श्रद्धाञ्जलि: माँ और अहिंसा की सीख

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


पीड़ा के दिनों में अहिंसक समझ बिलकुल अलग हो सकती है। इस बात की अनुभूति मुझे अपनी माँ के देहांत के बाद हुई है। उसे पूर्णतया व्यक्त करना मेरे लिए कठिन है। लेकिन जो अनुभूति है वह सत्यान्वेषी है और यथार्थ भी है। किसी भी समाज में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु को एक कठिन परीक्षा भी कहा जा सकता है। यह परीक्षा की घड़ी विचित्र होती है। इसमें आत्मा की मुक्ति होती है तो उससे जुड़े लोगों के लिए पीड़ादायी समय होता है। उसे शोक कहा गया है। शोक अपने आप में कष्ट का चरम है किंतु गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि यह आत्मा का परमसत्ता के साथ विलय का क्षण है। इसमें देहांत होता है। हिंदू धर्म व रीति की समझ में इस काल में ऐसा कहा जाता है कि शरीर छोड़कर आत्मा परमसत्ता में विलीन हो जाती है। शरीर की अंतिम क्रिया के अनुसार लोग यह मान लेते हैं कि यह संसार नश्वर है और शरीर पंचमहाभूतों से विनिर्मित हुई थी और उसी में मिल गई। आत्मा परमआत्मा में मिल गई। पर इसे ऐसा ही क्यों समझा जाए? यदि ऐसा नहीं है तो इसे किस प्रकार समझा जाए? यदि ऐसा ही है तो उसे किस प्रकार समझा जाए? यह कुछ अनसुलझे सवाल हैं जो वियोग में समझ में नहीं आते।

श्रीमती प्रेमा त्रिपाठी
(महापरिनिर्वाण: 5 मई 2021)
यह एक ऐसा समय है जब मनुष्य अपने अच्छे और बुरे समय को स्मरण करता है। वह आंकलन करता है कि जो मेरा अपना था, जो हमसे विछुड़ गया, उसके लिए हमने क्या किया? उसके साथ हमने क्या नहीं किया? उस जीव की इच्छाएँ क्या थीं? उसके जीवन के उज्ज्वल पक्ष क्या थे? उसके त्याग और समर्पण के बदले हमने क्या अपना कर्तव्य निर्वहन किया या कुछ छूट गया? ऐसे अनेकों सवाल होते हैं, जो बेचैन करते हैं और ऐसे अनेकों सन्दर्भ होते हैं, जो पीड़ा में भी असहज होने और अपने किए और संतोष करने के लिए हृदय को समझाते हैं। ऐसा प्रत्येक व्यक्ति के साथ होता है जो ठीक-ठीक सोचता है और अपने अधिकार से अधिक अपने कर्त्तव्य को जीवन का अवसर मानता है। 

मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य है। इस सृष्टि में तो मृत्यु की अनेकों गाथाएँ हैं। जो जन्मा है उसका अंत होना है। जिसकी उत्पत्ति है उसकी समाप्ति भी सुनिश्चित है। लेकिन किए गए जीवन के व्यवहार, आचरण सदैव जीवित रहते हैं। इस सांसारिक जीवन में, लोग यह समझ पाते कि हमारे जीवन के आचरण अच्छे ही हों, दूसरों के लिए हों, दूसरों के प्रति हों। अगर सही मायने में देखा जाय तो यह दूसरे सुख की अभिलाषा को ही हम प्रेम कहते हैं। दूसरों के प्रति त्याग ही तो प्रेम है। और इस त्याग और प्रेम की सबसे बड़ी वाहक केवल माँ होती हैं। प्रेम ही तो इस जीवन का सार है। माँ से अधिक कोई प्रेम नहीं करता, यह एक अहिंसक बर्ताव है। माँ अपने साहस से प्रेम करती है। यह उसके भीतर ईश्क़रीय गुण है। सबसे बड़ी बात की माँ का प्रेम शाश्वत होता है। उसका प्रेम स्थायी होता है। उसके प्रेम में केवल अच्छाइयां होती हैं। माँ ही अपने समस्त सृष्टि पर समान प्रेम करती है और उसके भाव सबके लिए सर्वोदयी होते हैं।

