व्यंग्य: वैशाली में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

दुनिया में त्राहिमाम मचा था। कई देशों के राजा शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घुसा रहे थे। विलाप करती प्रजा को देखने के लिए न वे आँखें खोलते थे और न ही वायुमंडल से प्राणवायु लेते थे। उनका ऑक्सीजन सिलेंडर वहीं रेत में धँसा था। सिलेंडर सीधा टैंक से जुड़ा था और टैंक ऑक्सीजन प्लांट से। वैशाली के राजा वहाँ से आराम से साँस ले सकते थे। आज महामंत्री ब्रीफिंग के लिए आए तो साथ में एक पैकेट लाए। बोले- महाराज, रेत में से निकलिए। अमेरिका ने आपको पोर्टेबल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की गिफ्ट भेजी है। हर मिनट में यह छः लीटर ऑक्सीजन देता है। आपकी सप्लाई पक्की हो गई, अब जनता की सुध लें। 

महामंत्री से पैकेट लेकर राजा महारानी के कक्ष में पहुँचे। बोले, प्राणप्रिये कपालभाति कर-करके तुम्हारा कपाल प्रबुद्ध और काया तन्वंगी हो गई है। यह ऑक्सीजन कंसंट्रेटर रखो और निरापद रहो। मैं राजा हूँ, प्रजा महामारी झेल रही हो तो मैं महल में नहीं रह सकता। मैं अपने सुरक्षा बबल में खुश हूँ। कंसंट्रेटर पाकर महारानी अति प्रसन्न हुई। वस्तुतः वह सेनापति के वियोग और उसकी चिंता में घुली जा रही थी। वह गुप्तमार्ग से सेनापति के रनिवास में पहुँची और बोली- हे प्रिय, तुम्हें रात-दिन राज्य में घूम-घूम कर कानून और व्यवस्था को मुरब्बा बनने से रोकना होता है, यह कंसंट्रेटर रखो, तुम्हारे प्राण बचेंगे तो मेरा जीवन सार्थक होगा। 

महारानी के सुरंग में लौटते ही सेनापति छद्मप्रेम से बाहर निकल आया। विपक्ष की कद्दावर नेत्री ही उसकी मूल प्रेमिका थी। वही इस कठिन समय में भी रोज राजा को चेतावनी-पत्र लिखती थी और प्रेस को थमा देती थी। राजा पर उसे कतई भरोसा नहीं था कि वह कभी ऐसे पत्रों को पढ़ेगा और मानेगा कि उसके राज्य में विपक्ष जैसा भी कुछ है। मध्यरात्रि हुई। सारे खुफिया तंत्र की नजरों में धूल झोंक कर सेनापति अपनी प्रेमिका से मिला और उसे अमेरिकी कंसंट्रेटर उपहार में दे दिया। विपक्षी नेत्री की जान में जान आ गई। अन्यथा इन दिनों उसके खास भी उसकी सुध नहीं ले रहे थे और दरबार में झाड़ू-पोछा लगाने का अवसर तलाश रहे थे। उसने सेनापति को जी भर प्यार करने दिया और राजा के सारे भेद उगलवाती रही।

भोर हुई। टीवी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ में राजा के सारे भेद सार्वजनिक हो रहे थे। विपक्षी नेत्री ने प्रियतम एंकर को अपने घर कॉफी पर बुला कर राजा के सारे भेद उगल डाले थे और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उसे उपहार में दे दिया था। कंसंट्रेटर के दम पर जनतंत्र का चौथा स्तंभ सारे दिन मुखर बना रहा। राजा से जनता वैसे भी थक चुकी थी। राजा की चालबाजियों के सनसनीखेज उद्घाटन से जनता मुर्दा ही बनी रही। इसके चलते राजा के अंधभक्त और निष्ठावान हो गए। राजद्रोही चैनल की ईंट दर ईंट उखाड़ना उनका अंतिम ध्येय हो गया। दिन भर चिल्ला-चिल्ला कर एंकर बहुत थक चुका था। वह गला तर करना चाहता था। वह अपनी सुपरिचित गलियों से गुजरते हुए नगरवधू मित्र के वीआईपी रूम में दाखिल हो गया। नगरप्रिया ने संगीत, नृत्य और मादक अदाओं से, मायूस एंकर में हमेशा की तरह नई जान भर दी। ऑक्सीजन कंसंट्रेटर वैशाली की नगरवधू के हाथों में आकर धन्य हो चुका था। 

रात्रि का चौथा प्रहर होने वाला था। योगासन करने का सबसे मुफीद समय, शांत और शीतल पवन से लबरेज आसमान। अपने बगीचे में प्रातः भ्रमण की तैयारी करते हुए राजा के कानों में पायल की छन-छन गूंज उठी। राजा ने शयनकक्ष नहीं छोड़ा, राष्ट्रप्रिया का सानिध्य उनके सारे तनाव दूर कर गया। वे खुश हो कर बोले- सुप्रिया, यह लो हीरे का हार। हीरा व्यापारी लंदन भागते-भागते यहाँ छोड़ गया था। तुम्हारे ग्रीवा तल पर अद्भुत लगेगा। सुप्रिया बोली- हे राष्ट्रनाथ, बाहर बहुत आपदा है। कठिन समय है। जनता साँस नहीं ले पा रही है। अस्पतालों में बिस्तर खाली नहीं है, दवाइयाँ नहीं है, ऑक्सीजन नहीं है। इस ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का उपहार आप स्वीकारें। आप जीवित रहेंगे, तो राष्ट्र बचेगा, राष्ट्रभक्त बचेंगे। सुप्रिया लौट गई। वही कंसंट्रेटर देख राजा खिन्न हो गए, किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे और पुनः रेत के घरोंदे में घुस गए। 

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