िल्मकार इतना जोखिम लेना अफोर्ड नहीं कर सकता। यही कारण है कि उसे फिल्म की कहानी में बदलाव करने की जरूरत पड़ती है। मेरे ख़याल से युक्तियुक्त परिवर्तन कहानी पर बनाई गई फिल्म को और अधिक रोचक ही बनाते हैं क्योंकि इन छोटे मोटे बदलावों की बदौलत फिल्म कहानी की हूबहू नक़ल होने से बच जाती है। यह बात भी गौर करने लायक है कि निर्देशक बासु चटर्जी ने कृति के मूल संवेदनात्मक उद्देश्यों से किसी भी प्रकार कोई अन्याय नहीं होने दिया है। उन्होंने साहित्यिक प्रतिबद्धता और व्यावसायिक हितों में सामंजस्य साधने का भरसक प्रयत्न किया है और उसमे वे सफल भी रहे हैं। इसी के चलते ‘रजनीगंधा’ साहित्यिक कृतियों पर बनी सफलतम फिल्मों में गिनी जाती है। 


आधार सामग्री 
1)  भंडारी, मन्नू, यही सच है, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 110002 
2)  चटर्जी, बासु, रजनीगंधा, 1974 


सन्दर्भ 
1) मन्नू भंडारी बनाम कला विकास पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड वाद, दिल्ली उच्च न्यायालय, 8 अगस्त, 1986
( https://indiankanoon.org/doc/331111/)
2)  दास, विनोद, भारतीय सिनेमा का अंतःकरण, मेधा बुक्स, दिल्ली, संस्करण, 2003, पृष्ठ 167 
3)   मिश्र, विजय कुमार, हिंदी साहित्य और सिनेमा : रूपांतरण के आयाम, शिवालिक प्रकाशन, दिल्ली,   संस्करण, 2020, पृ. 134 
4) संजय, अपर्णा, फ़िल्म रिव्यु : रजनीगंधा - अ वूमन्स नैरेटिव ऑर पॉलिटिक्स ऑफ़ अपीज़मेंट?, फेमिनिज्मइनइंडियाडॉट.कॉम, 21 अगस्त, 2020 
(https://feminisminindia.com/2020/08/21/film-review-rajnigandha-womans-narrative-politics-of-appeasement/)
5) भंडारी, मन्नू, प्रतिनिधि कहानियाँ, राजकमल पेपरबैक, बारहवाँ संस्करण, पृष्ठ 9


4 comments :

  1. बहुत अच्छा और जानकारी देने वाला लेख आपके द्वारा लिखा गया । यदि सम्भव हो तो इसमें काग़ज़ कलम लिखा जा सकता है पेपर पेन की जगह और कानपुर लिखा जा सकता है कानपूर के स्थान पर । बाक़ी आपके लेख को बारीकी से पढ़कर बहुत अच्छा लगा जिन आयामों से आपने विषय को देख कर पाठकों को दिखाने का प्रयास किया वे सराहनीय हैं । आशा है आप त्रुटि सुधार यथाशीघ्र करके सूचित करेंगी ।

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  2. बहुत अच्छा और जानकारी देने वाला लेख आपके द्वारा लिखा गया । यदि सम्भव हो तो इसमें काग़ज़ कलम लिखा जा सकता है पेपर पेन की जगह और कानपुर लिखा जा सकता है कानपूर के स्थान पर । बाक़ी आपके लेख को बारीकी से पढ़कर बहुत अच्छा लगा जिन आयामों से आपने विषय को देख कर पाठकों को दिखाने का प्रयास किया वे सराहनीय हैं । आशा है आप त्रुटि सुधार यथाशीघ्र करके सूचित करेंगी ।

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  3. बहुत अच्छा और जानकारी देने वाला लेख आपके द्वारा लिखा गया । यदि सम्भव हो तो इसमें काग़ज़ कलम लिखा जा सकता है पेपर पेन की जगह और कानपुर लिखा जा सकता है कानपूर के स्थान पर । बाक़ी आपके लेख को बारीकी से पढ़कर बहुत अच्छा लगा जिन आयामों से आपने विषय को देख कर पाठकों को दिखाने का प्रयास किया वे सराहनीय हैं । आशा है आप त्रुटि सुधार यथाशीघ्र करके सूचित करेंगी ।

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    1. लेख आपको पसंद आया, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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