 इसलिए यह कहा गया है कि मनुष्य के जीवन में संसार की सर्वोत्तम उपलब्धि माँ होती है। वह उदार होती है। करुणा और प्रेम की प्रतिमूर्ति होती है और अपनी संतान के लिए सबसे अधिक समर्पित होती है। वह अपने हर सृजन पर गर्व करती है क्योंकि वह सदैव सोचती है कि जो उसके बच्चों के लिए सुखकारी है, वही तो उसके सुख का आधार है। उसके लिए तो अपनी खुशी भी नहीं होती। वह जीवन भर अपने बच्चों के लिए जीती है। हमने अपने जीवन में देखा कि माँ ने हमको प्यार किया। हम सभी भाई-बहनों को समान प्रेम किया। हमारी खुशी में अपनी खुशी को भूल गई और उसने हमारे लिए ही जीवन जिया बिना किसी आशा व अपेक्षा के। मेरी माँ का नाम श्रीमती प्रेमा त्रिपाठी था। जैसा नाम वैसा गुण उसमें मैं पाया। मानों उसे सबसे प्रेम करना उपहार स्वरूप मिला हो। वह विदुषी थीं। सरल थीं। विनम्र थीं। करुणा की सागर थीं। हमारे लिए तो माँ-पिता से बढ़कर भगवान का भी स्थान कभी न था। अब माँ इस नश्वर संसार में नहीं है लेकिन उसके साथ जिया गया हर पल अविस्मरणीय है। उसके साथ व्यतीत जीवन के हर पल हमें शिक्षा देते हैं। त्याग और समर्पण की शिक्षा। बिना किसी से इच्छा अपेक्षा किए, अपना अधिकतम देना केवल माँ सिखा सकती है। इस बात की सीख केवल माँ से मिल सकती है, केवल इतना नहीं है अपितु वह उसे व्यवहृत करना, आचरण में लाना सिखाती है, यह बड़ी बात है। मेरी माँ साध्वी थी। निर्विकार थी। अप्रतिम थी और उसका जीवन पवित्र था। हमारे जीवन में अगर वह सब गुण आ भी जाएँ तो भी मैं उस जैसा नहीं बना सकता। उतना प्रेम हम में व्याप्त होगा भी तो वैसा गाढ़ा रंग उसमें नहीं होगा।

त्रिपाठी परिवार
अहिंसक सभ्यता का इतिहास अगर लिखा जाए तो उसमें माँ के त्याग, समर्पण, प्रेम और करुणा की जो भावना होती है, जो खुशबू होती है, वह अवश्य अंकित किया जाना चाहिए। माएँ तो अहिंसक होती हैं और दुनिया की और इस सृष्टि की सर्वोत्तम अहिंसक आचरण की मिसाल अगर दी जाए तो वह मेरी दृष्टि से उदाहरण माँ का ही हो सकता है। जैसा मैं अपनी माँ में देखा, महसूस किया। हमारे यहाँ शास्त्रों ने भी माँ को सर्वोच्च स्थान दिया है। माँ को ही हमारे ईश्वर, देवी-देवता, गंधर्व आदि ने, ऋषि-मुनियों, तपस्वियों ने और प्रत्येक अवतार ने आदर दिया है जो आदर इस सृष्टि में और किसी को भी प्राप्त नहीं है। हमें यह प्रतीत होता है कि माँ हमेशा स्वर्ग की अधिकारी होती हैं। क्योंकि ईश्वर ने माँ की उपस्थिति और उसके अनेकशः जीवन के कर्म को पुनीत और दिव्य माना है। किसी भी पुरुष या स्त्री को गर्व होना चाहिए कि उसको किसी माँ ने जना है। उसका प्रत्येक भाग्योदय तो सच कहा जाय तो माँ से ही उद्भूत हुआ है। मेरे भी जीवन का भाग्योदय माँ से हुआ है, यह मेरा पवित्र विश्वास है और दृढ़ विश्वास है।

वस्तुतः जीवन में हम स्वार्थ में जीते हैं। जो हमारा मन है इसलिए स्वार्थ के बस में होकर आचरण करने लगता है। माँ सा मन हो, तो स्वार्थ बिलकुल नहीं होगा। माँ जैसी पवित्रता अगर जीवन में हो तो हमारे जीवन के स्वरूप ही अप्रतिम हो जाए, क्योंकि माँ अप्रतिम होती है, अनूठी होती है। उसके भीतर की मौलिकता हमें संस्कार देती है। मेरी माँ द्वारा मुझे दिए संस्कार ही तो अब उसके जाने के बाद उसकी उपस्थिति होंगे। सबके साथ ऐसा होता है। कुछ उसे जीते हैं, कुछ उन दिए गए अच्छे संस्कारों की भी सद्गति कर देते हैं। लेकिन मैं अपने आपको भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे मेरी जन्मदात्री माँ ने बहुत कुछ दिया। उसके भीतर की इच्छा ही रही होगी, जो बलवती हुई, तभी तो मुझे और मेरे मन के भीतर अहिंसा जैसे विषय पढ़ने के भाव जागृत हुए होंगे। उसकी इच्छा, उसकी अभिलाषा ही तो मेरे जीवन के संस्कार बने होंगे, ऐसी मेरी धारणा है। माँ को खुद का जीवन जीने का वक़्त नहीं मिलता, इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं है। तभी मैंने एक नॉन-प्रोफेशनल विषय ‘अहिंसा’ को लेकर पढ़ाई की, ऐसा प्रतीत होता है। आज जब दुनिया तकनीकी और अधिकतम संग्रह के लिए अच्छे प्रोफेशनल विषयों को लेकर आगे बढ़ने की आग्रही है। ऐसे समय में अहिंसा विषय की ओर मेरी रुझान मैं अपनी माँ के अन्तस् की रुझान या अभिरुचि मानता हूँ। जब इसे पढ़ने गया, तब समझ नहीं आता था, पर अब आ रहा है। इसलिए माँ ने तो मुझे यह भी समझने का अवसर दिया कि वह एक असीम अहिंसक अनुभूति की लौ से इस जगत को अहिंसक बनाना चाहती थी। आज उसकी अनुपस्थिति से रिक्त हुए स्थान केवल मेरे पास शेष हैं। तो क्या वह मेरे को संस्कारित व शिक्षित करके वह करना चाहती थी, जो स्व शरीर से नहीं कर सकी? सच तो यह है कि माँ हर रिक्त स्थान, शेष कार्य करती है अपनी संतानों और पीढ़ियों से। मन में बार-बार उठते ऐसे अनेकों सवाल हैं जो व्यक्त पूर्णतया नहीं हो सकते क्योंकि मनुष्य की मस्तिष्क की सारी बातें कागजों ओर या लिपियों में व्यक्त नहीं हो पातीं। वह आंशिक ही प्रकट कर पाता है। यह भी मुझे समझ में नहीं आता कि वह अभाव में और निम्नतम जरूरतों के साथ क्यों खुश रहती थी? उसके भीतर कोई भी तरीके की लालच-लिप्सा क्यों न थी? यह हमारे लिए एक लेशन-सीख है। यह हमारे लिए एक उदाहरण है जो अपने आप में अनूठा है। मेरी माँ के यह पाठ क्या हमें गढ़ रहे थे बिना किसी व्यक्त के? लेकिन वे सब अब उसकी अनुपस्थिति में व्यक्त हो गए हैं या हो रहे हैं? निःसन्देह, अब वे हमारे साथ रहेंगे जीवन की अंतिम साँस तक।

दुर्लभ और अपरिभाषित कुछ स्मृतियाँ हर माएँ अपनी संतानों के लिए छोड़ जाती हैं। उसे सहेजना तो उन सन्तानों का कर्त्तव्य है, ऐसा ही मुझे प्रतीत होता है। माँ-पिता के मूल्य ही तो सन्तानों के आभूषण होते हैं। और उन आभूषण को धारण करना ही मनुष्य का धर्म है। धर्म अमूर्त नहीं है। वह किसी तरीके से अदृश्य नहीं है। वह तो वरेण्य है। दुनिया का सच्चा धर्म भी माँ-पिता के मूल्यों से निकला पारितोषिक है जो इसे अपना ले वह समझो अमृतमय हो गया क्योंकि अहिंसक और सार्थक प्रेम की अनेकों दुर्लभ स्मृतियाँ मेरी माँ ने मुझे दिया वे अनमोल हैं।

विभिन्न चुनौतियों का प्रभाव हर काल-परिस्थिति को प्रभावित करता है। इसी प्रकार देश में 21वीं सदी का 2020 व 2021 संसार भर के अनेकों लोगों को प्रभावित किया। कोविड-19 के संक्रमण से जूझती दुनिया में इतने तरीके के भय पैदा किए गए कि अनेकों लोग अनचाही मौत के शिकार हुए। अगर इतने भय न पैदा किए जाते और पैनिक न किया जाता तो बहुत से लोग मरते नहीं, जीवित होते। ऑक्सीजन की कमी और सरकारी व्यवस्था के अभाव ने भी लोगों के जीवन को निगल लिया। काश! सभी संवेदनशील होते तो बहुत से लोग ज़िंदा होते। मेरी माँ भी जीवित होती। माँ के साथ भी तो कुछ ऐसा ही हुआ। ऑक्सीजन के अभाव और एम्बुलेंस समय पर न मिलने की वजह से माँ इस लोक से चली गई। वह मरना नहीं चाहती थी। वह जीना चाहती थी। सपने देखती थी, सपने पूर्ण करने की इच्छा रखती थी। हॉस्पीटल के बाहर दो एम्बुलेंस होने के बाद भी अस्पताल प्रशासन ने न ही चालक बुलाया न ही माँ को सही चिकित्सकीय सहयोग किया। यह सूक्ष्म हिंसा कहीं भी नोट नहीं है लेकिन इस प्रकार की हिंसा की गई। हिंसा का मनोविज्ञान सूक्ष्म होता है जो अहिंसक लोगों को मार डालता है। कुछ अकथ कथाएँ अपने साथ ऐसी सूक्ष्म हिंसा से पीड़ा का कारण बनती हैं जो अंदर तक बहुत से लोगों को झकझोर देती हैं। दुनिया भर में ऐसी हिंसाएँ की गईं और अनेकों लोग इसके शिकार हैं लेकिन इन हिंसा की जिम्मेदारी कोई भी लेने को तैयार नहीं है और इसे नियति को यही मंजूर था, ऐसा कहकर छोड़ दिया गया है।

हिंसा की इन प्रवृत्तियों को घटना तो नहीं माना जा सकता। नियति भी नहीं माना जा सकता। किंतु जो अब इस जगत से चले गए उनसे विछुड़े लोगों की पीड़ा का क्या? दुनिया में मृत्युलोक में क्या संतोष कर लेना नियति है। गीता में तो इस नश्वर जगत में कुछ भी न मरने की बातें सही मानी जा सकती हैं तो भावनाएँ केवल मोह के कारण नहीं अस्तित्व में होती हैं अपितु भावनाओं का भी अपना स्थान है। इन प्रश्नों का उत्तर अनुत्तरित है। अनुत्तरित बहुत सी बातें ऐसी भी हैं जो माँ के साथ थीं और अभी भी अंदर से कौंध रहीं हैं अंतस में। जो भी हो अब माँ कभी न मिलेगी और दिल को समझाने के लिए कोई उपाय नहीं है। हिंसा की आवृत्ति इतनी सघन है किंतु माँ के जीवन से मिली अहिंसक आचरण की, प्रेम की और करुणा की जड़ें उतनी ही गहरी हैं जो हमारे जीवन के लिए संबल हैं,  वे हमेशा हमारे जीवन को साहसी बनाएंगी और हमें अपनी प्रेरणा प्रदान करेंगी। हर माँ अपनी संतानों के लिए उत्कृष्ट ही करती होगी, यह नहीं कह सकता लेकिन एक बहुत ही शानदार उक्ति है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं होती। माँ की अनुपस्थिति में उसकी सुंदर छवि मेरे हृदय को आलोकित करेंगी जो मौलिक और ज़िंदगी रौशन करने वाली होंगी। माँ के असीम अलौकिक दिव्य आत्मा को प्रणाम। उन सभी उसकी खूबसूरत प्रेरणा को प्रणाम क्योंकि उसके प्रेम से ज्यादा सुंदर इस जगत की समस्त चीजें मिथ्या हैं। दुनिया की अनेकों अवधारणा माँ की परिभाषा के समक्ष बौनी हैं क्योंकि जो इतनी सुंदर है उसकी श्रेष्ठता हर जीवन के लिए अप्रतिम उपहार ही है। माँ, को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि😢 सृष्टि की उस परमसत्ता को उस प्रेमपुञ्ज दिव्य आत्मा को समादृत करने की कामना के साथ दुनिया की उन माँओं को भी आदरांजलि जो इस कोविड काल में इस दुनिया में अब नहीं रहीं। पुनश्च यह कहना युक्तियुक्त है और सर्वदा सच है कि अहिंसक सभ्यता के विमर्श में माताएँ सदैव सर्वोच्च पंक्ति में स्मरण होंगी क्योंकि वे त्याग की प्रतिमूर्ति होती हैं प्रेम की निर्झर अविरल धारा सी।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

6 comments :

  1. दिल को छू लेने वाली एवं अंदर तक हिला देने वाला सत्य ।

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  2. दिल को छू लेने वाला एवं अंदर तक हिला देने वाला सत्य ।

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  3. माँ को नमन और बंदन

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  4. माँ को नमन और बंदन

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  5. मां को कोटि कोटि प्रणाम ।

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